कक्षा 7 संस्कृत दीपकम् पाठ 7 ईशावास्यम् इदं सर्वम् समाधान (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 7 संस्कृत दीपकम् (दीपकम्) पाठ 7 ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का सम्पूर्ण समाधान देता है – यह भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकशिपु एवं भगवान् नृसिंह के प्रसिद्ध प्रसंग पर आधारित एक संस्कृत-नाटक है, जिसका केन्द्रीय संदेश है – ‘ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है’। यहाँ नाटक का मूल पाठ, हिन्दी सार, शब्दार्थ-तालिका, तृतीया-विभक्ति एवं लृट्-लकार के व्याकरण-बिन्दु, तथा अभ्यास (वयम् अभ्यासं कुर्मः) के प्रत्येक प्रश्न के मौलिक, परीक्षा-उपयोगी उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ एवं अभिकथन-कारण दिए गए हैं।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (नाटक) एवं भावार्थ
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- वयम् अभ्यासं कुर्मः (अभ्यासः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 7 का सप्तम पाठ ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ एक रोचक संस्कृत-नाटक के रूप में प्रस्तुत है। पाठ का आरम्भ कक्षा के एक संवाद से होता है, जिसमें बालक पूछते हैं – ‘ईश्वर कहाँ है?’ आचार्या बताती हैं कि ईश्वर केवल देवालय में नहीं, अपितु वृक्ष, कक्षा, शिला एवं क्रीडाङ्गण – सर्वत्र व्याप्त है। इसी ‘ईश्वर सर्वत्र अस्ति’ भाव को सिद्ध करने के लिए भक्त प्रह्लाद, दैत्यराज हिरण्यकशिपु, होलिका एवं भगवान् नृसिंह का प्रसिद्ध प्रसंग नाटक के रूप में दिखाया जाता है। अहंकारी हिरण्यकशिपु स्वयं को अमर एवं सर्वशक्तिमान् मानता है तथा अपने भक्त-पुत्र प्रह्लाद को अनेक उपायों से मारने का प्रयास करता है, किन्तु नारायण की कृपा से प्रह्लाद हर बार बच जाता है। अन्ततः भगवान् स्तम्भ से नृसिंह-रूप में प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध करते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव है – ईश्वर सर्वव्यापक है, अहंकार का अन्त निश्चित है, एवं भक्ति की सदा रक्षा होती है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह कथा नृसिंहपुराण एवं श्रीमद्भागवतपुराण में वर्णित है, जिनके रचयिता महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं। ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र का प्रसिद्ध वाक्य है, जिसका अर्थ है – ‘यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है’। पाठ में आचार्या इसी सत्य को बालकों के समक्ष नाटक के माध्यम से सिद्ध करती हैं। नाटक के मुख्य पात्र हैं – राजभटः, सभासदः, हिरण्यकशिपुः, मन्त्री, दैत्यपुरोहितः, सेनापतिः, होलिका, प्रह्लादः, नृसिंहः एवं अध्यापिका। व्याकरण की दृष्टि से यह पाठ तृतीया विभक्ति (उपकरण/करण-अर्थ), लृट्-लकार (भविष्यत्-काल) एवं स्वर-सन्धि (दीर्घ/गुण/वृद्धि) का अभ्यास कराता है।
मूल पाठ (नाटक) एवं भावार्थ
(नाटक के प्रमुख संवाद ज्यों-के-त्यों; साथ में सरल हिन्दी भावार्थ।)
आरम्भिक संवाद (कक्षायाम्)
एकः बालः – मान्ये! ईश्वरः देवालये भवति ।
अध्यापिका – वत्साः! ईश्वरः न केवलं देवालये अपितु सर्वत्र व्याप्तः अस्ति । किम् ‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ इति न श्रुतवन्तः?
बालः – नैव आर्ये! तस्य कः अर्थः?
अध्यापिका – एतत् सर्वं जगत् ईशेन व्याप्तम् अस्ति । ‘ईश्वरः सर्वत्र अस्ति’ इति अर्थः । पुरा कश्चन भवादृशः अल्पवयस्कः बालः ‘ईश्वरः सर्वत्र अस्ति’ इति दर्शितवान् । इदानीं तमेव प्रसङ्गं पठामः । — दीपकम्, कक्षा 7, पाठ 7
भावार्थ: कक्षा में बालक प्रश्न करते हैं कि ईश्वर कहाँ रहता है। आचार्या समझाती हैं कि ईश्वर केवल मन्दिर में सीमित नहीं है, वह सर्वत्र (वृक्ष, शिला, कक्षा, खेल के मैदान) व्याप्त है। ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का अर्थ ही यही है। इसी सत्य को सिद्ध करने हेतु प्रह्लाद का प्रसंग नाटक रूप में पढ़ा एवं अभिनीत किया जाता है।
हिरण्यकशिपोः सभा
दैत्यपुरोहितः – भगवन्! देशे सर्वत्र भवतः एव पूजा भवति । अन्यदेवतानाम् पूजाराधनं न भवति ।
हिरण्यकशिपुः – मम पुत्रकः एव मम शत्रुः अस्ति । कुलकलङ्कः सः प्रह्लादः अहर्निशं मम शत्रोः हरेः गुणगानं करोति ।
सेनापतिः – स्वामिन्! गजस्य पद-दलनेन अपि सः जीवति ।
मन्त्री – रज्ज्वा बद्ध्वा समुद्रमध्ये क्षिप्तवन्तः । तथापि… — (हिरण्यकशिपोः सभा)
भावार्थ: अहंकारी हिरण्यकशिपु स्वयं को अमर एवं सर्वशक्तिमान् घोषित करता है। सभी देवता उससे भयभीत हैं तथा सर्वत्र उसी की पूजा होती है। किन्तु उसका अपना पुत्र प्रह्लाद दिन-रात भगवान् हरि (नारायण) का गुणगान करता है, जिससे वह क्रोधित हो जाता है। हाथी के पैरों से कुचलवाने, रस्सी से बाँधकर समुद्र में फेंकने आदि अनेक उपायों से भी प्रह्लाद नहीं मरता।
होलिका-प्रसंगः
प्रह्लादः – (करौ बद्ध्वा हरिं स्मरति) ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…
(नारायणस्य कृपया प्रह्लादः रक्षितः भवति । ब्रह्मणः वरस्य दुरुपयोगकारणात् अग्निः होलिकाम् एव ज्वालयति । होलिका अग्निदाहात् आर्तनादं कुर्वती प्राणान् त्यजति ।) — (होलिका-प्रसंगः)
भावार्थ: हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को ब्रह्मा से वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाती है। प्रह्लाद ‘ॐ नमो नारायणाय’ का जप करता रहता है। नारायण की कृपा से प्रह्लाद बच जाता है तथा वरदान के दुरुपयोग के कारण अग्नि होलिका को ही जला देती है। इसी से होलिकोत्सव की परम्परा जुड़ी मानी जाती है।
नृसिंहावतारः
प्रह्लादः – ननु हरिः सर्वत्र अस्ति । अस्मिन् स्तम्भे अपि अस्ति ।
(हिरण्यकशिपुः स्तम्भं प्रहरति । महता गर्जनेन नृसिंहः स्तम्भात् बहिः आगच्छति ।)
नृसिंहः – मूढ! पश्य, न त्वमसि भुवि, न च स्वर्गे; न वा पाताले, न च आकाशे; न गृहाभ्यन्तरे, बहिर्भागे वा; नायं दिवसो, न वा रात्रिः; नाहं मनुष्यो, न च पशुः; न अस्त्रेण, न च शस्त्रेण; निजनखैः तव वक्षःस्थलं विदीर्य हनिष्यामि ।
अध्यापिका – एवं बालः प्रह्लादः ‘ईश्वरः सर्वत्र अस्ति’ इति दर्शितवान् । अत एव उच्यते, ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ इति । — (नृसिंहावतारः)
भावार्थ: हिरण्यकशिपु व्यंग्य से पूछता है कि क्या उसका हरि इस स्तम्भ में भी है। प्रह्लाद दृढ़तापूर्वक कहता है – ‘हाँ, हरि सर्वत्र है, इस स्तम्भ में भी’। क्रोध में हिरण्यकशिपु स्तम्भ पर प्रहार करता है और भगवान् नृसिंह-रूप में प्रकट होते हैं। वे ब्रह्मा के वरदान का उल्लंघन किए बिना – न दिन-न रात (सन्ध्याकाल), न भीतर-न बाहर (देहरी पर), न अस्त्र-न शस्त्र (नखों से) – हिरण्यकशिपु का वध करते हैं। इस प्रकार सिद्ध होता है कि ‘ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है’।
सार (Hindi Summary)
‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ पाठ एक संस्कृत-नाटक है, जो ईशोपनिषद् के सत्य – ‘यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है’ – को कथा-रूप में सिद्ध करता है। कक्षा में जब बालक पूछते हैं कि ईश्वर कहाँ रहता है, तब आचार्या समझाती हैं कि ईश्वर केवल देवालय में नहीं, अपितु सर्वत्र है। इसी भाव को दर्शाने के लिए भक्त प्रह्लाद का प्रसिद्ध प्रसंग नाटक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
दैत्यराज हिरण्यकशिपु अत्यन्त अहंकारी है; ब्रह्मा से वरदान पाकर वह स्वयं को अमर एवं सर्वशक्तिमान् मानता है तथा चाहता है कि सर्वत्र केवल उसी की पूजा हो। किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद परम भक्त है और दिन-रात भगवान् नारायण (हरि) का स्मरण करता है। इससे क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास करता है – हाथी के पैरों से कुचलवाना, ऊँचे पर्वत से गिरवाना, रस्सी से बाँधकर समुद्र में फिंकवाना, तथा होलिका की गोद में बैठाकर अग्नि में जलवाना। प्रत्येक बार नारायण की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहता है, और होलिका अपने वरदान का दुरुपयोग करने के कारण स्वयं अग्नि में जलकर भस्म हो जाती है।
अन्त में हिरण्यकशिपु व्यंग्य से पूछता है कि क्या उसका हरि स्तम्भ में भी है। प्रह्लाद के ‘हाँ’ कहने पर वह क्रोध से स्तम्भ पर प्रहार करता है और भगवान् नृसिंह (आधा मनुष्य-आधा सिंह) प्रकट होते हैं। वे ब्रह्मा के वरदान का उल्लंघन किए बिना – सन्ध्याकाल में, देहरी पर, अपने नखों से – हिरण्यकशिपु का वध करते हैं। इस प्रकार सिद्ध होता है कि ईश्वर सर्वव्यापक है, अहंकार का अन्त निश्चित है तथा सच्चे भक्त की सदैव रक्षा होती है। यही पाठ का संदेश है – ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ईशावास्यम् | ईश्वर से व्याप्त | Pervaded by God |
| राजगम्भीरः | राजाओं में कुशलतम | The best amongst kings |
| कश्चन | कोई व्यक्ति | Someone |
| विजयताम् | विजयी होवे | Let (him) be victorious |
| सर्वशक्तिमान् | सबसे अधिक शक्तिशाली | All powerful |
| यज्ञभागः | यज्ञ-आहुति | Yajña offering |
| आराधनम् | पूजा | Worship |
| दास्यन्ति | देंगे | Shall give |
| ध्यायन्ति | ध्यान करते हैं | Meditate |
| नामकीर्तनम् | नाम जपना | Singing the name in praise |
| सक्रोधम् | क्रोध सहित | With anger |
| खलु (अव्ययम्) | निश्चित रूप से | Indeed |
| कुलकलङ्कः | वंश को कलंकित करने वाला | One who brings ill-fame to the family |
| अहर्निशम् | दिन-रात | Day and night |
| पद-दलनेन | पैरों से कुचलने से | Stamped (by foot) |
| उत्तुङ्गशिखरात् | ऊँचे पर्वत के शिखर से | From the peak of a high mountain |
| रज्ज्वा | रस्सी के द्वारा | By the rope |
| बद्ध्वा | बाँधकर | Having tied |
| क्षिप्तवन्तः | फेंक दिया | (They) threw |
| विचिन्त्य | सोचकर | Having thought |
| द्रक्ष्यामि | देखूँगा | Shall see |
| अलं चिन्तया | चिंता मत करो | Do not worry |
| पितृष्वसः! | हे बुआ! | O paternal aunt! |
| बाढम् | अवश्य | Certainly |
| अन्विष्यसि | ढूँढ़ोगे | (You) shall search |
| करतलध्वनिना | ताली बजाकर | By clap sound |
| प्रज्वलयति | जलाता है | Kindles |
| आर्तनादम् | चिल्लाकर रोना | Cry for help |
| भङ्क्ष्यामि | तोड़ दूँगा | (I) shall break |
| सन्निहितः | पास आया | Came near |
| कालोऽहम् | मैं मृत्यु (यम) हूँ | I am death |
| देहल्याम् | देहरी में | At the threshold |
| निजनखैः | अपने नाखूनों से | By own nails |
| वक्षःस्थलम् | छाती | Chest |
| भिनत्ति | चीरता है | Tears apart |
वयम् अभ्यासं कुर्मः (अभ्यासः)
1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखन्तु —
(क) दैत्यराजः कः?
(ख) के हिरण्यकशिपुं ध्यायन्ति?
(ग) किं देवेभ्यः न दास्यन्ति?
(घ) कस्य दलनेन अपि सः जीवति?
(ङ) राक्षसाः कुतः प्रह्लादं पातितवन्तः?
(च) हिरण्यकशिपुः कस्मात् वरं प्राप्तवान्?
(छ) हरिः कुत्र अस्ति इति कः वदति?
2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु —
(क) के भीताः तिष्ठन्ति?
(ख) प्रह्लादः अहर्निशं किं करोति?
(ग) प्रह्लादं कथं समुद्रे क्षिप्तवन्तः?
(घ) नृसिंहः कथं बहिः आगच्छति?
(ङ) हिरण्यकशिपुः केन स्तम्भं भङ्क्ष्यामि इति वदति?
3. उदाहरणानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयन्तु — (तृतीया-विभक्तिः: एकवचनम् · द्विवचनम् · बहुवचनम्)
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|
| (क) रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
| (ख) चमसेन | चमसाभ्याम् | चमसैः |
| (ग) आचार्येण | आचार्याभ्याम् | आचार्यैः |
| (घ) आसन्देन | आसन्दाभ्याम् | आसन्दैः |
| (ङ) बालिकया | बालिकाभ्याम् | बालिकाभिः |
| (च) पेटिकया | पेटिकाभ्याम् | पेटिकाभिः |
| (छ) मित्रेण | मित्राभ्याम् | मित्रैः |
| (ज) वस्त्रेण | वस्त्राभ्याम् | वस्त्रैः |
4. उदाहरणानुसारं रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु —
(रेखांकित पद के आधार पर प्रश्न बनाइए। यथा – हिरण्यकशिपुः आगच्छति । → कः आगच्छति?)
| वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में) | प्रश्ननिर्माणम् – उत्तर |
|---|---|
| (क) हिरण्यकशिपुः आगच्छति । | कः आगच्छति? |
| (ख) सुरासुराः सर्वे भीताः भविष्यन्ति । | के भीताः भविष्यन्ति? |
| (ग) दैत्यराजः खड्गेन प्रहरति । | दैत्यराजः केन प्रहरति? |
| (घ) अहं प्रह्लादं मारयिष्यामि । | अहं कं मारयिष्यामि? |
| (ङ) तात! हरिस्तु सर्वत्र अस्ति । | तात! हरिस्तु कुत्र अस्ति? |
| (च) पुत्रस्य विषये वक्तुम् इच्छति । | कस्य विषये वक्तुम् इच्छति? |
| (छ) नृसिंहः निजनखैः हिरण्यकशिपुं मारितवान् । | नृसिंहः कैः हिरण्यकशिपुं मारितवान्? |
5. अधः प्रदत्तेषु रिक्तस्थानेषु तृतीया-विभक्त्यन्तानि रूपाणि लिखन्तु —
6. उदाहरणानुसारं संयोज्य लिखन्तु — (स्वर-सन्धि)
| पदच्छेदः | सन्धिपदम् – उत्तर |
|---|---|
| (क) रमा + ईशः | रमेशः |
| (ख) सुर + ईश्वरः | सुरेश्वरः |
| (ग) नाग + इन्द्रः | नागेन्द्रः |
| (घ) गज + इन्द्रः | गजेन्द्रः |
| (ङ) माता + इव | मातेव |
| (च) राम + इति | रामेति |
| (छ) पर + उपकारः | परोपकारः |
| (ज) मम + उपरि | ममोपरि |
| (झ) सूर्य + उदयः | सूर्योदयः |
| (ञ) रामेण + उक्तम् | रामेणोक्तम् |
| (ट) तस्य + उपरि | तस्योपरि |
7. उदाहरणानुसारं वाक्यानि वर्तमानकालतः भविष्यत्-काले परिवर्तयन्तु — (लृट्-लकारः)
| वर्तमानकालः | भविष्यत्कालः – उत्तर |
|---|---|
| (क) सा आपणं गच्छति । | सा आपणं गमिष्यति । |
| (ख) रमा क्रीडाङ्गणे क्रीडति । | रमा क्रीडाङ्गणे क्रीडिष्यति । |
| (ग) बालाः फलानि खादन्ति । | बालाः फलानि खादिष्यन्ति । |
| (घ) ताः योगासनं कुर्वन्ति । | ताः योगासनं करिष्यन्ति । |
| (ङ) अहं नित्यं पठामि । | अहं नित्यं पठिष्यामि । |
| (च) त्वं कस्मिन् विषये वदसि? | त्वं कस्मिन् विषये वदिष्यसि? |
| (छ) आवां पाठं लिखावः । | आवां पाठं लेखिष्यावः । |
| (ज) यूयं शालां गच्छथ । | यूयं शालां गमिष्यथ । |
| (झ) ते बालिके वैद्ये भवतः । | ते बालिके वैद्ये भविष्यतः । |
| (ञ) वयं श्लोकान् स्मरामः । | वयं श्लोकान् स्मरिष्यामः । |
8. उदाहरणानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयन्तु — (एकवचनम् · द्विवचनम् · बहुवचनम् – लृट्-लकारः)
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|
| (क) बालकः कार्यं करिष्यति । | बालकौ कार्यं करिष्यतः । | बालकाः कार्यं करिष्यन्ति । |
| (ख) सः शालां गमिष्यति । | तौ शालां गमिष्यतः । | ते शालां गमिष्यन्ति । |
| (ग) त्वं श्लोकं वदिष्यसि । | युवां श्लोकं वदिष्यथः । | यूयं श्लोकं वदिष्यथ । |
| (घ) अहं पुस्तकं दास्यामि । | आवां पुस्तकानि दास्यावः । | वयं पुस्तकानि दास्यामः । |
| (ङ) छात्रः प्रदर्शनीं द्रक्ष्यति । | छात्रौ प्रदर्शनीं द्रक्ष्यतः । | छात्राः प्रदर्शनीं द्रक्ष्यन्ति । |
| (च) अहं भगवद्गीतां श्रोष्यामि । | आवां भगवद्गीतां श्रोष्यावः । | वयं भगवद्गीतां श्रोष्यामः । |
| (छ) बालिका कथां लेखिष्यति । | बालिके कथां लेखिष्यतः । | बालिकाः कथां लेखिष्यन्ति । |
| (ज) त्वं किं खादिष्यसि? | युवां किं खादिष्यथः? | यूयं किं खादिष्यथ? |
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं।
1. तृतीया विभक्ति का प्रयोग
(क) वाक्य में उपकरण/करण-अर्थ (साधन) में तृतीया विभक्ति होती है।
यथा – हिरण्यकशिपुः खड्गेन स्तम्भं भञ्जयति । · बालकः लेखन्या लिखति । · पितामहः चषकेण क्षीरं पिबति ।
(ख) क्रियाविशेषण/स्वभाववाचक शब्दों में भी तृतीया विभक्ति होती है।
यथा – हिरण्यकशिपुः आश्चर्येण आह । · नृसिंहः क्रोधेन गर्जति ।
2. तृतीया-विभक्तेः रूपाणि
| लिङ्गः / मूलशब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुल्लिङ्ग – बालक | बालकेन | बालकाभ्याम् | बालकैः |
| पुल्लिङ्ग – वृक्ष | वृक्षेण | वृक्षाभ्याम् | वृक्षैः |
| पुल्लिङ्ग – शिक्षक | शिक्षकेण | शिक्षकाभ्याम् | शिक्षकैः |
| पुल्लिङ्ग – तद् (वह) | तेन | ताभ्याम् | तैः |
| पुल्लिङ्ग – किम् (कौन) | केन | काभ्याम् | कैः |
| स्त्रीलिङ्ग – छात्रा | छात्रया | छात्राभ्याम् | छात्राभिः |
| स्त्रीलिङ्ग – शिक्षिका | शिक्षिकया | शिक्षिकाभ्याम् | शिक्षिकाभिः |
| स्त्रीलिङ्ग – गदा | गदया | गदाभ्याम् | गदाभिः |
| स्त्रीलिङ्ग – तद् (वह) | तया | ताभ्याम् | ताभिः |
| स्त्रीलिङ्ग – किम् | कया | काभ्याम् | काभिः |
| नपुंसकलिङ्ग – वन | वनेन | वनाभ्याम् | वनैः |
| नपुंसकलिङ्ग – पुस्तक | पुस्तकेन | पुस्तकाभ्याम् | पुस्तकैः |
| नपुंसकलिङ्ग – फल | फलेन | फलाभ्याम् | फलैः |
| नपुंसकलिङ्ग – तद् | तेन | ताभ्याम् | तैः |
| नपुंसकलिङ्ग – किम् | केन | काभ्याम् | कैः |
3. लृट्-लकारः (भविष्यत्-काले प्रयोगः)
लृट्-लकार का प्रयोग भविष्यत्-काल में होता है। यथा – पठ् धातु:
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | पठिष्यति | पठिष्यतः | पठिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुषः | पठिष्यसि | पठिष्यथः | पठिष्यथ |
| उत्तमपुरुषः | पठिष्यामि | पठिष्यावः | पठिष्यामः |
वाक्य-प्रयोग – बालकः पाठं पठिष्यति । · त्वं पाठं पठिष्यसि । · अहं पाठं पठिष्यामि । · वयं पाठं पठिष्यामः ।
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार)
| विषयः | विवरणम् |
|---|---|
| कथास्रोतः | यह घटना नृसिंहपुराण एवं श्रीमद्भागवतपुराण में वर्णित है; इनके रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने अष्टादश (18) पुराण लिखे। |
| नृसिंहावतार-स्थान | बिहार राज्य के ‘पूर्णिया’ जनपद में बनमनखी-ग्राम के पास ‘सिकलीगढ़ धरहरा’ इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ भगवान् नृसिंह का अवतार माना जाता है। यहाँ माणिक्य-नामक प्रसिद्ध स्तम्भ भी है। |
| होलिकोत्सव | होलिका के दहन से ही होलिकोत्सव की परम्परा जुड़ी है। ‘होलकः’ का अर्थ है – अग्नि में भुना अर्द्धपक्व धान्य (हिन्दी – ‘होरा’)। शास्त्रों में होलिकोत्सव को ‘वासन्तीय-नवसस्येष्टिः’ कहा गया है। |
| अष्टादश पुराणानि (18) | मत्स्य, मार्कण्डेय, भागवत, भविष्य, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त, वायु, वराह, वामन, विष्णु, अग्नि, नारद, पद्म, लिङ्ग, गरुड, कूर्म, स्कन्द। |
| स्मृति-श्लोकः | मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् । अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि प्रचक्षते ॥ |
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. माता-पित्रोः शिक्षकस्य च साहाय्येन मानवानां षोडश-संस्काराणां नामानि लिखन्तु ।
2. पुराणेभ्यः कामपि एकां कथां संगृह्य लिखन्तु, कक्षायां श्रावयन्तु च ।
3. कार्यकलापः – कक्षायाः सर्वे छात्राः मिलित्वा अस्य नाटकस्य अभिनयं कुर्वन्तु ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का अर्थ क्या है?
2. हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद से क्यों क्रुद्ध था?
3. होलिका किस प्रकार अग्नि में जल गई?
4. भगवान् नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किस प्रकार किया?
5. इस पाठ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग किस अर्थ में होता है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।
7. हिरण्यकशिपु के अहंकार एवं उसके परिणाम पर प्रकाश डालिए।
8. नृसिंहावतार से सम्बन्धित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक तथ्यों का वर्णन कीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का अर्थ है—
(क) ईश्वर केवल देवालय में है
(ख) यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है
(ग) ईश्वर कहीं नहीं है
(घ) ईश्वर केवल स्वर्ग में है
2. प्रह्लाद किसका गुणगान करता था?
(क) हिरण्यकशिपोः
(ख) होलिकायाः
(ग) हरेः (नारायणस्य)
(घ) ब्रह्मणः
3. हिरण्यकशिपु ने वरदान किससे प्राप्त किया था?
(क) विष्णोः
(ख) ब्रह्मदेवात्
(ग) शिवात्
(घ) इन्द्रात्
4. होलिका को कौन-सा वरदान प्राप्त था?
(क) अग्नि उसे नहीं जला सकती
(ख) वह अमर है
(ग) जल में नहीं डूबेगी
(घ) वह सर्वशक्तिमान् है
5. भगवान् नृसिंह कहाँ से प्रकट हुए?
(क) आकाशात्
(ख) समुद्रात्
(ग) स्तम्भात्
(घ) पर्वतात्
6. ‘खड्गेन’ पद में कौन-सी विभक्ति है?
(क) प्रथमा
(ख) द्वितीया
(ग) तृतीया
(घ) चतुर्थी
7. लृट्-लकार का प्रयोग किस काल में होता है?
(क) वर्तमान-काल
(ख) भूत-काल
(ग) भविष्यत्-काल
(घ) आज्ञार्थ
8. ‘सुर + ईश्वरः’ का सन्धि-पद है—
(क) सुरीश्वरः
(ख) सुरेश्वरः
(ग) सुरैश्वरः
(घ) सुरोश्वरः
9. नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किससे किया?
(क) खड्गेन
(ख) अस्त्रेण
(ग) निजनखैः
(घ) गदया
10. यह कथा किन पुराणों में वर्णित है?
(क) विष्णुपुराण एवं वायुपुराण
(ख) नृसिंहपुराण एवं श्रीमद्भागवतपुराण
(ग) स्कन्दपुराण एवं पद्मपुराण
(घ) अग्निपुराण एवं नारदपुराण
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): प्रह्लाद को अग्नि नहीं जला सकी।
कारण (R): प्रह्लाद नारायण का स्मरण कर रहा था और नारायण की कृपा से उसकी रक्षा हुई।
2. अभिकथन (A): नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध देहरी पर सन्ध्याकाल में नखों से किया।
कारण (R): इस प्रकार ब्रह्मा का वरदान भी सुरक्षित रहा एवं दुष्ट का अन्त भी हुआ।
3. अभिकथन (A): ‘खड्गेन’ पद में तृतीया विभक्ति है।
कारण (R): करण/उपकरण (साधन) के अर्थ में सदैव चतुर्थी विभक्ति होती है।
4. अभिकथन (A): हिरण्यकशिपु स्वयं को अमर एवं सर्वशक्तिमान् मानता था।
कारण (R): उसे ब्रह्मा से एक अद्भुत वरदान प्राप्त था।
5. अभिकथन (A): ‘ईश्वरः सर्वत्र अस्ति’ इस सत्य को प्रह्लाद ने सिद्ध किया।
कारण (R): प्रह्लाद के कहने पर स्तम्भ से नृसिंह प्रकट हुए, जिससे ईश्वर की सर्वव्यापकता सिद्ध हुई।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- नाटक के पात्र (हिरण्यकशिपु, मन्त्री, सेनापति, होलिका, प्रह्लाद, नृसिंह) एवं उनके प्रमुख संवाद याद रखें।
- तृतीया-विभक्ति के रूप (बालकेन-बालकाभ्याम्-बालकैः, केन-काभ्याम्-कैः) तालिका सहित याद करें।
- लृट्-लकार (भविष्यत्-काल) के रूप – पठिष्यति, गमिष्यति, करिष्यति आदि – कण्ठस्थ करें।
- स्वर-सन्धि (रमा+ईशः=रमेशः, पर+उपकारः=परोपकारः) के नियम समझकर अभ्यास करें।
- ‘पूर्णवाक्येन’ एवं ‘एकपदेन’ वाले प्रश्नों के निर्देश का ध्यान रखें – उसी रूप में उत्तर लिखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- करण-अर्थ में तृतीया के स्थान पर चतुर्थी/द्वितीया लिख देना – साधन में सदा तृतीया।
- लृट्-लकार को आज्ञार्थ (लोट्) समझ लेना – लृट् भविष्यत्-काल का है।
- सन्धि में गुण/दीर्घ का भ्रम – अ+ई = ए (सुरेश्वरः), अ+उ = ओ (सूर्योदयः)।
- विसर्ग एवं संयुक्ताक्षर की अशुद्धि – वक्षःस्थलम्, निजनखैः, ज्वालयिष्यामि शुद्ध लिखें।
- कथा को गलती से रामायण/महाभारत से बताना – यह पुराण (भागवत/नृसिंह) की कथा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 7 का पाठ 7 ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ किस पर आधारित है?
यह पाठ एक संस्कृत-नाटक है, जो भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकशिपु, होलिका एवं भगवान् नृसिंह के प्रसिद्ध प्रसंग पर आधारित है। यह कथा नृसिंहपुराण एवं श्रीमद्भागवतपुराण में वर्णित है और इसका संदेश है – ‘ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है’।
‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – ‘यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है’। ईश्वर केवल देवालय में सीमित नहीं, अपितु वृक्ष, शिला, कक्षा एवं क्रीडाङ्गण – सर्वत्र विद्यमान है।
भगवान् नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किस प्रकार किया?
नृसिंह ने ब्रह्मा के वरदान का उल्लंघन किए बिना – न दिन-न रात (सन्ध्याकाल), न भीतर-न बाहर (देहरी पर), न अस्त्र-न शस्त्र (अपने नखों से) – हिरण्यकशिपु की छाती चीरकर उसका वध किया।
नाटक-संवाद, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
