कक्षा 8 हिंदी (मल्हार) अध्याय 4 – हरिद्वार (पत्र) प्रश्न-उत्तर एवं सार (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 8 हिंदी की पुस्तक मल्हार (गद्य) के अध्याय 4 ‘हरिद्वार’ (लेखक – भारतेंदु हरिश्चंद्र, विधा – पत्र) का पूरा समाधान देता है। यहाँ पाठ की सभी अभ्यास-गतिविधियों के प्रश्न पुस्तक के अनुसार और उत्तर मौलिक एवं परीक्षोपयोगी रूप में दिए गए हैं।

कक्षा: 8 विषय: हिंदी पुस्तक: मल्हार (गद्य) अध्याय: 4 लेखक: भारतेंदु हरिश्चंद्र विधा: पत्र सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र (सन् 1850–1885) हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध रचनाकार थे, जिन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक’ माना जाता है। उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन किया तथा कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका और स्त्रियों के लिए बालाबोधिनी जैसी पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं। ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ का उद्घोष करने वाले भारतेंदु अपनी यात्राओं के लिए भी चर्चित रहे; वे मानते थे कि शिक्षा की पूर्ति केवल पुस्तकों से ही नहीं, यात्राओं से भी होती है। उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अंग्रेजी शासन का विरोध और स्वाधीनता की भावना के स्वर सुनाई देते हैं। सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी और सरयूपार की यात्रा उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

पाठ का सार

‘हरिद्वार’ पाठ भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा गया एक पत्र है, जो 14 अक्टूबर सन् 1871 ई. को प्रकाशित हुआ था। इस पत्र में लेखक ने सन् 1871 की अपनी हरिद्वार-यात्रा का रोचक एवं साहित्यिक वर्णन प्रस्तुत किया है। पत्र की भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, जिसमें प्राचीन हिंदी की छवि दिखाई देती है।

लेखक कहते हैं कि हरिद्वार ऐसी पुण्य भूमि है जहाँ प्रवेश करते ही मन शुद्ध और निर्मल हो जाता है। यह भूमि तीन ओर हरे-भरे सुंदर पर्वतों से घिरी है, जिन पर अनेक प्रकार की लताएँ सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही हैं। बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो साधुओं की भाँति एक पैर पर तपस्या करते हुए घाम, ओस और वर्षा सहते हैं। वे फल, फूल, छाया, छाल और लकड़ी से ही नहीं, बल्कि जलने पर कोयले और राख से भी सबका मनोरथ पूर्ण करते हैं।

लेखक त्रिभुवन-पावनी श्री गंगा जी की पवित्र, शीतल और मिष्ट धारा का वर्णन करते हैं, जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल यश की लता-सी दिखाई देती है। यहाँ गंगा दो धाराओं – नील धारा और श्री गंगा – में बँट जाती हैं। ‘हरि की पैड़ी’ नामक पक्के घाट पर स्नान होता है। इस क्षेत्र में हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल – पाँच मुख्य तीर्थ हैं। लेखक बताते हैं कि यहाँ के पंडे बड़े संतोषी हैं, जो एक पैसे को भी लाख मानकर संतुष्ट रहते हैं।

लेखक दीवान कृपा राम के बंगले पर ठहरे थे और उन्होंने अपने मित्र कल्लू जी के साथ ग्रहण-काल में आनंदपूर्वक स्नान तथा श्री भागवत का पारायण किया। एक दिन उन्होंने गंगा-तट पर पत्थर पर ही भोजन किया और अनुभव किया कि वह सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़कर था; वहाँ बार-बार उनके चित्त में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। अंत में लेखक संपादक से कहते हैं कि वे चित्त से अब भी वहीं निवास करते हैं और इस पत्र को पत्रिका में स्थान देने का अनुरोध करते हैं। इस प्रकार यह पत्र प्रकृति-प्रेम, स्वच्छता, सादगी, संतोष और आध्यात्मिकता का सुंदर संदेश देता है।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
पुण्य भूमिपवित्र एवं पावन धरती
वल्लीलता, बेल
मनोरथमन की इच्छा, अभिलाषा
अर्थीयाचक, माँगने वाला, इच्छुक व्यक्ति
विमुखनिराश होकर लौटना, मुँह मोड़ना
बधिकशिकारी, हिंसक व्यक्ति, बहेलिया
कल्लोल करनाक्रीड़ा करना, आनंद से चहकना/उछलना
त्रिभुवन-पावनीतीनों लोकों को पवित्र करने वाली (गंगा)
कीर्तियश, प्रसिद्धि
मिष्टमीठा, मधुर
श्वेतसफेद, उज्ज्वल
शिखर (शिषर)पर्वत की चोटी
पाटनदी की चौड़ाई, फैलाव
वेगतेज प्रवाह, गति
धर्मशालायात्रियों के ठहरने का सार्वजनिक भवन
विलक्षणअनोखा, विशेष, असाधारण
संतोषीथोड़े में संतुष्ट रहने वाला
निदानअंत में, फलस्वरूप
पारायणकिसी ग्रंथ का आद्योपांत (आरंभ से अंत तक) पाठ
वैराग्यसांसारिक मोह से विरक्ति, अनासक्ति
कुशाएक प्रकार की पवित्र घास, दर्भ
विरक्तसंसार से विमुख, वैरागी
मौनावलंबनमौन धारण करना, चुप हो जाना
स्थानदान(पत्रिका में) स्थान देना, छापना/सँजोना

मेरी समझ से (पाठ से)

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?

• लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।

• लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।

• लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।

• लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।

उत्तरसही उत्तर – लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।यहाँ लेखक वृक्षों की तुलना सज्जनों से करते हैं – जैसे सज्जन अपकार करने वाले को भी उपकार देते हैं, वैसे ही वृक्ष पत्थर मारने (कष्ट देने) पर भी बदले में मीठे फल देते हैं। यह वृक्षों की उदारता और परोपकार का मानवीकरण है।

2. “वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?

• शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी

• आर्थिक संतोष और मानसिक विकास

• मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव

• सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम

उत्तरसही उत्तर – मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव।पवित्र तीर्थ-स्थल हरिद्वार के शांत, निर्मल वातावरण में लेखक का मन सांसारिक मोह से हटकर वैराग्य और ईश्वर-भक्ति की ओर झुक जाता था – यह उनकी मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव को दर्शाता है।

3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?

• संतुष्टि में सुख होता है।

• सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।

• लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।

• पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।

उत्तरसही उत्तर – संतुष्टि में सुख होता है।गंगा-तट के पवित्र वातावरण में, प्रकृति के समीप किया गया साधारण भोजन भी लेखक को परम संतोष देता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सच्चा सुख वस्तुओं की कीमत में नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि में है।

4. “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?

• अंधविश्वास और लालच

• मानवता और देशप्रेम

• सादगी और आत्मनिर्भरता

• स्वच्छता और प्रकृति प्रेम

उत्तरसही उत्तर – सादगी और आत्मनिर्भरता; तथा स्वच्छता और प्रकृति प्रेम। (एक से अधिक उत्तर संभव)लेखक का स्वयं रसोई बनाकर पत्थर पर भोजन करना सादगी और आत्मनिर्भरता का परिचायक है, और गंगा-तट के निर्मल जल के निकट बैठकर भोजन करना उनके स्वच्छता तथा प्रकृति-प्रेम को भी दर्शाता है।

5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?

• राजनीतिक

• आध्यात्मिक

• सामाजिक

• प्राकृतिक

उत्तरसही उत्तर – आध्यात्मिक; तथा प्राकृतिक। (एक से अधिक उत्तर संभव)हरिद्वार में लेखक को गंगा-स्नान, भागवत-पारायण और वैराग्य-भक्ति का आध्यात्मिक अनुभव हुआ, साथ ही पर्वतों, वृक्षों, पक्षियों और गंगा जैसे प्राकृतिक सौंदर्य ने भी उन्हें अत्यंत आनंदित किया।

6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?

• कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता

• मुहावरों का अधिक प्रयोग

• सरलता और चित्रात्मकता

• जटिलता और संक्षिप्तता

उत्तरसही उत्तर – सरलता और चित्रात्मकता।यद्यपि भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, फिर भी लेखक ने सहज शैली में उपमाओं और तुलनाओं के माध्यम से ऐसा सजीव वर्णन किया है कि हरिद्वार का दृश्य आँखों के सामने चित्र की तरह उभर आता है।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने होंं। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने।

संकेतयह समूह-चर्चा (गतिविधि) है। प्रत्येक विद्यार्थी अपने चुने हुए उत्तर का कारण पाठ की पंक्तियों के आधार पर बताए और दूसरों के तर्क धैर्य से सुनकर अंतर पर विचार करे।

मिलकर करें मिलान

पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। आपस में चर्चा कीजिए और इनके उपयुक्त संदर्भों से इनका मिलान कीजिए—

क्रमशब्दउपयुक्त संदर्भ (सही मिलान)
1.हरिद्वारयह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।
2.गंगायह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे— भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि।
3.भगीरथये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी है।
4.चण्डिकामान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप।
5.भागवतयह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं।
6.दालचीनीयह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं।
मिलान संकेत: हरिद्वार → तीर्थस्थान (उत्तराखंड); गंगा → प्रधान नदी; भगीरथ → सूर्यवंशी राजा; चण्डिका → दुर्गा का रूप; भागवत → पुराण; दालचीनी → सुगंधित छाल वाला पेड़।

मिलकर करें चयन

(क) पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो निष्कर्ष दिए गए हैं— एक सही और एक भ्रामक। उपयुक्त (सही) निष्कर्ष पर सही का चिह्न लगाइए।

क्रमपंक्तिसही निष्कर्ष
1.पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है।
2.बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं।
3.इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं।
4.जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है।
5.एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है।
6.निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर कहीं स्थान दिया जाए, यानी इसे पढ़ा और सँजोया जाए।
टिप्पणीप्रत्येक वाक्य में पहला कथन तथ्य और भाव दोनों दृष्टि से सही है, जबकि दूसरा (भ्रामक) कथन पंक्ति का गलत/अधूरा अर्थ निकालता है। ऊपर दिए सही निष्कर्ष ही चुनने योग्य हैं।

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनी गई पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए कि आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया।

(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”

अर्थलेखक कहते हैं कि हरिद्वार की कुशा (पवित्र घास) में दालचीनी और जावित्री जैसी मनोहर सुगंध आती है।इसके माध्यम से वे यह भाव व्यक्त करते हैं कि यह भूमि इतनी पवित्र है कि यहाँ की साधारण घास तक सुगंधित है – अर्थात् स्थान की पवित्रता उसकी प्रत्येक वस्तु में झलकती है।

(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।”

अर्थलेखक वृक्षों की उदारता और परोपकार की प्रशंसा करते हैं। वृक्षों के पास जो भी याचक (अर्थी) जाता है, वह कभी निराश नहीं लौटता।वृक्ष जीवित रहते हुए फल, फूल, छाया, छाल, बीज, लकड़ी आदि देते हैं और जलकर भी कोयले और राख के रूप में मनुष्य के काम आते हैं। इस प्रकार वृक्ष अंत तक निःस्वार्थ भाव से दूसरों का हित करते हैं।

सोच-विचार के लिए

(क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब? (संकेत— किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)

उत्तरयह वाक्य दर्शाता है कि लेखक का मन हरिद्वार में इतना रम गया है कि शरीर से लौट आने पर भी उनका चित्त (मन) अब तक वहीं बसा हुआ है – अर्थात् उस स्थान से गहरा भावनात्मक लगाव हो गया है।हाँ, ऐसा अनुभव प्रायः होता है। जैसे किसी सुंदर यात्रा-स्थल, ददिहाल-ननिहाल या किसी आनंदपूर्ण आयोजन से लौटने के बाद भी मन उसी की मधुर यादों में डूबा रहता है। (विद्यार्थी अपना अनुभव लिखें।)

(ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तरयह कथन संतोष की भावना को दर्शाता है – जो लोग थोड़े में ही संतुष्ट रहते हैं, वे सच्चे सुखी होते हैं।आज के अधिकांश लोग अधिक धन और सुविधाओं की होड़ में संतोष खोते जा रहे हैं, फिर भी ऐसे संतोषी लोग अब भी मिलते हैं। उदाहरण के लिए – कोई किसान या मेहनती मजदूर अपनी सीमित आय में भी प्रसन्न रहता है, और संत-महात्मा सादगीपूर्ण जीवन में संतोष पाते हैं। (विद्यार्थी अपने उदाहरण जोड़ें।)

(ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।” आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी? (संकेत— केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)

उत्तरलेखक ने उस बंगले को ‘टिकने योग्य’ इसलिए कहा क्योंकि वह सुविधाजनक होने के साथ-साथ मनोरम स्थान पर स्थित था।वहाँ चारों ओर से शीतल पवन आती थी, गंगा और पर्वतों का सुंदर दृश्य दिखता था, वातावरण शांत एवं पवित्र था और तीर्थ-स्थलों तक पहुँच सुगम थी। इन्हीं प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक विशेषताओं ने उसे ठहरने के लिए उत्तम बनाया, केवल आराम ही नहीं।

(घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।” इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?

उत्तरवृक्ष पूर्णतः परोपकारी हैं – वे अपना सर्वस्व मनुष्य और अन्य जीवों के कल्याण के लिए अर्पित कर देते हैं।वे हमें भोजन (फल), औषधि एवं सुगंध (गंध, छाल), छाया, ऑक्सीजन, लकड़ी और ईंधन देते हैं; जलकर राख और कोयले के रूप में भी उपयोगी रहते हैं।इससे शिक्षा मिलती है कि हमें वृक्षों की रक्षा करनी चाहिए और निःस्वार्थ भाव से दूसरों के काम आना चाहिए।

अनुमान और कल्पना से

(क) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?

उत्तर (कल्पना)मैं ‘हरि की पैड़ी’ पर पवित्र गंगा-स्नान करना चाहूँगा और संध्या-काल की गंगा-आरती देखूँगा।हरे-भरे पर्वतों की सैर करूँगा, मंदिरों के दर्शन करूँगा तथा शांत वातावरण में कुछ समय ध्यान लगाऊँगा। साथ ही गंगा-तट के सुंदर दृश्यों को अपनी डायरी/चित्र में सँजोऊँगा।

(ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।” कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।

उत्तर (कल्पना)गंगा की ठंडी-ठंडी फुहारें मेरे मुख और हाथों को छूकर एक सुखद सिहरन भर देती हैं। मन शांत और तरोताज़ा हो जाता है।लहरों की कलकल ध्वनि, शीतल पवन और जल की निर्मलता से ऐसा लगता है मानो सारी थकान और चिंता बह गई हो और हृदय पवित्रता से भर उठा हो।

(ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?

उत्तर (कल्पना)यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो वे हमसे बातें करते, अपनी पीड़ा बताते और हमें छाया-फल देने पर धन्यवाद की अपेक्षा करते।तब शायद कोई भी निर्दयता से उन्हें न काटता, क्योंकि वे विरोध करते या दुखी होते। संभवतः मनुष्य प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील होकर पेड़ों से मित्रता निभाता और पर्यावरण अधिक हरा-भरा एवं सुरक्षित रहता।

(घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।” इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?

उत्तरभारतीय संस्कृति में गंगा को केवल नदी नहीं, बल्कि पूज्य माता और देवी माना जाता है।इसी श्रद्धा और आदर के कारण लेखक ने गंगा के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ आदरसूचक शब्द लगाए हैं, जिससे गंगा के प्रति उनकी भक्ति और सम्मान की भावना प्रकट होती है।

(ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।

उत्तरदृष्टिबाधित साथी के लिए: दृश्यों का सजीव वर्णन शब्दों में सुनाऊँगा, गंगा-जल का स्पर्श कराऊँगा, आरती की ध्वनि और घंटियों का अनुभव कराऊँगा तथा हाथ थामकर सुरक्षित रास्ता दिखाऊँगा।श्रवणबाधित साथी के लिए: संकेतों, लिखकर अथवा चित्रों के माध्यम से जानकारी दूँगा, सुंदर दृश्य दिखाऊँगा और भीड़भाड़ में उसका विशेष ध्यान रखूँगा ताकि वह बिछड़ न जाए।

लिखें संवाद

(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।

उत्तर (नमूना संवाद)लेखक: कल्लू जी, देखिए तो सही – हरिद्वार की यह भूमि कितनी पवित्र और मनोरम है!कल्लू जी: सच कहा आपने! गंगा का यह शीतल जल और चारों ओर के हरे पर्वत मन को मोह लेते हैं।लेखक: चलिए, हरि की पैड़ी पर स्नान करें और फिर श्री भागवत का पारायण करें।कल्लू जी: अवश्य। यहाँ आकर तो चित्त में स्वयं ही भक्ति और वैराग्य का उदय हो रहा है।

(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए— जैसे पर्वत बोल रहे होंं।

उत्तर (नमूना संवाद)लेखक: हे पर्वतो! तुम कितने भव्य और शांत खड़े हो, मानो साधना में लीन हो।पर्वत: हाँ यात्री! हम युगों से इस पुण्य भूमि की रक्षा करते हुए घाम, ओस और वर्षा सहते रहते हैं।लेखक: तुम्हारी हरियाली और शीतल पवन मेरे मन को असीम शांति देती है।पर्वत: तुम भी प्रकृति का सम्मान करना और इस सौंदर्य को सदा सहेजकर रखना।

‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग / काल की पहचान

‘आदरार्थ बहुवचन’ को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—

उत्तर 1. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं, वे अभी सभा में उपस्थित हैं 2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, हमें उनका कहना मानना चाहिए। 3. मेरी बहन बाजार जा रही है, वहाँ से किताबें ले आएगी। 4. बाहर फेरीवाला आया हैउसे बुला लाओ। 5. डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी बुला लाओ। 6. आप तो बहुत दिन बाद आए हैं, आपका स्वागत है। 7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं, उनसे परामर्श लेना चाहिए। 8. आपके माता-पिता कहाँ हैं? क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ? 9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं, हम इनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं। 10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है

काल की पहचान – निम्नलिखित पंक्तियों में क्रिया कौन-से काल को प्रदर्शित कर रही है? (भूतकाल/वर्तमान/भविष्य)

उत्तर 1. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। – भविष्य काल 2. यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। – वर्तमान काल 3. वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं। – वर्तमान काल 4. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। – भूतकाल 5. मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। – भूतकाल
संकेत (ख)इन वाक्यों का काल बदलकर नए वाक्य बनाना विद्यार्थी का अभ्यास-कार्य है, जैसे – ‘यह भूमि पर्वतों से घिरी थी’ (भूतकाल), ‘यह भूमि पर्वतों से घिरी रहेगी’ (भविष्य)।

भावों की पहचान

दिए गए भावों (प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख) में से प्रत्येक पंक्ति में प्रकट होने वाला भाव पहचानिए—

क्रमपंक्तिभाव
1.उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।संतोष
2.चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।वैराग्य / भक्ति
3.पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।संतोष
4.हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।शांति / प्रसन्नता
5.सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।परोपकार

पत्र की रचना

नीचे इस पत्र की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। इन विशेषताओं से जुड़े वाक्यों से इनका मिलान कीजिए (एक विशेषता एक से अधिक वाक्यों से भी जुड़ सकती है)—

क्रमपत्र की विशेषताएँपत्र से उदाहरण
1.व्यक्तिपरकता— पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होती हैं।“ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…”
2.संवादात्मकता— पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है।श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!
3.स्वाभाविक शैली— भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है।आपका मित्र — यात्री
4.व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन— जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है।मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है…
5.अभिवादन या संबोधन— पत्र का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है।हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता… का अत्यंत विस्तार से वर्णन। जैसे— “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…”
6.हस्ताक्षर— लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है।और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।
7.उपसंहार और निवेदन— लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है।एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके…
8.मुख्य विषय-वस्तुऔर संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…
पत्र (गतिविधि)जिस प्रकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी यात्रा का वर्णन संपादक को पत्र के रूप में लिखकर भेजा, उसी प्रकार विद्यार्थी अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखकर बताएँ – संबोधन, यात्रा-अनुभव और अंत में अपना नाम अवश्य लिखें।

लेखन के अनोखे तरीके

(क) पाठ में लेखक ने कई स्थानों पर तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। पाठ में से उन विशिष्ट पंक्तियों को ढूँढ़िए—

तुलनापाठ की विशिष्ट पंक्ति
1. वृक्षों की तुलना साधुओं से“बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।”
2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से“मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।”
3. हरियाली की तुलना गलीचे से“सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से“त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।”

(ख) निम्नलिखित प्राचीन-शैली की पंक्तियों को आज की हिंदी में लिखिए।

उत्तर 1. “इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।”
→ इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट शिकारियों से बिना डरे आनंद से उछल-कूद करते हैं।
2. “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
→ वर्षा के कारण हर ओर हरियाली फैली थी, मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरे रंग का गलीचा बिछा दिया गया हो।
3. “यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।”
→ यह इतना पवित्र तीर्थ है कि वहाँ इच्छा और क्रोध से भरे (विकारी) लोग रह ही नहीं पाते।
4. “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।”
→ वहाँ जाते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसका वर्णन करना संभव नहीं।
5. “यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।”
→ यहाँ रात को ग्रहण लगा और हम सबने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्री भागवत का पूरा पाठ भी किया।
6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।”
→ उस समय पत्थर पर किए गए भोजन का सुख सोने की थाली के भोजन से कहीं अधिक था।
7. “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
→ मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को (अपनी पत्रिका में) स्थान अवश्य देंगे।
(ग) प्राचीन वर्तनीपाठ में प्रयुक्त प्राचीन वर्तनी वाले शब्द एवं उनका आज का रूप – शिषर → शिखर, जात्रियों → यात्रियों, बिछायत → बिछावन/बिछौना, बरफ → बर्फ, पनेे → पना (शरबत), जलेे → जले। (विद्यार्थी ऐसे और शब्द भी सूची में जोड़ें।)

आपकी बात

1. “मैंने गंगा जी के तट पर रसोई करके… भोजन किया।” क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?

उत्तर (संभावित)हाँ, पिकनिक या यात्रा के समय मैंने खुले मैदान/नदी-किनारे भोजन किया है।खुले वातावरण में ताज़ी हवा, हरियाली और मित्रों के साथ का आनंद भोजन को और अधिक स्वादिष्ट तथा यादगार बना देता है – यह अनुभव घर के सामान्य भोजन से कहीं अधिक रोमांचक और सुखद होता है। (विद्यार्थी अपना अनुभव लिखें।)

2. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो? उसके बारे में बताइए।

उत्तर (संभावित)हाँ। एक बार थककर लौटने पर माँ के हाथ की सादी रोटी और गुड़ ने मुझे जो संतोष दिया, वह किसी महँगे भोजन से नहीं मिल सकता था।इससे मैंने समझा कि सुख वस्तु की कीमत में नहीं, बल्कि उससे जुड़े स्नेह और मन की संतुष्टि में होता है। (विद्यार्थी अपना अनुभव जोड़ें।)

3. “हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।” आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो?

उत्तर (संभावित)मुझे मंदिर/नदी-तट तथा किसी शांत हरे-भरे उद्यान में पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है।वहाँ की शांति, स्वच्छता और प्राकृतिक सौंदर्य से मन तुरंत शांत और प्रसन्न हो जाता है। (विद्यार्थी अपने अनुभव से लिखें।)

4. पाठ में वर्णित है, यहाँ के वृक्ष “फल, फूल, गंध… जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।” क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?

उत्तर (संभावित)हाँ, हमारे घर के आँगन में लगा नीम/आम का पेड़ मुझे बहुत प्रिय है।उसकी छाया में मैं बचपन से खेलता और पढ़ता आया हूँ, वह हमें फल एवं शीतल छाया देता है; इसी कारण उससे मेरा गहरा भावनात्मक जुड़ाव है। (विद्यार्थी अपना उदाहरण दें।)

पाठ से आगे (गतिविधियाँ – संकेत सहित)

पाठ के अंत में अनेक रचनात्मक एवं समूह-गतिविधियाँ दी गई हैं, जो विद्यार्थी की अपनी कल्पना और व्यावहारिक कार्य पर आधारित हैं। नीचे संक्षिप्त संकेत दिए गए हैं—

प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण: “तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!” विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए, जिसमें स्वच्छता और पर्यावरण-संरक्षण का संदेश हो।

स्वास्थ्य और योग: (क) 5 मिनट मौन बैठकर अपनी श्वास एवं आस-पास की ध्वनियों पर ध्यान केंद्रित कीजिए और उस अनुभव पर एक अनुच्छेद लिखिए। (ख) अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रमों की एक ‘सूचना’ तैयार कीजिए।

सज्जन वृक्ष: (क) एक पौधा लगाइए, उसे नाम देकर उसका मित्र बनिए और देखभाल कीजिए। (ख) उसके बारे में अपनी दैनंदिनी (डायरी) में नियमित लिखिए।

अपने शब्द: ‘शीतल’ शब्द का शब्द-चित्र बनाइए – अर्थ (ठंडा), समानार्थी (ठंडा, सर्द), विपरीतार्थक (उष्ण/गरम), वाक्य प्रयोग (पर्वत से शीतल पवन बह रही थी)।

यात्रा के व्यय की गणना: ₹1000 के बजट में किसी यात्रा का व्यय-विवरण (किराया, भोजन, स्मृति-चिह्न आदि) बनाइए और सोचिए कि कौन-सी वस्तु आवश्यक है।

यात्रा सबके लिए: टूरिस्ट गाइड बनकर सोचिए कि बुजुर्ग, बच्चों, दिव्यांग एवं श्रवण/दृष्टिबाधित यात्रियों की सुविधा के लिए आप पहुँचने, घूमने और भोजन में कैसे सहायता करेंगे, तथा ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा हेतु क्या ध्यान रखेंगे।

शब्द से जुड़े शब्द: ‘हरिद्वार’ से जुड़े शब्द लिखिए – जैसे गंगा, घाट, तीर्थ, पैड़ी, स्नान, मंदिर, पंडा, यात्रा।

आज की पहेली (पाठ से शब्द खोजिए): 1. मसाला – दालचीनी; 2. कपास से जुड़ा शब्द – जनेऊ; 3. जहाँ स्नान होता है – घाट/हरि की पैड़ी; 4. वृक्ष का अंग – छाल (या जड़/पत्ते); 5. नगर/तीर्थ – हरिद्वार (कनखल); 6. व्यापार से जुड़ा स्थान – दुकान; 7. नदी – गंगा; 8. पर्वत – विल्वपर्वत; 9. धार्मिक ग्रंथ – भागवत।

झरोखे से / खोजबीन के लिए: भारतेंदु के ‘हरिद्वार के मार्ग में’ पत्रांश तथा उनके प्रसिद्ध नाटक ‘अंधेर नगरी’ को पढ़कर कक्षा में चर्चा कीजिए।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय (30–40 शब्द)

1. ‘हरिद्वार’ पाठ किस विधा में लिखा गया है और किसके नाम लिखा गया है?

उत्तर‘हरिद्वार’ पाठ ‘पत्र’ विधा में लिखा गया है। इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा था, जो 14 अक्टूबर 1871 ई. को प्रकाशित हुआ।

2. हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-कौन से हैं?

उत्तरहरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ हैं – हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल।

3. लेखक ने हरिद्वार के पंडों की किस विशेषता की प्रशंसा की है?

उत्तरलेखक ने पंडों के संतोषी स्वभाव की प्रशंसा की है। वे इतने संतोषी हैं कि एक पैसे को भी लाख मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, अर्थात् वे थोड़े में भी प्रसन्न रहते हैं।

4. गंगा-तट पर पत्थर पर भोजन करते समय लेखक को कैसा अनुभव हुआ?

उत्तरगंगा-तट पर शीतल जल के निकट पत्थर पर किया गया भोजन लेखक को सोने की थाली के भोजन से भी बढ़कर सुखद लगा। उस समय उनके चित्त में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।

5. लेखक ने वृक्षों की तुलना सज्जनों से क्यों की है?

उत्तरक्योंकि वृक्ष सज्जनों की भाँति परोपकारी होते हैं। जैसे सज्जन अपकार करने वाले का भी भला करते हैं, वैसे ही वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं और जीवन-भर तथा जलकर भी दूसरों के काम आते हैं।

दीर्घ उत्तरीय (100–120 शब्द)

6. ‘हरिद्वार’ पत्र में लेखक ने हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।

उत्तरलेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य का अत्यंत सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है। उन्होंने बताया कि यह भूमि तीन ओर हरे-भरे पर्वतों से घिरी है, जिन पर लताएँ सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैली हैं।बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो साधु एक पैर पर तपस्या कर रहे हों और घाम, ओस, वर्षा सह रहे हों। वृक्षों पर रंग-बिरंगे पक्षी निडर होकर कल्लोल करते हैं।त्रिभुवन-पावनी गंगा की शीतल, मिष्ट और स्वच्छ धारा राजा भगीरथ की कीर्ति की लता-सी दिखती है। वर्षा से चहुँ ओर हरियाली ऐसी फैली है मानो हरा गलीचा बिछा हो। इन उपमाओं और मानवीकरण से लेखक ने प्रकृति का मनोरम चित्र खींचा है।

7. इस पत्र के माध्यम से भारतेंदु हरिश्चंद्र हमें कौन-कौन से जीवन-मूल्यों का संदेश देते हैं?

उत्तरइस पत्र से अनेक जीवन-मूल्यों का संदेश मिलता है। पंडों के संतोषी स्वभाव के वर्णन से ‘संतोष ही सबसे बड़ा सुख है’ का बोध होता है।पत्थर पर सादा भोजन करके परम सुख पाने से सादगी और संतुष्टि का मूल्य स्पष्ट होता है। वृक्षों की उदारता का चित्रण निःस्वार्थ परोपकार की सीख देता है।गंगा को ‘श्री’ और ‘जी’ कहकर संबोधित करना प्रकृति एवं संस्कृति के प्रति श्रद्धा सिखाता है, तथा गंगा-तट पर स्वच्छ रहकर भोजन करना स्वच्छता और प्रकृति-प्रेम का संदेश देता है। इस प्रकार यह पत्र हमें संतोष, सादगी, परोपकार, स्वच्छता और प्रकृति-संरक्षण की प्रेरणा देता है।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘हरिद्वार’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) प्रेमचंद

(ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र

(ग) महादेवी वर्मा

(घ) रामधारी सिंह दिनकर

उत्तर(ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र।

2. यह पत्र किस पत्रिका के संपादक के नाम लिखा गया था?

(क) हरिश्चंद्र मैगजीन

(ख) बालाबोधिनी

(ग) कविवचन सुधा

(घ) सरस्वती

उत्तर(ग) कविवचन सुधा।

3. हरिद्वार में स्नान का प्रसिद्ध पक्का घाट किस नाम से जाना जाता है?

(क) दशाश्वमेध घाट

(ख) हरि की पैड़ी

(ग) कुशावर्त्त

(घ) नीलधारा

उत्तर(ख) हरि की पैड़ी।

4. लेखक के अनुसार हरिद्वार में स्थित मुख्य देवता कौन हैं?

(क) श्री गंगा जी

(ख) विल्वेश्वर महादेव

(ग) चण्डिका देवी

(घ) भगीरथ

उत्तर(क) श्री गंगा जी। लेखक लिखते हैं कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।

5. हरिद्वार से गंगा किस रूप में आगे बढ़ती है?

(क) पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है

(ख) पहाड़ों में लौट जाती है

(ग) सूख जाती है

(घ) रेगिस्तान में गिरती है

उत्तर(क) पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।

6. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” – यहाँ ‘सज्जन’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(क) पंडों के लिए

(ख) यात्रियों के लिए

(ग) फलदार वृक्षों के लिए

(घ) नदियों के लिए

उत्तर(ग) फलदार वृक्षों के लिए।

7. लेखक हरिद्वार में किसके बंगले पर ठहरे थे?

(क) दीवान कृपा राम

(ख) भारामल जैकृष्णदास खत्री

(ग) कल्लू जी

(घ) पंडा

उत्तर(क) दीवान कृपा राम।

8. लेखक के अनुसार हरिद्वार में किस वस्तु से दालचीनी जैसी सुगंध आती है?

(क) जल से

(ख) कुशा (घास) से

(ग) फूलों से

(घ) धूप से

उत्तर(ख) कुशा (घास) से।

9. लेखक ने पत्र के अंत में अपने नाम के साथ स्वयं को क्या कहा है?

(क) संपादक

(ख) यात्री

(ग) तीर्थयात्री

(घ) पंडित

उत्तर(ख) यात्री। पत्र के अंत में “आपका मित्र – यात्री – भारतेंदु हरिश्चंद्र” लिखा है।

10. भारतेंदु हरिश्चंद्र को किस रूप में जाना जाता है?

(क) छायावाद के प्रवर्तक

(ख) आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक

(ग) रीतिकाल के कवि

(घ) उपन्यास सम्राट

उत्तर(ख) आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(क), 5-(क), 6-(ग), 7-(क), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): लेखक के अनुसार हरिद्वार में प्रवेश करते ही मन शुद्ध हो जाता है।

कारण (R): हरिद्वार एक पवित्र तीर्थस्थान है जो अपनी निर्मलता एवं आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): लेखक ने पत्थर पर किए भोजन को सोने की थाल के भोजन से बढ़कर बताया।

कारण (R): लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने पत्थर पर भोजन किया।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – भोजन का सुख वस्तु में नहीं, बल्कि पवित्र वातावरण और मन की संतुष्टि में था।

3. अभिकथन (A): पाठ में ‘गंगा’ के साथ ‘हैं’ क्रिया का प्रयोग हुआ है, जबकि गंगा एकवचन है।

कारण (R): आदर-सम्मान प्रकट करने के लिए एकवचन संज्ञा का बहुवचन रूप में (आदरार्थ बहुवचन) प्रयोग किया जाता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): पत्र की भाषा आज की हिंदी से कुछ भिन्न प्रतीत होती है।

कारण (R): यह पत्र लगभग 150 वर्ष पुराना है और इसमें प्राचीन हिंदी की छवि दिखाई देती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): लेखक ने हरिद्वार के वृक्षों की तुलना साधुओं से की है।

कारण (R): वृक्ष एक स्थान पर खड़े रहकर घाम, ओस और वर्षा को साधुओं की भाँति सहन करते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-उपयोगी सुझाव

पत्र-विधा से जुड़े प्रश्नों में संबोधन, विषय-वस्तु और अंत में हस्ताक्षर की विशेषताएँ अवश्य लिखें। उपमा/मानवीकरण के उदाहरण (वृक्ष → साधु, हरियाली → गलीचा, गंगा → भगीरथ की कीर्ति) याद रखें। ‘आदरार्थ बहुवचन’ का नियम और प्राचीन वर्तनी (शिषर→शिखर, जात्रियों→यात्रियों) के उदाहरण परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।

सामान्य भूलें (इनसे बचें)

• ‘हरिद्वार’ को कहानी/निबंध न लिखें – यह ‘पत्र’ विधा है।
• लेखक का नाम ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’ है, ‘हरिश्चंद्र राजा’ नहीं।
• ‘कविवचन सुधा’ एक पत्रिका है, स्थान या ग्रंथ नहीं।
• पाँच तीर्थों के नाम में कुशावर्त्त और विल्वपर्वत को न छोड़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘हरिद्वार’ पाठ के लेखक कौन हैं और यह किस विधा में है?

इस पाठ के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं और यह ‘पत्र’ विधा में लिखा गया है, जिसे उन्होंने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम भेजा था।

हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-से हैं?

हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल – ये पाँच मुख्य तीर्थ हैं।

लेखक ने गंगा के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ क्यों लगाया है?

गंगा को पूज्य माता एवं देवी मानने के कारण श्रद्धा और आदर प्रकट करने हेतु लेखक ने ‘श्री गंगा जी’ जैसे आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है (आदरार्थ बहुवचन)।

इस पाठ से कौन-से जीवन-मूल्य मिलते हैं?

संतोष, सादगी, परोपकार, स्वच्छता, प्रकृति-प्रेम और संस्कृति के प्रति श्रद्धा – ये इस पत्र के प्रमुख जीवन-मूल्य हैं।

प्रश्न NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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