कक्षा 8 हिंदी मल्हार पाठ 5 — कबीर के दोहे प्रश्न उत्तर और भावार्थ
कबीर के दोहे प्रश्न उत्तर: कक्षा 8 हिंदी मल्हार पाठ 5 के आठ दोहों का भावार्थ, शब्दार्थ, दोनों मिलान, भाषा-अभ्यास और रचनात्मक गतिविधियों के नमूने पढ़ें।
स्रोत: NCERT मल्हार पाठ 5 की PDF, मुद्रित पृष्ठ 63–75, पुनर्मुद्रण 2026–27। व्यक्तिगत, कल्पनात्मक और समूह-कार्य वाले उत्तर नमूने हैं; अपने अनुभव के अनुसार लिखें।
कवि से परिचय – कबीर
कबीर संत-काव्य के प्रमुख रचनाकार हैं। पाठ्यपुस्तक के परिचय में उनका करघे पर कपड़ा बुनना और जीवन की सच्चाई तथा अच्छे मनुष्य बनने की प्रेरणा देने वाली रचनाएँ वर्णित हैं। उसमें काशी में चौदहवीं शताब्दी में जन्म की बात ‘माना जाता है’ के रूप में दी है; जन्म-वर्ष निश्चित तथ्य के रूप में न लिखें। परिचय में ‘कबीर ग्रंथावली’ का उल्लेख है, जबकि इस पाठ के आठ दोहों का दिया संदर्भ ‘कबीर वचनावली’, संपादक अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ है।
दोहे (मूल पाठ)
इस पाठ में कबीर के आठ दोहे संकलित हैं, जो सत्य, गुरु-महिमा, परोपकार, संतुलन, मधुर वाणी, आलोचना का स्वागत, विवेक तथा सत्संगति जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा देते हैं।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
— कबीर
(संदर्भ— कबीर वचनावली, संपादक— अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’)
दोहों का भावार्थ
1. साँच बराबर तप नहीं…
कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तपस्या नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। सच बोलना और सच पर टिके रहना ही सबसे बड़ी साधना है। जिस मनुष्य के हृदय में सच्चाई बसती है, उसके हृदय में स्वयं गुरु (अर्थात् ईश्वर/सच्चा ज्ञान) निवास करता है। आशय यह है कि सत्य ही जीवन का सर्वोच्च मूल्य है और सच्चे हृदय में ही ईश्वरीय प्रकाश प्रकट होता है।
2. बड़ा हुआ तो क्या हुआ…
कबीर खजूर के ऊँचे पेड़ का उदाहरण देकर कहते हैं कि केवल बड़ा या ऊँचा (धनवान/शक्तिशाली) हो जाने से कुछ नहीं होता, यदि उससे किसी का भला न हो। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर वह राहगीर (पंथी) को छाया नहीं देता और उसके फल भी इतने ऊँचे लगते हैं कि सहज ही प्राप्त नहीं होते। इसी प्रकार बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए; अहंकारी एवं निरुपयोगी बड़प्पन व्यर्थ है।
3. गुरु गोविंद दोऊ खड़े…
कबीर कहते हैं कि यदि गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण छुऊँ? वे स्वयं उत्तर देते हैं कि मैं अपने गुरु पर बलिहारी (न्योछावर) जाता हूँ, क्योंकि गुरु ने ही मुझे गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग बताया है। इस दोहे में गुरु की महिमा को सर्वोपरि बताया गया है, क्योंकि ज्ञान देने वाला गुरु ही हमें ईश्वर से मिलाता है।
4. अति का भला न बोलना…
कबीर जीवन में संतुलन का महत्व समझाते हैं। वे कहते हैं कि न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना अच्छा है; जैसे न अधिक वर्षा अच्छी होती है और न ही तेज धूप। अर्थात् किसी भी बात की ‘अति’ (अत्यधिकता) हानिकारक होती है। हर परिस्थिति में संतुलन एवं विवेक बनाए रखना ही उचित है।
5. ऐसी बानी बोलिए…
कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार (मन का आपा) न हो। ऐसी मीठी वाणी दूसरों को शीतलता (शांति) प्रदान करती है और बोलने वाले को स्वयं भी मानसिक शांति देती है। आशय यह है कि अहंकाररहित, विनम्र एवं मधुर वचन से वातावरण सुखद बनता है और सबका मन प्रसन्न रहता है।
6. निंदक नियरे राखिए…
कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले (आलोचक) को अपने पास ही, अपने आँगन में झोंपड़ी बनवाकर रखना चाहिए। ऐसा निंदक बिना पानी और बिना साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल (शुद्ध) कर देता है, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है। अर्थात् रचनात्मक आलोचना से दूर भागने के बजाय उसे आत्म-सुधार का साधन मानना चाहिए।
7. साधू ऐसा चाहिए…
कबीर कहते हैं कि साधु (सज्जन/विवेकी व्यक्ति) का स्वभाव सूप (अनाज फटकने वाला सूपा) जैसा होना चाहिए। जैसे सूप सार (उपयोगी अनाज) को अपने पास रख लेता है और थोथा (बेकार भूसी) को उड़ा देता है, वैसे ही विवेकशील व्यक्ति को अच्छी-उपयोगी बातों को ग्रहण करना चाहिए और व्यर्थ-हानिकारक बातों को छोड़ देना चाहिए। यह विवेक एवं सूझबूझ की शिक्षा देता है।
8. कबिरा मन पंछी भया…
कबीर कहते हैं कि मन पंछी (पक्षी) के समान चंचल हो गया है, जो जहाँ चाहे वहाँ उड़ जाता है। इसके आगे वे जीवन का गहरा सत्य बताते हैं कि व्यक्ति जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। अर्थात् अच्छी संगति अच्छे और बुरी संगति बुरे परिणाम देती है; इसलिए मन एवं संगति दोनों को सही दिशा में रखना आवश्यक है।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| साँच | सत्य, सच्चाई |
| तप | तपस्या, साधना |
| हिरदे | हृदय, मन |
| पंथी | राहगीर, पथिक, यात्री |
| लागै | लगते हैं |
| दोऊ | दोनों |
| काके | किसके |
| लागौं पाँय | चरण छुऊँ, पैर लगूँ |
| बलिहारी | न्योछावर, समर्पित |
| गोविंद | ईश्वर, परमात्मा |
| अति | अत्यधिक, बहुत ज़्यादा |
| चूप | चुप, मौन |
| बानी | वाणी, बोली |
| आपा | अहंकार, घमंड; इस दोहे में अपनापन नहीं |
| सीतल | शीतल, शांत |
| आपहुँ | स्वयं भी |
| निंदक | निंदा/आलोचना करने वाला |
| नियरे | निकट, पास |
| कुटी छवाय | झोंपड़ी बनवाकर |
| निर्मल | स्वच्छ, शुद्ध, साफ़ |
| सुभाय | स्वभाव से, सहज ही |
| सूप | सूपा (अनाज फटकने का साधन) |
| सार | उपयोगी/मूल्यवान वस्तु, तत्व |
| गहि रहै | पकड़ रखता है, ग्रहण करता है |
| थोथा | खोखला, बेकार (भूसी) |
| पंछी | पक्षी, चिड़िया |
| भावै तहवाँ | जहाँ चाहे वहाँ |
| संगति | साथ, संग, मेल-जोल |
मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा ( ★ ) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
(1) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है?
• श्रम का महत्त्व
• गुरु का महत्त्व
• ज्ञान का महत्त्व
• भक्ति का महत्त्व
(2) “अति का भला न बोलना अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना अति की भली न धूप।।” इस दोहे का मूल संदेश क्या है?
• हमेशा चुप रहने में ही हमारी भलाई है
• बारिश और धूप से बचना चाहिए
• हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है
• हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए
(3) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं फल लागै अति दूर।।” यह दोहा किस जीवन कौशल को विकसित करने पर बल देता है?
• समय का सदुपयोग करना
• दूसरों के काम आना
• परिश्रम और लगन से काम करना
• सभी के प्रति उदार रहना
(4) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै आपहुँ सीतल होय।।” इस दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
• लोग हमारी प्रशंसा और सम्मान करने लगते हैं
• दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है
• किसी से विवाद होने पर उसमें जीत हासिल होती है
• सुनने वालों का मन इधर-उधर भटकने लगता है
(5) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप।।” इस दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
• सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता है
• सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है
• बाहरी परिस्थितियाँ ही जीवन में सफलता तय करती हैं
• सत्य महत्त्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है
(6) “निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना निर्मल करै सुभाय।।” यहाँ जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?
• आलोचना से बचना चाहिए
• आलोचकों को दूर रखना चाहिए
• आलोचकों को पास रखना चाहिए
• आलोचकों की निंदा करनी चाहिए
(7) “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देइ उड़ाय।।” इस दोहे में ‘सूप’ किसका प्रतीक है?
• मन की कल्पनाओं का
• सुख-सुविधाओं का
• विवेक और सूझबूझ का
• कठोर और क्रोधी स्वभाव का
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
मिलकर करें मिलान
(क) अर्थ/संदर्भ का मिलान — पृष्ठ 66
| बाएँ क्रमांक / आरंभ | दाएँ क्रमांक | अर्थ |
|---|---|---|
| 1. गुरु गोविंद | 3 | गुरु का मार्गदर्शन और शिष्य का आदर |
| 2. अति का भला | 5 | जीवन में संतुलन |
| 3. ऐसी बानी | 6 | मधुर वाणी से शांति |
| 4. निंदक नियरे | 8 | आलोचना से गलतियाँ पहचानना |
| 5. साधू ऐसा | 7 | विवेक से अच्छे-बुरे की पहचान |
| 6. कबिरा मन पंछी | 4 | मन को सही दिशा देना |
| 7. साँच बराबर | 1 | सत्य का पालन और झूठ से बचना |
| 8. बड़ा हुआ | 2 | बड़प्पन के साथ उदारता |
कुंजी: 1→3, 2→5, 3→6, 4→8, 5→7, 6→4, 7→1, 8→2।
(ख) दूसरी पंक्ति का मिलान — पृष्ठ 67
| बाएँ क्रमांक / आरंभ | दाएँ क्रमांक | दूसरी पंक्ति का आरंभ |
|---|---|---|
| 1. गुरु गोविंद | 8 | बलिहारी गुरु आपने |
| 2. अति का भला न बोलना | 6 | अति का भला न बरसना |
| 3. ऐसी बानी | 2 | औरन को सीतल करै |
| 4. निंदक नियरे | 1 | बिन पानी साबुन बिना |
| 5. साधू ऐसा | 4 | सार सार को गहि रहै |
| 6. कबिरा मन पंछी | 7 | जो जैसी संगति करै |
| 7. बड़ा हुआ | 5 | पंथी को छाया नहीं |
| 8. साँच बराबर | 3 | जाके हिरदे साँच है |
कुंजी: 1→8, 2→6, 3→2, 4→1, 5→4, 6→7, 7→5, 8→3। मूल पंक्तियों की पूरी वर्तनी ऊपर दोहों में देखें।
पंक्तियों पर चर्चा / सोच-विचार के लिए
पंक्तियों पर चर्चा
(क) मन-पंछी और संगति: मन की चंचलता को पक्षी के रूप में व्यक्त किया है। संगति विचार और व्यवहार को प्रभावित करती है; अच्छे प्रभाव पहचानने की सीख है। संगति व्यक्ति के हर परिणाम का अकेला कारण नहीं।
(ख) सत्य और तप: कबीर सत्य का आचरण श्रेष्ठ साधना मानते हैं। सच्चे हृदय में गुरु/ज्ञान के प्रकाश का भाव व्यक्त है।
सोच-विचार के लिए
(क) गुरु और गोविंद: विचार का नमूना: मैं गुरु का विशेष आदर उचित मानता हूँ क्योंकि वह समझने की दिशा देता है। यह कबीर का भक्तिकाव्य है। विद्यार्थी सहमत या असहमत होकर तर्क दे सकते हैं; सबका धार्मिक मत एक जैसा होना जरूरी नहीं।
(ख) संपन्नता के साथ गुण: विनम्रता, सहायता, उदारता और जिम्मेदारी आवश्यक हैं।
(ग) शब्दों का प्रभाव: शब्द सुनने वाले और बोलने वाले दोनों की मनोदशा पर असर डाल सकते हैं। नमूना: साथी की भूल पर शांत सलाह देने से हमारा विवाद घटा। अपना वास्तविक उदाहरण लिखें।
(ङ) संगति: अभ्यास करने वाले मित्रों के साथ रहने से अभ्यास की रुचि बढ़ सकती है; नकल के दबाव से गलत निर्णय हो सकता है। अपने निर्णय और अन्य परिस्थितियों की भूमिका भी समझें। मुद्रित क्रम में (घ) नहीं दिया है।
सूप का उदाहरण समझें

‘निंदक नियरे’ आत्म-सुधार का संदेश है; अपमान, धमकी या उत्पीड़न सहने का निर्देश नहीं। ‘खजूर’ काव्य में अनुपयोगी बड़प्पन की उपमा है; खजूर का वास्तविक पेड़/फल अनुपयोगी नहीं।
दोहे की रचना
पृष्ठ 68 के आठ संकेतों पर पाठ से उदाहरण:
- एक अक्षर से आरंभ: ‘गुरु गोविंद’, ‘निंदक नियरे’, ‘सूप सुभाय’ — समान आरंभिक ध्वनि का प्रभाव।
- दोहराया शब्द: ‘सार सार’। ‘अति’ भी कई चरणों में लौटता है।
- एक मात्रा का अंतर: ‘का–की’ और ‘भला–भली’, दूसरी पंक्ति ‘अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप’ में।
- विपरीतार्थी: ‘साँच–झूठ’, ‘बोलना–चूप’, ‘सार–थोथा’।
- तुलना: ‘जैसे पेड़ खजूर’ और ‘जैसा सूप सुभाय’।
- दूसरा नाम देना: ‘मन पंछी’ — मन को पंछी रूप में प्रस्तुत करना।
- अलग वर्तनी: चूप→चुप, बानी→वाणी, हिरदे→हृदय, सीतल→शीतल, पंछी→पक्षी। मूल काव्य को बदलकर उद्धृत न करें।
- उदाहरण से बात समझाना: खजूर से उपयोगी बड़प्पन; सूप से विवेक; वर्षा/धूप से अति से बचना।
(ख) सूची समूह में साझा करें। दोहा दो पंक्तियों और चार चरणों का छंद है; सामान्य मात्रा-विन्यास प्रत्येक पंक्ति में 13–11 होता है। तुक, दोहराव और ध्वनि कविता को यादगार बनाते हैं। छंद की मात्रा-गणना शिक्षक से अभ्यास करें।
अनुमान और कल्पना से
पृष्ठ 68–69 के प्रत्येक प्रश्न पर नमूना संकेत; अपना तर्क भी स्वीकार्य है:
(क) गुरु का महत्व
सामने ऐसी स्थिति होती तो ज्ञान देने वाले गुरु का आभार प्रकट करता। शिक्षक न हों तो सीखने और मार्गदर्शन की व्यवस्था कठिन होगी; पुस्तक, परिवार और अनुभव भी सीखने के साधन हैं।
(ख) अति और संतुलन
बहुत बोलने से दूसरों की बात सुनने का अवसर घट सकता है; जरूरी समय पर मौन से अपनी बात रह सकती है। वर्षा अधिक हो तो जलभराव, कम हो तो पानी की कमी हो सकती है। जरूरत से ज्यादा स्क्रीन-समय पढ़ाई, आराम और दूसरी गतिविधियों का समय घटा सकता है। परिस्थिति के अनुसार संतुलन बनाएँ।
(ग) सत्य
झूठ से भरोसा टूट सकता है। गलत उत्तर को अंक मिले हों तो शिक्षक को विनम्रता से बताकर सुधार का अनुरोध करूँगा।
(घ) मधुर वाणी
सम्मानपूर्ण बात से सहयोग और शांत चर्चा बढ़ सकती है। खतरे या अनुचित व्यवहार पर स्पष्ट और दृढ़ बात जरूरी हो सकती है; दृढ़ होने के लिए अपमानजनक होना जरूरी नहीं।
(ङ) उपयोगी बड़प्पन
बड़े पद का अर्थ दूसरों की मदद और जिम्मेदारी भी है। खजूर फल तथा नारियल भोजन/तेल आदि से उपयोगी हो सकते हैं। मॉनिटर चुनते समय निष्पक्षता, जिम्मेदारी, सुनने की क्षमता और सहयोग देखें।
(च) आलोचना
ठोस और उचित सुझाव से गलती सुधर सकती है। कोई प्रतिक्रिया न दे तो सुधार का अवसर घटेगा; हर आलोचना सही मानने के बजाय प्रमाण और उद्देश्य समझें।
(छ) सूप जैसा विवेक
उपयोगी विचार अपनाऊँगा और अफवाह/हानिकारक सलाह छोड़ूँगा। बिना जाँचे हर बात स्वीकार करने से गलत फैसले हो सकते हैं।
(ज) मन-पंछी
मन को पुस्तकालय और प्रकृति की ओर ले जाना चाहूँगा ताकि सीखूँ और शांति पाऊँ। संगति सोच, आदत और व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
वाद-विवाद और अन्य गतिविधियाँ
वाद-विवाद
(क) पक्ष, विपक्ष और निर्णायक समूह बनाएँ। (ख) पक्ष का नमूना: वाणी पर संयम से दूसरों को सुनते हैं। विपक्ष का नमूना: जरूरत पर चुप रहना भी उचित नहीं। (ग) दोनों तर्क लिखकर देखें कि संतुलन का संदेश दोनों को कहाँ जोड़ता है।
शब्द से जुड़े शब्द
‘कबीर’ से पाठ के शब्द जोड़ें: बानी, साँच, गुरु, गोविंद, निंदक, सूप, संगति। हर शब्द का संदर्भ बताएँ।
दोहे और कहावतें
‘जैसा संग वैसा रंग’: खेल का अभ्यास करने वाले मित्रों के साथ मेरी रुचि बढ़ी। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’: पौधे की नियमित देखभाल की तो वह बढ़ा। कहावतें सामान्य अनुभव व्यक्त करती हैं; हर स्थिति का निश्चित वैज्ञानिक नियम नहीं।
सबकी प्रस्तुति
एक दोहा चुनकर गायन, भाव-नृत्य, पाठ या अभिनय करें। नमूना: एक मित्र गुस्से में है; दूसरा शांत बात करके समाधान की ओर लाता है। समूह पहले भाव समझे, फिर प्रस्तुति चुने।
पाठ से आगे
आपकी बात
(क) किसी वास्तविक मार्गदर्शक ने कैसे सहायता की? नमूना: अध्यापक ने प्रश्न हल करने के छोटे कदम समझाए। (ख) गलती बताने से सुधार का अनुभव: साथी ने वर्तनी सुधारी तो पुनः जाँचा। (ग) मित्रों से मिली अच्छी आदत: मिलकर पढ़ने की नियमितता। ये उदाहरण हैं, अपना अनुभव नहीं तो वैसा दावा न करें।
सृजन
(क) मौलिक कहानी का नमूना: मैच में गेंद सीमा छू चुकी थी, पर निर्णायक ने नहीं देखा। नेहा ने अपनी टीम के लाभ के बावजूद सही बात बताई। खेल रुका और निर्णय सुधरा। टीम ने सीखा कि विश्वास जीत से बड़ा हो सकता है।
(ख) शिक्षक पर लेख: समय लेकर अनुमति से पूछें—आप पढ़ाने में किन बातों पर ध्यान देते हैं? कठिनाई में विद्यार्थियों की कैसे सहायता करते हैं? उत्तर के आधार पर परिचय, योगदान और सीखी बातों वाला छोटा निबंध लिखें।
कबीर हमारे समय में
(क) कल्पना में विषय: अफवाह, पानी की रक्षा, मिल-जुलकर रहना, डिजिटल संयम। (ख) छात्र की मौलिक दो-पंक्ति का नमूना: ‘बिना जाँच के बात न भेजो, पहले सच को जान। / शब्द वही फिर आगे कहो, जिसमें हो सम्मान।’ यह कबीर की रचना या जाँचा हुआ दोहा-छंद नहीं; अपना लेखन तैयार करें।
साइबर सुरक्षा और दोहे
(क) अनावश्यक निजी जानकारी साझा करने से दुरुपयोग और अवांछित संपर्क का जोखिम हो सकता है। (ख) स्रोत, लेखक, तारीख और प्रमाण देखकर जानकारी चुनें; संदिग्ध संदेश पर किसी विश्वसनीय वयस्क/शिक्षक से बात करें। सूप की तरह जाँचना साहित्यिक उदाहरण है।
आज के समय में — छह घटनाओं से संबंधित दोहे
- अमित की संगति: ‘कबिरा मन पंछी भया…’
- इंटरनेट की जानकारी चुनना: ‘साधू ऐसा चाहिए…’
- मित्र से सुधारात्मक आलोचना: ‘निंदक नियरे राखिए…’
- रीमा का क्रोध और कटु बोल: ‘ऐसी बानी बोलिए…’
- मोहन और महेश का बहुत बोलना/चुप रहना: ‘अति का भला न बोलना…’
- सुरेश द्वारा गुरु का योगदान मानना: ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े…’
खोजबीन के लिए
परिवार, शिक्षक या पुस्तकालय से कबीर का एक गीत/साखी खोजें, सुनें और स्रोत सहित लिखें। पुस्तक में पृष्ठ 74 पर NCERT के वीडियो-संदर्भ दिए हैं। सभी सदस्यों की चुनी रचनाएँ मिलाकर पुस्तिका बनाएँ; दूसरी रचना को कबीर के नाम से लिखने से पहले स्रोत जाँचें।
पढ़ने के लिए — कदम मिलाकर चलना होगा
पृष्ठ 75 पर अटल बिहारी वाजपेयी की कविता दी है। इसका केंद्रीय भाव संकट, सफलता-असफलता और सुख-दुख में साहस, सेवा तथा मिलकर आगे बढ़ना है। अग्नि, अंगारे और आहुति संघर्ष/समर्पण की काव्यात्मक छवियाँ हैं; इन्हें आग या चोट पहुँचाने की सलाह न समझें। कबीर के उदारता और उपयोगी बड़प्पन के संदेश से इसकी तुलना कर सकते हैं।
ClearStudy के अतिरिक्त प्रश्न
यह अतिरिक्त अभ्यास NCERT के मुद्रित अभ्यास से अलग है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. इस पाठ के दोहों के रचयिता कौन हैं और दोहे किस ग्रंथ से लिए गए हैं?
2. कबीर के अनुसार झूठ किसके समान है?
3. कबीर ने खजूर के पेड़ का उदाहरण क्यों दिया है?
4. ‘निंदक’ को पास रखने से क्या लाभ होता है?
5. ‘सूप’ के स्वभाव से कबीर ने साधु को क्या सीख दी है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
6. “अति का भला न बोलना…” दोहे के माध्यम से कबीर ने जीवन का कौन-सा महत्त्वपूर्ण संदेश दिया है? उदाहरण सहित समझाइए।
7. कबीर के इन दोहों में ‘गुरु’ की महिमा किस प्रकार प्रकट हुई है? समझाइए।
8. कबीर के दोहे आज के समय में भी प्रासंगिक हैं – इस कथन को किन्हीं तीन दोहों के आधार पर सिद्ध कीजिए।
ClearStudy अभ्यास MCQ और अभिकथन-कारण
1. इस पाठ में संकलित कबीर के दोहों की कुल संख्या कितनी है?
(क) छह
(ख) सात
(ग) आठ
(घ) दस
2. कबीर के अनुसार सबसे बड़ी तपस्या क्या है?
(क) मौन रहना
(ख) सत्य का पालन
(ग) धन-दान
(घ) तीर्थयात्रा
3. ‘सूप’ किस वस्तु को अपने पास रख लेता है?
(क) थोथा (भूसी)
(ख) पानी
(ग) सार (उपयोगी अनाज)
(घ) धूल
4. “बलिहारी गुरु आपने” में कबीर ने किसके प्रति समर्पण व्यक्त किया है?
(क) ईश्वर
(ख) गुरु
(ग) माता-पिता
(घ) राजा
5. खजूर का पेड़ राहगीर को क्या नहीं देता?
(क) फूल
(ख) छाया
(ग) जड़
(घ) काँटे
6. ‘निंदक’ का अर्थ है—
(क) प्रशंसा करने वाला
(ख) निंदा/आलोचना करने वाला
(ग) मित्र
(घ) गुरु
7. “मन का आपा खोय” में ‘आपा’ का अर्थ है—
(क) अहंकार
(ख) धन
(ग) मित्रता
(घ) क्रोध
8. “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय” पंक्ति किस कहावत के रूप में प्रसिद्ध है?
(क) जैसा देश वैसा भेष
(ख) जैसा संग वैसा रंग
(ग) जैसी करनी वैसी भरनी
(घ) नाच न जाने आँगन टेढ़ा
9. मधुर वाणी बोलने से दूसरों को क्या मिलता है?
(क) धन
(ख) शीतलता/शांति
(ग) क्रोध
(घ) भय
10. कबीर ने मन की तुलना किससे की है?
(क) नदी से
(ख) पंछी (पक्षी) से
(ग) दीपक से
(घ) पवन से
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): कबीर निंदक को अपने पास रखने की सलाह देते हैं।
कारण (R): निंदक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।
2. अभिकथन (A): कबीर के अनुसार केवल बड़ा (ऊँचा/संपन्न) होना ही पर्याप्त है।
कारण (R): खजूर का पेड़ ऊँचा होकर भी राहगीर को छाया नहीं देता।
3. अभिकथन (A): कबीर गुरु को गोविंद (ईश्वर) से ऊँचा स्थान देते हैं।
कारण (R): गुरु ने ही गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग बताया है।
4. अभिकथन (A): “अति का भला न…” दोहा संतुलित जीवन की सीख देता है।
कारण (R): दोहे में किसी भी बात की अत्यधिकता को हानिकारक बताया गया है।
5. अभिकथन (A): अच्छी संगति का जीवन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
कारण (R): कबीर कहते हैं कि मनुष्य जैसी संगति करता है, वैसा ही फल पाता है।
परीक्षा-उपयोगी सुझाव
दोहे को परीक्षा में लिखते समय उसकी मूल वर्तनी (जैसे ‘चूप’, ‘सीतल’, ‘साँच’) ज्यों-की-त्यों लिखें – इन्हें आधुनिक रूप में न बदलें। भावार्थ लिखते समय पहले शब्दार्थ स्पष्ट करें, फिर पूरे दोहे का केंद्रीय संदेश एक-दो वाक्य में दें। ‘जैसा संग वैसा रंग’ जैसी कहावतों एवं प्रतीकों (सूप = विवेक, खजूर = निरुपयोगी बड़प्पन) को उत्तर में अवश्य जोड़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
कक्षा 8 हिंदी मल्हार अध्याय 5 में कितने दोहे हैं और किसने लिखे हैं?
इस पाठ में संत कबीर के कुल आठ दोहे संकलित हैं, जो ‘कबीर वचनावली’ से लिए गए हैं।
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े…” दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
इस दोहे में गुरु की महिमा बताई गई है। कबीर गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा मानते हैं, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।
‘सूप’ किसका प्रतीक है?
‘सूप’ विवेक और सूझबूझ का प्रतीक है – जैसे सूप सार रख लेता और थोथा उड़ा देता है, वैसे ही विवेकी व्यक्ति अच्छी बातें ग्रहण और व्यर्थ बातें त्याग देता है।
“जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय” किस कहावत के रूप में प्रसिद्ध है?
यह पंक्ति ‘जैसा संग वैसा रंग’ कहावत के रूप में प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति जिस संगति में रहता है, वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है।
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास और ClearStudy के अतिरिक्त प्रश्न अलग हैं। भावार्थ तथा उत्तर अध्ययन-सहायता हैं, आधिकारिक NCERT उत्तर-कुंजी नहीं।
