कक्षा 8 हिंदी (मल्हार) अध्याय 4 – हरिद्वार (पत्र) प्रश्न-उत्तर एवं सार (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 8 हिंदी की पुस्तक मल्हार (गद्य) के अध्याय 4 ‘हरिद्वार’ (लेखक – भारतेंदु हरिश्चंद्र, विधा – पत्र) का पूरा समाधान देता है। यहाँ पाठ की सभी अभ्यास-गतिविधियों के प्रश्न पुस्तक के अनुसार और उत्तर मौलिक एवं परीक्षोपयोगी रूप में दिए गए हैं।
- लेखक परिचय – भारतेंदु हरिश्चंद्र
- पाठ का सार
- शब्दार्थ
- मेरी समझ से (पाठ से)
- मिलकर करें मिलान
- मिलकर करें चयन
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- अनुमान और कल्पना से
- लिखें संवाद
- ‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग / काल की पहचान
- भावों की पहचान
- पत्र की रचना
- लेखन के अनोखे तरीके
- आपकी बात
- पाठ से आगे (गतिविधियाँ)
- अतिरिक्त प्रश्न
- अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लेखक परिचय – भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र (सन् 1850–1885) हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध रचनाकार थे, जिन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक’ माना जाता है। उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन किया तथा कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका और स्त्रियों के लिए बालाबोधिनी जैसी पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं। ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ का उद्घोष करने वाले भारतेंदु अपनी यात्राओं के लिए भी चर्चित रहे; वे मानते थे कि शिक्षा की पूर्ति केवल पुस्तकों से ही नहीं, यात्राओं से भी होती है। उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अंग्रेजी शासन का विरोध और स्वाधीनता की भावना के स्वर सुनाई देते हैं। सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी और सरयूपार की यात्रा उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।
पाठ का सार
‘हरिद्वार’ पाठ भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा गया एक पत्र है, जो 14 अक्टूबर सन् 1871 ई. को प्रकाशित हुआ था। इस पत्र में लेखक ने सन् 1871 की अपनी हरिद्वार-यात्रा का रोचक एवं साहित्यिक वर्णन प्रस्तुत किया है। पत्र की भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, जिसमें प्राचीन हिंदी की छवि दिखाई देती है।
लेखक कहते हैं कि हरिद्वार ऐसी पुण्य भूमि है जहाँ प्रवेश करते ही मन शुद्ध और निर्मल हो जाता है। यह भूमि तीन ओर हरे-भरे सुंदर पर्वतों से घिरी है, जिन पर अनेक प्रकार की लताएँ सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही हैं। बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो साधुओं की भाँति एक पैर पर तपस्या करते हुए घाम, ओस और वर्षा सहते हैं। वे फल, फूल, छाया, छाल और लकड़ी से ही नहीं, बल्कि जलने पर कोयले और राख से भी सबका मनोरथ पूर्ण करते हैं।
लेखक त्रिभुवन-पावनी श्री गंगा जी की पवित्र, शीतल और मिष्ट धारा का वर्णन करते हैं, जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल यश की लता-सी दिखाई देती है। यहाँ गंगा दो धाराओं – नील धारा और श्री गंगा – में बँट जाती हैं। ‘हरि की पैड़ी’ नामक पक्के घाट पर स्नान होता है। इस क्षेत्र में हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल – पाँच मुख्य तीर्थ हैं। लेखक बताते हैं कि यहाँ के पंडे बड़े संतोषी हैं, जो एक पैसे को भी लाख मानकर संतुष्ट रहते हैं।
लेखक दीवान कृपा राम के बंगले पर ठहरे थे और उन्होंने अपने मित्र कल्लू जी के साथ ग्रहण-काल में आनंदपूर्वक स्नान तथा श्री भागवत का पारायण किया। एक दिन उन्होंने गंगा-तट पर पत्थर पर ही भोजन किया और अनुभव किया कि वह सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़कर था; वहाँ बार-बार उनके चित्त में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। अंत में लेखक संपादक से कहते हैं कि वे चित्त से अब भी वहीं निवास करते हैं और इस पत्र को पत्रिका में स्थान देने का अनुरोध करते हैं। इस प्रकार यह पत्र प्रकृति-प्रेम, स्वच्छता, सादगी, संतोष और आध्यात्मिकता का सुंदर संदेश देता है।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पुण्य भूमि | पवित्र एवं पावन धरती |
| वल्ली | लता, बेल |
| मनोरथ | मन की इच्छा, अभिलाषा |
| अर्थी | याचक, माँगने वाला, इच्छुक व्यक्ति |
| विमुख | निराश होकर लौटना, मुँह मोड़ना |
| बधिक | शिकारी, हिंसक व्यक्ति, बहेलिया |
| कल्लोल करना | क्रीड़ा करना, आनंद से चहकना/उछलना |
| त्रिभुवन-पावनी | तीनों लोकों को पवित्र करने वाली (गंगा) |
| कीर्ति | यश, प्रसिद्धि |
| मिष्ट | मीठा, मधुर |
| श्वेत | सफेद, उज्ज्वल |
| शिखर (शिषर) | पर्वत की चोटी |
| पाट | नदी की चौड़ाई, फैलाव |
| वेग | तेज प्रवाह, गति |
| धर्मशाला | यात्रियों के ठहरने का सार्वजनिक भवन |
| विलक्षण | अनोखा, विशेष, असाधारण |
| संतोषी | थोड़े में संतुष्ट रहने वाला |
| निदान | अंत में, फलस्वरूप |
| पारायण | किसी ग्रंथ का आद्योपांत (आरंभ से अंत तक) पाठ |
| वैराग्य | सांसारिक मोह से विरक्ति, अनासक्ति |
| कुशा | एक प्रकार की पवित्र घास, दर्भ |
| विरक्त | संसार से विमुख, वैरागी |
| मौनावलंबन | मौन धारण करना, चुप हो जाना |
| स्थानदान | (पत्रिका में) स्थान देना, छापना/सँजोना |
मेरी समझ से (पाठ से)
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?
• लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।
• लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
• लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
• लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।
2. “वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
• शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
• आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
• मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
• सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
• संतुष्टि में सुख होता है।
• सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।
• लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।
• पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
4. “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?
• अंधविश्वास और लालच
• मानवता और देशप्रेम
• सादगी और आत्मनिर्भरता
• स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
• राजनीतिक
• आध्यात्मिक
• सामाजिक
• प्राकृतिक
6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?
• कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
• मुहावरों का अधिक प्रयोग
• सरलता और चित्रात्मकता
• जटिलता और संक्षिप्तता
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने होंं। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने।
मिलकर करें मिलान
पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। आपस में चर्चा कीजिए और इनके उपयुक्त संदर्भों से इनका मिलान कीजिए—
| क्रम | शब्द | उपयुक्त संदर्भ (सही मिलान) |
|---|---|---|
| 1. | हरिद्वार | यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
| 2. | गंगा | यह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे— भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि। |
| 3. | भगीरथ | ये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी है। |
| 4. | चण्डिका | मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप। |
| 5. | भागवत | यह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। |
| 6. | दालचीनी | यह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं। |
मिलकर करें चयन
(क) पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो निष्कर्ष दिए गए हैं— एक सही और एक भ्रामक। उपयुक्त (सही) निष्कर्ष पर सही का चिह्न लगाइए।
| क्रम | पंक्ति | सही निष्कर्ष |
|---|---|---|
| 1. | पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है। | लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है। |
| 2. | बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। | वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं। |
| 3. | इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। | यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं। |
| 4. | जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है। | गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है। |
| 5. | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। | लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है। |
| 6. | निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। | लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर कहीं स्थान दिया जाए, यानी इसे पढ़ा और सँजोया जाए। |
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ से चुनी गई पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए कि आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया।
(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।”
सोच-विचार के लिए
(क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब? (संकेत— किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)
(ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
(ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।” आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी? (संकेत— केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)
(घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।” इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?
अनुमान और कल्पना से
(क) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?
(ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।” कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।
(ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?
(घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।” इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?
(ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
लिखें संवाद
(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए— जैसे पर्वत बोल रहे होंं।
‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग / काल की पहचान
‘आदरार्थ बहुवचन’ को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
काल की पहचान – निम्नलिखित पंक्तियों में क्रिया कौन-से काल को प्रदर्शित कर रही है? (भूतकाल/वर्तमान/भविष्य)
भावों की पहचान
दिए गए भावों (प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख) में से प्रत्येक पंक्ति में प्रकट होने वाला भाव पहचानिए—
| क्रम | पंक्ति | भाव |
|---|---|---|
| 1. | उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था। | संतोष |
| 2. | चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। | वैराग्य / भक्ति |
| 3. | पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। | संतोष |
| 4. | हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी। | शांति / प्रसन्नता |
| 5. | सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं। | परोपकार |
पत्र की रचना
नीचे इस पत्र की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। इन विशेषताओं से जुड़े वाक्यों से इनका मिलान कीजिए (एक विशेषता एक से अधिक वाक्यों से भी जुड़ सकती है)—
| क्रम | पत्र की विशेषताएँ | पत्र से उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. | व्यक्तिपरकता— पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होती हैं। | “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…” |
| 2. | संवादात्मकता— पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। | श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु! |
| 3. | स्वाभाविक शैली— भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। | आपका मित्र — यात्री |
| 4. | व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन— जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है। | मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है… |
| 5. | अभिवादन या संबोधन— पत्र का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता… का अत्यंत विस्तार से वर्णन। जैसे— “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” |
| 6. | हस्ताक्षर— लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है। | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। |
| 7. | उपसंहार और निवेदन— लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है। | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके… |
| 8. | मुख्य विषय-वस्तु | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… |
लेखन के अनोखे तरीके
(क) पाठ में लेखक ने कई स्थानों पर तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। पाठ में से उन विशिष्ट पंक्तियों को ढूँढ़िए—
| तुलना | पाठ की विशिष्ट पंक्ति |
|---|---|
| 1. वृक्षों की तुलना साधुओं से | “बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।” |
| 2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से | “मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।” |
| 3. हरियाली की तुलना गलीचे से | “सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।” |
| 4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से | “त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।” |
(ख) निम्नलिखित प्राचीन-शैली की पंक्तियों को आज की हिंदी में लिखिए।
→ इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट शिकारियों से बिना डरे आनंद से उछल-कूद करते हैं। 2. “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
→ वर्षा के कारण हर ओर हरियाली फैली थी, मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरे रंग का गलीचा बिछा दिया गया हो। 3. “यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।”
→ यह इतना पवित्र तीर्थ है कि वहाँ इच्छा और क्रोध से भरे (विकारी) लोग रह ही नहीं पाते। 4. “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।”
→ वहाँ जाते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसका वर्णन करना संभव नहीं। 5. “यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।”
→ यहाँ रात को ग्रहण लगा और हम सबने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्री भागवत का पूरा पाठ भी किया। 6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।”
→ उस समय पत्थर पर किए गए भोजन का सुख सोने की थाली के भोजन से कहीं अधिक था। 7. “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
→ मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को (अपनी पत्रिका में) स्थान अवश्य देंगे।
आपकी बात
1. “मैंने गंगा जी के तट पर रसोई करके… भोजन किया।” क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?
2. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो? उसके बारे में बताइए।
3. “हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।” आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो?
4. पाठ में वर्णित है, यहाँ के वृक्ष “फल, फूल, गंध… जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।” क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?
पाठ से आगे (गतिविधियाँ – संकेत सहित)
पाठ के अंत में अनेक रचनात्मक एवं समूह-गतिविधियाँ दी गई हैं, जो विद्यार्थी की अपनी कल्पना और व्यावहारिक कार्य पर आधारित हैं। नीचे संक्षिप्त संकेत दिए गए हैं—
प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण: “तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!” विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए, जिसमें स्वच्छता और पर्यावरण-संरक्षण का संदेश हो।
स्वास्थ्य और योग: (क) 5 मिनट मौन बैठकर अपनी श्वास एवं आस-पास की ध्वनियों पर ध्यान केंद्रित कीजिए और उस अनुभव पर एक अनुच्छेद लिखिए। (ख) अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रमों की एक ‘सूचना’ तैयार कीजिए।
सज्जन वृक्ष: (क) एक पौधा लगाइए, उसे नाम देकर उसका मित्र बनिए और देखभाल कीजिए। (ख) उसके बारे में अपनी दैनंदिनी (डायरी) में नियमित लिखिए।
अपने शब्द: ‘शीतल’ शब्द का शब्द-चित्र बनाइए – अर्थ (ठंडा), समानार्थी (ठंडा, सर्द), विपरीतार्थक (उष्ण/गरम), वाक्य प्रयोग (पर्वत से शीतल पवन बह रही थी)।
यात्रा के व्यय की गणना: ₹1000 के बजट में किसी यात्रा का व्यय-विवरण (किराया, भोजन, स्मृति-चिह्न आदि) बनाइए और सोचिए कि कौन-सी वस्तु आवश्यक है।
यात्रा सबके लिए: टूरिस्ट गाइड बनकर सोचिए कि बुजुर्ग, बच्चों, दिव्यांग एवं श्रवण/दृष्टिबाधित यात्रियों की सुविधा के लिए आप पहुँचने, घूमने और भोजन में कैसे सहायता करेंगे, तथा ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा हेतु क्या ध्यान रखेंगे।
शब्द से जुड़े शब्द: ‘हरिद्वार’ से जुड़े शब्द लिखिए – जैसे गंगा, घाट, तीर्थ, पैड़ी, स्नान, मंदिर, पंडा, यात्रा।
आज की पहेली (पाठ से शब्द खोजिए): 1. मसाला – दालचीनी; 2. कपास से जुड़ा शब्द – जनेऊ; 3. जहाँ स्नान होता है – घाट/हरि की पैड़ी; 4. वृक्ष का अंग – छाल (या जड़/पत्ते); 5. नगर/तीर्थ – हरिद्वार (कनखल); 6. व्यापार से जुड़ा स्थान – दुकान; 7. नदी – गंगा; 8. पर्वत – विल्वपर्वत; 9. धार्मिक ग्रंथ – भागवत।
झरोखे से / खोजबीन के लिए: भारतेंदु के ‘हरिद्वार के मार्ग में’ पत्रांश तथा उनके प्रसिद्ध नाटक ‘अंधेर नगरी’ को पढ़कर कक्षा में चर्चा कीजिए।
अतिरिक्त प्रश्न
लघु उत्तरीय (30–40 शब्द)
1. ‘हरिद्वार’ पाठ किस विधा में लिखा गया है और किसके नाम लिखा गया है?
2. हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-कौन से हैं?
3. लेखक ने हरिद्वार के पंडों की किस विशेषता की प्रशंसा की है?
4. गंगा-तट पर पत्थर पर भोजन करते समय लेखक को कैसा अनुभव हुआ?
5. लेखक ने वृक्षों की तुलना सज्जनों से क्यों की है?
दीर्घ उत्तरीय (100–120 शब्द)
6. ‘हरिद्वार’ पत्र में लेखक ने हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
7. इस पत्र के माध्यम से भारतेंदु हरिश्चंद्र हमें कौन-कौन से जीवन-मूल्यों का संदेश देते हैं?
अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘हरिद्वार’ पाठ के लेखक कौन हैं?
(क) प्रेमचंद
(ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) रामधारी सिंह दिनकर
2. यह पत्र किस पत्रिका के संपादक के नाम लिखा गया था?
(क) हरिश्चंद्र मैगजीन
(ख) बालाबोधिनी
(ग) कविवचन सुधा
(घ) सरस्वती
3. हरिद्वार में स्नान का प्रसिद्ध पक्का घाट किस नाम से जाना जाता है?
(क) दशाश्वमेध घाट
(ख) हरि की पैड़ी
(ग) कुशावर्त्त
(घ) नीलधारा
4. लेखक के अनुसार हरिद्वार में स्थित मुख्य देवता कौन हैं?
(क) श्री गंगा जी
(ख) विल्वेश्वर महादेव
(ग) चण्डिका देवी
(घ) भगीरथ
5. हरिद्वार से गंगा किस रूप में आगे बढ़ती है?
(क) पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है
(ख) पहाड़ों में लौट जाती है
(ग) सूख जाती है
(घ) रेगिस्तान में गिरती है
6. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” – यहाँ ‘सज्जन’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) पंडों के लिए
(ख) यात्रियों के लिए
(ग) फलदार वृक्षों के लिए
(घ) नदियों के लिए
7. लेखक हरिद्वार में किसके बंगले पर ठहरे थे?
(क) दीवान कृपा राम
(ख) भारामल जैकृष्णदास खत्री
(ग) कल्लू जी
(घ) पंडा
8. लेखक के अनुसार हरिद्वार में किस वस्तु से दालचीनी जैसी सुगंध आती है?
(क) जल से
(ख) कुशा (घास) से
(ग) फूलों से
(घ) धूप से
9. लेखक ने पत्र के अंत में अपने नाम के साथ स्वयं को क्या कहा है?
(क) संपादक
(ख) यात्री
(ग) तीर्थयात्री
(घ) पंडित
10. भारतेंदु हरिश्चंद्र को किस रूप में जाना जाता है?
(क) छायावाद के प्रवर्तक
(ख) आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक
(ग) रीतिकाल के कवि
(घ) उपन्यास सम्राट
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): लेखक के अनुसार हरिद्वार में प्रवेश करते ही मन शुद्ध हो जाता है।
कारण (R): हरिद्वार एक पवित्र तीर्थस्थान है जो अपनी निर्मलता एवं आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
2. अभिकथन (A): लेखक ने पत्थर पर किए भोजन को सोने की थाल के भोजन से बढ़कर बताया।
कारण (R): लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने पत्थर पर भोजन किया।
3. अभिकथन (A): पाठ में ‘गंगा’ के साथ ‘हैं’ क्रिया का प्रयोग हुआ है, जबकि गंगा एकवचन है।
कारण (R): आदर-सम्मान प्रकट करने के लिए एकवचन संज्ञा का बहुवचन रूप में (आदरार्थ बहुवचन) प्रयोग किया जाता है।
4. अभिकथन (A): पत्र की भाषा आज की हिंदी से कुछ भिन्न प्रतीत होती है।
कारण (R): यह पत्र लगभग 150 वर्ष पुराना है और इसमें प्राचीन हिंदी की छवि दिखाई देती है।
5. अभिकथन (A): लेखक ने हरिद्वार के वृक्षों की तुलना साधुओं से की है।
कारण (R): वृक्ष एक स्थान पर खड़े रहकर घाम, ओस और वर्षा को साधुओं की भाँति सहन करते हैं।
परीक्षा-उपयोगी सुझाव
पत्र-विधा से जुड़े प्रश्नों में संबोधन, विषय-वस्तु और अंत में हस्ताक्षर की विशेषताएँ अवश्य लिखें। उपमा/मानवीकरण के उदाहरण (वृक्ष → साधु, हरियाली → गलीचा, गंगा → भगीरथ की कीर्ति) याद रखें। ‘आदरार्थ बहुवचन’ का नियम और प्राचीन वर्तनी (शिषर→शिखर, जात्रियों→यात्रियों) के उदाहरण परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।
सामान्य भूलें (इनसे बचें)
• ‘हरिद्वार’ को कहानी/निबंध न लिखें – यह ‘पत्र’ विधा है।
• लेखक का नाम ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’ है, ‘हरिश्चंद्र राजा’ नहीं।
• ‘कविवचन सुधा’ एक पत्रिका है, स्थान या ग्रंथ नहीं।
• पाँच तीर्थों के नाम में कुशावर्त्त और विल्वपर्वत को न छोड़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘हरिद्वार’ पाठ के लेखक कौन हैं और यह किस विधा में है?
इस पाठ के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं और यह ‘पत्र’ विधा में लिखा गया है, जिसे उन्होंने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम भेजा था।
हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-से हैं?
हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल – ये पाँच मुख्य तीर्थ हैं।
लेखक ने गंगा के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ क्यों लगाया है?
गंगा को पूज्य माता एवं देवी मानने के कारण श्रद्धा और आदर प्रकट करने हेतु लेखक ने ‘श्री गंगा जी’ जैसे आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है (आदरार्थ बहुवचन)।
इस पाठ से कौन-से जीवन-मूल्य मिलते हैं?
संतोष, सादगी, परोपकार, स्वच्छता, प्रकृति-प्रेम और संस्कृति के प्रति श्रद्धा – ये इस पत्र के प्रमुख जीवन-मूल्य हैं।
प्रश्न NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
