कक्षा 8 हिंदी मल्हार पाठ 4 — हरिद्वार प्रश्न उत्तर और सार

हरिद्वार प्रश्न उत्तर: कक्षा 8 हिंदी मल्हार पाठ 4 में भारतेंदु हरिश्चंद्र के यात्रा-पत्र का सार, शब्दार्थ, अभ्यास, सही चयन-मिलान, पत्र की रचना, आदरार्थ बहुवचन और काल के उदाहरण पढ़ें।

कक्षा: 8 विषय: हिंदी पुस्तक: मल्हार अध्याय: 4 लेखक: भारतेंदु हरिश्चंद्र विधा: पत्र स्रोत प्रति: पुनर्मुद्रण 2026–27

स्रोत: NCERT मल्हार पाठ 4 की PDF, मुद्रित पृष्ठ 45–62, पुनर्मुद्रण 2026–27। व्यक्तिगत, कल्पनात्मक और समूह-कार्य वाले उत्तर नमूने हैं; अपने अनुभव के अनुसार लिखें।

लेखक परिचय – भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र (सन् 1850–1885) हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध रचनाकार थे, जिन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक’ माना जाता है। उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन किया तथा कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका और स्त्रियों के लिए बालाबोधिनी जैसी पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं। ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ का उद्घोष करने वाले भारतेंदु अपनी यात्राओं के लिए भी चर्चित रहे; वे मानते थे कि शिक्षा की पूर्ति केवल पुस्तकों से ही नहीं, यात्राओं से भी होती है। उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अंग्रेजी शासन का विरोध और स्वाधीनता की भावना के स्वर सुनाई देते हैं। सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी और सरयूपार की यात्रा उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

पाठ का सार

‘हरिद्वार’ भारतेंदु हरिश्चंद्र का यात्रा-अनुभव प्रस्तुत करने वाला पत्र है, जो 14 अक्टूबर 1871 को ‘कविवचनसुधा’ में प्रकाशित हुआ। लेखक तीन ओर हरे पर्वत, लताओं, वृक्षों, पक्षियों और गंगा की धाराओं का चित्रात्मक वर्णन करते हैं। लताएँ शुभ मनोरथों जैसी और वृक्ष तपस्वी साधुओं जैसे दिखते हैं। वृक्षों की उदारता से परोपकार का भाव सामने आता है।

लेखक दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले में ठहरे; मित्र कल्लू जी भी साथ थे। ग्रहण के समय स्नान, दिन में भागवत-पारायण और गंगा-तट पर स्वयं पकाकर पत्थर पर भोजन करने से उन्हें विशेष आनंद मिला। सादे भोजन का सुख सोने की थाली से बढ़कर लगा। लौटने पर भी उनका मन उसी स्थान में रमा रहा। वे संपादक से पत्र को पत्रिका में स्थान देने का निवेदन करते हैं।

यह उन्नीसवीं शताब्दी का व्यक्तिगत और साहित्यिक वर्णन है। कुशा की सुगंध, पंडों का संतोष और तीर्थ की निर्मलता लेखक की अनुभूति/श्रद्धा के रूप में पढ़ें; इन्हें सभी वर्तमान निवासियों, नदीजल की पीने-योग्यता या आज की यात्रा-सुविधाओं के प्रमाण के रूप में न लें। भगीरथ-संबंधी प्रसंग धार्मिक परंपरा का संदर्भ है।

हरिद्वार यात्रा-पत्र के भाव पर आधारित नदी, हरे पर्वत, वृक्ष और पत्र-लेखन सामग्री का कल्पनात्मक दृश्य
भारतेंदु के ‘हरिद्वार’ पत्र में प्रकृति और व्यक्तिगत अनुभव साथ आते हैं। यह AI से बनाया भावचित्र है; वास्तविक हरिद्वार का फोटो, ऐतिहासिक दृश्य या भौगोलिक मानचित्र नहीं।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
पुण्य भूमिपवित्र एवं पावन धरती
वल्लीलता, बेल
मनोरथमन की इच्छा, अभिलाषा
अर्थीयाचक, माँगने वाला, इच्छुक व्यक्ति
विमुखनिराश होकर लौटना, मुँह मोड़ना
बधिकशिकारी, हिंसक व्यक्ति, बहेलिया
कल्लोल करनाक्रीड़ा करना, आनंद से चहकना/उछलना
त्रिभुवन-पावनीतीनों लोकों को पवित्र करने वाली (गंगा)
कीर्तियश, प्रसिद्धि
मिष्टमीठा, मधुर
श्वेतसफेद, उज्ज्वल
शिखर (शिषर)पर्वत की चोटी
पाटनदी की चौड़ाई, फैलाव
वेगतेज प्रवाह, गति
धर्मशालायात्रियों के ठहरने का सार्वजनिक भवन
विलक्षणअनोखा, विशेष, असाधारण
संतोषीथोड़े में संतुष्ट रहने वाला
निदानअंत में, फलस्वरूप
पारायणकिसी ग्रंथ का आद्योपांत (आरंभ से अंत तक) पाठ
वैराग्यसांसारिक मोह से विरक्ति, अनासक्ति
कुशाएक प्रकार की पवित्र घास, दर्भ
विरक्तसंसार से विमुख, वैरागी
मौनावलंबनमौन धारण करना, चुप हो जाना
स्थानदान(पत्रिका में) स्थान देना, छापना/सँजोना

मेरी समझ से (पाठ से)

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?

• लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।

• लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।

• लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।

• लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।

उत्तरसही उत्तर – लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।यहाँ लेखक वृक्षों की तुलना सज्जनों से करते हैं – जैसे सज्जन अपकार करने वाले को भी उपकार देते हैं, वैसे ही वृक्ष पत्थर मारने (कष्ट देने) पर भी बदले में मीठे फल देते हैं। यह वृक्षों की उदारता और परोपकार का मानवीकरण है।

2. “वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?

• शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी

• आर्थिक संतोष और मानसिक विकास

• मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव

• सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम

उत्तरसही उत्तर – मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव।पवित्र तीर्थ-स्थल हरिद्वार के शांत, निर्मल वातावरण में लेखक का मन सांसारिक मोह से हटकर वैराग्य और ईश्वर-भक्ति की ओर झुक जाता था – यह उनकी मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव को दर्शाता है।

3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?

• संतुष्टि में सुख होता है।

• सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।

• लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।

• पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।

उत्तरसही उत्तर – संतुष्टि में सुख होता है।गंगा-तट के पवित्र वातावरण में, प्रकृति के समीप किया गया साधारण भोजन भी लेखक को परम संतोष देता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सच्चा सुख वस्तुओं की कीमत में नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि में है।

4. “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?

• अंधविश्वास और लालच

• मानवता और देशप्रेम

• सादगी और आत्मनिर्भरता

• स्वच्छता और प्रकृति प्रेम

उत्तरप्रमुख उत्तर — सादगी और आत्मनिर्भरता (तीसरा विकल्प)। प्रकृति-प्रेम प्रसंग से समझा जा सकता है; स्वच्छता का प्रमाण इस पंक्ति में नहीं है।लेखक का स्वयं रसोई बनाकर पत्थर पर भोजन करना सादगी और आत्मनिर्भरता का परिचायक है, गंगा-तट पर बैठने से प्रकृति के निकट रहने का सुख व्यक्त होता है।

5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?

• राजनीतिक

• आध्यात्मिक

• सामाजिक

• प्राकृतिक

उत्तरसही उत्तर – आध्यात्मिक; तथा प्राकृतिक। (एक से अधिक उत्तर संभव)हरिद्वार में लेखक को गंगा-स्नान, भागवत-पारायण और वैराग्य-भक्ति का आध्यात्मिक अनुभव हुआ, साथ ही पर्वतों, वृक्षों, पक्षियों और गंगा जैसे प्राकृतिक सौंदर्य ने भी उन्हें अत्यंत आनंदित किया।

6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?

• कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता

• मुहावरों का अधिक प्रयोग

• सरलता और चित्रात्मकता

• जटिलता और संक्षिप्तता

उत्तरसही उत्तर – सरलता और चित्रात्मकता।यद्यपि भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, फिर भी लेखक ने सहज शैली में उपमाओं और तुलनाओं के माध्यम से ऐसा सजीव वर्णन किया है कि हरिद्वार का दृश्य आँखों के सामने चित्र की तरह उभर आता है।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने होंं। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने।

संकेतयह समूह-चर्चा (गतिविधि) है। प्रत्येक विद्यार्थी अपने चुने हुए उत्तर का कारण पाठ की पंक्तियों के आधार पर बताए और दूसरों के तर्क धैर्य से सुनकर अंतर पर विचार करे।

मिलकर करें मिलान

पृष्ठ 50 के दाएँ स्तंभ के मूल क्रमांक के अनुसार सही मिलान:

बाएँ शब्ददाएँ क्रमांकसंदर्भ का सार
1. हरिद्वार3उत्तराखंड का तीर्थ; गंगा के पर्वतीय क्षेत्र से मैदान की ओर आने का स्थान
2. गंगा5भारत की प्रमुख नदी
3. भगीरथ6धार्मिक कथा-परंपरा में गंगा को पृथ्वी पर लाने वाले सूर्यवंशी राजा
4. चण्डिका1मान्यताओं में दुर्गा का एक रूप
5. भागवत2श्रीकृष्ण-संबंधी कथाओं वाला पुराण
6. दालचीनी4पेड़ की सुगंधित छाल, जिसका मसाले में उपयोग होता है

क्रम-कुंजी: 1→3, 2→5, 3→6, 4→1, 5→2, 6→4। संदर्भ में आए अलकनंदा और मंदाकिनी को गंगा के पूर्ण पर्याय न मानें; वे गंगा नदी-तंत्र की अलग नदियाँ हैं। यहाँ उद्देश्य मुद्रित संदर्भों का मिलान है। नदी-तंत्र का संदर्भ: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन — गंगा का प्रवाह।

मिलकर करें चयन

पृष्ठ 51 में हर पंक्ति के सामने दिए दो निष्कर्षों में उपयुक्त विकल्प का क्रम:

पंक्ति क्रमांकसही विकल्पकारण
1पहलालताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की सुंदरता से जोड़ा गया है।
2दूसरावृक्षों के मौसम सहने की तुलना तपस्वी साधुओं से है; वृक्षों की वास्तविक तपस्या नहीं।
3पहलालेखक पक्षियों के निडर होकर आनंद करने का दृश्य वर्णित करते हैं।
4पहलाजल की मिठास और शीतलता की अनुभूति उपमा द्वारा व्यक्त है; उसमें चीनी या बर्फ मिलाने का कथन नहीं।
5दूसरागंगा के समीप भोजन से प्रकृति के साथ निकटता और सुख प्रकट है; महँगे बर्तन की अनिवार्यता नहीं।
6दूसरा‘स्थानदान’ का संदर्भ संपादक से पत्रिका में पत्र प्रकाशित करने का निवेदन है।

क्रम-कुंजी: 1, 2, 1, 1, 2, 2। सभी पहले विकल्प सही नहीं हैं। समूह में अपना चयन पाठ की पंक्ति से समझाएँ।

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनी गई पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए कि आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया।

(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”

अर्थअपने अनुभव और श्रद्धाभाव के वर्णन में लेखक कहते हैं कि हरिद्वार की कुशा में दालचीनी और जावित्री जैसी मनोहर सुगंध आती है।इसके माध्यम से वे यह भाव व्यक्त करते हैं कि यह भूमि इतनी पवित्र है कि यहाँ की साधारण घास तक सुगंधित है – अर्थात् स्थान की पवित्रता उसकी प्रत्येक वस्तु में झलकती है।

(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।”

अर्थलेखक वृक्षों की उदारता और परोपकार की प्रशंसा करते हैं। वृक्षों के पास जो भी याचक (अर्थी) जाता है, वह कभी निराश नहीं लौटता।वृक्ष जीवित रहते हुए फल, फूल, छाया, छाल, बीज, लकड़ी आदि देते हैं और जलकर भी कोयले और राख के रूप में मनुष्य के काम आते हैं। इस प्रकार वृक्ष अंत तक निःस्वार्थ भाव से दूसरों का हित करते हैं।

सोच-विचार के लिए

(क) चित्त से वहीं निवास

लौट आने के बाद भी लेखक के मन में हरिद्वार की सुखद स्मृतियाँ बसी हैं। नमूना व्यक्तिगत उत्तर: नानी के घर से लौटकर मैं वहाँ की बातचीत और खेल याद करता रहा। ऐसा अनुभव न हुआ हो तो वही लिखें।

(ख) संतोष का कथन आज

यह लेखक का अपने समय का अवलोकन है; उससे आज के पूरे समाज या किसी पेशे के लोगों का स्वभाव तय नहीं होता। विचार का नमूना: मेरी परिचित एक व्यक्ति उपयोगी चीजें खरीदकर बाकी धन बचाती हैं और उपलब्ध साधनों का आनंद लेती हैं। यह संतोष का उदाहरण हो सकता है। अपने वास्तविक उदाहरण और कारण लिखें; कम आय का अर्थ अपने-आप प्रसन्नता नहीं।

(ग) टिकने योग्य स्थान

पाठ में शांत, आनंददायक परिवेश और शीतल पवन का उल्लेख है। इनके कारण स्थान सुखद लगा होगा। आराम, दृश्य और सुविधाएँ अतिरिक्त अनुमान हो सकते हैं, पर बंगले की सभी आधुनिक सुविधाएँ या तीर्थों तक आसान पहुँच पाठ में बताई नहीं गई है।

(घ) वृक्षों का महत्व

लेखक फल, फूल, सुगंध, छाया और अन्य उपयोगों से वृक्षों की उदारता समझाते हैं। आज हम उनसे प्रकृति की रक्षा तथा दूसरों की सहायता की सीख ले सकते हैं। हर पेड़ के सभी अंग औषधि/खाद्य नहीं होते; बिना पहचान उनका सेवन न करें। परोपकार की उपमा पेड़ों को चोट पहुँचाने या जलाने की सलाह नहीं।

अनुमान और कल्पना से

ये कल्पनात्मक उत्तर हैं; अलग योजनाएँ भी उचित हैं।

(क) हरिद्वार में मेरी योजना

हरे पर्वत और नदी के दृश्य देखूँगा, शांत सुरक्षित स्थान पर बैठकर प्रकृति का चित्र बनाऊँगा और यात्रा-डायरी लिखूँगा। धार्मिक स्थलों पर जाना अपनी रुचि तथा परिवार की योजना पर निर्भर होगा।

(ख) जल के छींटों की कल्पना

शीतल फुहार और हवा से ताजगी महसूस होगी। लहरों की ध्वनि तथा हरियाली मन को सुख देंगी। यह साहित्यिक कल्पना है; नदी-किनारे की सुरक्षा आवश्यक है।

(ग) बोलते पेड़

पेड़ कहते—हम छाया और फल देते हैं; हमारी शाखाएँ मत तोड़ो, हमारी देखभाल करो। इस कल्पना से प्रकृति के प्रति संवेदना बढ़ सकती है।

(घ) ‘श्री’ और ‘जी’

लेखक गंगा के प्रति अपना आदर और धार्मिक श्रद्धा इन संबोधनों से व्यक्त करते हैं। यह उनके भाव और सांस्कृतिक संदर्भ का संकेत है।

(ङ) सुलभ यात्रा

साथी से पूछूँगा कि किस प्रकार की सहायता और संचार वे पसंद करते हैं। दृष्टिबाधित साथी को सहमति से रास्ते और दृश्य का वर्णन करूँगा; हाथ पकड़ने या दिशा बदलने से पहले पूछूँगा। श्रवणबाधित साथी के लिए उनके अनुकूल लिखित जानकारी, दृश्य संकेत या संकेत-भाषा उपलब्ध करूँगा। सुरक्षित पहुँच, बैठने की जगह, भीड़ में तय मिलन-स्थान और नदी से सुरक्षित दूरी सभी के लिए उपयोगी हैं। किसी को जल छूने या धार्मिक कार्य के लिए बाध्य नहीं करूँगा।

लिखें संवाद

(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।

उत्तर (नमूना संवाद)लेखक: कल्लू जी, देखिए तो सही – हरिद्वार की यह भूमि कितनी पवित्र और मनोरम है!कल्लू जी: सच कहा आपने! गंगा का यह शीतल जल और चारों ओर के हरे पर्वत मन को मोह लेते हैं।लेखक: चलिए, हरि की पैड़ी पर स्नान करें और फिर श्री भागवत का पारायण करें।कल्लू जी: अवश्य। यहाँ आकर तो चित्त में स्वयं ही भक्ति और वैराग्य का उदय हो रहा है।

(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए— जैसे पर्वत बोल रहे होंं।

उत्तर (नमूना संवाद)लेखक: हे पर्वतो! तुम कितने भव्य और शांत खड़े हो, मानो साधना में लीन हो।पर्वत: हाँ यात्री! हम युगों से इस पुण्य भूमि की रक्षा करते हुए घाम, ओस और वर्षा सहते रहते हैं।लेखक: तुम्हारी हरियाली और शीतल पवन मेरे मन को असीम शांति देती है।पर्वत: तुम भी प्रकृति का सम्मान करना और इस सौंदर्य को सदा सहेजकर रखना।

‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग / काल की पहचान

आदरार्थ बहुवचन — रिक्त स्थान

सम्मान के लिए एक व्यक्ति के साथ भी बहुवचन क्रिया/सर्वनाम आ सकते हैं। हर एकवचन संज्ञा अपने-आप आदरार्थ बहुवचन नहीं होती। मूल दस वाक्यों के भरे रूप:

  1. हमारे प्रधानाचार्य महोदय आज विद्यालय में उपस्थित हैं।
  2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, हमें उनका कहना मानना चाहिए।
  3. मेरी बहन बाजार जा रही है, वहाँ से किताबें ले आएगी।
  4. बाहर फेरीवाला आया है। उसे बुला लाओ।
  5. डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी बुला लाओ।
  6. आप तो बहुत दिन बाद आए हैं, आपका स्वागत है।
  7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं, उनसे परामर्श लेना चाहिए।
  8. आपके माता-पिता कहाँ हैं? क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?
  9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं, हम इनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
  10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है।

काल की पहचान

क्रममुख्य क्रियाकाल
1स्थानदान दीजिएगाभविष्य; इसी वाक्य में ‘निश्चय है’ वर्तमान है।
2घिरी हैवर्तमान
3हैं / फल देते हैंवर्तमान
4उदय होता थाभूत
5टिका थाभूत

अन्य दो कालों में बदलना — नमूने

  1. भूत: मुझे निश्चय था कि आपने इस पत्र को स्थान दिया था। वर्तमान: मुझे निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थान देते हैं।
  2. भूत: यह भूमि तीन ओर हरे पर्वतों से घिरी थी। भविष्य: यह भूमि तीन ओर हरे पर्वतों से घिरी रहेगी।
  3. भूत: वृक्ष ऐसे थे कि पत्थर मारने से फल देते थे। भविष्य: वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे।
  4. वर्तमान: चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है। भविष्य: चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होगा।
  5. वर्तमान: मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका हूँ। भविष्य: मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिकूँगा।

पहले वाक्य में निवेदन और निश्चय दोनों हैं। काल-परिवर्तन में उनका वाक्य-रूप भी बदलता है; भूतकाल का ऊपर दिया रूप कथन है, भविष्य का अनुरोध नहीं।

भावों की पहचान

दिए गए भावों (प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख) में से प्रत्येक पंक्ति में प्रकट होने वाला भाव पहचानिए—

क्रमपंक्तिभाव
1.उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।संतोष
2.चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।वैराग्य / भक्ति
3.पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।संतोष
4.हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।शांति (दिए भावों की सूची से)
5.सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।परोपकार

पत्र की रचना

पृष्ठ 56 के दाएँ उदाहरणों के क्रमांक से मिलान। एक उदाहरण एक से अधिक विशेषताओं से जुड़ सकता है:

विशेषताउपयुक्त उदाहरण क्रमांककारण
1. व्यक्तिपरकता8; 1/4 भी स्वीकार्यचित्त से वहीं रहने का कथन निजी भावना है।
2. संवादात्मकता6; 2 भीसंपादक को सीधे संबोधित करके निवेदन है।
3. स्वाभाविक शैली4समाचार लिखने के आनंद की सहज अभिव्यक्ति
4. व्यक्तिगत अनुभव7; 1 भीस्वयं रसोई/भोजन तथा स्नान का अनुभव
5. अभिवादन/संबोधन2संपादक को आदरपूर्ण प्रारंभिक संबोधन
6. हस्ताक्षर3‘आपका मित्र — यात्री’ से प्रेषक का संकेत
7. उपसंहार और निवेदन6अंत में पत्र को स्थान देने का अनुरोध
8. मुख्य विषय-वस्तु5हरिद्वार का विस्तृत प्राकृतिक वर्णन

अपनी यात्रा का पत्र — ढाँचा

स्थान और तारीख → परिचित का संबोधन → यात्रा कब/कहाँ हुई → दृश्य और अपना अनुभव → समापन तथा आगे मिलने/लिखने का निवेदन → अपना नाम। अपनी वास्तविक यात्रा लिखें; यात्रा न की हो तो शिक्षक की अनुमति से काल्पनिक पत्र को स्पष्ट रूप से ‘कल्पना’ कहें।

लेखन के अनोखे तरीके

(क) पाठ में लेखक ने कई स्थानों पर तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। पाठ में से उन विशिष्ट पंक्तियों को ढूँढ़िए—

तुलनापाठ की विशिष्ट पंक्ति
1. वृक्षों की तुलना साधुओं से“बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।”
2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से“मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।”
3. हरियाली की तुलना गलीचे से“सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से“त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।”

(ख) निम्नलिखित प्राचीन-शैली की पंक्तियों को आज की हिंदी में लिखिए।

उत्तर 1. “इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।”
→ इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट शिकारियों से बिना डरे आनंद से उछल-कूद करते हैं।
2. “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
→ वर्षा के कारण हर ओर हरियाली फैली थी, मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरे रंग का गलीचा बिछा दिया गया हो।
3. “यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।”
→ लेखक कहते हैं कि यह इतना निर्मल तीर्थ है कि इच्छा और क्रोध से भरे लोग वहाँ नहीं रहते। यह श्रद्धा से भरा आदर्शीकृत साहित्यिक कथन है, नगर के सभी लोगों के बारे में तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं।
4. “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।”
→ वहाँ जाते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसका वर्णन करना संभव नहीं।
5. “यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।”
→ यहाँ रात को ग्रहण लगा और हम सबने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्री भागवत का पूरा पाठ भी किया।
6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।”
→ उस समय पत्थर पर किए गए भोजन का सुख सोने की थाली के भोजन से कहीं अधिक था।
7. “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
→ मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को (अपनी पत्रिका में) स्थान अवश्य देंगे।
(ग) प्राचीन वर्तनीपाठ में प्रयुक्त प्राचीन वर्तनी वाले शब्द एवं उनका आज का रूप – शिषर → शिखर, जात्रियों → यात्रियों, बिछायत → बिछावन/बिछौना, बरफ → बर्फ, पनेे → पना (शरबत), जलेे → जले। (विद्यार्थी ऐसे और शब्द भी सूची में जोड़ें।)

आपकी बात

1. “मैंने गंगा जी के तट पर रसोई करके… भोजन किया।” क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?

उत्तर (संभावित)हाँ, पिकनिक या यात्रा के समय मैंने खुले मैदान/नदी-किनारे भोजन किया है।खुले वातावरण में ताज़ी हवा, हरियाली और मित्रों के साथ का आनंद भोजन को और अधिक स्वादिष्ट तथा यादगार बना देता है – यह अनुभव घर के सामान्य भोजन से कहीं अधिक रोमांचक और सुखद होता है। (विद्यार्थी अपना अनुभव लिखें।)

2. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो? उसके बारे में बताइए।

उत्तर (संभावित)हाँ। एक बार थककर लौटने पर माँ के हाथ की सादी रोटी और गुड़ ने मुझे जो संतोष दिया, वह किसी महँगे भोजन से नहीं मिल सकता था।इससे मैंने समझा कि सुख वस्तु की कीमत में नहीं, बल्कि उससे जुड़े स्नेह और मन की संतुष्टि में होता है। (विद्यार्थी अपना अनुभव जोड़ें।)

3. “हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।” आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो?

उत्तर (संभावित)मुझे मंदिर/नदी-तट तथा किसी शांत हरे-भरे उद्यान में पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है।वहाँ की शांति, स्वच्छता और प्राकृतिक सौंदर्य से मन तुरंत शांत और प्रसन्न हो जाता है। (विद्यार्थी अपने अनुभव से लिखें।)

4. पाठ में वर्णित है, यहाँ के वृक्ष “फल, फूल, गंध… जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।” क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?

उत्तर (संभावित)हाँ, हमारे घर के आँगन में लगा नीम/आम का पेड़ मुझे बहुत प्रिय है।उसकी छाया में मैं बचपन से खेलता और पढ़ता आया हूँ, वह हमें फल एवं शीतल छाया देता है; इसी कारण उससे मेरा गहरा भावनात्मक जुड़ाव है। (विद्यार्थी अपना उदाहरण दें।)

पाठ से आगे (गतिविधियाँ – संकेत सहित)

प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण

पोस्टर का नमूना: ‘तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!’ नीचे संदेश लिखें—कचरा कूड़ेदान में डालें; नदी में वस्तुएँ न फेंकें; पौधों की रक्षा करें। अपने समूह के सुझाव जोड़ें और नदी/हरियाली का चित्र बनाएँ।

स्वास्थ्य और योग

(क) पाँच मिनट आराम से मौन बैठकर श्वास और आसपास की ध्वनियाँ देखें। अपना वास्तविक अनुभव लिखें। नमूना: पहले ध्यान भटका; धीरे-धीरे पक्षियों की आवाज सुनाई दी और मन शांत लगा। सबको एक जैसा अनुभव होना जरूरी नहीं। (ख) सूचना का नमूना:

[अपने विद्यालय का नाम] — सूचना
तारीख: [जारी करने की तारीख]
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का कार्यक्रम
21 जून को [समय] पर [स्थान] में विद्यार्थियों के लिए योग-कार्यक्रम होगा। भाग लेने वाले सुविधाजनक वस्त्र पहनें। शिक्षक की देखरेख में अपनी सुविधा के अनुसार भाग लें।
[वास्तविक आयोजक का नाम/पद]

विद्यालय की वास्तविक अनुमति और समय भरें; यह घोषित वास्तविक कार्यक्रम नहीं।

सज्जन वृक्ष

(क) उपयुक्त स्थानीय पौधा वयस्क की सहायता से लगाएँ, उसे नाम दें और उसकी पानी/धूप की जरूरत समझें। (ख) डायरी में तारीख, पानी, पत्तों में परिवर्तन और अपनी देखभाल लिखें। अंकुर न बढ़े तो भी ईमानदार अवलोकन लिखें।

अपने शब्द — ‘शीतल’

अर्थसमानार्थीविपरीतार्थीवाक्य
ठंडा, सुखद ठंडक वालाठंडा; संदर्भ में सर्दगरम / उष्णप्रातः शीतल हवा चल रही थी।

समूह के हर सदस्य का शब्द अलग हो; उसका अर्थ, पर्याय, विलोम और अपना वाक्य लिखें।

यात्रा के व्यय की गणना

₹1000 में निकट के स्थान की काल्पनिक यात्रा का बजट; यह वर्तमान किराए का दावा नहीं:

मदराशि
आना-जाना₹400
भोजन₹250
पीने का सुरक्षित पानी₹50
स्मृति-चिह्न₹100
बची राशि₹200
कुल₹1000

(ख) नमूना: स्थानीय चित्र वाला बुकमार्क लूँगा क्योंकि उपयोगी है। महँगी वस्तु अनिवार्य नहीं; आवश्यक खर्च के बाद ही खरीदूँगा। असली यात्रा में स्थानीय मूल्य और अनुमति जाँचें।

यात्रा सबके लिए

(क) प्रत्येक व्यक्ति की जरूरत पूछकर सुलभ वाहन/रास्ता, विराम, शौचालय, भोजन और जानकारी की योजना बनाएँ। बच्चों के लिए जिम्मेदार वयस्क तथा तय मिलन-स्थान रखें। (ख) मौन संवाद में हावभाव/लिखित संदेश का प्रयोग करके चर्चा करें कि श्रवणबाधित साथी को कौन-सा माध्यम पसंद होगा। (ग) ऐतिहासिक भवनों पर न लिखें, वस्तुएँ न उखाड़ें और प्रवेश/फोटोग्राफी के स्थल-नियम मानें।

आज की पहेली — पृष्ठ 61

पृष्ठ 162 की पुस्तक-कुंजी के अनुरूप: 1. दालचीनी या जावित्री; 2. जनेऊ; 3. हरि की पैड़ी या घाट; 4. फल/फूल/पत्ते/छाल/बीज/लकड़ी/जड़ में कोई एक; 5. कनखल या हरिद्वार; 6. दुकान; 7. गंगा; 8. विल्वपर्वत; 9. श्रीभागवत।

झरोखे से — हरिद्वार के मार्ग में

पृष्ठ 61 के पत्रांश में लेखक मार्ग के वृक्ष-पक्षियों और बबूल में बया के लटकते घोंसलों का वर्णन करते हैं। कांटेदार वृक्ष में घर बनाने को वे पक्षी का चातुर्य कहते हैं। चर्चा करें: प्रकृति को ध्यान से देखने और तुलना द्वारा लिखने में यह अंश मुख्य पत्र से कैसे मिलता है? यह लेखक की साहित्यिक व्याख्या है, सभी पक्षियों का वैज्ञानिक नियम नहीं।

खोजबीन के लिए

पुस्तकालय या विश्वसनीय पाठ-स्रोत से भारतेंदु का ‘अंधेर नगरी’ पढ़ें। पात्र, शासन/न्याय पर व्यंग्य और अपनी समझ पर साथियों से चर्चा करें। पढ़े बिना कथानक या उद्धरण न गढ़ें।

ClearStudy के अतिरिक्त प्रश्न

यह अतिरिक्त अभ्यास NCERT के मुद्रित अभ्यास से अलग है।

लघु उत्तरीय (30–40 शब्द)

1. ‘हरिद्वार’ पाठ किस विधा में लिखा गया है और किसके नाम लिखा गया है?

उत्तर‘हरिद्वार’ पाठ ‘पत्र’ विधा में लिखा गया है। इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा था, जो 14 अक्टूबर 1871 ई. को प्रकाशित हुआ।

2. हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-कौन से हैं?

उत्तरहरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ हैं – हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल।

3. लेखक ने हरिद्वार के पंडों की किस विशेषता की प्रशंसा की है?

उत्तरलेखक ने पंडों के संतोषी स्वभाव की प्रशंसा की है। वे इतने संतोषी हैं कि एक पैसे को भी लाख मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, अर्थात् वे थोड़े में भी प्रसन्न रहते हैं।

4. गंगा-तट पर पत्थर पर भोजन करते समय लेखक को कैसा अनुभव हुआ?

उत्तरगंगा-तट पर शीतल जल के निकट पत्थर पर किया गया भोजन लेखक को सोने की थाली के भोजन से भी बढ़कर सुखद लगा। उस समय उनके चित्त में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।

5. लेखक ने वृक्षों की तुलना सज्जनों से क्यों की है?

उत्तरक्योंकि वृक्ष सज्जनों की भाँति परोपकारी होते हैं। जैसे सज्जन अपकार करने वाले का भी भला करते हैं, वैसे ही वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं और जीवन-भर तथा जलकर भी दूसरों के काम आते हैं।

दीर्घ उत्तरीय (100–120 शब्द)

6. ‘हरिद्वार’ पत्र में लेखक ने हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।

उत्तरलेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य का अत्यंत सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है। उन्होंने बताया कि यह भूमि तीन ओर हरे-भरे पर्वतों से घिरी है, जिन पर लताएँ सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैली हैं।बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो साधु एक पैर पर तपस्या कर रहे हों और घाम, ओस, वर्षा सह रहे हों। वृक्षों पर रंग-बिरंगे पक्षी निडर होकर कल्लोल करते हैं।त्रिभुवन-पावनी गंगा की शीतल, मिष्ट और स्वच्छ धारा राजा भगीरथ की कीर्ति की लता-सी दिखती है। वर्षा से चहुँ ओर हरियाली ऐसी फैली है मानो हरा गलीचा बिछा हो। इन उपमाओं और मानवीकरण से लेखक ने प्रकृति का मनोरम चित्र खींचा है।

7. इस पत्र के माध्यम से भारतेंदु हरिश्चंद्र हमें कौन-कौन से जीवन-मूल्यों का संदेश देते हैं?

उत्तरइस पत्र से अनेक जीवन-मूल्यों का संदेश मिलता है। पंडों के संतोषी स्वभाव के वर्णन से ‘संतोष ही सबसे बड़ा सुख है’ का बोध होता है।पत्थर पर सादा भोजन करके परम सुख पाने से सादगी और संतुष्टि का मूल्य स्पष्ट होता है। वृक्षों की उदारता का चित्रण निःस्वार्थ परोपकार की सीख देता है।गंगा को ‘श्री’ और ‘जी’ कहकर संबोधित करना प्रकृति एवं संस्कृति के प्रति श्रद्धा सिखाता है, तथा गंगा-तट पर भोजन का आनंद प्रकृति से लगाव का संकेत देता है। इस प्रकार यह पत्र हमें संतोष, सादगी, परोपकार, स्वच्छता और प्रकृति-संरक्षण की प्रेरणा देता है।

ClearStudy अभ्यास MCQ और अभिकथन-कारण

1. ‘हरिद्वार’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) प्रेमचंद

(ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र

(ग) महादेवी वर्मा

(घ) रामधारी सिंह दिनकर

उत्तर(ख) भारतेंदु हरिश्चंद्र।

2. यह पत्र किस पत्रिका के संपादक के नाम लिखा गया था?

(क) हरिश्चंद्र मैगजीन

(ख) बालाबोधिनी

(ग) कविवचन सुधा

(घ) सरस्वती

उत्तर(ग) कविवचन सुधा।

3. हरिद्वार में स्नान का प्रसिद्ध पक्का घाट किस नाम से जाना जाता है?

(क) दशाश्वमेध घाट

(ख) हरि की पैड़ी

(ग) कुशावर्त्त

(घ) नीलधारा

उत्तर(ख) हरि की पैड़ी।

4. लेखक के अनुसार हरिद्वार में स्थित मुख्य देवता कौन हैं?

(क) श्री गंगा जी

(ख) विल्वेश्वर महादेव

(ग) चण्डिका देवी

(घ) भगीरथ

उत्तर(क) श्री गंगा जी। लेखक लिखते हैं कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।

5. हरिद्वार से गंगा किस रूप में आगे बढ़ती है?

(क) पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है

(ख) पहाड़ों में लौट जाती है

(ग) सूख जाती है

(घ) रेगिस्तान में गिरती है

उत्तर(क) पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।

6. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” – यहाँ ‘सज्जन’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(क) पंडों के लिए

(ख) यात्रियों के लिए

(ग) फलदार वृक्षों के लिए

(घ) नदियों के लिए

उत्तर(ग) फलदार वृक्षों के लिए।

7. लेखक हरिद्वार में किसके बंगले पर ठहरे थे?

(क) दीवान कृपा राम

(ख) भारामल जैकृष्णदास खत्री

(ग) कल्लू जी

(घ) पंडा

उत्तर(क) दीवान कृपा राम।

8. लेखक के अनुसार हरिद्वार में किस वस्तु से दालचीनी जैसी सुगंध आती है?

(क) जल से

(ख) कुशा (घास) से

(ग) फूलों से

(घ) धूप से

उत्तर(ख) कुशा (घास) से।

9. लेखक ने पत्र के अंत में अपने नाम के साथ स्वयं को क्या कहा है?

(क) संपादक

(ख) यात्री

(ग) तीर्थयात्री

(घ) पंडित

उत्तर(ख) यात्री। पत्रांश के अंत में “आपका मित्र — यात्री” लिखा है; उसके बाद पुस्तक में लेखक का नाम अलग दिया है।

10. भारतेंदु हरिश्चंद्र को किस रूप में जाना जाता है?

(क) छायावाद के प्रवर्तक

(ख) आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक

(ग) रीतिकाल के कवि

(घ) उपन्यास सम्राट

उत्तर(ख) आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(क), 5-(क), 6-(ग), 7-(क), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): लेखक के अनुसार हरिद्वार में प्रवेश करते ही मन शुद्ध हो जाता है।

कारण (R): हरिद्वार एक पवित्र तीर्थस्थान है जो अपनी निर्मलता एवं आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): लेखक ने पत्थर पर किए भोजन को सोने की थाल के भोजन से बढ़कर बताया।

कारण (R): लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने पत्थर पर भोजन किया।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – भोजन का सुख वस्तु में नहीं, बल्कि पवित्र वातावरण और मन की संतुष्टि में था।

3. अभिकथन (A): पाठ में ‘गंगा’ के साथ ‘हैं’ क्रिया का प्रयोग हुआ है, जबकि गंगा एकवचन है।

कारण (R): आदर-सम्मान प्रकट करने के लिए एकवचन संज्ञा का बहुवचन रूप में (आदरार्थ बहुवचन) प्रयोग किया जाता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): पत्र की भाषा आज की हिंदी से कुछ भिन्न प्रतीत होती है।

कारण (R): यह पत्र लगभग 150 वर्ष पुराना है और इसमें प्राचीन हिंदी की छवि दिखाई देती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): लेखक ने हरिद्वार के वृक्षों की तुलना साधुओं से की है।

कारण (R): वृक्ष एक स्थान पर खड़े रहकर घाम, ओस और वर्षा को साधुओं की भाँति सहन करते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-उपयोगी सुझाव

पत्र-विधा से जुड़े प्रश्नों में संबोधन, विषय-वस्तु और अंत में हस्ताक्षर की विशेषताएँ अवश्य लिखें। उपमा/मानवीकरण के उदाहरण (वृक्ष → साधु, हरियाली → गलीचा, गंगा → भगीरथ की कीर्ति) याद रखें। ‘आदरार्थ बहुवचन’ का नियम और प्राचीन वर्तनी (शिषर→शिखर, जात्रियों→यात्रियों) के उदाहरण समझकर अपने वाक्यों में प्रयोग करें।

सामान्य भूलें (इनसे बचें)

• ‘हरिद्वार’ को कहानी/निबंध न लिखें – यह ‘पत्र’ विधा है।
• लेखक का नाम ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’ है, ‘हरिश्चंद्र राजा’ नहीं।
• ‘कविवचन सुधा’ एक पत्रिका है, स्थान या ग्रंथ नहीं।
• पाँच तीर्थों के नाम में कुशावर्त्त और विल्वपर्वत को न छोड़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘हरिद्वार’ पाठ के लेखक कौन हैं और यह किस विधा में है?

इस पाठ के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं और यह ‘पत्र’ विधा में लिखा गया है, जिसे उन्होंने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम भेजा था।

हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-से हैं?

हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल – ये पाँच मुख्य तीर्थ हैं।

लेखक ने गंगा के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ क्यों लगाया है?

गंगा को पूज्य माता एवं देवी मानने के कारण श्रद्धा और आदर प्रकट करने हेतु लेखक ने ‘श्री गंगा जी’ जैसे आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है (आदरार्थ बहुवचन)।

इस पाठ से कौन-से जीवन-मूल्य मिलते हैं?

संतोष, सादगी, परोपकार, स्वच्छता, प्रकृति-प्रेम और संस्कृति के प्रति श्रद्धा – ये इस पत्र के प्रमुख जीवन-मूल्य हैं।

प्रश्न NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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