कक्षा 8 हिंदी (मल्हार) अध्याय 5 – कबीर के दोहे प्रश्न-उत्तर एवं भावार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 8 हिंदी की नई पुस्तक मल्हार (काव्य) के अध्याय 5 ‘कबीर के दोहे’ (रचनाकार – कबीर) का पूरा समाधान देता है – सभी दोहों का मूल पाठ, भावार्थ, शब्दार्थ तथा पाठ की सभी अभ्यास-गतिविधियों के उत्तर।

कक्षा: 8 विषय: हिंदी पुस्तक: मल्हार (काव्य) अध्याय: 5 रचनाकार: कबीर विधा: दोहे सत्र: 2026–27

कवि से परिचय – कबीर

कबीर हिंदी के भक्तिकालीन निर्गुण-संत काव्य-धारा के सबसे प्रभावशाली एवं लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। माना जाता है कि उनका जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी (वाराणसी) में हुआ था। वे जुलाहे (करघे पर कपड़ा बुनने वाले) का काम करते थे और इसी श्रम के साथ-साथ उनके मन में सहज, सरल कविता बुनती जाती थी। बिना किसी औपचारिक शिक्षा के उन्होंने जीवन के गहरे अनुभवों को अत्यंत सरल भाषा में दोहों और साखियों के रूप में व्यक्त किया। उन्होंने आडंबर, पाखंड, जाति-भेद और बाहरी दिखावे का विरोध किया तथा सच्चाई, गुरु-महिमा, सत्संगति और मधुर वाणी पर बल दिया। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संग्रहीत हैं। आज भी उनके दोहे लोग भजनों की तरह गाते हैं और पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाए जाते हैं; उनकी वाणी हमें जीवन की सच्चाई समझने और अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देती है।

दोहे (मूल पाठ)

इस पाठ में कबीर के आठ दोहे संकलित हैं, जो सत्य, गुरु-महिमा, परोपकार, संतुलन, मधुर वाणी, आलोचना का स्वागत, विवेक तथा सत्संगति जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा देते हैं।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।

अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥

कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥

— कबीर
(संदर्भ— कबीर वचनावली, संपादक— अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’)

दोहों का भावार्थ

1. साँच बराबर तप नहीं…

कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तपस्या नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। सच बोलना और सच पर टिके रहना ही सबसे बड़ी साधना है। जिस मनुष्य के हृदय में सच्चाई बसती है, उसके हृदय में स्वयं गुरु (अर्थात् ईश्वर/सच्चा ज्ञान) निवास करता है। आशय यह है कि सत्य ही जीवन का सर्वोच्च मूल्य है और सच्चे हृदय में ही ईश्वरीय प्रकाश प्रकट होता है।

2. बड़ा हुआ तो क्या हुआ…

कबीर खजूर के ऊँचे पेड़ का उदाहरण देकर कहते हैं कि केवल बड़ा या ऊँचा (धनवान/शक्तिशाली) हो जाने से कुछ नहीं होता, यदि उससे किसी का भला न हो। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर वह राहगीर (पंथी) को छाया नहीं देता और उसके फल भी इतने ऊँचे लगते हैं कि सहज ही प्राप्त नहीं होते। इसी प्रकार बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए; अहंकारी एवं निरुपयोगी बड़प्पन व्यर्थ है।

3. गुरु गोविंद दोऊ खड़े…

कबीर कहते हैं कि यदि गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण छुऊँ? वे स्वयं उत्तर देते हैं कि मैं अपने गुरु पर बलिहारी (न्योछावर) जाता हूँ, क्योंकि गुरु ने ही मुझे गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग बताया है। इस दोहे में गुरु की महिमा को सर्वोपरि बताया गया है, क्योंकि ज्ञान देने वाला गुरु ही हमें ईश्वर से मिलाता है।

4. अति का भला न बोलना…

कबीर जीवन में संतुलन का महत्व समझाते हैं। वे कहते हैं कि न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना अच्छा है; जैसे न अधिक वर्षा अच्छी होती है और न ही तेज धूप। अर्थात् किसी भी बात की ‘अति’ (अत्यधिकता) हानिकारक होती है। हर परिस्थिति में संतुलन एवं विवेक बनाए रखना ही उचित है।

5. ऐसी बानी बोलिए…

कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार (मन का आपा) न हो। ऐसी मीठी वाणी दूसरों को शीतलता (शांति) प्रदान करती है और बोलने वाले को स्वयं भी मानसिक शांति देती है। आशय यह है कि अहंकाररहित, विनम्र एवं मधुर वचन से वातावरण सुखद बनता है और सबका मन प्रसन्न रहता है।

6. निंदक नियरे राखिए…

कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले (आलोचक) को अपने पास ही, अपने आँगन में झोंपड़ी बनवाकर रखना चाहिए। ऐसा निंदक बिना पानी और बिना साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल (शुद्ध) कर देता है, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है। अर्थात् रचनात्मक आलोचना से दूर भागने के बजाय उसे आत्म-सुधार का साधन मानना चाहिए।

7. साधू ऐसा चाहिए…

कबीर कहते हैं कि साधु (सज्जन/विवेकी व्यक्ति) का स्वभाव सूप (अनाज फटकने वाला सूपा) जैसा होना चाहिए। जैसे सूप सार (उपयोगी अनाज) को अपने पास रख लेता है और थोथा (बेकार भूसी) को उड़ा देता है, वैसे ही विवेकशील व्यक्ति को अच्छी-उपयोगी बातों को ग्रहण करना चाहिए और व्यर्थ-हानिकारक बातों को छोड़ देना चाहिए। यह विवेक एवं सूझबूझ की शिक्षा देता है।

8. कबिरा मन पंछी भया…

कबीर कहते हैं कि मन पंछी (पक्षी) के समान चंचल हो गया है, जो जहाँ चाहे वहाँ उड़ जाता है। इसके आगे वे जीवन का गहरा सत्य बताते हैं कि व्यक्ति जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। अर्थात् अच्छी संगति अच्छे और बुरी संगति बुरे परिणाम देती है; इसलिए मन एवं संगति दोनों को सही दिशा में रखना आवश्यक है।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
साँचसत्य, सच्चाई
तपतपस्या, साधना
हिरदेहृदय, मन
पंथीराहगीर, पथिक, यात्री
लागैलगते हैं
दोऊदोनों
काकेकिसके
लागौं पाँयचरण छुऊँ, पैर लगूँ
बलिहारीन्योछावर, समर्पित
गोविंदईश्वर, परमात्मा
अतिअत्यधिक, बहुत ज़्यादा
चूपचुप, मौन
बानीवाणी, बोली
आपाअहंकार, अपनापन/घमंड
सीतलशीतल, शांत
आपहुँस्वयं भी
निंदकनिंदा/आलोचना करने वाला
नियरेनिकट, पास
कुटी छवायझोंपड़ी बनवाकर
निर्मलस्वच्छ, शुद्ध, साफ़
सुभायस्वभाव से, सहज ही
सूपसूपा (अनाज फटकने का साधन)
सारउपयोगी/मूल्यवान वस्तु, तत्व
गहि रहैपकड़ रखता है, ग्रहण करता है
थोथाखोखला, बेकार (भूसी)
पंछीपक्षी, चिड़िया
भावै तहवाँजहाँ चाहे वहाँ
संगतिसाथ, संग, मेल-जोल

मेरी समझ से

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा ( ★ ) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

(1) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है?

• श्रम का महत्त्व

• गुरु का महत्त्व

• ज्ञान का महत्त्व

• भक्ति का महत्त्व

उत्तर★ गुरु का महत्त्व।इस दोहे में कबीर ने गुरु को सर्वोपरि बताया है, क्योंकि गुरु ने ही गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग दिखाया। (इस दृष्टि से ‘ज्ञान का महत्त्व’ भी उपयुक्त माना जा सकता है, क्योंकि गुरु ज्ञान देकर ही ईश्वर से मिलाता है।)

(2) “अति का भला न बोलना अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना अति की भली न धूप।।” इस दोहे का मूल संदेश क्या है?

• हमेशा चुप रहने में ही हमारी भलाई है

• बारिश और धूप से बचना चाहिए

• हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है

• हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए

उत्तर★ हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।दोहे में कहा गया है कि किसी भी बात की ‘अति’ अच्छी नहीं होती; जीवन में संतुलन बनाए रखना ही उचित है।

(3) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं फल लागै अति दूर।।” यह दोहा किस जीवन कौशल को विकसित करने पर बल देता है?

• समय का सदुपयोग करना

• दूसरों के काम आना

• परिश्रम और लगन से काम करना

• सभी के प्रति उदार रहना

उत्तर★ दूसरों के काम आना।खजूर के पेड़ की भाँति केवल बड़ा होना व्यर्थ है यदि उससे किसी का भला न हो; इसलिए बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए। (इसी आधार पर ‘सभी के प्रति उदार रहना’ भी उपयुक्त है।)

(4) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै आपहुँ सीतल होय।।” इस दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

• लोग हमारी प्रशंसा और सम्मान करने लगते हैं

• दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है

• किसी से विवाद होने पर उसमें जीत हासिल होती है

• सुनने वालों का मन इधर-उधर भटकने लगता है

उत्तर★ दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है।मधुर वाणी दूसरों को शीतल (शांत) करती है और बोलने वाले को भी मानसिक शांति प्रदान करती है।

(5) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप।।” इस दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

• सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता है

• सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है

• बाहरी परिस्थितियाँ ही जीवन में सफलता तय करती हैं

• सत्य महत्त्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है

उत्तर★ सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है तथा ★ सत्य महत्त्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।दोहे में सत्य को सबसे बड़ी तपस्या एवं जीवन-मूल्य बताया गया है; सच्चे हृदय में स्वयं गुरु (ईश्वरीय प्रकाश) निवास करता है।

(6) “निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना निर्मल करै सुभाय।।” यहाँ जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?

• आलोचना से बचना चाहिए

• आलोचकों को दूर रखना चाहिए

• आलोचकों को पास रखना चाहिए

• आलोचकों की निंदा करनी चाहिए

उत्तर★ आलोचकों को पास रखना चाहिए।निंदक हमारी कमियाँ बताकर बिना पानी-साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है, इसलिए उसे पास रखना लाभकारी है।

(7) “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देइ उड़ाय।।” इस दोहे में ‘सूप’ किसका प्रतीक है?

• मन की कल्पनाओं का

• सुख-सुविधाओं का

• विवेक और सूझबूझ का

• कठोर और क्रोधी स्वभाव का

उत्तर★ विवेक और सूझबूझ का।जैसे सूप सार को रख लेता और थोथा उड़ा देता है, वैसे ही विवेकशील व्यक्ति अच्छी बातें ग्रहण और व्यर्थ बातें त्याग देता है।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

उत्तरयह एक समूह-चर्चा गतिविधि है। मित्रों के साथ बैठकर हर प्रश्न पर विचार कीजिए कि किसने कौन-सा उत्तर चुना और क्यों। अपने उत्तर के पीछे दोहे की पंक्ति का आधार बताइए।जैसे प्रश्न (1) में कोई ‘गुरु का महत्त्व’ तो कोई ‘ज्ञान का महत्त्व’ चुन सकता है – दोनों ही तर्कसंगत हैं, क्योंकि गुरु ज्ञान देकर ही ईश्वर तक पहुँचाता है। इस प्रकार चर्चा से पता चलता है कि एक ही दोहे के एक से अधिक सही अर्थ हो सकते हैं।

मिलकर करें मिलान

(क) पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे स्तंभ 1 में दी गई हैं। इन्हें स्तंभ 2 में दिए गए इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए।

उत्तर (सही मिलान)
स्तंभ 1 (पंक्ति)स्तंभ 2 (सही अर्थ/संदर्भ)
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।जीवन में संतुलन महत्त्वपूर्ण है।
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्त्वपूर्ण है।
7. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
8. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।

(ख) नीचे स्तंभ 1 में दी गई दोहों की पंक्तियों को स्तंभ 2 में दी गई उपयुक्त पंक्तियों से जोड़िए—

उत्तर (पंक्तियों का मिलान)
स्तंभ 1 (प्रथम पंक्ति)स्तंभ 2 (मिलती हुई दूसरी पंक्ति)
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
8. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।

पंक्तियों पर चर्चा / सोच-विचार के लिए

पंक्तियों पर चर्चा: नीचे दी गई पंक्तियों का आपको क्या अर्थ समझ में आया?

(क) “कबिरा मन पंछी भया भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय।”

उत्तरइस पंक्ति का अर्थ है कि मन पक्षी की तरह चंचल है और जहाँ चाहे उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल (परिणाम) मिलता है – अच्छी संगति अच्छा और बुरी संगति बुरा फल देती है। इसलिए हमें सत्संगति करनी चाहिए।

(ख) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप।।”

उत्तरइसका अर्थ है कि सत्य से बड़ी कोई तपस्या और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिसके हृदय में सच्चाई होती है, उसके हृदय में स्वयं गुरु (ईश्वरीय ज्ञान) निवास करता है। अर्थात् सत्य का पालन ही सबसे श्रेष्ठ साधना है।

सोच-विचार के लिए:

(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।” इस दोहे में गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी ऊपर स्थान दिया गया है। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने विचार लिखिए।

उत्तर (विचारात्मक)हाँ, मैं इससे सहमत हूँ। गुरु ही वह व्यक्ति है जो हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश देता है और ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। बिना गुरु के मार्गदर्शन के ईश्वर को पहचानना कठिन है, इसलिए कबीर ने गुरु को सर्वोच्च आदर का पात्र माना है। (विद्यार्थी अपने अनुभव के आधार पर अपने विचार भी जोड़ सकते हैं।)

(ख) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।” बड़ा या संपन्न होने के साथ-साथ मनुष्य में और कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए?

उत्तरबड़ा या संपन्न होने के साथ-साथ मनुष्य में विनम्रता, उदारता, परोपकार की भावना, दया, सहायता करने का स्वभाव और दूसरों के काम आने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। तभी उसका बड़प्पन सार्थक एवं समाज के लिए उपयोगी होता है।

(ग) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय।” क्या शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही पड़ता है या स्वयं पर भी?

उत्तरशब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही नहीं, बल्कि स्वयं पर भी पड़ता है। जब हम मधुर एवं शांत वाणी बोलते हैं तो सुनने वाले को सुख मिलता है और हमारा अपना मन भी शांत एवं प्रसन्न रहता है। इसके विपरीत कटु वचन बोलने से दूसरे को कष्ट होता है और हम स्वयं भी अशांत एवं तनावग्रस्त हो जाते हैं।

(ङ) “जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय॥” हमारे विचारों और कार्यों पर संगति का क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तरसंगति का हमारे विचारों, आदतों और व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अच्छे लोगों की संगति से हममें अच्छे गुण, सकारात्मक सोच एवं अच्छी आदतें विकसित होती हैं, जबकि बुरी संगति हमें गलत राह पर ले जाती है। उदाहरणार्थ, मेहनती एवं अनुशासित मित्रों के साथ रहने से विद्यार्थी भी पढ़ाई में रुचि लेने लगता है।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. इस पाठ के दोहों के रचयिता कौन हैं और दोहे किस ग्रंथ से लिए गए हैं?

उत्तरइन दोहों के रचयिता संत कबीर हैं। ये दोहे ‘कबीर वचनावली’ (संपादक – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’) से लिए गए हैं।

2. कबीर के अनुसार झूठ किसके समान है?

उत्तरकबीर के अनुसार झूठ बोलना पाप के समान है, क्योंकि “झूठ बराबर पाप” अर्थात् झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं।

3. कबीर ने खजूर के पेड़ का उदाहरण क्यों दिया है?

उत्तरकबीर ने यह समझाने के लिए खजूर का उदाहरण दिया कि केवल बड़ा या ऊँचा होना व्यर्थ है यदि किसी का भला न हो। खजूर ऊँचा होकर भी राहगीर को न छाया देता है, न सुलभ फल।

4. ‘निंदक’ को पास रखने से क्या लाभ होता है?

उत्तरनिंदक हमारी कमियों एवं गलतियों को बताता रहता है, जिससे हमें उन्हें सुधारने का अवसर मिलता है और हमारा स्वभाव बिना किसी साधन के ही निर्मल (शुद्ध) होता रहता है।

5. ‘सूप’ के स्वभाव से कबीर ने साधु को क्या सीख दी है?

उत्तरजैसे सूप उपयोगी अनाज (सार) रख लेता और बेकार भूसी (थोथा) उड़ा देता है, वैसे ही साधु/विवेकी व्यक्ति को अच्छी बातें ग्रहण करनी और व्यर्थ बातें छोड़ देनी चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

6. “अति का भला न बोलना…” दोहे के माध्यम से कबीर ने जीवन का कौन-सा महत्त्वपूर्ण संदेश दिया है? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तरइस दोहे के माध्यम से कबीर ने जीवन में संतुलन का महत्त्वपूर्ण संदेश दिया है। उनका कहना है कि किसी भी बात की ‘अति’ अर्थात् अत्यधिकता हानिकारक होती है।जैसे न बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न बहुत अधिक चुप रहना; न अत्यधिक वर्षा अच्छी है और न तेज धूप। अत्यधिक वर्षा से बाढ़ और अत्यधिक धूप से सूखा पड़ जाता है।इसी प्रकार मोबाइल या मीडिया का अत्यधिक प्रयोग भी हानिकारक है। अतः हर परिस्थिति में संयम एवं संतुलन बनाए रखना ही श्रेष्ठ जीवन-कौशल है।

7. कबीर के इन दोहों में ‘गुरु’ की महिमा किस प्रकार प्रकट हुई है? समझाइए।

उत्तरकबीर के दोहों में गुरु की महिमा को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया है। “गुरु गोविंद दोऊ खड़े” दोहे में वे कहते हैं कि गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ खड़े हों तो पहले गुरु के चरण छुऊँगा।इसका कारण यह है कि गुरु ने ही गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग बताया। बिना गुरु के ज्ञान-प्रकाश के ईश्वर को पहचानना संभव नहीं।इसी प्रकार “जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप” में भी गुरु को सच्चे ज्ञान/ईश्वर के रूप में हृदय में बसा बताया गया है। इस प्रकार कबीर गुरु को जीवन का सबसे बड़ा मार्गदर्शक मानते हैं।

8. कबीर के दोहे आज के समय में भी प्रासंगिक हैं – इस कथन को किन्हीं तीन दोहों के आधार पर सिद्ध कीजिए।

उत्तर1. सत्य का महत्त्व: “साँच बराबर तप नहीं” आज भी सिखाता है कि ईमानदारी एवं सच्चाई ही सफल और सम्मानित जीवन का आधार है।2. संतुलन: “अति का भला न…” दोहा आज के डिजिटल युग में मोबाइल, सोशल मीडिया एवं भोजन तक में संयम बरतने की सीख देता है।3. सत्संगति: “जो जैसी संगति करै…” आज भी सत्य है कि अच्छे मित्रों एवं वातावरण का व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अतः कबीर के दोहे कालजयी एवं सदा प्रासंगिक हैं।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ में संकलित कबीर के दोहों की कुल संख्या कितनी है?

(क) छह

(ख) सात

(ग) आठ

(घ) दस

उत्तर(ग) आठ।

2. कबीर के अनुसार सबसे बड़ी तपस्या क्या है?

(क) मौन रहना

(ख) सत्य का पालन

(ग) धन-दान

(घ) तीर्थयात्रा

उत्तर(ख) सत्य का पालन।

3. ‘सूप’ किस वस्तु को अपने पास रख लेता है?

(क) थोथा (भूसी)

(ख) पानी

(ग) सार (उपयोगी अनाज)

(घ) धूल

उत्तर(ग) सार (उपयोगी अनाज)।

4. “बलिहारी गुरु आपने” में कबीर ने किसके प्रति समर्पण व्यक्त किया है?

(क) ईश्वर

(ख) गुरु

(ग) माता-पिता

(घ) राजा

उत्तर(ख) गुरु।

5. खजूर का पेड़ राहगीर को क्या नहीं देता?

(क) फूल

(ख) छाया

(ग) जड़

(घ) काँटे

उत्तर(ख) छाया।

6. ‘निंदक’ का अर्थ है—

(क) प्रशंसा करने वाला

(ख) निंदा/आलोचना करने वाला

(ग) मित्र

(घ) गुरु

उत्तर(ख) निंदा/आलोचना करने वाला।

7. “मन का आपा खोय” में ‘आपा’ का अर्थ है—

(क) अहंकार

(ख) धन

(ग) मित्रता

(घ) क्रोध

उत्तर(क) अहंकार।

8. “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय” पंक्ति किस कहावत के रूप में प्रसिद्ध है?

(क) जैसा देश वैसा भेष

(ख) जैसा संग वैसा रंग

(ग) जैसी करनी वैसी भरनी

(घ) नाच न जाने आँगन टेढ़ा

उत्तर(ख) जैसा संग वैसा रंग।

9. मधुर वाणी बोलने से दूसरों को क्या मिलता है?

(क) धन

(ख) शीतलता/शांति

(ग) क्रोध

(घ) भय

उत्तर(ख) शीतलता/शांति।

10. कबीर ने मन की तुलना किससे की है?

(क) नदी से

(ख) पंछी (पक्षी) से

(ग) दीपक से

(घ) पवन से

उत्तर(ख) पंछी (पक्षी) से।
उत्तर-कुंजी: 1-(ग), 2-(ख), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(क), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कबीर निंदक को अपने पास रखने की सलाह देते हैं।

कारण (R): निंदक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): कबीर के अनुसार केवल बड़ा (ऊँचा/संपन्न) होना ही पर्याप्त है।

कारण (R): खजूर का पेड़ ऊँचा होकर भी राहगीर को छाया नहीं देता।

उत्तर(घ) A गलत है (केवल बड़ा होना पर्याप्त नहीं, उपयोगी होना भी आवश्यक है), जबकि R सही है।

3. अभिकथन (A): कबीर गुरु को गोविंद (ईश्वर) से ऊँचा स्थान देते हैं।

कारण (R): गुरु ने ही गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग बताया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): “अति का भला न…” दोहा संतुलित जीवन की सीख देता है।

कारण (R): दोहे में किसी भी बात की अत्यधिकता को हानिकारक बताया गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): अच्छी संगति का जीवन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

कारण (R): कबीर कहते हैं कि मनुष्य जैसी संगति करता है, वैसा ही फल पाता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-उपयोगी सुझाव

दोहे को परीक्षा में लिखते समय उसकी मूल वर्तनी (जैसे ‘चूप’, ‘सीतल’, ‘साँच’) ज्यों-की-त्यों लिखें – इन्हें आधुनिक रूप में न बदलें। भावार्थ लिखते समय पहले शब्दार्थ स्पष्ट करें, फिर पूरे दोहे का केंद्रीय संदेश एक-दो वाक्य में दें। ‘जैसा संग वैसा रंग’ जैसी कहावतों एवं प्रतीकों (सूप = विवेक, खजूर = निरुपयोगी बड़प्पन) को उत्तर में अवश्य जोड़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

कक्षा 8 हिंदी मल्हार अध्याय 5 में कितने दोहे हैं और किसने लिखे हैं?

इस पाठ में संत कबीर के कुल आठ दोहे संकलित हैं, जो ‘कबीर वचनावली’ से लिए गए हैं।

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े…” दोहे का मुख्य संदेश क्या है?

इस दोहे में गुरु की महिमा बताई गई है। कबीर गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा मानते हैं, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।

‘सूप’ किसका प्रतीक है?

‘सूप’ विवेक और सूझबूझ का प्रतीक है – जैसे सूप सार रख लेता और थोथा उड़ा देता है, वैसे ही विवेकी व्यक्ति अच्छी बातें ग्रहण और व्यर्थ बातें त्याग देता है।

“जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय” किस कहावत के रूप में प्रसिद्ध है?

यह पंक्ति ‘जैसा संग वैसा रंग’ कहावत के रूप में प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति जिस संगति में रहता है, वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है।

दोहे एवं प्रश्न NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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