Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 10 Solutions — सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)
Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 10 solutions: वीरवर–शूद्रक की हितोपदेश-कथा का पहला भाग, शब्दार्थ और सात अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। पात्र-सन्दर्भ, सन्धि, अन्वय और भूतकाल सरल व्याख्या सहित समझें।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-बिन्दवः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का दशम पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)’ प्रसिद्ध कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है। संस्कृत-कथासाहित्य अत्यन्त समृद्ध एवं वैविध्यपूर्ण है; कथाओं के माध्यम से रोचक ढंग से जीवनोपयोगी उपदेश एवं प्रेरणाएँ दी जाती हैं। प्रस्तुत पाठ में शोभावती नगरी के पराक्रमी राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र वीरवर की कथा है, जो अपने स्वामी एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर करने को उद्यत रहता है। उसकी स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण-भाव अत्यन्त प्रेरणादायक है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – उत्तम उद्देश्य (सत्-निमित्त/सन्निमित्त) के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है। यह कथा दो भागों में है; प्रस्तुत ‘क-भागः’ में राजलक्ष्मी द्वारा बताए गए कठिन उपाय तक की घटनाएँ हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ संस्कृत के सुप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से संकलित है, जिसके रचयिता नारायण पण्डित माने जाते हैं और जो पञ्चतन्त्र की शैली में हितकारी उपदेश देने वाला ग्रन्थ है। पाठ का आरम्भ इस वर्णन से होता है कि शोभावती नामक एक नगरी थी, जहाँ शूद्रक नामक महापराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता एवं पवित्र-चरित्र राजा राज्य करता था। एक दिन वीरवर नामक राजपुत्र आजीविका (वृत्ति) पाने के लिए अपनी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर एवं पुत्री वीरवती के साथ किसी देश से राजद्वार पर आता है। यहाँ से उसकी अद्भुत स्वामिभक्ति एवं त्याग की कथा आरम्भ होती है। यह पाठ संवाद (नाट्य) एवं गद्य दोनों शैलियों में है तथा इसमें मुक्त-पदविन्यास, भूतकाल आदि व्याकरण-बिन्दु भी समझाए गए हैं।
सार (Hindi Summary)
शोभावती नगरी में शूद्रक नामक महापराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता एवं पवित्र-चरित्र राजा राज्य करता था। एक दिन वीरवर नामक एक राजपुत्र आजीविका पाने के लिए अपनी पत्नी, पुत्र शक्तिधर एवं पुत्री वीरवती सहित किसी देश से राजद्वार पर आया। उसने द्वारपाल से प्रार्थना की कि उसे स्वामी के पास ले चले। द्वारपाल उसे राजा के समीप ले गया। वीरवर ने विनयपूर्वक प्रणाम करके कहा कि यदि वह सौभाग्य से राजा की सेवा में नियुक्त हो जाए, तो जो भी आज्ञा दी जाएगी उसका श्रद्धापूर्वक पालन करेगा। राजा ने उसका वेतन पूछा तो उसने प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ माँगीं, और सामग्री के रूप में अपने दोनों भुजाओं तथा खड्ग को बताया। राजा ने इतना अधिक वेतन देना सम्भव न समझकर इनकार कर दिया और वीरवर प्रणाम करके सभा से बाहर चला गया।
तभी मन्त्री ने राजा को सुझाया कि चार दिन का वेतन देकर इस वेतनार्थी राजपुत्र के स्वरूप की परीक्षा कर लेनी चाहिए कि यह वेतन उचित है या नहीं। मन्त्रियों की सलाह से ताम्बूल देकर राजा ने वीरवर को नियुक्त कर लिया। वीरवर प्रतिदिन प्रातः राजदर्शन के पश्चात् अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को (देव-कार्य में), शेष का आधा दरिद्रों को दे देता और बचा हुआ भोजन-व्यय हेतु पत्नी के हाथ में दे देता था। फिर वह शस्त्र धारण किए हुए दिन-रात राजद्वार की सेवा करता और राजा की आज्ञा मिलने पर ही घर जाता था।
एक दिन कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में राजा ने किसी का करुण रोदन सुना। पूछने पर वीरवर ने उत्तर दिया कि वही द्वार पर सेवक के रूप में उपस्थित है। राजा ने उसे उस रोने की आवाज़ का पीछा करने की आज्ञा दी। वीरवर आज्ञा मानकर चल पड़ा। राजा भी मन-ही-मन यह सोचकर कि इस घोर अन्धकार में राजपुत्र को अकेले नहीं जाना चाहिए, खड्ग हाथ में लेकर चुपचाप उसके पीछे-पीछे नगर के बाहर निकल गया। बाहर वीरवर ने दिव्य आभूषणों से सुसज्जित एक रोती हुई सुन्दरी को देखा। पूछने पर उसने स्वयं को राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी बताया और कहा कि दैव (भाग्य) के प्रतिकूल होने से तीसरे दिन राजा की मृत्यु हो जाएगी, अतः वह अनाथ होकर रो रही है। वीरवर ने उपाय पूछा तो राजलक्ष्मी ने एक अत्यन्त कठिन उपाय बताया – यदि वीरवर हँसते हुए मुख से अपनी सबसे प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को उपहार रूप में अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष जीवित रहेगा और राजलक्ष्मी सुखपूर्वक यहीं निवास करेगी। इतना कहकर वह तत्क्षण अदृश्य हो गई। (कथा का अगला भाग पाठ 11 में है।)
पात्रों का भेद: वीरवर राजवंशीय पुरुष है, शूद्रक का पुत्र नहीं। उसकी पत्नी का पाठगत नाम वेदरता है। राजलक्ष्मी राज्य-समृद्धि का मानवीकृत कथा-पात्र है; उसे सर्वमङ्गला से न मिलाएँ। घटनाएँ नीति-कथा के साहित्यिक संदर्भ में हैं।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| महीपतिः | राजा (भूपाल) | King |
| महापराक्रमी | बहुत बलवान, अति बलशाली | Very brave / mighty |
| नानाशास्त्रवित् | अनेक शास्त्रों का ज्ञाता | One who knows many shastras |
| पूतचरित्रः | पवित्र चरित्र वाला | Of high (pure) character |
| प्रतिवसति स्म | रहता था (अवसत्) | Used to live |
| वृत्त्यर्थम् | आजीविका पाने के लिए | To get livelihood |
| समायाताः | आए (आगतवन्तः) | Came |
| प्रतिहारम् / दौवारिकः | द्वारपाल को / द्वारपालक | Door-keeper / gate-keeper |
| वर्तनम् | वेतन | Salary |
| उपपन्नम् | उपयुक्त, युक्तियुक्त (उचित) | Appropriate / suitable |
| सुवर्णशतचतुष्टयम् | चार सौ स्वर्णमुद्राएँ | Four hundred gold coins |
| निर्गतः | बाहर चला गया (बहिः गतवान्) | Went out |
| आलोक्य | देखकर (दृष्ट्वा) | After seeing |
| नियोजितः | सेवा में नियुक्त किया गया | Appointed |
| धृतायुधः | शस्त्र धारण किए हुए | Armed (bearing weapons) |
| अहर्निशम् | दिन-रात | Day and night |
| करुणरोदनध्वनिम् | करुणाजनक रोदन-ध्वनि को | Sorrowful weeping sound |
| व्यचिन्तयत् | सोचा (अचिन्तयत्) | Thought |
| सूचिभेद्ये तिमिरे | सघन अन्धकार में (सुई से भेदने योग्य घना अँधेरा) | In dense darkness |
| खड्गपाणिः | खड्गधारी (हाथ में तलवार लिए) | One with a sword in hand |
| विलपसि / क्रन्दामि | रो रही हो / रो रही हूँ | (You) weep / I weep |
| साष्टाङ्गं नमस्कृत्य | आठों अंगों सहित प्रणाम करके | After bowing with eight parts |
| प्रत्युवाच | उत्तर दिया | Answered |
| पञ्चत्वम् | मृत्यु को (पंचत्व प्राप्त होना) | Death |
| अनाथा | स्वामी/रक्षक के बिना | Without protector |
| दुःसाध्या | कठिनाई से सिद्ध होने योग्य | Difficult to accomplish |
| सहासवदनेन | हास्ययुक्त (प्रसन्न) मुख से | With a smiling face |
| निवत्स्यामि | निवास करूँगी (वासं करिष्यामि) | (I) will stay |
| तत्क्षणादेव | उसी क्षण | On the spot / instantly |
वेतन-विभाजन का अर्थ
| प्राप्तकर्ता | कुल 400 में भाग | स्वर्णमुद्राएँ |
|---|---|---|
| देवकार्य | आधा | 200 |
| दरिद्रजन | बची 200 का आधा = कुल का चौथाई | 100 |
| पत्नी के हाथ में गृह-व्यय | शेष चौथाई | 100 |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लिखत ‘आम्’ अथवा ‘न’ —
यथा – किं राज्ञः शूद्रकस्य नगर्याः नाम शोभावती आसीत् ? → आम् । किं वीरवरः अनेकशास्त्राणां ज्ञाता आसीत् ? → न ।
2. अधोलिखितान् प्रश्नान् पूर्णवाक्येन उत्तरत —
(क) शूद्रकः कीदृशः राजा आसीत् ?
(ख) वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छति स्म ?
(ग) राज्ञः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?’ इति प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः किम् अयच्छत् ?
(घ) वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छति स्म ?
(ङ) वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं केभ्यः यच्छति स्म ?
(च) राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ?
(छ) राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं श्रुत्वा बद्धाञ्जलिः वीरवरः किम् अवदत् ?
3. उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत —
यथा – वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम् । → (अहं) राजपुत्रः वृत्त्यर्थम् आगतः अस्मि, तस्माद् मां स्वामिनः समीपं नय ।
4. उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत —
यथा – अथैकदा = अथ + एकदा । (सन्धि-विच्छेद)
| पदम् | सन्धि-विच्छेदः (उत्तर) |
|---|---|
| वृत्त्यर्थम् | वृत्ति + अर्थम् |
| कस्मादपि | कस्मात् + अपि |
| कोऽपि | कः + अपि |
| राजपुत्रोऽस्मि | राजपुत्रः + अस्मि |
| यथेष्टम् | यथा + इष्टम् |
| वेतनार्पणेन | वेतन + अर्पणेन |
| तदालोक्य | तत् + आलोक्य |
| ततोऽसौ | ततः + असौ |
| वर्तनार्थिनो | वर्तन + अर्थिनः |
| तदवशिष्टम् | तत् + अवशिष्टम् |
| राजदर्शनादनन्तरम् | राजदर्शनात् + अनन्तरम् |
| वेति | वा + इति |
| राजलक्ष्मीरुवाच | राजलक्ष्मीः + उवाच |
| चार्द्धम् | च + अर्धम् |
| बहिर्नगरादालोकिता | बहिः + नगरात् + आलोकिता |
| कापि | का + अपि |
| प्रत्युवाच | प्रति + उवाच |
| राजलक्ष्मीरस्मि | राजलक्ष्मीः + अस्मि |
| स्थास्यामीति | स्थास्यामि + इति |
| भुजच्छायायाम् | भुज + छायायाम् |
| अस्त्यत्र | अस्ति + अत्र |
| कश्चिदुपायो | कश्चित् + उपायः |
अभ्यास 4 में वर्तन + अर्थिनः से वर्तनार्थिनः बनता है; आगे राजपुत्रस्य होने पर विसर्ग-सन्धि से वर्तनार्थिनो रूप आता है। कश्चित् + उपायः का प्रसंगगत रूप कश्चिदुपायो भी अगले पद येन से जुड़ा है। पदच्छेद करते समय मूल पद उपायः लिखें।
5. अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत —
यथा – अहं भवतः सेवायां नियोजितः । → राज्ञे (= राजा/स्वामी के लिए)। नीचे रेखांकित पद किसके लिए प्रयुक्त है, यह लिखा गया है।
6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं (वाक्यांशं) पाठात् चित्वा लिखत —
पुस्तक का निर्देश श्लोक चुनने को कहता है, लेकिन मुख्य कथा गद्य और संवाद में है। इसलिए सम्बन्धित गद्य-वाक्यांश लिखे हैं।
7. अधोलिखितानां वाक्यानां पदच्छेदं कुरुत —
यथा – अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत् । → अथ एकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मात् अपि देशात् राजद्वारम् उपागच्छत् ।
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-बिन्दवः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत दो व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।
1. वाक्यान्वयः (मुक्त-पदविन्यासक्रमः)
संस्कृत-भाषा की एक प्रमुख विशेषता है मुक्त पदविन्यास-क्रम – अर्थात् वाक्य में कर्ता, कर्म, क्रिया आदि पदों को हम विभक्ति और व्याकरणिक सम्बन्ध सही रखते हुए अनेक क्रमों में रख सकते हैं। सामान्य आशय समान रह सकता है, पर बल, भाव और शैली में अन्तर हो सकता है।
| सामान्यः वाक्यक्रमः | (पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः |
|---|---|
| रामः वनम् अगच्छत् । (रामः वनम् अगच्छत् / अगच्छत् रामः वनम् / वनम् अगच्छत् रामः) | (तीनों रूप शुद्ध हैं) |
| शोभावती नाम काचन नगरी आसीत् । | आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी । |
| तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च । | निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते । |
पाठक को विभक्ति को भली-भाँति समझकर पदों का अन्वय करना चाहिए।
2. भूतकालः
काल के प्रायः तीन भेद हैं – वर्तमानकाल, भूतकाल एवं भविष्यत्-काल। भूतकाल बीते हुए समय का वाचक है। संस्कृत में भूतकाल अनेक प्रकार से व्यक्त होता है –
| भूतकाल व्यक्त करने की विधि | पाठगत उदाहरण |
|---|---|
| लङ्-लकारः (सामान्य भूतकाल) | उपागच्छत् (उप+अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि+अचिन्तयत्) |
| लट्-लकार + ‘स्म’ योजनम् | प्रतिवसति स्म |
| धातु + क्तवतु-प्रत्ययः (कर्तृवाच्य) | श्रुतवान् |
| धातु + क्त-प्रत्ययः (कर्तृ/कर्म/भाव-वाच्य) | निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता |
कर्तृ-कर्म-भाव-वाच्य के विषय में अगले पाठ (पाठ 11) के ‘अवधेय-अंश’ में देखें।
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (भाव-विस्तार के श्लोक एवं कथा)
पाठ के भाव के अनुरूप कुछ श्लोक एवं एक प्रेरक कथा दी गई है। मुख्य श्लोक हैं –
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ (यजुर्वेदः ४०.२)
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥
| विषयः | विवरणम् |
|---|---|
| पाठस्य आधारः | ‘हितोपदेशः’ इति कथाग्रन्थः |
| मुख्यपात्राणि | राजा शूद्रकः, राजपुत्रः वीरवरः, मन्त्री, राजलक्ष्मीः |
| केन्द्रीयभावः | सत्-निमित्ते (श्रेष्ठ उद्देश्य हेतु) त्यागः एव वरम् (श्रेष्ठ); स्वामिभक्तिः, कर्तव्यनिष्ठा च |
| योग्यताविस्तरस्य कथा | ‘जीमूतवाहनस्य कथा’ – जो त्याग, परोपकार एवं साहस की प्रेरणा देती है |
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. कर्तव्यनिष्ठा से सम्बन्धित दस सूक्तियाँ अथवा श्लोक एकत्र कीजिए —
नमूना संग्रह-योजना: निम्न दस आरम्भिक अंशों की सहायता से पुस्तक में पूरा पद्य खोजकर लिखें। ये कर्म, परोपकार, विनम्रता, संयम और हितकारी वाणी से जुड़ते हैं; सभी में कर्तव्यनिष्ठा शब्द सीधे नहीं आता। हर पद्य का हिन्दी अर्थ और सेवा से सम्बन्ध अपने शब्दों में जोड़ें।
- कुर्वन्नेवेह कर्माणि… — पाठ 10, पृ. 122; यजुर्वेद 40.2
- यथा छायातपौ नित्यं… — पाठ 10, पृ. 122; पुस्तक में पञ्चतन्त्र-सन्दर्भ
- कार्यं कर्मणि निर्वृत्ते… — पाठ 10, पृ. 122; पुस्तक में वाल्मीकि-रामायण-सन्दर्भ
- परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः… — पाठ 10, पृ. 123
- भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः… — पाठ 3, तीसरा सुभाषित
- यथा ह्येकेन चक्रेण… — पाठ 3, आठवाँ सुभाषित
- अद्वेष्टा सर्वभूतानां… — पाठ 5, पाँचवाँ श्लोक
- सन्तुष्टः सततं योगी… — पाठ 5, छठा श्लोक
- यस्मान्नोद्विजते लोको… — पाठ 5, सातवाँ श्लोक
- अनुद्वेगकरं वाक्यं… — पाठ 5, आठवाँ श्लोक
2. अस्य पाठस्य कृते कानिचन नूतनानि शीर्षकाणि लिखत ।
नीचे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। त्याग की वर्तमान जीवन में सुरक्षित मिसालें समय देना, मेहनत करना, वस्तुएँ साझा करना और संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता करना हैं। कथा की चरम घटनाओं को जीवन में दोहराने का निर्देश न समझें।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. यह पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है और उसका स्वरूप कैसा है?
2. वीरवर ने राजा से अपने वेतन एवं सामग्री के विषय में क्या उत्तर दिया?
3. वीरवर अपने वेतन का विभाजन किस प्रकार करता था?
4. आधी रात में राजा ने क्या सुना और वीरवर को क्या आज्ञा दी?
5. राजलक्ष्मी ने वीरवर को क्या उपाय बताया?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. वीरवर के चरित्र की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।
7. राजा शूद्रक द्वारा वीरवर की परीक्षा एवं नियुक्ति का प्रसंग वर्णित कीजिए।
8. योग्यताविस्तर में दी गई ‘जीमूतवाहन की कथा’ से क्या शिक्षा मिलती है?
MCQ & अभिकथन-कारण
1. यह पाठ किस कथाग्रन्थ से संकलित है?
(क) पञ्चतन्त्रम्
(ख) हितोपदेशः
(ग) कथासरित्सागरः
(घ) वेतालपञ्चविंशतिः
2. शूद्रक किस नगरी का राजा था?
(क) उज्जयिनी
(ख) विदेहनगरी
(ग) शोभावती
(घ) पाटलिपुत्र
3. वीरवर ने प्रतिदिन कितने स्वर्ण की माँग की?
(क) सौ स्वर्णमुद्राएँ
(ख) दो सौ स्वर्णमुद्राएँ
(ग) चार सौ स्वर्णमुद्राएँ (सुवर्णशतचतुष्टय)
(घ) हज़ार स्वर्णमुद्राएँ
4. ‘का ते सामग्री ?’ के उत्तर में वीरवर ने क्या बताया?
(क) धन एवं रथ
(ख) इमौ बाहू, एष खड्गश्च
(ग) सेना एवं अश्व
(घ) कवच एवं ढाल
5. राजा ने वीरवर को अन्ततः किसकी सलाह से नियुक्त किया?
(क) रानी की
(ख) पुरोहित की
(ग) मन्त्रियों की (मन्त्रिणां वचनात्)
(घ) सेनापति की
6. वीरवर अपने वेतन का आधा भाग किसे देता था?
(क) राजा को
(ख) देवताओं को (देव-कार्य में)
(ग) सैनिकों को
(घ) केवल पत्नी को
7. राजा ने करुण रोदन किस समय सुना?
(क) प्रातःकाल
(ख) सायंकाल
(ग) कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में
(घ) मध्याह्न में
8. रोती हुई सुन्दरी ने अपना परिचय क्या दिया?
(क) राजा की रानी
(ख) शूद्रक की राजलक्ष्मी
(ग) कोई अप्सरा
(घ) वीरवर की पुत्री
9. राजलक्ष्मी के अनुसार राजा की मृत्यु कब होने वाली थी?
(क) उसी रात
(ख) तीसरे दिन (तृतीये दिवसे)
(ग) एक मास बाद
(घ) एक वर्ष बाद
10. राजलक्ष्मी के बताए उपाय का स्वरूप कैसा था?
(क) अत्यन्त सरल
(ख) अत्यन्त दुःसाध्य (कठिन)
(ग) असम्भव
(घ) निरर्थक
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): यह पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ उत्तम उद्देश्य के लिए त्याग का संदेश देता है।
कारण (R): यह पाठ ‘हितोपदेशः’ की वीरवर-कथा पर आधारित है, जो स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एवं त्याग की प्रेरणा देती है।
2. अभिकथन (A): राजा शूद्रक ने प्रारम्भ में वीरवर की वेतन-माँग अस्वीकार कर दी।
कारण (R): वीरवर मूर्ख एवं अयोग्य था, इसलिए राजा ने उसे अस्वीकार किया।
3. अभिकथन (A): वीरवर शस्त्र धारण कर दिन-रात राजद्वार की सेवा करता था।
कारण (R): वह अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ एवं स्वामिभक्त राजपुत्र था।
4. अभिकथन (A): राजा भी खड्ग लेकर वीरवर के पीछे-पीछे नगर के बाहर निकल गया।
कारण (R): राजा ने सोचा कि इस घोर अन्धकार में राजपुत्र को अकेले नहीं जाना चाहिए।
5. अभिकथन (A): राजलक्ष्मी उपाय बताकर तत्क्षण अदृश्य हो गई।
कारण (R): राजलक्ष्मी ने उपाय बताया कि प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को अर्पित करने पर राजा सौ वर्ष जीवित रहेगा।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- कथा का क्रम याद रखें – वीरवर का आगमन → वेतन-माँग → अस्वीकृति → मन्त्री की सलाह → नियुक्ति → रोदन → राजलक्ष्मी का उपाय।
- शब्दार्थ (वृत्त्यर्थम्, धृतायुधः, सूचिभेद्ये तिमिरे, पञ्चत्वम्, साष्टाङ्गम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- सन्धि-विच्छेद एवं पदच्छेद का अभ्यास करें – अभ्यास 4 एवं 7 को ध्यान से तैयार करें।
- ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें, केवल एक शब्द नहीं।
- भूतकाल के चार रूप (लङ्, लट्+स्म, क्तवतु, क्त) उदाहरण सहित याद करें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- पाठ को गलती से पञ्चतन्त्र से बताना – यह ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है।
- राजलक्ष्मी को साधारण रानी समझ लेना – वह राजा शूद्रक की ‘राजलक्ष्मी’ (राज्य-समृद्धि की देवी) है।
- सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘कश्चिदुपायो’ = कश्चित् + उपायः; ‘चार्द्धम्’ = च + अर्धम्।
- वेतन-विभाजन में भ्रम – आधा देवताओं को, शेष का आधा दरिद्रों को, बचा भाग पत्नी को।
- यह स्मरण रखें कि यह कथा का केवल ‘क-भागः’ है; शेष कथा पाठ 11 में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 का दशम पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
यह पाठ संस्कृत के सुप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है, जो रोचक कथाओं के माध्यम से हितकारी उपदेश देता है। यह पाठ दो भागों में है – यह ‘क-भागः’ है तथा शेष कथा पाठ 11 में है।
वीरवर कौन था और उसके मुख्य गुण क्या थे?
वीरवर एक राजपुत्र था जो आजीविका हेतु राजा शूद्रक की सेवा में आया। वह अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ, स्वामिभक्त, साहसी, दानशील एवं राष्ट्र के प्रति समर्पित था – इसी कारण वह अनुकरणीय आदर्श माना जाता है।
राजलक्ष्मी ने राजा शूद्रक को बचाने का क्या उपाय बताया?
राजलक्ष्मी ने बताया कि यदि वीरवर हँसते हुए मुख से अपनी सबसे प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को उपहार रूप में अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक जीवित रहेगा और राजलक्ष्मी सुखपूर्वक वहीं निवास करेगी। यह उपाय अत्यन्त दुःसाध्य (कठिन) था।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 10, पृष्ठ 111–123; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
