Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 10 Solutions — सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)

Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 10 solutions: वीरवर–शूद्रक की हितोपदेश-कथा का पहला भाग, शब्दार्थ और सात अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। पात्र-सन्दर्भ, सन्धि, अन्वय और भूतकाल सरल व्याख्या सहित समझें।

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 10 पाठ: सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का दशम पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)’ प्रसिद्ध कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है। संस्कृत-कथासाहित्य अत्यन्त समृद्ध एवं वैविध्यपूर्ण है; कथाओं के माध्यम से रोचक ढंग से जीवनोपयोगी उपदेश एवं प्रेरणाएँ दी जाती हैं। प्रस्तुत पाठ में शोभावती नगरी के पराक्रमी राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र वीरवर की कथा है, जो अपने स्वामी एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर करने को उद्यत रहता है। उसकी स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण-भाव अत्यन्त प्रेरणादायक है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – उत्तम उद्देश्य (सत्-निमित्त/सन्निमित्त) के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है। यह कथा दो भागों में है; प्रस्तुत ‘क-भागः’ में राजलक्ष्मी द्वारा बताए गए कठिन उपाय तक की घटनाएँ हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ संस्कृत के सुप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से संकलित है, जिसके रचयिता नारायण पण्डित माने जाते हैं और जो पञ्चतन्त्र की शैली में हितकारी उपदेश देने वाला ग्रन्थ है। पाठ का आरम्भ इस वर्णन से होता है कि शोभावती नामक एक नगरी थी, जहाँ शूद्रक नामक महापराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता एवं पवित्र-चरित्र राजा राज्य करता था। एक दिन वीरवर नामक राजपुत्र आजीविका (वृत्ति) पाने के लिए अपनी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर एवं पुत्री वीरवती के साथ किसी देश से राजद्वार पर आता है। यहाँ से उसकी अद्भुत स्वामिभक्ति एवं त्याग की कथा आरम्भ होती है। यह पाठ संवाद (नाट्य) एवं गद्य दोनों शैलियों में है तथा इसमें मुक्त-पदविन्यास, भूतकाल आदि व्याकरण-बिन्दु भी समझाए गए हैं।

सार (Hindi Summary)

शोभावती नगरी में शूद्रक नामक महापराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता एवं पवित्र-चरित्र राजा राज्य करता था। एक दिन वीरवर नामक एक राजपुत्र आजीविका पाने के लिए अपनी पत्नी, पुत्र शक्तिधर एवं पुत्री वीरवती सहित किसी देश से राजद्वार पर आया। उसने द्वारपाल से प्रार्थना की कि उसे स्वामी के पास ले चले। द्वारपाल उसे राजा के समीप ले गया। वीरवर ने विनयपूर्वक प्रणाम करके कहा कि यदि वह सौभाग्य से राजा की सेवा में नियुक्त हो जाए, तो जो भी आज्ञा दी जाएगी उसका श्रद्धापूर्वक पालन करेगा। राजा ने उसका वेतन पूछा तो उसने प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ माँगीं, और सामग्री के रूप में अपने दोनों भुजाओं तथा खड्ग को बताया। राजा ने इतना अधिक वेतन देना सम्भव न समझकर इनकार कर दिया और वीरवर प्रणाम करके सभा से बाहर चला गया।

तभी मन्त्री ने राजा को सुझाया कि चार दिन का वेतन देकर इस वेतनार्थी राजपुत्र के स्वरूप की परीक्षा कर लेनी चाहिए कि यह वेतन उचित है या नहीं। मन्त्रियों की सलाह से ताम्बूल देकर राजा ने वीरवर को नियुक्त कर लिया। वीरवर प्रतिदिन प्रातः राजदर्शन के पश्चात् अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को (देव-कार्य में), शेष का आधा दरिद्रों को दे देता और बचा हुआ भोजन-व्यय हेतु पत्नी के हाथ में दे देता था। फिर वह शस्त्र धारण किए हुए दिन-रात राजद्वार की सेवा करता और राजा की आज्ञा मिलने पर ही घर जाता था।

एक दिन कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में राजा ने किसी का करुण रोदन सुना। पूछने पर वीरवर ने उत्तर दिया कि वही द्वार पर सेवक के रूप में उपस्थित है। राजा ने उसे उस रोने की आवाज़ का पीछा करने की आज्ञा दी। वीरवर आज्ञा मानकर चल पड़ा। राजा भी मन-ही-मन यह सोचकर कि इस घोर अन्धकार में राजपुत्र को अकेले नहीं जाना चाहिए, खड्ग हाथ में लेकर चुपचाप उसके पीछे-पीछे नगर के बाहर निकल गया। बाहर वीरवर ने दिव्य आभूषणों से सुसज्जित एक रोती हुई सुन्दरी को देखा। पूछने पर उसने स्वयं को राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी बताया और कहा कि दैव (भाग्य) के प्रतिकूल होने से तीसरे दिन राजा की मृत्यु हो जाएगी, अतः वह अनाथ होकर रो रही है। वीरवर ने उपाय पूछा तो राजलक्ष्मी ने एक अत्यन्त कठिन उपाय बताया – यदि वीरवर हँसते हुए मुख से अपनी सबसे प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को उपहार रूप में अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष जीवित रहेगा और राजलक्ष्मी सुखपूर्वक यहीं निवास करेगी। इतना कहकर वह तत्क्षण अदृश्य हो गई। (कथा का अगला भाग पाठ 11 में है।)

पात्रों का भेद: वीरवर राजवंशीय पुरुष है, शूद्रक का पुत्र नहीं। उसकी पत्नी का पाठगत नाम वेदरता है। राजलक्ष्मी राज्य-समृद्धि का मानवीकृत कथा-पात्र है; उसे सर्वमङ्गला से न मिलाएँ। घटनाएँ नीति-कथा के साहित्यिक संदर्भ में हैं।

रात्रि में वनपथ पर वीरवर और अलंकृत राजलक्ष्मी का संवाद; दूर वृक्ष के पीछे राजा शूद्रक
पाठ 10 के रात्रि-संवाद का मौलिक कल्पनात्मक चित्र। वेशभूषा और स्थान कलात्मक पुनर्निर्माण हैं; यह ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
महीपतिःराजा (भूपाल)King
महापराक्रमीबहुत बलवान, अति बलशालीVery brave / mighty
नानाशास्त्रवित्अनेक शास्त्रों का ज्ञाताOne who knows many shastras
पूतचरित्रःपवित्र चरित्र वालाOf high (pure) character
प्रतिवसति स्मरहता था (अवसत्)Used to live
वृत्त्यर्थम्आजीविका पाने के लिएTo get livelihood
समायाताःआए (आगतवन्तः)Came
प्रतिहारम् / दौवारिकःद्वारपाल को / द्वारपालकDoor-keeper / gate-keeper
वर्तनम्वेतनSalary
उपपन्नम्उपयुक्त, युक्तियुक्त (उचित)Appropriate / suitable
सुवर्णशतचतुष्टयम्चार सौ स्वर्णमुद्राएँFour hundred gold coins
निर्गतःबाहर चला गया (बहिः गतवान्)Went out
आलोक्यदेखकर (दृष्ट्वा)After seeing
नियोजितःसेवा में नियुक्त किया गयाAppointed
धृतायुधःशस्त्र धारण किए हुएArmed (bearing weapons)
अहर्निशम्दिन-रातDay and night
करुणरोदनध्वनिम्करुणाजनक रोदन-ध्वनि कोSorrowful weeping sound
व्यचिन्तयत्सोचा (अचिन्तयत्)Thought
सूचिभेद्ये तिमिरेसघन अन्धकार में (सुई से भेदने योग्य घना अँधेरा)In dense darkness
खड्गपाणिःखड्गधारी (हाथ में तलवार लिए)One with a sword in hand
विलपसि / क्रन्दामिरो रही हो / रो रही हूँ(You) weep / I weep
साष्टाङ्गं नमस्कृत्यआठों अंगों सहित प्रणाम करकेAfter bowing with eight parts
प्रत्युवाचउत्तर दियाAnswered
पञ्चत्वम्मृत्यु को (पंचत्व प्राप्त होना)Death
अनाथास्वामी/रक्षक के बिनाWithout protector
दुःसाध्याकठिनाई से सिद्ध होने योग्यDifficult to accomplish
सहासवदनेनहास्ययुक्त (प्रसन्न) मुख सेWith a smiling face
निवत्स्यामिनिवास करूँगी (वासं करिष्यामि)(I) will stay
तत्क्षणादेवउसी क्षणOn the spot / instantly

वेतन-विभाजन का अर्थ

प्राप्तकर्ताकुल 400 में भागस्वर्णमुद्राएँ
देवकार्यआधा200
दरिद्रजनबची 200 का आधा = कुल का चौथाई100
पत्नी के हाथ में गृह-व्ययशेष चौथाई100

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लिखत ‘आम्’ अथवा ‘न’ —

यथा – किं राज्ञः शूद्रकस्य नगर्याः नाम शोभावती आसीत् ? → आम् । किं वीरवरः अनेकशास्त्राणां ज्ञाता आसीत् ? → न ।

उत्तर (क) किं वीरवरः राजपुत्रः आसीत् ? – आम् । (ख) “किं ते वर्तनम्” ? इति किं शूद्रकः अपृच्छत् ? – आम् । (ग) किं वीरवरं राज्ञः समीपे दौवारिकः अनयत् ? – आम् । (घ) किं राजा शूद्रकः राजपुत्रं वीरवरं साक्षात् दृष्ट्वा एव वृत्तिम् अयच्छत् ? – न । (मन्त्रिणां वचनात् नियोजितवान्) (ङ) किं वीरवरः स्ववेतनस्य चतुर्थं भागम् एव पत्न्यै यच्छति स्म ? – आम् । (च) किं करुण-रोदन-ध्वनिं राजा श्रुतवान् ? – आम् । (छ) किं करुणरोदनध्वनिः दिवसे श्रुतः आसीत् ? – न । (अर्धरात्रे श्रुतः) (ज) किं राजलक्ष्म्या उक्तः उपायः अतीव दुःसाध्यः आसीत् ? – आम् । (झ) किं भगवती सर्वमङ्गला उपायं संसूच्य शीघ्रमेव अदृश्या अभवत् ? – न । उपाय बताकर राजलक्ष्मी अदृश्य हुई; सर्वमङ्गला उपहार की प्राप्तकर्ता के रूप में कही गई हैं।

2. अधोलिखितान् प्रश्नान् पूर्णवाक्येन उत्तरत —

(क) शूद्रकः कीदृशः राजा आसीत् ?

उत्तरशूद्रकः महापराक्रमी, नानाशास्त्रवित्, पूतचरित्रः च राजा आसीत् ।

(ख) वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छति स्म ?

उत्तरवीरवरः स्वामिनः (राज्ञः शूद्रकस्य) समीपं गन्तुम् इच्छति स्म ।

(ग) राज्ञः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?’ इति प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः किम् अयच्छत् ?

उत्तरवीरवरः अयच्छत् – “इमौ बाहू, एष खड्गश्च” (इति मम सामग्री) ।

(घ) वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छति स्म ?

उत्तरयदा राजा स्वयम् आदिशति स्म, तदा एव वीरवरः स्वगृहं गच्छति स्म ।

(ङ) वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं केभ्यः यच्छति स्म ?

उत्तरवीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं देवेभ्यः (देवकार्याय) यच्छति स्म ।

(च) राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ?

उत्तरराजलक्ष्मीः चिरकालं शूद्रकस्य भुजच्छायायां (तस्य भुजबलस्य आश्रये) सुखेन अवसत् ।

(छ) राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं श्रुत्वा बद्धाञ्जलिः वीरवरः किम् अवदत् ?

उत्तरबद्धाञ्जलिः वीरवरः अवदत् – “भगवति ! अस्ति अत्र कश्चित् उपायः येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति, स्वामी च सुचिरं जीवति ?”

3. उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत —

यथा – वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम् । → (अहं) राजपुत्रः वृत्त्यर्थम् आगतः अस्मि, तस्माद् मां स्वामिनः समीपं नय ।

अन्वयः (उत्तर) (क) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी । → शोभावती नाम काचन नगरी आसीत् । (ख) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव ! → देव ! (मम वर्तनम्) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयम् (अस्ति) । (ग) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथममवगम्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति । → देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन अस्य वेतनार्थिनः राजपुत्रस्य स्वरूपं प्रथमम् अवगम्यताम्, एतत् वेतनम् उपपन्नं किं न वा इति । (घ) क्रन्दनमनुसर राजपुत्र ! → राजपुत्र ! क्रन्दनम् अनुसर । (ङ) अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना । → अथ नरपतिना मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन असौ राजपुत्रः वीरवरः नियोजितः । (च) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरे ऽस्मिन् । → एषः राजपुत्रः अस्मिन् सूचिभेद्ये तिमिरे एकाकी गन्तुं न अर्हति । (छ) भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ? → भगवति ! अत्र कश्चित् उपायः अस्ति किम्, येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति, स्वामी च सुचिरं जीवति ? (ज) तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम् । → तदा राजा शूद्रकः वर्षाणां शतं पुनः जीविष्यति ।

4. उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत —

यथा – अथैकदा = अथ + एकदा । (सन्धि-विच्छेद)

पदम्सन्धि-विच्छेदः (उत्तर)
वृत्त्यर्थम्वृत्ति + अर्थम्
कस्मादपिकस्मात् + अपि
कोऽपिकः + अपि
राजपुत्रोऽस्मिराजपुत्रः + अस्मि
यथेष्टम्यथा + इष्टम्
वेतनार्पणेनवेतन + अर्पणेन
तदालोक्यतत् + आलोक्य
ततोऽसौततः + असौ
वर्तनार्थिनोवर्तन + अर्थिनः
तदवशिष्टम्तत् + अवशिष्टम्
राजदर्शनादनन्तरम्राजदर्शनात् + अनन्तरम्
वेतिवा + इति
राजलक्ष्मीरुवाचराजलक्ष्मीः + उवाच
चार्द्धम्च + अर्धम्
बहिर्नगरादालोकिताबहिः + नगरात् + आलोकिता
कापिका + अपि
प्रत्युवाचप्रति + उवाच
राजलक्ष्मीरस्मिराजलक्ष्मीः + अस्मि
स्थास्यामीतिस्थास्यामि + इति
भुजच्छायायाम्भुज + छायायाम्
अस्त्यत्रअस्ति + अत्र
कश्चिदुपायोकश्चित् + उपायः

अभ्यास 4 में वर्तन + अर्थिनः से वर्तनार्थिनः बनता है; आगे राजपुत्रस्य होने पर विसर्ग-सन्धि से वर्तनार्थिनो रूप आता है। कश्चित् + उपायः का प्रसंगगत रूप कश्चिदुपायो भी अगले पद येन से जुड़ा है। पदच्छेद करते समय मूल पद उपायः लिखें।

5. अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत —

यथा – अहं भवतः सेवायां नियोजितः । → राज्ञे (= राजा/स्वामी के लिए)। नीचे रेखांकित पद किसके लिए प्रयुक्त है, यह लिखा गया है।

उत्तर (क) ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः । → वीरवराय (वीरवरः) । (ख) तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य । → राज्ञे शूद्रकाय (राजा शूद्रकः) । (ग) चिरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि । → राज्ञे शूद्रकाय (शूद्रकस्य) । (घ) सा चातीव दुःसाध्या । → प्रवृत्त्यै / उपायाय (प्रवृत्तिः/उपायः) । (ङ) किं ते वर्तनम् ? → वीरवराय (वीरवरस्य) ।

6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं (वाक्यांशं) पाठात् चित्वा लिखत —

पुस्तक का निर्देश श्लोक चुनने को कहता है, लेकिन मुख्य कथा गद्य और संवाद में है। इसलिए सम्बन्धित गद्य-वाक्यांश लिखे हैं।

उत्तर (क) राजलक्ष्मीः वदति यत् यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु त्यजति तदा सा पुनः शूद्रकस्य समीपे स्थास्यति । → “यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि ।” (ख) राजा शूद्रकः प्रथमं वीरवरस्य वृत्त्यर्थं प्रार्थनां न स्वीकरोति । → “नैतच्छक्यम् !” (इति उक्त्वा राजा वृत्तिं न स्वीकरोति) । (ग) एकदा कोऽपि वीरवरः नाम राजपुत्रः वृत्तिं प्राप्तुं राज्ञः शूद्रकस्य समीपं गच्छति । → “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत् ।” (घ) सः तस्य कर्तव्यनिष्ठां साक्षात् पश्यति । → “तस्माद् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति ।” — राजा पीछे जाकर घटना देखने का निश्चय करता है; यह उसकी प्रत्यक्ष जाँच का सम्बन्धित संवाद है। (ङ) राजा मन्त्रिणां मन्त्रणया वीरवराय वृत्तिं यच्छति । → “अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना ।”

7. अधोलिखितानां वाक्यानां पदच्छेदं कुरुत —

यथा – अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत् । → अथ एकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मात् अपि देशात् राजद्वारम् उपागच्छत् ।

पदच्छेदः (उत्तर) (क) वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि । → वृत्त्यर्थम् आगतः राजपुत्रः अस्मि । (ख) अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन । → अथ एकदा कृष्णचतुर्दश्याम् अर्धरात्रे सः राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन । (ग) तदहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य निरूपयामि च किमेतदिति । → तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतः अस्य निरूपयामि च किम् एतत् इति । (घ) अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति । → अस्ति अत्र कश्चित् उपायः येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति । (ङ) एकैवात्र प्रवृत्तिः सा चातीव दुःसाध्या । → एका एव अत्र प्रवृत्तिः सा च अतीव दुःसाध्या ।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-बिन्दवः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत दो व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।

1. वाक्यान्वयः (मुक्त-पदविन्यासक्रमः)

संस्कृत-भाषा की एक प्रमुख विशेषता है मुक्त पदविन्यास-क्रम – अर्थात् वाक्य में कर्ता, कर्म, क्रिया आदि पदों को हम विभक्ति और व्याकरणिक सम्बन्ध सही रखते हुए अनेक क्रमों में रख सकते हैं। सामान्य आशय समान रह सकता है, पर बल, भाव और शैली में अन्तर हो सकता है।

सामान्यः वाक्यक्रमः(पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः
रामः वनम् अगच्छत् । (रामः वनम् अगच्छत् / अगच्छत् रामः वनम् / वनम् अगच्छत् रामः)(तीनों रूप शुद्ध हैं)
शोभावती नाम काचन नगरी आसीत् ।आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी ।
तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च ।निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते ।

पाठक को विभक्ति को भली-भाँति समझकर पदों का अन्वय करना चाहिए।

2. भूतकालः

काल के प्रायः तीन भेद हैं – वर्तमानकाल, भूतकाल एवं भविष्यत्-काल। भूतकाल बीते हुए समय का वाचक है। संस्कृत में भूतकाल अनेक प्रकार से व्यक्त होता है –

भूतकाल व्यक्त करने की विधिपाठगत उदाहरण
लङ्-लकारः (सामान्य भूतकाल)उपागच्छत् (उप+अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि+अचिन्तयत्)
लट्-लकार + ‘स्म’ योजनम्प्रतिवसति स्म
धातु + क्तवतु-प्रत्ययः (कर्तृवाच्य)श्रुतवान्
धातु + क्त-प्रत्ययः (कर्तृ/कर्म/भाव-वाच्य)निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता

कर्तृ-कर्म-भाव-वाच्य के विषय में अगले पाठ (पाठ 11) के ‘अवधेय-अंश’ में देखें।

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (भाव-विस्तार के श्लोक एवं कथा)

पाठ के भाव के अनुरूप कुछ श्लोक एवं एक प्रेरक कथा दी गई है। मुख्य श्लोक हैं –

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ (यजुर्वेदः ४०.२)

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥
विषयःविवरणम्
पाठस्य आधारः‘हितोपदेशः’ इति कथाग्रन्थः
मुख्यपात्राणिराजा शूद्रकः, राजपुत्रः वीरवरः, मन्त्री, राजलक्ष्मीः
केन्द्रीयभावःसत्-निमित्ते (श्रेष्ठ उद्देश्य हेतु) त्यागः एव वरम् (श्रेष्ठ); स्वामिभक्तिः, कर्तव्यनिष्ठा च
योग्यताविस्तरस्य कथा‘जीमूतवाहनस्य कथा’ – जो त्याग, परोपकार एवं साहस की प्रेरणा देती है

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. कर्तव्यनिष्ठा से सम्बन्धित दस सूक्तियाँ अथवा श्लोक एकत्र कीजिए —

नमूना संग्रह-योजना: निम्न दस आरम्भिक अंशों की सहायता से पुस्तक में पूरा पद्य खोजकर लिखें। ये कर्म, परोपकार, विनम्रता, संयम और हितकारी वाणी से जुड़ते हैं; सभी में कर्तव्यनिष्ठा शब्द सीधे नहीं आता। हर पद्य का हिन्दी अर्थ और सेवा से सम्बन्ध अपने शब्दों में जोड़ें।

  1. कुर्वन्नेवेह कर्माणि… — पाठ 10, पृ. 122; यजुर्वेद 40.2
  2. यथा छायातपौ नित्यं… — पाठ 10, पृ. 122; पुस्तक में पञ्चतन्त्र-सन्दर्भ
  3. कार्यं कर्मणि निर्वृत्ते… — पाठ 10, पृ. 122; पुस्तक में वाल्मीकि-रामायण-सन्दर्भ
  4. परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः… — पाठ 10, पृ. 123
  5. भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः… — पाठ 3, तीसरा सुभाषित
  6. यथा ह्येकेन चक्रेण… — पाठ 3, आठवाँ सुभाषित
  7. अद्वेष्टा सर्वभूतानां… — पाठ 5, पाँचवाँ श्लोक
  8. सन्तुष्टः सततं योगी… — पाठ 5, छठा श्लोक
  9. यस्मान्नोद्विजते लोको… — पाठ 5, सातवाँ श्लोक
  10. अनुद्वेगकरं वाक्यं… — पाठ 5, आठवाँ श्लोक

2. अस्य पाठस्य कृते कानिचन नूतनानि शीर्षकाणि लिखत ।

उत्तर (नमूना)इस पाठ के लिए कुछ नूतन शीर्षक – (1) वीरवरस्य स्वामिभक्तिः, (2) कर्तव्यनिष्ठः राजपुत्रः, (3) राजलक्ष्म्याः उपायः, (4) त्यागस्य महिमा, (5) सेवायाः मूल्यम्।

नीचे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। त्याग की वर्तमान जीवन में सुरक्षित मिसालें समय देना, मेहनत करना, वस्तुएँ साझा करना और संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता करना हैं। कथा की चरम घटनाओं को जीवन में दोहराने का निर्देश न समझें।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. यह पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है और उसका स्वरूप कैसा है?

उत्तरयह पाठ संस्कृत के सुप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है। यह ग्रन्थ रोचक कथाओं के माध्यम से हितकारी उपदेश एवं जीवनोपयोगी प्रेरणाएँ देता है। संस्कृत का कथासाहित्य अत्यन्त समृद्ध एवं वैविध्यपूर्ण है।

2. वीरवर ने राजा से अपने वेतन एवं सामग्री के विषय में क्या उत्तर दिया?

उत्तरवीरवर ने अपना वेतन प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ (सुवर्णशतचतुष्टय) बताया। सामग्री पूछे जाने पर उसने उत्तर दिया – ‘इमौ बाहू, एष खड्गश्च’ अर्थात् ये मेरे दोनों भुजाएँ और यह खड्ग ही मेरी सामग्री है।

3. वीरवर अपने वेतन का विभाजन किस प्रकार करता था?

उत्तरवीरवर प्रतिदिन अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को (देव-कार्य में), शेष का आधा दरिद्रों को दे देता था, तथा बचा हुआ भाग भोजन एवं अन्य व्यय हेतु अपनी पत्नी के हाथ में दे देता था। इससे उसकी दानशीलता एवं भक्ति प्रकट होती है।

4. आधी रात में राजा ने क्या सुना और वीरवर को क्या आज्ञा दी?

उत्तरकृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में राजा ने किसी का करुण रोदन सुना। उसने द्वार पर खड़े वीरवर को आज्ञा दी कि वह उस रोने की आवाज़ का अनुसरण करे और पता लगाए कि यह क्या है।

5. राजलक्ष्मी ने वीरवर को क्या उपाय बताया?

उत्तरराजलक्ष्मी ने एक कठिन उपाय बताया – यदि वीरवर हँसते हुए मुख से अपनी सबसे प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को उपहार रूप में अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक जीवित रहेगा और राजलक्ष्मी सुखपूर्वक यहीं निवास करेगी।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. वीरवर के चरित्र की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरवीरवर इस कथा का आदर्श नायक है, जिसमें अनेक उत्तम गुण विद्यमान हैं। वह अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ एवं स्वामिभक्त है – शस्त्र धारण कर दिन-रात राजद्वार की सेवा करता है और राजा की आज्ञा मिलने पर ही घर जाता है। आधी रात में अकेले अन्धकार में करुण रोदन का पता लगाने जाने में भी वह तनिक भी नहीं हिचकता, जो उसका निर्भीक साहस दर्शाता है।वह दानशील एवं धार्मिक भी है – अपने वेतन का आधा भाग देवकार्य में, शेष का आधा दरिद्रों को दे देता है। राजलक्ष्मी का दुःख सुनकर वह तुरन्त राजा एवं राष्ट्र की रक्षा का उपाय पूछता है, जिससे उसका राष्ट्र के प्रति समर्पण-भाव प्रकट होता है। संक्षेप में, वीरवर स्वामिभक्ति, कर्तव्य-परायणता, साहस एवं त्याग का अनुकरणीय आदर्श है।

7. राजा शूद्रक द्वारा वीरवर की परीक्षा एवं नियुक्ति का प्रसंग वर्णित कीजिए।

उत्तरजब वीरवर ने प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राओं का वेतन माँगा और सामग्री के रूप में केवल अपनी भुजाएँ एवं खड्ग बताए, तो राजा शूद्रक ने इतना अधिक वेतन देना सम्भव न समझकर ‘नैतच्छक्यम्’ कहकर इनकार कर दिया और वीरवर सभा से बाहर चला गया।तभी मन्त्री ने राजा को सुझाव दिया कि चार दिन का वेतन देकर पहले इस वेतनार्थी राजपुत्र के स्वरूप (योग्यता) की परीक्षा कर लेनी चाहिए कि यह वेतन उचित है या नहीं। मन्त्रियों की इस सलाह को मानकर राजा ने ताम्बूल देकर वीरवर को सेवा में नियुक्त कर लिया। यह प्रसंग दर्शाता है कि किसी को नियुक्त करने से पूर्व उसकी योग्यता की परीक्षा करना बुद्धिमानी है।

8. योग्यताविस्तर में दी गई ‘जीमूतवाहन की कथा’ से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तरयोग्यताविस्तर में दी गई जीमूतवाहन की कथा में विदेहनगर के धर्मात्मा राजा शुद्धकेतु का पुत्र जीमूतवाहन त्यागशील, परोपकाररत एवं दीन-दुखियों पर दया करने वाला था। समुद्र-तट पर एक वृद्ध नाग को दुःखी देखकर, जिसका पुत्र शंखचूड गरुड का आहार बनने वाला था, जीमूतवाहन ने उसकी रक्षा हेतु स्वयं शंखचूड का रूप धरकर अपना शरीर गरुड को सौंप दिया।गरुड ने जब उसे निर्भय एवं निर्विकार देखा, तो उसका वास्तविक परिचय जानकर तथा उसके साहस, करुणा एवं परोपकार से प्रभावित होकर उसे मुक्त कर दिया और नागवंश के हनन से विरत रहने की प्रतिज्ञा भी कर ली। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए किया गया त्याग एवं परोपकार ही जीवन का सर्वोच्च आदर्श है – ‘परोपकारार्थमिदं शरीरम्’।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस कथाग्रन्थ से संकलित है?

(क) पञ्चतन्त्रम्

(ख) हितोपदेशः

(ग) कथासरित्सागरः

(घ) वेतालपञ्चविंशतिः

उत्तर(ख) हितोपदेशः।

2. शूद्रक किस नगरी का राजा था?

(क) उज्जयिनी

(ख) विदेहनगरी

(ग) शोभावती

(घ) पाटलिपुत्र

उत्तर(ग) शोभावती।

3. वीरवर ने प्रतिदिन कितने स्वर्ण की माँग की?

(क) सौ स्वर्णमुद्राएँ

(ख) दो सौ स्वर्णमुद्राएँ

(ग) चार सौ स्वर्णमुद्राएँ (सुवर्णशतचतुष्टय)

(घ) हज़ार स्वर्णमुद्राएँ

उत्तर(ग) चार सौ स्वर्णमुद्राएँ (सुवर्णशतचतुष्टय)।

4. ‘का ते सामग्री ?’ के उत्तर में वीरवर ने क्या बताया?

(क) धन एवं रथ

(ख) इमौ बाहू, एष खड्गश्च

(ग) सेना एवं अश्व

(घ) कवच एवं ढाल

उत्तर(ख) इमौ बाहू, एष खड्गश्च। (मेरी दोनों भुजाएँ एवं यह खड्ग)

5. राजा ने वीरवर को अन्ततः किसकी सलाह से नियुक्त किया?

(क) रानी की

(ख) पुरोहित की

(ग) मन्त्रियों की (मन्त्रिणां वचनात्)

(घ) सेनापति की

उत्तर(ग) मन्त्रियों की (मन्त्रिणां वचनात्)।

6. वीरवर अपने वेतन का आधा भाग किसे देता था?

(क) राजा को

(ख) देवताओं को (देव-कार्य में)

(ग) सैनिकों को

(घ) केवल पत्नी को

उत्तर(ख) देवताओं को (देव-कार्य में)। (शेष का आधा दरिद्रों को, बचा भाग पत्नी को)

7. राजा ने करुण रोदन किस समय सुना?

(क) प्रातःकाल

(ख) सायंकाल

(ग) कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में

(घ) मध्याह्न में

उत्तर(ग) कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में।

8. रोती हुई सुन्दरी ने अपना परिचय क्या दिया?

(क) राजा की रानी

(ख) शूद्रक की राजलक्ष्मी

(ग) कोई अप्सरा

(घ) वीरवर की पुत्री

उत्तर(ख) शूद्रक की राजलक्ष्मी।

9. राजलक्ष्मी के अनुसार राजा की मृत्यु कब होने वाली थी?

(क) उसी रात

(ख) तीसरे दिन (तृतीये दिवसे)

(ग) एक मास बाद

(घ) एक वर्ष बाद

उत्तर(ख) तीसरे दिन (तृतीये दिवसे)।

10. राजलक्ष्मी के बताए उपाय का स्वरूप कैसा था?

(क) अत्यन्त सरल

(ख) अत्यन्त दुःसाध्य (कठिन)

(ग) असम्भव

(घ) निरर्थक

उत्तर(ख) अत्यन्त दुःसाध्य (कठिन)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): यह पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ उत्तम उद्देश्य के लिए त्याग का संदेश देता है।

कारण (R): यह पाठ ‘हितोपदेशः’ की वीरवर-कथा पर आधारित है, जो स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एवं त्याग की प्रेरणा देती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): राजा शूद्रक ने प्रारम्भ में वीरवर की वेतन-माँग अस्वीकार कर दी।

कारण (R): वीरवर मूर्ख एवं अयोग्य था, इसलिए राजा ने उसे अस्वीकार किया।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – राजा ने वेतन अधिक होने के कारण (‘नैतच्छक्यम्’) इनकार किया था, न कि वीरवर के अयोग्य होने के कारण।

3. अभिकथन (A): वीरवर शस्त्र धारण कर दिन-रात राजद्वार की सेवा करता था।

कारण (R): वह अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ एवं स्वामिभक्त राजपुत्र था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): राजा भी खड्ग लेकर वीरवर के पीछे-पीछे नगर के बाहर निकल गया।

कारण (R): राजा ने सोचा कि इस घोर अन्धकार में राजपुत्र को अकेले नहीं जाना चाहिए।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): राजलक्ष्मी उपाय बताकर तत्क्षण अदृश्य हो गई।

कारण (R): राजलक्ष्मी ने उपाय बताया कि प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को अर्पित करने पर राजा सौ वर्ष जीवित रहेगा।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, किन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है (दोनों स्वतंत्र तथ्य हैं)।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • कथा का क्रम याद रखें – वीरवर का आगमन → वेतन-माँग → अस्वीकृति → मन्त्री की सलाह → नियुक्ति → रोदन → राजलक्ष्मी का उपाय।
  • शब्दार्थ (वृत्त्यर्थम्, धृतायुधः, सूचिभेद्ये तिमिरे, पञ्चत्वम्, साष्टाङ्गम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • सन्धि-विच्छेद एवं पदच्छेद का अभ्यास करें – अभ्यास 4 एवं 7 को ध्यान से तैयार करें।
  • ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें, केवल एक शब्द नहीं।
  • भूतकाल के चार रूप (लङ्, लट्+स्म, क्तवतु, क्त) उदाहरण सहित याद करें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • पाठ को गलती से पञ्चतन्त्र से बताना – यह ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है।
  • राजलक्ष्मी को साधारण रानी समझ लेना – वह राजा शूद्रक की ‘राजलक्ष्मी’ (राज्य-समृद्धि की देवी) है।
  • सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘कश्चिदुपायो’ = कश्चित् + उपायः; ‘चार्द्धम्’ = च + अर्धम्।
  • वेतन-विभाजन में भ्रम – आधा देवताओं को, शेष का आधा दरिद्रों को, बचा भाग पत्नी को।
  • यह स्मरण रखें कि यह कथा का केवल ‘क-भागः’ है; शेष कथा पाठ 11 में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का दशम पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ संस्कृत के सुप्रसिद्ध नीति-कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है, जो रोचक कथाओं के माध्यम से हितकारी उपदेश देता है। यह पाठ दो भागों में है – यह ‘क-भागः’ है तथा शेष कथा पाठ 11 में है।

वीरवर कौन था और उसके मुख्य गुण क्या थे?

वीरवर एक राजपुत्र था जो आजीविका हेतु राजा शूद्रक की सेवा में आया। वह अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ, स्वामिभक्त, साहसी, दानशील एवं राष्ट्र के प्रति समर्पित था – इसी कारण वह अनुकरणीय आदर्श माना जाता है।

राजलक्ष्मी ने राजा शूद्रक को बचाने का क्या उपाय बताया?

राजलक्ष्मी ने बताया कि यदि वीरवर हँसते हुए मुख से अपनी सबसे प्रिय वस्तु को सर्वमंगला देवी को उपहार रूप में अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक जीवित रहेगा और राजलक्ष्मी सुखपूर्वक वहीं निवास करेगी। यह उपाय अत्यन्त दुःसाध्य (कठिन) था।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 10, पृष्ठ 111–123; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

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