Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 4 Solutions — प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः

Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 4 solutions: गोपबन्धु दास के जीवन, करुणा और देशसेवा का सार तथा आठ अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। पूर्वरूपसन्धि और पुस्तक के चित्र पर आधारित संस्कृत नमूने समझें।

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 4 पाठ: प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का चतुर्थ पाठ ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ ओडिशा के महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रता-सेनानी एवं साहित्यकार उत्कलमणि गोपबन्धु दास के प्रेरक जीवन पर आधारित है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है, जिसमें विद्यालय के सभागार में शिक्षक एवं छात्र ओडिशा के केन्द्रापड़ा क्षेत्र में आई भयङ्कर बाढ़ (जलप्लाव) तथा उससे हुई भारी हानि की चर्चा करते हैं। इसी प्रसंग में आचार्य छात्रों को गोपबन्धु दास के सेवा-कार्यों का स्मरण कराते हैं। पाठ में एक मार्मिक प्रसंग है जिसमें गोपबन्धु अपने भोजन को एक भूखे भिक्षुक को दे देते हैं। आगे उनका संक्षिप्त जीवन-परिचय, उनकी रचनाएँ, सत्यवादी-वनविद्यालय की स्थापना एवं उन्हें मिली ‘उत्कलमणि’ उपाधि का वर्णन है। पाठ का केन्द्रीय भाव परोपकार, करुणा, देशसेवा एवं त्याग है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ उत्कलमणि गोपबन्धु दास (1877–1928) के जीवन एवं आदर्शों पर आधारित एक प्रेरक गद्यांश है, जिसमें एक श्लोक भी सम्मिलित है। पाठ का प्रसंग इस प्रकार है – ओडिशा-राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में आई भयङ्कर बाढ़ से भारी हानि होती है। इसी पर सभागार में चर्चा करते हुए आचार्य छात्रों को बताते हैं कि किस प्रकार गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा की थी। गोपबन्धु दास सत्यवादी-वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध ‘पञ्चमित्रों’ में से एक तथा स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामी थे। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से वे स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित हुए तथा दो वर्ष कारावास में रहे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ की उपाधि दी।

पाठगत श्लोक

(गोपबन्धु दास की प्रसिद्ध काव्य-पङ्क्तियों का संस्कृत रूपान्तर एवं पाठ का शीर्षक-श्लोक, ज्यों-के-त्यों।)

स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः,
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ॥

उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः ।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ॥
— पाठगत श्लोकौ, दीपकम् (कक्षा 8)

भावार्थः – मेरा शरीर अपने देश की भूमि में विलीन हो जाए। देशवासी मेरा अनुसरण करते हुए (देश-सेवा के मार्ग पर) आगे बढ़ें। देश की स्वतन्त्रता के मार्ग में जहाँ-जहाँ बाधक गड्ढे हों, वे सब मेरी अस्थियों एवं मांस से भर जाएँ (अर्थात् मैं स्वयं को देश के लिए पूर्णतया अर्पित कर देना चाहता हूँ)। ‘उत्कलमणि’ नाम से प्रसिद्ध यह लोकसेवक एवं उच्च विचारों वाला देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम के योग्य है।

सार (Hindi Summary)

पाठ का आरम्भ विद्यालय के सभागार के एक संवाद से होता है। ओडिशा-राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में आई भयङ्कर बाढ़ से भारी हानि हुई है – घर नष्ट हो गए, अनेक लोग अस्वस्थ होकर चिकित्सालय में मृत्यु से जूझ रहे हैं, कुछ भूख से कष्ट सह रहे हैं तथा बहुत-से पालतू पशु भी नदी के प्रवाह में बह गए। शिक्षक एवं छात्र इस दुःख की चर्चा करते हैं। आचार्य कहते हैं कि हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए, जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा की थी और इसी कारण आज भी वे जन-मानस में आदरणीय हैं।

इसके पश्चात् एक मार्मिक प्रसंग आता है। एक बार आचार्य हरिहर दास ने सत्यवादी-वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन पर आमन्त्रित किया। केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए। तभी बाहर से एक करुण स्वर सुनाई दिया – ‘माँ, मैं भूखा हूँ, कृपया कुछ भोजन दो; तीन दिनों से मैंने कुछ नहीं खाया।’ इस क्रन्दन को सुनकर गोपबन्धु का हृदय करुणा से भर गया और उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं। कुछ भी विचार किए बिना उन्होंने अपने लिए परोसा हुआ भोजन हाथ में लेकर बाहर जाकर उस भूखे भिक्षुक को खिला दिया।

गोपबन्धु दास महान् समाजसेवक थे। उनका जन्म ओडिशा के पुरी जनपद के साक्षीगोपाल के समीप सुआण्डो-ग्राम में हुआ। अध्ययनकाल से ही वे दरिद्रों एवं रोगियों की सेवा करते रहे। उन्होंने सत्यवादी-वनविद्यालय में छात्रों को निःशुल्क पढ़ाया तथा निरक्षरता दूर करने के लिए निरन्तर प्रयत्न किया। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से वे स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित हुए और दो वर्ष कारावास में रहे, जहाँ उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’ आदि अनेक प्रेरक पुस्तकें ओड़िआ भाषा में लिखीं। वे सदैव स्वदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं का ही उपयोग करते थे। उन्होंने ‘समाज’ दैनिक-पत्र, दरिद्रनारायण-सेवा-सङ्घ आदि की स्थापना की। उनके असीम त्याग से प्रभावित होकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसे महामना देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम के योग्य हैं।

श्वेत वस्त्र पहने समाजसेवक का एक रोगी को सहारा देकर छोटे चिकित्सालय तक ले जाने का कल्पनात्मक दृश्य
गोपबन्धु की रोगी-सेवा से प्रेरित मौलिक ऐतिहासिक कल्पना। यह उनका प्रमाणित चित्र या वास्तविक घटना का फोटो नहीं है; अभ्यास 4 के लिए पुस्तक का मूल चित्र देखें।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
जलप्लावपीडितानाम्बाढ़-पीड़ितों काOf the flood victims
नष्टानिनष्ट हुए / क्षतिग्रस्तDestroyed
अनाहारेणभोजन न करने सेBy abstaining from food
नदीस्रोतसानदी के प्रवाह सेBy river currents
अकुण्ठम्आग्रहपूर्वक / निःसङ्कोचGenerously
समादृतःसम्मानित, आदरप्राप्तHonoured
सुस्वादूनि व्यञ्जनानिस्वादिष्ट भोजनDelicious dishes
दौर्लभ्यम्कष्ट से प्राप्त किया गयाDifficulty in obtaining
निःशुल्कम्निःशुल्क, बिना शुल्क केWithout any fees
करुणध्वनिःकरुणायुक्त ध्वनिWeeping words
अगुञ्जत्गूँजाEchoed
बुभुक्षितःभूखा, क्षुधातुरHungry
दयाविगलितहृदयःदयापूर्ण हृदय वाला, करुणार्द्रCompassionate heart
अश्रुपूर्णनयनःआँसुओं से भरी आँखों वालाEyes filled with tears
परिवेषितम्परोसा गया (अन्न)Served (food)
पञ्चमित्रेषुपाँच मित्रों मेंAmong the five friends
स्वतन्त्रतासङ्ग्रामीस्वतन्त्रता-सेनानीFreedom fighter
कारावासम्कारागार में रहनाLiving in jail
चिन्ताकुलःचिन्ता से व्याकुलWorried
सहस्रशःहजारोंIn thousands
लीयताम्विलीन हो जाए(May it) merge
गर्तमालिकागड्ढों की शृङ्खलाSeries of pits
उत्कलमणिःउत्कल (ओडिशा) की मणि (एक उपाधि)Gem of Odisha (a title)
महामनाःउच्च विचारों वाला, उदारचेताBroad-minded / magnanimous

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः ?

उत्तरगोपबन्धुः (गोपबन्धुदासः) ।

(ख) गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान् ?

उत्तरभिक्षुकाय (बुभुक्षिताय भिक्षुकाय) ।

(ग) मरणासन्नः कः आसीत् ?

उत्तरगोपबन्धोः पुत्रः (स्वपुत्रः) ।

(घ) गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत् ?

उत्तरउत्कलमणिः (इति उपाधिना) ।

(ङ) गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान् ?

उत्तरवर्षद्वयम् (द्वे वर्षे) ।

2. एकवाक्येन उत्तरं लिखत —

(क) गोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ?

उत्तरबहिः स्थितस्य बुभुक्षितस्य भिक्षुकस्य करुणक्रन्दनध्वनिं श्रुत्वा गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ।

(ख) कीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ?

उत्तरगोपबन्धुः मरणासन्नं (मरणसमीपस्थं) स्वपुत्रं विहाय जलप्लावपीडितानां समाजसेवाम् अकरोत् ।

(ग) गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः ?

उत्तरसमाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभूय आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धवे ‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिं प्रदत्तवान् ।

(घ) गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान् ?

उत्तरगोपबन्धुः ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान् ।

(ङ) गोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान् ?

उत्तरगोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशस्य वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान् ।

3. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —

(कोष्ठक): सेवाम्, सुस्वादूनि, सहायताम्, स्वदेशवस्त्राणि, अन्यतमः

उत्तर (नमूना-वाक्यानि) (क) सेवाम् – गोपबन्धुः दरिद्राणां रोगिणां च सेवाम् अकरोत् । (ख) सुस्वादूनि – कदलीपत्रेषु सुस्वादूनि व्यञ्जनानि परिवेषितानि । (ग) सहायताम् – अस्माभिः दुःखितानां सहायताम् करणीया । (घ) स्वदेशवस्त्राणि – गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि एव अधारयत् । (ङ) अन्यतमः – गोपबन्धुः प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः आसीत् ।

4. चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि रचयत —

पुस्तक के पृष्ठ 45 पर गोपबन्धु एक रोगी को सहारा देकर चिकित्सालय ले जाते दिखते हैं। नीचे उसी चित्र पर आधारित नमूना है; अन्य उपयुक्त वाक्य भी स्वीकार्य हैं।

नमूना-वाक्यानि(क) इदं चिकित्सालयस्य चित्रम् अस्ति।(ख) एकः रोगी चिकित्सालयं गच्छति।(ग) गोपबन्धुः रोगिणं चिकित्सालयं नयति।(घ) सः रोगिणः सहायतां करोति।(ङ) चित्रे गोपबन्धोः करुणा प्रकटिता अस्ति।

5. समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत —

उत्तर (क) स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः । (ख) उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः । (ग) स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु । (घ) स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका, । (ङ) ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ।

6. उदाहरणानुसारं क्रियापदं स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत —

यथा – गतवान् → गतवती

पुंलिङ्गम्स्त्रीलिङ्गम् (उत्तर)
(क) प्राप्तवान्प्राप्तवती
(ख) उपविष्टवान्उपविष्टवती
(ग) भुक्तवान्भुक्तवती
(घ) कृतवान्कृतवती
(ङ) गृहीतवान्गृहीतवती

7. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत —

अ (स्तम्भः)इ (स्तम्भः)
1. समाजःव्यञ्जनानि
2. ममास्थिमांसैःक्रन्दनध्वनिः
3. उत्कलमणिःदिनपत्रिका
4. आँ आँ . . इतिपरिपूरितास्तु
5. सुस्वादूनिगोपबन्धुः
सही मिलान (उत्तर) 1. समाजः → दिनपत्रिका 2. ममास्थिमांसैः → परिपूरितास्तु 3. उत्कलमणिः → गोपबन्धुः 4. आँ आँ . . इति → क्रन्दनध्वनिः 5. सुस्वादूनि → व्यञ्जनानि

8. घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत —

(दिए गए वाक्यों को घटनाओं के सही क्रम में पुनः लिखिए। मूल वाक्य – (क) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान् । (ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् । (ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् । (घ) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । (ङ) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् ।)

उत्तर (सही घटनाक्रमः) (क) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । (ख) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् । (ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् । (घ) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान् । (ङ) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् ।

अभ्यास 6 में प्राप्तवान् आदि क्तवतु-प्रत्ययान्त रूप हैं; स्त्रीलिङ्ग में प्राप्तवती आदि बनते हैं। अभ्यास 8 के दिए अक्षरों का सही घटनाक्रम घ → ङ → ग → क → ख है।

अत्र इदम् अवधेयम् (पूर्वरूपसन्धिः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत पूर्वरूपसन्धिः का परिचय दिया गया है, जिसे ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।

नियम – जब किसी पद के अन्त में ‘ए’कार अथवा ‘ओ’कार हो और उसके बाद आने वाले अगले पद का प्रथम वर्ण ‘अ’कार हो, तब पूर्वरूपसन्धि होती है। वहाँ ‘अ’कार के स्थान पर ‘ऽ’ (अवग्रह-चिह्न) का प्रयोग होता है।

विच्छेदःसन्धि-रूपम्
देशभक्तो + अयम्देशभक्तोऽयम्
सर्वे + अपिसर्वेऽपि
पशवो + अपिपशवोऽपि
बुभुक्षितो + अस्मिबुभुक्षितोऽस्मि
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत्अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (श्लोक-विश्लेषणम्)

पाठ में आये श्लोक ‘भोजनस्यातिदौर्लभ्यं…’ का पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ इस प्रकार है –

भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम् ।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु ॥

पदच्छेदः – भोजनस्य अतिदौर्लभ्यम् जीवनाय सुखप्रदम् तदर्थम् भोजनम् कुर्याः मा शरीरे दयाम् कुरु ।

अन्वयः – भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते) । जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः । तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु ।

भावार्थः – भोजन अत्यन्त दुर्लभ है (कठिनाई से प्राप्त होता है)। जीवन को आगे ले जाने के लिए सुखप्रद भोजन करना चाहिए। अतः शरीर के कष्ट का विचार करके भोजन के विषय में कभी संकोच अथवा लज्जा नहीं करनी चाहिए।

उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयः

विषयःविवरणम्
जन्म09/10/1877
जन्मस्थानम्सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्
पितादैत्यारिदासः
मातास्वर्णमयी देवी
पत्नीमोती देवी
एफ़्.ए. उत्तीर्णः1900, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा
बी.एल्. उत्तीर्णः1906, कलकत्ता-विश्वविद्यालयः
सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा1909
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः1917
समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम्1919
भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम्1920
उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम्1924
रचनाःअवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान
स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले)17.06.1928

सत्यवादि-वनविद्यालयः – पाठ के परिचय के अनुसार भारत का प्रथम मुक्त-विद्यालय, सन् 1909 ई. में अगस्त मास की 12 तारीख को साक्षीगोपाल नामक स्थान पर स्थापित। गोपबन्धुदास, नीलकण्ठदास, गोदावरीशमिश्र, कृपासिन्धुमिश्र, लिङ्गराजमिश्र, हरिहरदास एवं नन्दकिशोरदास – इन देशभक्तों के सम्मिलित प्रयास से यह निःशुल्क वनविद्यालय प्रसिद्ध हुआ। ‘पञ्चसखा’ मिलकर समाजसेवा एवं शिक्षा-विकास करते हुए स्वाधीनता-आन्दोलन के लिए जनता को प्रेरित करते थे।

मुक्तविद्यालय यहाँ खुले प्राकृतिक वातावरण में शिक्षण के प्रसंग में है। जीवनपरिचय की तिथियाँ पुस्तक के पृष्ठ 47–48 से हैं। देशसेवा वाला श्लोक आत्मसमर्पण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. स्वप्रदेशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामिणां नामानि सङ्गृह्य तेषु एकस्य सचित्रां संक्षिप्तजीवनीं लिखत ।

मार्गदर्शनम्यह स्वयं करने का कार्य है। अपने प्रदेश के स्वतन्त्रता-सेनानियों (जैसे – भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई, आदि स्थानीय वीर) के नाम एकत्र कीजिए तथा उनमें से किसी एक की चित्र-सहित संक्षिप्त जीवनी संस्कृत/हिन्दी में लिखिए।

2. जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं स्वकीयाम् एकां कार्ययोजनां लिखत ।

मार्गदर्शनम्विद्यालय, अभिभावकों और अधिकृत राहत-संगठनों के मार्गदर्शन में बाढ़-पीड़ितों की सहायता की योजना लिखिए। विद्यार्थी सुरक्षित स्थान से सामग्री-संग्रह और सूची बनाने में सहायता कर सकते हैं; जलधारा में उतरकर बचाव न करें। योजना में लिख सकते हैं — – भोजन एवं स्वच्छ जल की व्यवस्था, औषध एवं चिकित्सा-शिविर, सूखे वस्त्र एवं आश्रय-स्थल, धन-संग्रह अभियान तथा स्वयंसेवकों के दल बनाकर सहायता पहुँचाना।

आगे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. इस पाठ के आरम्भ में किस घटना की चर्चा होती है?

उत्तरपाठ के आरम्भ में ओडिशा-राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में आई भयङ्कर बाढ़ (जलप्लाव) की चर्चा होती है, जिससे घर नष्ट हुए, अनेक लोग बीमार पड़े तथा बहुत-से पशु नदी के प्रवाह में बह गए।

2. गोपबन्धु ने अपना भोजन भिक्षुक को क्यों दे दिया?

उत्तरबाहर से एक भूखे भिक्षुक का करुण क्रन्दन सुनकर, जिसने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था, गोपबन्धु का हृदय करुणा से भर गया। दयावश उन्होंने बिना कुछ सोचे अपना परोसा हुआ भोजन उठाकर बाहर जाकर उसे खिला दिया।

3. गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ की उपाधि किसने और क्यों दी?

उत्तरप्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ की उपाधि दी, क्योंकि समाजसेवा एवं देशसेवा के लिए उनका त्याग असीम था। ‘उत्कलमणि’ का अर्थ है – उत्कल (ओडिशा) की मणि।

4. सत्यवादी-वनविद्यालय की क्या विशेषता थी?

उत्तरसत्यवादी-वनविद्यालय पाठ के परिचय के अनुसार भारत का प्रथम मुक्त-विद्यालय था, जो सन् 1909 में साक्षीगोपाल में स्थापित हुआ। यहाँ छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। ‘पञ्चसखा’ मिलकर शिक्षा-विकास एवं समाजसेवा करते थे।

5. कारावास में रहते हुए गोपबन्धु ने कौन-कौन सी रचनाएँ लिखीं?

उत्तरकारागार में रहते हुए गोपबन्धु ने ओड़िआ भाषा में ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’ तथा ‘नचिकेता-उपाख्यान’ जैसी अनेक प्रेरणादायी पुस्तकें लिखीं।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. गोपबन्धु दास के जीवन से हमें कौन-कौन से जीवन-मूल्य मिलते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरगोपबन्धु दास का जीवन अनेक उच्च जीवन-मूल्यों का आदर्श है। सबसे पहले उनमें करुणा एवं परोपकार था – भूखे भिक्षुक के लिए उन्होंने अपना भोजन तक दे दिया। दूसरा मूल्य निःस्वार्थ समाजसेवा है – उन्होंने दरिद्रों एवं रोगियों की सेवा की तथा बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए मरणासन्न पुत्र को भी छोड़ दिया।तीसरा मूल्य देशभक्ति एवं त्याग है – उन्होंने स्वतन्त्रता-आन्दोलन में भाग लिया, दो वर्ष कारावास सहा तथा सदैव स्वदेशी वस्त्रों का ही उपयोग किया। शिक्षा के प्रति समर्पण, निरक्षरता-निवारण एवं उच्च विचार उनके अन्य गुण हैं। इसी कारण वे ‘उत्कलमणि’ एवं ‘महामना’ कहलाए और आज भी प्रणाम के योग्य हैं।

7. भोजन-प्रसंग के आधार पर गोपबन्धु के करुण एवं उदार स्वभाव का वर्णन कीजिए।

उत्तरएक बार आचार्य हरिहर दास ने सत्यवादी-वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन पर आमन्त्रित किया। केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए और सब आसन पर बैठ गए। तभी बाहर से एक भिक्षुक का करुण स्वर सुनाई दिया – ‘माँ, मैं भूखा हूँ, तीन दिनों से कुछ नहीं खाया, कृपया कुछ भोजन दो।’इस क्रन्दन को सुनते ही गोपबन्धु का हृदय करुणा से पिघल गया और उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं। उन्होंने कुछ भी सोचे बिना तुरन्त अपने लिए परोसा हुआ भोजन हाथ में उठाया और बाहर जाकर उस भूखे भिक्षुक को खिला दिया। यह प्रसंग उनके अत्यन्त करुण, दयालु एवं उदार स्वभाव को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।

8. पाठगत श्लोक ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः…’ का भाव अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस श्लोक में गोपबन्धु की अनन्य देशभक्ति एवं समर्पण-भावना प्रकट होती है। वे कामना करते हैं कि उनका शरीर अपने देश की भूमि में ही विलीन हो जाए तथा देशवासी उनका अनुसरण करते हुए देश-सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ें।वे यहाँ तक कहते हैं कि देश की स्वतन्त्रता के मार्ग में जहाँ-जहाँ बाधक गड्ढे हों, वे सब उनकी अस्थियों एवं मांस से भर जाएँ – अर्थात् वे स्वयं को पूर्णतया देश के लिए अर्पित कर देना चाहते हैं। यह श्लोक त्याग, बलिदान एवं राष्ट्रभक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है तथा आज भी जन-मानस में राष्ट्रभक्ति जागृत करता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस महान् व्यक्ति के जीवन पर आधारित है?

(क) महात्मा गाँधी

(ख) उत्कलमणि गोपबन्धु दास

(ग) प्रफुल्लचन्द्र राय

(घ) हरिहर दास

उत्तर(ख) उत्कलमणि गोपबन्धु दास।

2. किस जनपद में बाढ़ (जलप्लाव) आई थी?

(क) पुरी

(ख) कटक

(ग) केन्द्रापड़ा

(घ) साक्षीगोपाल

उत्तर(ग) केन्द्रापड़ा।

3. गोपबन्धु ने अपना भोजन किसे दे दिया?

(क) अध्यापक को

(ख) भूखे भिक्षुक को

(ग) पुत्र को

(घ) आचार्य को

उत्तर(ख) भूखे भिक्षुक को।

4. गोपबन्धु को कौन-सी उपाधि मिली?

(क) देशबन्धु

(ख) दीनबन्धु

(ग) उत्कलमणि

(घ) लोकमान्य

उत्तर(ग) उत्कलमणि।

5. गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि किसने दी?

(क) महात्मा गाँधी

(ख) आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय

(ग) नीलकण्ठ दास

(घ) हरिहर दास

उत्तर(ख) आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय।

6. गोपबन्धु कितने वर्ष कारावास में रहे?

(क) एक वर्ष

(ख) दो वर्ष

(ग) तीन वर्ष

(घ) पाँच वर्ष

उत्तर(ख) दो वर्ष (वर्षद्वयम्)।

7. गोपबन्धु का जन्म-ग्राम कौन-सा है?

(क) कटक

(ख) सुआण्डो-ग्राम

(ग) केन्द्रापड़ा

(घ) रेभेन्सा

उत्तर(ख) सुआण्डो-ग्राम (पुरी जनपद, साक्षीगोपाल के समीप)।

8. गोपबन्धु किस प्रसिद्ध समूह के सदस्य थे?

(क) पञ्चमित्र (पञ्चसखा)

(ख) त्रिमूर्ति

(ग) सप्तर्षि

(घ) नवरत्न

उत्तर(क) पञ्चमित्र (पञ्चसखा)।

9. सत्यवादी-वनविद्यालय की क्या विशेषता थी?

(क) यह शुल्क लेने वाला विद्यालय था

(ख) यह पाठ के अनुसार भारत का प्रथम निःशुल्क मुक्त-विद्यालय था

(ग) यह केवल कन्याओं का विद्यालय था

(घ) यह विदेशी विद्यालय था

उत्तर(ख) यह पाठ के अनुसार भारत का प्रथम निःशुल्क मुक्त-विद्यालय था।

10. इस पाठ की मुख्य प्रेरणा क्या है?

(क) धन-संचय

(ख) परोपकार, करुणा एवं देशसेवा

(ग) स्वार्थ एवं प्रतिस्पर्धा

(घ) एकान्तवास

उत्तर(ख) परोपकार, करुणा एवं देशसेवा।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(क), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): गोपबन्धु भूखे भिक्षुक का करुण स्वर सुनकर अश्रुपूर्णनयन हो गए।

कारण (R): उनका हृदय अत्यन्त करुण एवं दयालु था, जो दूसरों के दुःख से तुरन्त विगलित हो जाता था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि दी गई।

कारण (R): वे एक धनी व्यापारी थे जिन्होंने बहुत-सा धन संचित किया था।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – यह उपाधि उनके असीम त्याग एवं समाजसेवा के कारण आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने दी थी, धन-संचय के कारण नहीं।

3. अभिकथन (A): गोपबन्धु सदैव स्वदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं का ही उपयोग करते थे।

कारण (R): वे महात्मा गाँधी की प्रेरणा से स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित देशभक्त थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): सत्यवादी-वनविद्यालय पाठ के परिचय के अनुसार भारत का प्रथम मुक्त-विद्यालय था।

कारण (R): यह सन् 1909 में साक्षीगोपाल नामक स्थान पर पञ्चसखाओं के सम्मिलित प्रयास से स्थापित हुआ था।

उत्तर(ख) A और R दोनों पाठ की जानकारी से मेल खाते हैं, पर स्थापना-वर्ष और स्थान अपने-आप में ‘प्रथम’ होने की व्याख्या नहीं करते।

5. अभिकथन (A): ‘देशभक्तोऽयम्’ पद में पूर्वरूपसन्धि है।

कारण (R): पद के अन्त में ‘ओ’कार के बाद ‘अ’कार आने पर ‘अ’कार के स्थान पर अवग्रह-चिह्न (ऽ) का प्रयोग होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है। (देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्)

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • गोपबन्धु दास का जीवन-परिचय (जन्म 1877, जन्मस्थान सुआण्डो-ग्राम, उपाधि ‘उत्कलमणि’, देहावसान 1928) तालिका-रूप में याद रखें।
  • शब्दार्थ (जलप्लावपीडितानाम्, अकुण्ठम्, बुभुक्षितः, परिवेषितम्, उत्कलमणिः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें।
  • पूर्वरूपसन्धि के सभी उदाहरण (देशभक्तोऽयम्, सर्वेऽपि, पशवोऽपि) सन्धि एवं सन्धि-विच्छेद दोनों रूपों में याद करें।
  • ‘एकपदेन’ उत्तर में केवल एक पद लिखें, जबकि ‘एकवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।
  • श्लोक ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः…’ एवं उसका भावार्थ कण्ठस्थ करें – अभ्यास 5 की रिक्तस्थान-पूर्ति इसी श्लोक पर आधारित है।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • ‘उत्कलमणि’ उपाधि देने वाले को महात्मा गाँधी लिख देना – यह आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने दी थी।
  • बाढ़ वाले जनपद को ‘पुरी’ लिख देना – बाढ़ केन्द्रापड़ा जनपद में आई थी (जन्म पुरी जनपद में)।
  • अवग्रह-चिह्न (ऽ) छोड़ देना – देशभक्तोऽयम्, बुभुक्षितोऽस्मि शुद्ध लिखें।
  • स्त्रीलिङ्ग-परिवर्तन में ‘-वान्’ के स्थान पर ‘-वती’ न लगाना (प्राप्तवान् → प्राप्तवती)।
  • घटनाक्रम में भोजन-प्रसंग एवं उपाधि-प्रसंग का क्रम उलट देना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का पाठ 4 ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ किस पर आधारित है?

यह पाठ ओडिशा के महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रता-सेनानी एवं साहित्यकार उत्कलमणि गोपबन्धु दास (1877–1928) के प्रेरक जीवन, उनके परोपकार, करुणा एवं देशसेवा पर आधारित है।

गोपबन्धु दास को ‘उत्कलमणि’ क्यों कहा जाता है?

समाजसेवा एवं देशसेवा के लिए उनके असीम त्याग से प्रभावित होकर प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ (उत्कल अर्थात् ओडिशा की मणि) की उपाधि दी थी।

इस पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

इस पाठ का मुख्य संदेश परोपकार, करुणा, निःस्वार्थ समाजसेवा, देशभक्ति एवं त्याग है। गोपबन्धु का जीवन हमें दूसरों के दुःख में सहायता करने तथा देश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देता है।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 4, पृष्ठ 36–48; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

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