Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 4 Solutions (NCERT 2026–27) – प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः
This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 4 ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ – the inspiring account of उत्कलमणि गोपबन्धु दास, the great Odia social worker and freedom-fighter. It includes the पाठ-परिचय/प्रसंग, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, the verse with its भावार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः) along with grammar (पूर्वरूपसन्धिः) notes, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- पाठगत श्लोक
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (पूर्वरूपसन्धिः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का चतुर्थ पाठ ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ ओडिशा के महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रता-सेनानी एवं साहित्यकार उत्कलमणि गोपबन्धु दास के प्रेरक जीवन पर आधारित है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है, जिसमें विद्यालय के सभागार में शिक्षक एवं छात्र ओडिशा के केन्द्रापड़ा क्षेत्र में आई भयङ्कर बाढ़ (जलप्लाव) तथा उससे हुई भारी हानि की चर्चा करते हैं। इसी प्रसंग में आचार्य छात्रों को गोपबन्धु दास के सेवा-कार्यों का स्मरण कराते हैं। पाठ में एक मार्मिक प्रसंग है जिसमें गोपबन्धु अपने भोजन को एक भूखे भिक्षुक को दे देते हैं। आगे उनका संक्षिप्त जीवन-परिचय, उनकी रचनाएँ, सत्यवादी-वनविद्यालय की स्थापना एवं उन्हें मिली ‘उत्कलमणि’ उपाधि का वर्णन है। पाठ का केन्द्रीय भाव परोपकार, करुणा, देशसेवा एवं त्याग है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ उत्कलमणि गोपबन्धु दास (1877–1928) के जीवन एवं आदर्शों पर आधारित एक प्रेरक गद्यांश है, जिसमें एक श्लोक भी सम्मिलित है। पाठ का प्रसंग इस प्रकार है – ओडिशा-राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में आई भयङ्कर बाढ़ से भारी हानि होती है। इसी पर सभागार में चर्चा करते हुए आचार्य छात्रों को बताते हैं कि किस प्रकार गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा की थी। गोपबन्धु दास सत्यवादी-वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध ‘पञ्चमित्रों’ में से एक तथा स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामी थे। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से वे स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित हुए तथा दो वर्ष कारावास में रहे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ की उपाधि दी।
पाठगत श्लोक
(गोपबन्धु दास की प्रसिद्ध काव्य-पङ्क्तियों का संस्कृत रूपान्तर एवं पाठ का शीर्षक-श्लोक, ज्यों-के-त्यों।)
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ॥
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः ।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ॥
— पाठगत श्लोकौ, दीपकम् (कक्षा 8)
भावार्थः – मेरा शरीर अपने देश की भूमि में विलीन हो जाए। देशवासी मेरा अनुसरण करते हुए (देश-सेवा के मार्ग पर) आगे बढ़ें। देश की स्वतन्त्रता के मार्ग में जहाँ-जहाँ बाधक गड्ढे हों, वे सब मेरी अस्थियों एवं मांस से भर जाएँ (अर्थात् मैं स्वयं को देश के लिए पूर्णतया अर्पित कर देना चाहता हूँ)। ‘उत्कलमणि’ नाम से प्रसिद्ध यह लोकसेवक एवं उच्च विचारों वाला देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम के योग्य है।
सार (Hindi Summary)
पाठ का आरम्भ विद्यालय के सभागार के एक संवाद से होता है। ओडिशा-राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में आई भयङ्कर बाढ़ से भारी हानि हुई है – घर नष्ट हो गए, अनेक लोग अस्वस्थ होकर चिकित्सालय में मृत्यु से जूझ रहे हैं, कुछ भूख से कष्ट सह रहे हैं तथा बहुत-से पालतू पशु भी नदी के प्रवाह में बह गए। शिक्षक एवं छात्र इस दुःख की चर्चा करते हैं। आचार्य कहते हैं कि हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए, जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा की थी और इसी कारण आज भी वे जन-मानस में आदरणीय हैं।
इसके पश्चात् एक मार्मिक प्रसंग आता है। एक बार आचार्य हरिहर दास ने सत्यवादी-वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन पर आमन्त्रित किया। केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए। तभी बाहर से एक करुण स्वर सुनाई दिया – ‘माँ, मैं भूखा हूँ, कृपया कुछ भोजन दो; तीन दिनों से मैंने कुछ नहीं खाया।’ इस क्रन्दन को सुनकर गोपबन्धु का हृदय करुणा से भर गया और उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं। कुछ भी विचार किए बिना उन्होंने अपने लिए परोसा हुआ भोजन हाथ में लेकर बाहर जाकर उस भूखे भिक्षुक को खिला दिया।
गोपबन्धु दास महान् समाजसेवक थे। उनका जन्म ओडिशा के पुरी जनपद के साक्षीगोपाल के समीप सुआण्डो-ग्राम में हुआ। अध्ययनकाल से ही वे दरिद्रों एवं रोगियों की सेवा करते रहे। उन्होंने सत्यवादी-वनविद्यालय में छात्रों को निःशुल्क पढ़ाया तथा निरक्षरता दूर करने के लिए निरन्तर प्रयत्न किया। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से वे स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित हुए और दो वर्ष कारावास में रहे, जहाँ उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’ आदि अनेक प्रेरक पुस्तकें ओड़िआ भाषा में लिखीं। वे सदैव स्वदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं का ही उपयोग करते थे। उन्होंने ‘समाज’ दैनिक-पत्र, दरिद्रनारायण-सेवा-सङ्घ आदि की स्थापना की। उनके असीम त्याग से प्रभावित होकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसे महामना देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम के योग्य हैं।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जलप्लावपीडितानाम् | बाढ़-पीड़ितों का | Of the flood victims |
| नष्टानि | नष्ट हुए / क्षतिग्रस्त | Destroyed |
| अनाहारेण | भोजन न करने से | By abstaining from food |
| नदीस्रोतसा | नदी के प्रवाह से | By river currents |
| अकुण्ठम् | आग्रहपूर्वक / निःसङ्कोच | Generously |
| समादृतः | सम्मानित, आदरप्राप्त | Honoured |
| सुस्वादूनि व्यञ्जनानि | स्वादिष्ट भोजन | Delicious dishes |
| दौर्लभ्यम् | कष्ट से प्राप्त किया गया | Difficulty in obtaining |
| निःशुल्कम् | निःशुल्क, बिना शुल्क के | Without any fees |
| करुणध्वनिः | करुणायुक्त ध्वनि | Weeping words |
| अगुञ्जत् | गूँजा | Echoed |
| बुभुक्षितः | भूखा, क्षुधातुर | Hungry |
| दयाविगलितहृदयः | दयापूर्ण हृदय वाला, करुणार्द्र | Compassionate heart |
| अश्रुपूर्णनयनः | आँसुओं से भरी आँखों वाला | Eyes filled with tears |
| परिवेषितम् | परोसा गया (अन्न) | Served (food) |
| पञ्चमित्रेषु | पाँच मित्रों में | Among the five friends |
| स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी | स्वतन्त्रता-सेनानी | Freedom fighter |
| कारावासम् | कारागार में रहना | Living in jail |
| चिन्ताकुलः | चिन्ता से व्याकुल | Worried |
| सहस्रशः | हजारों | In thousands |
| लीयताम् | विलीन हो जाए | (May it) merge |
| गर्तमालिका | गड्ढों की शृङ्खला | Series of pits |
| उत्कलमणिः | उत्कल (ओडिशा) की मणि (एक उपाधि) | Gem of Odisha (a title) |
| महामनाः | उच्च विचारों वाला, उदारचेता | Broad-minded / magnanimous |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः ?
(ख) गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान् ?
(ग) मरणासन्नः कः आसीत् ?
(घ) गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत् ?
(ङ) गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान् ?
2. एकवाक्येन उत्तरं लिखत —
(क) गोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ?
(ख) कीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ?
(ग) गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः ?
(घ) गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान् ?
(ङ) गोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान् ?
3. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —
(कोष्ठक): सेवाम्, सुस्वादूनि, सहायताम्, स्वदेशवस्त्राणि, अन्यतमः
4. चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि रचयत —
(पाठ में दिए गए चिकित्सालय (अस्पताल) के चित्र को देखकर पाँच वाक्य – नमूना उत्तर)
5. समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत —
6. उदाहरणानुसारं क्रियापदं स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत —
यथा – गतवान् → गतवती
| पुंलिङ्गम् | स्त्रीलिङ्गम् (उत्तर) |
|---|---|
| (क) प्राप्तवान् | प्राप्तवती |
| (ख) उपविष्टवान् | उपविष्टवती |
| (ग) भुक्तवान् | भुक्तवती |
| (घ) कृतवान् | कृतवती |
| (ङ) गृहीतवान् | गृहीतवती |
7. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत —
| अ (स्तम्भः) | इ (स्तम्भः) |
|---|---|
| 1. समाजः | व्यञ्जनानि |
| 2. ममास्थिमांसैः | क्रन्दनध्वनिः |
| 3. उत्कलमणिः | दिनपत्रिका |
| 4. आँ आँ . . इति | परिपूरितास्तु |
| 5. सुस्वादूनि | गोपबन्धुः |
8. घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत —
(दिए गए वाक्यों को घटनाओं के सही क्रम में पुनः लिखिए। मूल वाक्य – (क) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान् । (ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् । (ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् । (घ) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । (ङ) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् ।)
अत्र इदम् अवधेयम् (पूर्वरूपसन्धिः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत पूर्वरूपसन्धिः का परिचय दिया गया है, जिसे ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।
नियम – जब किसी पद के अन्त में ‘ए’कार अथवा ‘ओ’कार हो और उसके बाद आने वाले अगले पद का प्रथम वर्ण ‘अ’कार हो, तब पूर्वरूपसन्धि होती है। वहाँ ‘अ’कार के स्थान पर ‘ऽ’ (अवग्रह-चिह्न) का प्रयोग होता है।
| विच्छेदः | सन्धि-रूपम् |
|---|---|
| देशभक्तो + अयम् | देशभक्तोऽयम् |
| सर्वे + अपि | सर्वेऽपि |
| पशवो + अपि | पशवोऽपि |
| बुभुक्षितो + अस्मि | बुभुक्षितोऽस्मि |
| अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् | अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (श्लोक-विश्लेषणम्)
पाठ में आये श्लोक ‘भोजनस्यातिदौर्लभ्यं…’ का पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ इस प्रकार है –
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु ॥
पदच्छेदः – भोजनस्य अतिदौर्लभ्यम् जीवनाय सुखप्रदम् तदर्थम् भोजनम् कुर्याः मा शरीरे दयाम् कुरु ।
अन्वयः – भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते) । जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः । तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु ।
भावार्थः – भोजन अत्यन्त दुर्लभ है (कठिनाई से प्राप्त होता है)। जीवन को आगे ले जाने के लिए सुखप्रद भोजन करना चाहिए। अतः शरीर के कष्ट का विचार करके भोजन के विषय में कभी संकोच अथवा लज्जा नहीं करनी चाहिए।
उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयः
| विषयः | विवरणम् |
|---|---|
| जन्म | 09/10/1877 |
| जन्मस्थानम् | सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम् |
| पिता | दैत्यारिदासः |
| माता | स्वर्णमयी देवी |
| पत्नी | मोती देवी |
| एफ़्.ए. उत्तीर्णः | 1900, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा |
| बी.एल्. उत्तीर्णः | 1906, कलकत्ता-विश्वविद्यालयः |
| सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा | 1909 |
| बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः | 1917 |
| समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम् | 1919 |
| भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम् | 1920 |
| उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम् | 1924 |
| रचनाः | अवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान |
| स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले) | 17.06.1928 |
सत्यवादि-वनविद्यालयः – भारत का प्रथम मुक्त-विद्यालय, सन् 1909 ई. में अगस्त मास की 12 तारीख को साक्षीगोपाल नामक स्थान पर स्थापित। गोपबन्धुदास, नीलकण्ठदास, गोदावरीशमिश्र, कृपासिन्धुमिश्र, लिङ्गराजमिश्र, हरिहरदास एवं नन्दकिशोरदास – इन देशभक्तों के सम्मिलित प्रयास से यह निःशुल्क वनविद्यालय प्रसिद्ध हुआ। ‘पञ्चसखा’ मिलकर समाजसेवा एवं शिक्षा-विकास करते हुए स्वाधीनता-आन्दोलन के लिए जनता को प्रेरित करते थे।
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. स्वप्रदेशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामिणां नामानि सङ्गृह्य तेषु एकस्य सचित्रां संक्षिप्तजीवनीं लिखत ।
2. जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं स्वकीयाम् एकां कार्ययोजनां लिखत ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. इस पाठ के आरम्भ में किस घटना की चर्चा होती है?
2. गोपबन्धु ने अपना भोजन भिक्षुक को क्यों दे दिया?
3. गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ की उपाधि किसने और क्यों दी?
4. सत्यवादी-वनविद्यालय की क्या विशेषता थी?
5. कारावास में रहते हुए गोपबन्धु ने कौन-कौन सी रचनाएँ लिखीं?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. गोपबन्धु दास के जीवन से हमें कौन-कौन से जीवन-मूल्य मिलते हैं? स्पष्ट कीजिए।
7. भोजन-प्रसंग के आधार पर गोपबन्धु के करुण एवं उदार स्वभाव का वर्णन कीजिए।
8. पाठगत श्लोक ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः…’ का भाव अपने शब्दों में लिखिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. यह पाठ किस महान् व्यक्ति के जीवन पर आधारित है?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) उत्कलमणि गोपबन्धु दास
(ग) प्रफुल्लचन्द्र राय
(घ) हरिहर दास
2. किस जनपद में बाढ़ (जलप्लाव) आई थी?
(क) पुरी
(ख) कटक
(ग) केन्द्रापड़ा
(घ) साक्षीगोपाल
3. गोपबन्धु ने अपना भोजन किसे दे दिया?
(क) अध्यापक को
(ख) भूखे भिक्षुक को
(ग) पुत्र को
(घ) आचार्य को
4. गोपबन्धु को कौन-सी उपाधि मिली?
(क) देशबन्धु
(ख) दीनबन्धु
(ग) उत्कलमणि
(घ) लोकमान्य
5. गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि किसने दी?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय
(ग) नीलकण्ठ दास
(घ) हरिहर दास
6. गोपबन्धु कितने वर्ष कारावास में रहे?
(क) एक वर्ष
(ख) दो वर्ष
(ग) तीन वर्ष
(घ) पाँच वर्ष
7. गोपबन्धु का जन्म-ग्राम कौन-सा है?
(क) कटक
(ख) सुआण्डो-ग्राम
(ग) केन्द्रापड़ा
(घ) रेभेन्सा
8. गोपबन्धु किस प्रसिद्ध समूह के सदस्य थे?
(क) पञ्चमित्र (पञ्चसखा)
(ख) त्रिमूर्ति
(ग) सप्तर्षि
(घ) नवरत्न
9. सत्यवादी-वनविद्यालय की क्या विशेषता थी?
(क) यह शुल्क लेने वाला विद्यालय था
(ख) यह भारत का प्रथम निःशुल्क मुक्त-विद्यालय था
(ग) यह केवल कन्याओं का विद्यालय था
(घ) यह विदेशी विद्यालय था
10. इस पाठ की मुख्य प्रेरणा क्या है?
(क) धन-संचय
(ख) परोपकार, करुणा एवं देशसेवा
(ग) स्वार्थ एवं प्रतिस्पर्धा
(घ) एकान्तवास
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): गोपबन्धु भूखे भिक्षुक को देखकर अश्रुपूर्णनयन हो गए।
कारण (R): उनका हृदय अत्यन्त करुण एवं दयालु था, जो दूसरों के दुःख से तुरन्त विगलित हो जाता था।
2. अभिकथन (A): गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि दी गई।
कारण (R): वे एक धनी व्यापारी थे जिन्होंने बहुत-सा धन संचित किया था।
3. अभिकथन (A): गोपबन्धु सदैव स्वदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं का ही उपयोग करते थे।
कारण (R): वे महात्मा गाँधी की प्रेरणा से स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित देशभक्त थे।
4. अभिकथन (A): सत्यवादी-वनविद्यालय भारत का प्रथम मुक्त-विद्यालय था।
कारण (R): यह सन् 1909 में साक्षीगोपाल नामक स्थान पर पञ्चसखाओं के सम्मिलित प्रयास से स्थापित हुआ था।
5. अभिकथन (A): ‘देशभक्तोऽयम्’ पद में पूर्वरूपसन्धि है।
कारण (R): पद के अन्त में ‘ओ’कार के बाद ‘अ’कार आने पर ‘अ’कार के स्थान पर अवग्रह-चिह्न (ऽ) का प्रयोग होता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- गोपबन्धु दास का जीवन-परिचय (जन्म 1877, जन्मस्थान सुआण्डो-ग्राम, उपाधि ‘उत्कलमणि’, देहावसान 1928) तालिका-रूप में याद रखें।
- शब्दार्थ (जलप्लावपीडितानाम्, अकुण्ठम्, बुभुक्षितः, परिवेषितम्, उत्कलमणिः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें।
- पूर्वरूपसन्धि के सभी उदाहरण (देशभक्तोऽयम्, सर्वेऽपि, पशवोऽपि) सन्धि एवं सन्धि-विच्छेद दोनों रूपों में याद करें।
- ‘एकपदेन’ उत्तर में केवल एक पद लिखें, जबकि ‘एकवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।
- श्लोक ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः…’ एवं उसका भावार्थ कण्ठस्थ करें – रिक्तस्थान-पूर्ति प्रायः इसी से आती है।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- ‘उत्कलमणि’ उपाधि देने वाले को महात्मा गाँधी लिख देना – यह आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने दी थी।
- बाढ़ वाले जनपद को ‘पुरी’ लिख देना – बाढ़ केन्द्रापड़ा जनपद में आई थी (जन्म पुरी जनपद में)।
- अवग्रह-चिह्न (ऽ) छोड़ देना – देशभक्तोऽयम्, बुभुक्षितोऽस्मि शुद्ध लिखें।
- स्त्रीलिङ्ग-परिवर्तन में ‘-वान्’ के स्थान पर ‘-वती’ न लगाना (प्राप्तवान् → प्राप्तवती)।
- घटनाक्रम में भोजन-प्रसंग एवं उपाधि-प्रसंग का क्रम उलट देना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 का पाठ 4 ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ किस पर आधारित है?
यह पाठ ओडिशा के महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रता-सेनानी एवं साहित्यकार उत्कलमणि गोपबन्धु दास (1877–1928) के प्रेरक जीवन, उनके परोपकार, करुणा एवं देशसेवा पर आधारित है।
गोपबन्धु दास को ‘उत्कलमणि’ क्यों कहा जाता है?
समाजसेवा एवं देशसेवा के लिए उनके असीम त्याग से प्रभावित होकर प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ (उत्कल अर्थात् ओडिशा की मणि) की उपाधि दी थी।
इस पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
इस पाठ का मुख्य संदेश परोपकार, करुणा, निःस्वार्थ समाजसेवा, देशभक्ति एवं त्याग है। गोपबन्धु का जीवन हमें दूसरों के दुःख में सहायता करने तथा देश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देता है।
पाठांश, श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
