NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 6: सौहार्दं प्रकृतेः शोभा
This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी, द्वितीयो भागः) पाठः 6 ‘सौहार्दं प्रकृतेः शोभा’ – a witty नाट्यांश (dramatized lesson) in which the animals and birds of a forest quarrel over who deserves to be their king, until प्रकृतिमाता (Mother Nature) teaches them that cooperation and friendship are the true beauty of nature – with its मूल नाट्यांश, an original सार (Hindi summary), भावार्थ of the embedded श्लोकाः, a complete शब्दार्थ table, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः, along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का षष्ठ पाठ ‘सौहार्दं प्रकृतेः शोभा’ एक रोचक नाट्यांश (नाटक का अंश) है। यह पाठ इस बात का बोध कराता है कि पारस्परिक व्यवहार स्नेह एवं सौहार्द से परिपूर्ण होना चाहिए। आजकल समाज में लोग आत्माभिमानी होकर एक-दूसरे का तिरस्कार करते हैं तथा केवल स्वार्थ-साधन में लगे रहते हैं। इसी प्रवृत्ति को उजागर करने के लिए लेखक ने वन के पशु-पक्षियों के माध्यम से आत्माभिमान का चित्रण किया है। नाटक में सिंह, वानर, काक, कोकिल (पिक), हाथी, बक, मयूर, व्याघ्र एवं चित्रक – सभी स्वयं को वनराज पद के योग्य मानते हुए परस्पर झगड़ते हैं। अन्त में प्रकृतिमाता आकर समझाती हैं कि समय आने पर सभी का अपना-अपना महत्त्व है और सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं; अतः हमें परस्पर स्नेह एवं मैत्रीपूर्ण व्यवहार से रहना चाहिए। यही सौहार्द प्रकृति की वास्तविक शोभा है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
प्रस्तुत पाठ ‘सौहार्दं प्रकृतेः शोभा’ एक मौलिक नाट्यांश है, जो शेमुषी (द्वितीयो भागः) पाठ्यपुस्तक में संकलित है। पाठ का आरम्भ इस उपदेश से होता है कि परस्पर व्यवहार स्नेह एवं सौहार्द से युक्त होना चाहिए। नाटक का दृश्य एक वन है, जिसके समीप एक नदी बहती है। वहाँ विश्राम कर रहे सिंह को वानर बार-बार सताते हैं और वह क्रोधित होकर भी कुछ नहीं कर पाता। इसी से वन के पशु-पक्षियों में यह विवाद उठ खड़ा होता है कि वनराज (राजा) बनने योग्य कौन है। प्रत्येक प्राणी अपनी-अपनी श्रेष्ठता का बखान करते हुए स्वयं को राजपद के योग्य बताता है – यही नाटक की मूल समस्या है। अन्त में प्रकृतिमाता के प्रवेश से इस विवाद का सुन्दर समाधान होता है और ‘सहयोग ही सबके कल्याण का मार्ग है’ – यह सन्देश प्रकट होता है। यह पाठ अनेक नीति-श्लोकों (पञ्चतन्त्र, शाण्डिल्यशतक आदि से उद्धृत) से अलंकृत है।
सार (Hindi Summary)
‘सौहार्दं प्रकृतेः शोभा’ नाट्यांश का आरम्भ इस उपदेश से होता है कि लोगों का परस्पर व्यवहार स्नेह एवं सौहार्द से युक्त होना चाहिए। आजकल समाज में लोग आत्माभिमानी होकर एक-दूसरे का तिरस्कार करते हैं और केवल स्वार्थ-साधन में लगे रहते हैं; दूसरों के कल्याण की वे तनिक भी चिन्ता नहीं करते।
वन के दृश्य में, नदी के समीप एक सिंह सुख से विश्राम कर रहा होता है। तभी एक वानर आकर उसकी पूँछ पकड़कर हिला देता है। क्रुद्ध सिंह उसे मारना चाहता है, परन्तु वानर वृक्ष पर चढ़ जाता है। बार-बार वानर सिंह को सताते हैं और सिंह इधर-उधर दौड़ता, गरजता हुआ भी कुछ नहीं कर पाता। यह देखकर वानर तथा पक्षी प्रसन्नता से कलरव करने लगते हैं। निद्रा-भंग के दुःख से थका सिंह पूछता है कि सब मिलकर उसे क्यों सता रहे हैं। एक वानर उत्तर देता है कि वह वनराज बनने के योग्य नहीं है, क्योंकि राजा तो रक्षक होता है, पर वह तो भक्षक है तथा अपनी रक्षा में भी असमर्थ है।
इसके बाद काक, कोकिल (पिक), हाथी, बक, मयूर, व्याघ्र एवं चित्रक – सभी आ-आकर अपनी-अपनी विशेषता बताते हुए स्वयं को वनराज-पद के योग्य घोषित करते हैं। काक अपनी सत्यप्रियता एवं परिश्रम का, हाथी अपने बल एवं पराक्रम का, बक अपने ध्यान एवं बुद्धि का, मयूर अपने सौन्दर्य एवं नृत्य का बखान करता है; परन्तु एक-दूसरे के दोष भी उजागर करते हैं। सभी पक्षी अन्त में निद्रालु, आत्मश्लाघाहीन उल्लू को राजा बनाने का निश्चय करते हैं, किन्तु काक इसका विरोध करता है कि अन्धा, क्रूर एवं दिनभर सोने वाला उल्लू सबकी रक्षा कैसे करेगा।
तभी प्रकृतिमाता प्रवेश करती हैं और स्नेहपूर्वक समझाती हैं कि सभी प्राणी उनकी सन्तान हैं तथा परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित हैं। ‘प्रजा के सुख में राजा का सुख’ तथा ‘अगाध जल में विचरण करने वाला रोहित मछली गर्व नहीं करता’ आदि श्लोकों से वे सिखाती हैं कि सबका यथासमय अपना-अपना महत्त्व है। अतः किसी एक गुण की चर्चा छोड़कर सभी को मिलकर प्रकृति के सौन्दर्य एवं वन की रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए। सभी प्रकृतिमाता को प्रणाम करते हैं और दृढ़ संकल्प के साथ गाते हैं कि “परस्पर विवाद से प्राणियों की हानि होती है, परन्तु पारस्परिक सहयोग से उन्हें लाभ होता है।” इस प्रकार यह नाट्यांश सौहार्द, सहयोग एवं विश्वबन्धुत्व का सन्देश देता है।
श्लोकानां भावार्थः (मुख्य श्लोकों के भावार्थ)
जन्तून् पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः ॥
— (वानरस्य उक्तिः, पञ्चतन्त्रोक्तिः)
भावार्थ: जो राजा के रूप में रहकर दूसरों के द्वारा सताए जाते हुए भयभीत प्राणियों की सदा रक्षा नहीं करता, वह राजा के वेश में निःसन्देह यमराज (मृत्यु का देवता) ही है। तात्पर्य यह है कि रक्षा न करने वाला राजा प्रजा के लिए मृत्यु के समान ही है।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः ॥
— (पिकस्य उक्तिः)
भावार्थ: कौआ भी काला है और कोयल भी काली है – फिर कोयल और कौए में क्या अन्तर है? परन्तु जब वसन्त ऋतु आती है, तब कौआ कौआ ही रहता है और कोयल कोयल ही (अपने मधुर स्वर से) पहचानी जाती है। तात्पर्य यह है कि गुण ही व्यक्ति की वास्तविक पहचान कराते हैं, बाह्य रूप नहीं।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥
— (मयूरस्य उक्तिः)
भावार्थ: यदि राजा भली प्रकार नेतृत्व करने वाला (सुयोग्य नेता) न हो, तो प्रजा उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जैसे समुद्र में बिना कर्णधार (खेवनहार) की नाव डूब जाती है। तात्पर्य यह है कि सुयोग्य नेता के बिना प्रजा का विनाश निश्चित है।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥
— (प्रकृतिमातुः उक्तिः)
भावार्थ: प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही राजा का हित है। राजा को अपनी प्रिय वस्तु हितकर नहीं माननी चाहिए, अपितु जो प्रजा को प्रिय एवं हितकर है, वही राजा का वास्तविक हित है।
अन्योन्यसहयोगेन लाभस्तेषां प्रजायते ॥
— (सर्वेषां समवेतगानम् – पाठ-सन्देशः)
भावार्थ: परस्पर विवाद (झगड़े) से प्राणियों की हानि होती है, किन्तु एक-दूसरे के सहयोग से उन्हें लाभ की प्राप्ति होती है। यही इस पूरे नाट्यांश का केन्द्रीय सन्देश है – सहयोग एवं सौहार्द ही सबके कल्याण का मार्ग है।
शब्दार्थ (शब्दार्थाः)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धुनाति / धूनोति | पकड़कर घुमा देता है, हिलाता है | Twists / shakes |
| कर्णमावृक्ष्य | कान खींचकर | Pulling the ears |
| तुदन्ति | तंग करते हैं, सताते हैं | Teasing / tormenting |
| कलरवम् | पक्षियों की चहचहाहट को | Birds’ chirping |
| सन्नपि | (सन् + अपि) होते हुए भी | Even being so |
| वित्रस्तान् | विशेष रूप से डरे हुओं को | Very frightened ones |
| कृतान्तः | मृत्यु का देवता, यमराज | God of death (Yama) |
| अनृतम् | असत्य, झूठ | Lie / untruth |
| अतिविकत्थनम् | आत्मश्लाघा, डींग मारना | Bragging |
| शृण्वन्नेवाहम् | (शृण्वन् + एव + अहम्) सुनते हुए ही मैं | Listening, I myself |
| पोथयित्वा मारयिष्यामि | पीड़ा देकर मार डालूँगा | Will kill by torturing |
| विधूय | आकर्षित कर, खींचकर | By dragging |
| अट्टहासपूर्वकम् | ठहाका मारते हुए | With a loud guffaw |
| विप्लवेत | (यहाँ) डूब सकती है, नष्ट हो सकती है | May sink / perish |
| जलधौ | समुद्र में | In the ocean |
| नौरिव | (नौः + इव) नाव के समान | Like a boat |
| शिरसि | सिर पर | On the head |
| संशीतिलेशस्य | तनिक से भी सन्देह का | Of the slightest doubt |
| वीक्ष्य | देखकर | After seeing |
| सम्भाराः | सामग्रियाँ | Materials |
| करालवक्त्रस्य | भयंकर मुख वाले का | Of the one with a terrible face |
| मिथः | परस्पर, आपस में | Among themselves |
| गुह्यमाख्याति | रहस्य कहता है | Tells the secret |
| मोदध्वम् | (तुम सब) प्रसन्न हो जाओ | (You all) be happy |
| अगाधजलसञ्चारी | अथाह जल-धारा में विचरण करने वाला | Who moves in deep water |
| रोहितः | ‘रोहित’ (रोहू) नामक बड़ी मछली | Rohu, a big fish |
| अङ्गुष्ठोदकमात्रेण | अँगूठे भर (थोड़े से) जल से ही | In thumb-deep water |
| शफरी | छोटी-सी मछली | A small fish |
अभ्यासः के उत्तर (Exercise Solutions)
1. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) वनराजः कैः दुरवस्थां प्राप्तः ?
(ख) कः वातावरणं कर्कशध्वनिना आकुलीकरोति ?
(ग) काकचेष्टः विद्यार्थी कीदृशः छात्रः मन्यते ?
(घ) कः आत्मानं बलशालिनं, विशालकायं, पराक्रमिणं च कथयति ?
(ङ) बकः कीदृशान् मीनान् क्रूरतया भक्षयति ?
2. अधोलिखितप्रश्नानामुत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(क) निःसंशयं कः कृतान्तः मन्यते ?
(ख) बकः वन्यजन्तूनां रक्षोपायान् कथं चिन्तयितुं कथयति ?
(ग) अन्ते प्रकृतिमाता प्रविश्य सर्वप्रथमं किं वदति ?
(घ) यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा कथं विप्लवेत ?
(ङ) मयूरः कथं नृत्यमुद्रायां स्थितः भवति ?
(च) अन्ते सर्वे मिलित्वा कस्य राज्याभिषेकाय तत्पराः भवन्ति ?
(छ) अस्मिन् नाटके कति पात्राणि सन्ति ?
3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(क) सिंहः वानराभ्यां स्वरक्षायाम् असमर्थः एवासीत् ।
(ख) गजः वन्यपशून् तुदन्तं शुण्डेन पोथयित्वा मारयति ।
(ग) वानरः आत्मानम् वनराजपदाय योग्यं मन्यते ।
(घ) मयूरस्य नृत्यं प्रकृतेः आराधना ।
(ङ) सर्वे प्रकृतिमातरम् प्रणमन्ति ।
4. शुद्धकथनानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धकथनानां च समक्षं ‘न’ इति लिखत —
5. अधोलिखितेषु समुचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —
मञ्जूषा: स्थितप्रज्ञः, यथासमयम्, मेध्यामेध्यभक्षकः, अहिभुक्, आत्मश्लाघाहीनः, पिकः
6. वाच्यपरिवर्तनं कृत्वा लिखत —
उदाहरणम्– क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति गर्जति च । → क्रुद्धेन सिंहेन इतस्ततः धाव्यते गर्ज्यते च ।
7. समासविग्रहं समस्तपदं वा लिखत —
| समस्तपदम् / विग्रहः | उत्तरम् |
|---|---|
| (क) तुच्छजीवैः (विग्रहः) | तुच्छाः च ते जीवाः, तैः – तुच्छजीवैः (कर्मधारयः) । |
| (ख) वृक्षोपरि (विग्रहः) | वृक्षस्य उपरि (अव्ययीभावः) । |
| (ग) पक्षिणां सम्राट् (समस्तपदम्) | पक्षिसम्राट् (षष्ठीतत्पुरुषः) । |
| (घ) स्थिता प्रज्ञा यस्य सः (समस्तपदम्) | स्थितप्रज्ञः (बहुव्रीहिः) । |
| (ङ) अपूर्वम् (विग्रहः) | न पूर्वम् (नञ्तत्पुरुषः) । |
| (च) व्याघ्रचित्रकौ (विग्रहः) | व्याघ्रः च चित्रकः च (द्वन्द्वः) । |
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. इस नाट्यांश का मूल सन्देश क्या है?
2. वानर ने सिंह को वनराज-पद के अयोग्य क्यों बताया?
3. प्रकृतिमाता ने सब प्राणियों को क्या उपदेश दिया?
4. काक स्वयं को राजपद के योग्य क्यों मानता है?
5. मयूर ने बक की किस प्रकार आलोचना की?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘सौहार्दं प्रकृतेः शोभा’ पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
7. इस पाठ में पशु-पक्षियों के माध्यम से लेखक ने मानव-समाज की किस प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है? स्पष्ट कीजिए।
8. प्रकृतिमाता द्वारा कहे गए श्लोक ‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः…’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस नाट्यांश का शीर्षक क्या है?
(क) बुद्धिर्बलवती सदा
(ख) सौहार्दं प्रकृतेः शोभा
(ग) शुचिपर्यावरणम्
(घ) शिशुलालनम्
2. वन में सिंह को बार-बार कौन सता रहा था?
(क) गजाः
(ख) काकाः
(ग) वानराः
(घ) बकाः
3. ‘कृतान्तः’ पद का अर्थ है—
(क) राजा
(ख) यमराज (मृत्यु का देवता)
(ग) रक्षक
(घ) मित्र
4. कौन स्वयं को बलशाली, विशालकाय एवं पराक्रमी कहता है?
(क) सिंहः
(ख) गजः
(ग) मयूरः
(घ) बकः
5. कौआ अपनी कर्कश ध्वनि ‘का-का’ से क्या करता है?
(क) वातावरणम् आकुलीकरोति
(ख) मीनान् भक्षयति
(ग) नृत्यं करोति
(घ) ध्यानमग्नः तिष्ठति
6. नाटक के अन्त में पक्षी किसका राज्याभिषेक करना चाहते हैं?
(क) काकस्य
(ख) मयूरस्य
(ग) उलूकस्य
(घ) पिकस्य
7. ‘अगाधजलसञ्चारी न गर्वं याति…’ श्लोक में किस मछली को गर्वरहित बताया गया है?
(क) शफरी
(ख) रोहितः
(ग) मीनः
(घ) मत्स्यः
8. प्रकृतिमाता सब प्राणियों को क्या सम्बोधन करती हैं?
(क) शत्रवः
(ख) मे सन्ततयः (मेरी सन्तान)
(ग) मूर्खाः
(घ) अतिथयः
9. इस नाटक में कुल कितने पात्र हैं?
(क) आठ
(ख) नौ
(ग) दस
(घ) बारह
10. नाटक का केन्द्रीय सन्देश किस श्लोक में निहित है?
(क) काकः कृष्णः पिकः कृष्णः…
(ख) प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः…
(ग) यो न रक्षति वित्रस्तान्…
(घ) यदि न स्यान्नरपतिः…
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): वानर ने सिंह को वनराज-पद के अयोग्य बताया।
कारण (R): सिंह रक्षक न होकर भक्षक है तथा अपनी रक्षा में भी असमर्थ है।
2. अभिकथन (A): अन्त में पक्षी उल्लू को राजा बनाने का निश्चय करते हैं।
कारण (R): उल्लू दिनभर जागकर सबकी रक्षा करने में पूर्णतया समर्थ है।
3. अभिकथन (A): प्रकृतिमाता सब प्राणियों को परस्पर झगड़ा न करने का उपदेश देती हैं।
कारण (R): सभी प्राणी उसकी सन्तान हैं तथा एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
4. अभिकथन (A): काक एवं कोकिल दोनों का वर्ण काला है।
कारण (R): वसन्त ऋतु आने पर भी दोनों में कोई अन्तर नहीं रहता।
5. अभिकथन (A): परस्पर सहयोग से प्राणियों को लाभ होता है।
कारण (R): परस्पर विवाद से प्राणियों की हानि होती है।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)
- नाटक के दस पात्रों एवं उनकी विशेषताओं को क्रम से याद रखें – एकपदेन/पूर्णवाक्येन उत्तर इन्हीं से आते हैं।
- पाठ के पाँचों नीति-श्लोक (कृतान्तः वाला, काकः कृष्णः…, यदि न स्यान्नरपतिः…, प्रजासुखे सुखं राज्ञः…, प्राणिनां जायते हानिः…) भावार्थ सहित कण्ठस्थ करें।
- वाच्यपरिवर्तन (कर्तृ ↔ कर्म) में विभक्ति का विशेष ध्यान रखें – कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा।
- शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – कृतान्तः, वराकान्, संशीतिलेशस्य, अगाधजलसञ्चारी आदि।
- समास-विग्रह में समास का नाम (तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वन्द्व, अव्ययीभाव) अवश्य लिखें – अतिरिक्त अंक मिलते हैं।
सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
- ‘का-का’ ध्वनि को काक के स्थान पर बक से जोड़ देना (यह काक की ध्वनि है)।
- पात्रों की संख्या में प्रकृतिमाता को भूल जाना – कुल दस पात्र हैं।
- कर्मवाच्य बनाते समय क्रिया को आत्मनेपद में न बदलना (पृच्छति → पृच्छ्यते)।
- संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘कृतान्तः’, ‘सञ्चारी’, ‘शृण्वन्’ शुद्ध लिखें।
- रोहित (बड़ी मछली, गर्वरहित) एवं शफरी (छोटी मछली, फुदकने वाली) के अर्थ आपस में बदल देना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शेमुषी कक्षा 10 का पाठ 6 ‘सौहार्दं प्रकृतेः शोभा’ किस विधा का है और इसका मुख्य भाव क्या है?
यह एक नाट्यांश (नाटक का अंश) है। इसका मुख्य भाव यह है कि परस्पर विवाद से प्राणियों की हानि होती है, जबकि सहयोग एवं सौहार्द से लाभ होता है। सभी प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं, अतः मिलकर रहना ही प्रकृति की वास्तविक शोभा है।
इस नाटक में कुल कितने पात्र हैं और वे कौन-कौन हैं?
इस नाटक में दस पात्र हैं – सिंह, वानर, काक, पिक (कोकिल), गज (हाथी), बक, मयूर, व्याघ्र, चित्रक तथा प्रकृतिमाता। ये सभी वनराज-पद के लिए विवाद करते हैं और अन्त में प्रकृतिमाता उन्हें सौहार्द का उपदेश देती हैं।
प्रकृतिमाता ने झगड़ते हुए प्राणियों को क्या समझाया?
प्रकृतिमाता ने समझाया कि सभी प्राणी उसकी सन्तान हैं और परस्पर आश्रित हैं। यथासमय सबका अपना-अपना महत्त्व है। अतः अहंकार एवं विवाद छोड़कर सबको मिलकर प्रसन्नता से रहना तथा प्रकृति-सौन्दर्य एवं वन की रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
नाट्यांश, शब्दार्थ एवं अभ्यासः-प्रश्न NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
