NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 8: सूक्तयः
This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी—द्वितीयो भागः) पाठः 8 ‘सूक्तयः’ – a selection of eight नीति-श्लोक (subhāṣitas) drawn from the celebrated Tamil classic तिरुक्कुरल् (तिरुक्कुरल) composed by the sage तिरुवल्लुवर – with the मूल श्लोक, अन्वय, हिन्दी भावार्थ, original सार, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः) along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / ग्रन्थ-परिचय
- मूल पाठ (श्लोकाः) — अन्वय व भावार्थ
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)
- अभ्यासः के उत्तर (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शेमुषी (द्वितीय भाग), कक्षा 10 का अष्टम पाठ ‘सूक्तयः’ मूलतः तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से संकलित आठ नीति-श्लोकों का संग्रह है। ‘सूक्ति’ का अर्थ है – सुन्दर एवं हितकारी वचन। इस ग्रन्थ के प्रणेता तिरुवल्लुवर हैं तथा उनका काल प्रथम शताब्दी माना जाता है। ‘तिरुक्कुरल्’ को तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है। यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है। प्रस्तुत पाठ के श्लोकों में विद्या-दान, मन एवं वाणी की सरलता (समता), मधुर वचन, विद्वानों की महत्ता, विवेक, धैर्यवान मन्त्री, परोपकार तथा सदाचार जैसे जीवनोपयोगी मूल्यों का सरल एवं सरस संस्कृत में प्रतिपादन किया गया है। ये श्लोक मानव-जीवन के लिए प्रेरणाप्रद एवं आचरणीय हैं।
पाठ-परिचय / ग्रन्थ-परिचय
प्रस्तुत पाठ के श्लोक मूलतः तमिल भाषा में रचित ‘तिरुक्कुरल्’ नामक ग्रन्थ से लिए गए हैं, जो तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृति है तथा तमिल भाषा का ‘वेद’ माना जाता है। इसके प्रणेता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं, जिनका काल ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी स्वीकार किया गया है। ‘तिरु’ शब्द श्रीवाचक (श्री = शोभा/लक्ष्मी का सूचक) है; अतः ‘तिरुक्कुरल्’ का अभिप्राय है – श्री से युक्त वाणी अथवा श्री से युक्त कुरल् (छन्द)। यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है, जिसमें कुल 1330 पद्य हैं। इसमें समस्त मानव-जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन किया गया है। प्रस्तुत श्लोक सरल, सरस एवं प्रेरणाप्रद भाषा में रचे गए हैं।
मूल पाठ (श्लोकाः) — अन्वय व भावार्थ
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता ॥ १ ॥
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः ॥ २ ॥
परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः ॥ ३ ॥
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुर्नाम नो मते ॥ ४ ॥
कर्तुं शक्यो भवेद्येन स विवेक इतीरितः ॥ ५ ॥
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते ॥ ६ ॥
न कुर्यादहितं कर्म स परेभ्यः कदापि च ॥ ७ ॥
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः ॥ ८ ॥ — तिरुक्कुरल् (तिरुवल्लुवरः)
सार (Hindi Summary)
‘सूक्तयः’ पाठ तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से संकलित आठ नीति-श्लोकों का सुन्दर संग्रह है। इस ग्रन्थ के रचयिता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं, जिनका काल प्रथम शताब्दी माना जाता है। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है तथा यह धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है। प्रस्तुत श्लोकों में मानव-जीवन को सँवारने वाले श्रेष्ठ मूल्यों का प्रतिपादन हुआ है।
प्रथम श्लोक में बताया गया है कि पिता बचपन में ही पुत्र को विद्या रूपी महान् धन देता है, यही उसके प्रति सच्ची कृतज्ञता है। द्वितीय श्लोक में मन एवं वाणी की समान सरलता को ही वास्तविक समता कहा गया है। तृतीय श्लोक में कठोर वचन बोलने वाले को उस मूर्ख के समान बताया गया है जो पके फल को छोड़कर कच्चा फल खाता है। चतुर्थ श्लोक के अनुसार विद्वान् ही सच्चे नेत्रवाले हैं; शेष लोगों के नेत्र केवल मुख की शोभा मात्र हैं।
पञ्चम श्लोक में कही गई बात के वास्तविक तत्त्व का निर्णय करने वाली बुद्धि को ‘विवेक’ कहा गया है। षष्ठ श्लोक में वाक्पटु, धैर्यवान् एवं सभा में निर्भीक मन्त्री को अपराजेय (कभी अपमानित न होने वाला) बताया गया है। सप्तम श्लोक में अपना कल्याण एवं सुख चाहने वाले को कभी किसी का अहित न करने का उपदेश दिया गया है। अष्टम श्लोक में सदाचार को प्रथम धर्म बताते हुए उसकी रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करने की प्रेरणा दी गई है। इस प्रकार ये सूक्तियाँ विद्या, सरलता, मधुर वाणी, ज्ञान, विवेक, धैर्य, परोपकार एवं सदाचार जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों की शिक्षा देती हैं।
शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यच्छति | देता है | Gives |
| विद्याधनम् | विद्या रूपी धन | Wealth of knowledge |
| तेपे | तपस्या की | Performed penance |
| कृतज्ञता | उपकार को मानना, आभार | Gratitude |
| अवक्रता | सरलता, ऋजुता (कुटिलता का अभाव) | Simplicity / straightness |
| वाचि | वाणी में | In the speech |
| तथ्यतः | वास्तव में, यथार्थ रूप से | Actually / truly |
| समत्वम् | समता, समानता | Equanimity / sameness |
| परुषाम् | कठोर (वाणी) | Harsh |
| अभ्युदीरयेत् | बोले / उच्चारण करे | May utter / speak |
| विमूढधीः | मूर्ख, बुद्धिहीन | A fool |
| अपक्वम् | कच्चा (फल) | Unripe |
| चक्षुष्मन्तः | नेत्रों वाले, दृष्टिसम्पन्न | Having eyes / sighted |
| वदने | मुख पर | On the face |
| तत्त्वार्थनिर्णयः | वास्तविक अर्थ का निर्णय | Determination of true meaning |
| ईरितः | कहा गया | Said / declared |
| वाक्पटुः | वाणी में चतुर, सम्भाषण में निपुण | Eloquent |
| अकातरः | निर्भीक, वीर, साहसी | Fearless |
| परिभूयते | अपमानित किया जाता है | Gets insulted |
| श्रेयः | कल्याण, हित | Welfare / good |
| प्रभूतानि | अत्यधिक, बहुत-से | Abundant / many |
| विदुषाम् | विद्वानों का | Of scholars |
| सदाचारम् | सद्आचरण, उत्तम व्यवहार | Good conduct |
अभ्यासः के उत्तर (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)
1. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति ?
(ख) विमूढधीः कीदृशीं वाचं परित्यजति ?
(ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः ?
(घ) प्राणेभ्योऽपि कः रक्षणीयः ?
(ङ) आत्मनः श्रेयः इच्छन् नरः कीदृशं कर्म न कुर्यात् ?
(च) वाचि का भवेत् ?
2. उदाहरणानुसारं स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
यथा – विमूढधीः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते। → कः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते ?
3. पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचितपदक्रमेण पूरयत —
4. अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत —
क. श्लोकसंख्या – 3 (यथा– सत्या मधुरा च वाणी का ? → धर्मप्रदा)
ख. श्लोकसंख्या – 7 (यथा– बुद्धिमान् नरः किम् इच्छति ? → आत्मनः श्रेयः)
5. मञ्जूषायाः तद्भावात्मकसूक्तीः विचित्य अधोलिखितकथनानां समक्षं लिखत —
मञ्जूषा: विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् · आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः · मनसि एवं वचसि एवं कर्मणि एवं महात्मनाम् · विद्याधनं धनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्
6. (अ) अधोलिखितानां शब्दानां पुरतः उचितं विलोमशब्दं कोष्ठकात् चित्वा लिखत —
| शब्दः | विलोमशब्दः (उत्तरम्) |
|---|---|
| (क) पक्वः (परिपक्वः, अपक्वः, क्वथितः) | अपक्वः |
| (ख) विमूढधीः (सुधीः, निधिः, मन्दधीः) | सुधीः |
| (ग) कातरः (अकरुणः, अधीरः, अकातरः) | अकातरः |
| (घ) कृतज्ञता (कृपणता, कृतघ्नता, कातरता) | कृतघ्नता |
| (ङ) आलस्यम् (उद्विग्नता, विलासिता, उद्योगः) | उद्योगः |
| (च) परुषा (पौरुषी, कोमला, कठोरा) | कोमला |
(आ) अधोलिखितानां शब्दानां त्रयः समानार्थकाः शब्दाः मञ्जूषायाः चित्वा लिख्यन्ताम् —
मञ्जूषा: लोचनम्, नेत्रम्, भूरि, शुभम्, परिषद्, मानसम्, मनः, सभा, नयनम्, आननम्, चेतः, विपुलम्, सद्, बहु, वक्त्रम्, वदनम्, शिवम्, कल्याणम्
| शब्दः | समानार्थकाः (उत्तरम्) |
|---|---|
| (क) प्रभूतम् | भूरि, विपुलम्, बहु |
| (ख) श्रेयः | शुभम्, शिवम्, कल्याणम् |
| (ग) चित्तम् | मानसम्, मनः, चेतः |
| (घ) सभा | परिषद्, सद् (संसद्), परिषत् |
| (ङ) चक्षुष् | लोचनम्, नेत्रम्, नयनम् |
| (च) मुखम् | आननम्, वक्त्रम्, वदनम् |
7. अधस्तात् समासविग्रहाः दीयन्ते तेषां समस्तपदानि पाठाधारेण दीयन्ताम् —
| विग्रहः | समस्तपदम् (उत्तरम्) | समासनाम |
|---|---|---|
| (क) तत्त्वार्थस्य निर्णयः | तत्त्वार्थनिर्णयः | षष्ठी तत्पुरुषः |
| (ख) वाचि पटुः | वाक्पटुः | सप्तमी तत्पुरुषः |
| (ग) धर्मं प्रददाति इति (ताम्) | धर्मप्रदाम् | उपपदतत्पुरुषः |
| (घ) न कातरः | अकातरः | नञ् तत्पुरुषः |
| (ङ) न हितम् | अहितम् | नञ् तत्पुरुषः |
| (च) महान् आत्मा येषाम् | महात्मानः | बहुव्रीहिः |
| (छ) विमूढा धीः यस्य सः | विमूढधीः | बहुव्रीहिः |
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. प्रस्तुत श्लोक किस ग्रन्थ से लिए गए हैं तथा उसके रचयिता कौन हैं?
2. कवि के अनुसार कठोर वचन बोलने वाला किसके समान है?
3. इस पाठ में किन्हें सच्चे नेत्रवाले कहा गया है और क्यों?
4. ‘विवेक’ किसे कहा गया है?
5. कैसा मन्त्री दूसरों के द्वारा अपमानित नहीं होता?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘सूक्तयः’ पाठ के श्लोकों में दिए गए मुख्य जीवन-मूल्यों का वर्णन कीजिए।
7. ‘तिरुक्कुरल्’ ग्रन्थ का परिचय अपने शब्दों में दीजिए।
8. ‘आचारः प्रथमो धर्मः’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. प्रस्तुत पाठ के श्लोक किस ग्रन्थ से लिए गए हैं?
(क) तिरुक्कुरल्
(ख) रघुवंशम्
(ग) पञ्चतन्त्रम्
(घ) हितोपदेशः
2. ‘तिरुक्कुरल्’ ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं?
(क) तिरुवल्लुवरः
(ख) कालिदासः
(ग) भर्तृहरिः
(घ) विष्णुशर्मा
3. पिता बाल्ये पुत्राय किं यच्छति?
(क) सुवर्णम्
(ख) विद्याधनम्
(ग) भूमिम्
(घ) रत्नम्
4. ‘तिरुक्कुरल्’ में कुल कितने पद्य हैं?
(क) 1000
(ख) 1330
(ग) 1500
(घ) 700
5. इस लोक में सच्चे ‘चक्षुष्मन्तः’ (नेत्रवाले) कौन कहे गए हैं?
(क) धनिकाः
(ख) विद्वांसः
(ग) राजानः
(घ) वीराः
6. ‘अकातरः’ शब्द का अर्थ है—
(क) भयभीत
(ख) निर्भीक
(ग) आलसी
(घ) मूर्ख
7. कही गई बात के वास्तविक अर्थ का निर्णय करने वाली बुद्धि क्या कहलाती है?
(क) श्रद्धा
(ख) विवेकः
(ग) भक्तिः
(घ) शक्तिः
8. कवि के अनुसार किसकी रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करनी चाहिए?
(क) धनस्य
(ख) सदाचारस्य
(ग) यशसः
(घ) बलस्य
9. विमूढधीः पक्व फल को छोड़कर कैसा फल खाता है?
(क) मधुरम्
(ख) अपक्वम्
(ग) सुस्वादु
(घ) रसपूर्णम्
10. अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को किसके लिए अहितकारी कार्य नहीं करना चाहिए?
(क) स्वयं कृते
(ख) परेभ्यः
(ग) बन्धुभ्यः
(घ) मित्रेभ्यः
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): प्रस्तुत पाठ ‘सूक्तयः’ के श्लोक तमिल ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं।
कारण (R): ‘तिरुक्कुरल्’ को तमिल भाषा का ‘वेद’ माना जाता है, जिसके रचयिता तिरुवल्लुवर हैं।
2. अभिकथन (A): इस संसार में विद्वान् ही सच्चे नेत्रवाले कहे गए हैं।
कारण (R): विद्वान् ज्ञान रूपी नेत्रों से युक्त होकर सत्य-असत्य का विवेक करने में समर्थ होते हैं।
3. अभिकथन (A): मनुष्य को सदाचार की रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करनी चाहिए।
कारण (R): सदाचार ही प्रथम (श्रेष्ठ) धर्म है, ऐसा विद्वानों का कथन है।
4. अभिकथन (A): कठोर वचन बोलने वाला व्यक्ति बुद्धिमान् माना जाता है।
कारण (R): धर्मप्रद मधुर वाणी छोड़कर कठोर बोलने वाला पके फल को छोड़कर कच्चा फल खाने वाले मूर्ख के समान है।
5. अभिकथन (A): वाक्पटु, धैर्यवान् एवं निर्भीक मन्त्री दूसरों के द्वारा अपमानित नहीं होता।
कारण (R): धैर्य एवं वाक्-चातुर्य से युक्त व्यक्ति सभा में किसी भी परिस्थिति का सामना सहजता से कर लेता है।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)
- आठों श्लोक उनके अन्वय एवं भावार्थ सहित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति एवं भावार्थ के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- ग्रन्थ-परिचय याद रखें – ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’, रचयिता तिरुवल्लुवर, काल प्रथम शताब्दी, कुल 1330 पद्य, तीन भाग (धर्म-अर्थ-काम)।
- शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – अकातरः, परिभूयते, ईरितः, अवक्रता आदि।
- समास-विग्रह में विभक्ति का सही प्रयोग करें (जैसे ‘तत्त्वार्थस्य निर्णयः’ = षष्ठी तत्पुरुष)।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही पद लिखें तथा ‘पूर्णवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।
सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
- ग्रन्थ का नाम भूल जाना – श्लोक ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं, रचयिता तिरुवल्लुवर हैं।
- संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘विमूढधीः’, ‘चक्षुष्मन्तः’, ‘कृतज्ञता’ शुद्ध लिखें।
- ‘ऐहिक/आमुष्मिक’ की भाँति विरोधी अर्थों को बदल देना – पक्व/अपक्व, कातर/अकातर ध्यान से लिखें।
- समास-विग्रह में गलत विभक्ति लगाना (जैसे ‘वाक्पटुः’ = वाचि पटुः, सप्तमी तत्पुरुष)।
- अन्वय में पदक्रम बिगाड़ देना – कर्ता-कर्म-क्रिया का उचित क्रम बनाए रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शेमुषी कक्षा 10 का आठवाँ पाठ ‘सूक्तयः’ किस विधा का है और इसके श्लोक कहाँ से लिए गए हैं?
यह एक पद्य (नीति-श्लोक संग्रह) पाठ है। इसके आठ श्लोक मूलतः तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं, जिसके रचयिता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है।
‘सूक्तयः’ पाठ में किन जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी गई है?
इस पाठ में विद्या-दान, मन एवं वाणी की सरलता (समता), मधुर वचन, विद्या की महत्ता, विवेक, धैर्य एवं वाक्-चातुर्य, परोपकार (अहिंसा) तथा सदाचार जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी गई है।
‘तिरुक्कुरल्’ ग्रन्थ की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
‘तिरुक्कुरल्’ तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृति है, जिसमें कुल 1330 पद्य हैं। यह धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है। इसका रचनाकाल प्रथम शताब्दी माना जाता है तथा इसमें समस्त मानव-जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन किया गया है।
श्लोक, अन्वय-शीर्षक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शेमुषी पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
