NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 8: सूक्तयः

This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी—द्वितीयो भागः) पाठः 8 ‘सूक्तयः’ – a selection of eight नीति-श्लोक (subhāṣitas) drawn from the celebrated Tamil classic तिरुक्कुरल् (तिरुक्कुरल) composed by the sage तिरुवल्लुवर – with the मूल श्लोक, अन्वय, हिन्दी भावार्थ, original सार, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः) along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).

कक्षा / Class: 10 विषय / Subject: Sanskrit (संस्कृत) पुस्तक / Book: Shemushi 2 (शेमुषी—द्वितीयो भागः) पाठः / Chapter: 8 पाठनाम: सूक्तयः सत्र / Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शेमुषी (द्वितीय भाग), कक्षा 10 का अष्टम पाठ ‘सूक्तयः’ मूलतः तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से संकलित आठ नीति-श्लोकों का संग्रह है। ‘सूक्ति’ का अर्थ है – सुन्दर एवं हितकारी वचन। इस ग्रन्थ के प्रणेता तिरुवल्लुवर हैं तथा उनका काल प्रथम शताब्दी माना जाता है। ‘तिरुक्कुरल्’ को तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है। यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है। प्रस्तुत पाठ के श्लोकों में विद्या-दान, मन एवं वाणी की सरलता (समता), मधुर वचन, विद्वानों की महत्ता, विवेक, धैर्यवान मन्त्री, परोपकार तथा सदाचार जैसे जीवनोपयोगी मूल्यों का सरल एवं सरस संस्कृत में प्रतिपादन किया गया है। ये श्लोक मानव-जीवन के लिए प्रेरणाप्रद एवं आचरणीय हैं।

पाठ-परिचय / ग्रन्थ-परिचय

प्रस्तुत पाठ के श्लोक मूलतः तमिल भाषा में रचित ‘तिरुक्कुरल्’ नामक ग्रन्थ से लिए गए हैं, जो तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृति है तथा तमिल भाषा का ‘वेद’ माना जाता है। इसके प्रणेता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं, जिनका काल ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी स्वीकार किया गया है। ‘तिरु’ शब्द श्रीवाचक (श्री = शोभा/लक्ष्मी का सूचक) है; अतः ‘तिरुक्कुरल्’ का अभिप्राय है – श्री से युक्त वाणी अथवा श्री से युक्त कुरल् (छन्द)। यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है, जिसमें कुल 1330 पद्य हैं। इसमें समस्त मानव-जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन किया गया है। प्रस्तुत श्लोक सरल, सरस एवं प्रेरणाप्रद भाषा में रचे गए हैं।

मूल पाठ (श्लोकाः) — अन्वय व भावार्थ

पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्।
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता ॥ १ ॥
अन्वयःपिता बाल्ये पुत्राय महत् विद्याधनं यच्छति। (पुत्रस्य विद्वत्तां दृष्ट्वा जनाः वदन्ति यत्) अस्य पिता किं तपः तेपे — इति उक्तिः तत्कृतज्ञता (भवति)।
भावार्थःपिता बचपन में ही अपने पुत्र को विद्या रूपी महान् धन प्रदान करता है। (जब पुत्र विद्वान् बनकर सभा में सम्मान पाता है, तब लोग कहते हैं कि) ‘इसके पिता ने कौन-सी तपस्या की थी (जिससे ऐसा विद्वान् पुत्र मिला)!’ – यह कथन ही पिता के प्रति पुत्र की (तथा समाज की) कृतज्ञता का परिचायक है।
अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः ॥ २ ॥
अन्वयःयथा चित्ते अवक्रता (भवति) तथा यदि वाचि (अपि) भवेत्, तद् एव महात्मानः तथ्यतः समत्वम् इति आहुः।
भावार्थःजैसे मन में सरलता (कुटिलता का अभाव) हो, वैसे ही यदि वाणी में भी सरलता हो, तो महात्मा-जन उसी को वास्तव में ‘समता’ कहते हैं। अर्थात् मन और वचन की एकरूपता ही सच्ची समता एवं सरलता है।
त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः ॥ ३ ॥
अन्वयःयः धर्मप्रदां वाचं त्यक्त्वा परुषां (वाचम्) अभ्युदीरयेत्, (सः) विमूढधीः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं (फलं) भुङ्क्ते।
भावार्थःजो व्यक्ति धर्म प्रदान करने वाली (हितकारी एवं मधुर) वाणी को छोड़कर कठोर वचन बोलता है, वह मूर्ख उस मनुष्य के समान है जो पके हुए (मीठे) फल को त्यागकर कच्चे (कड़वे) फल को खाता है।
विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः।
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुर्नाम नो मते ॥ ४ ॥
अन्वयःअस्मिन् लोके विद्वांसः एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः। ये तु अन्येषां वदने (चक्षुः सन्ति) ते (नेत्रे) चक्षुः नाम नो मते।
भावार्थःइस संसार में विद्वान् लोग ही (ज्ञान रूपी नेत्रों से युक्त होने के कारण) सच्चे नेत्रवाले कहे जाते हैं। शेष लोगों के मुख पर जो (दो) नेत्र होते हैं, वे (केवल मुख की शोभा हैं;) वस्तुतः नेत्र (दृष्टिसम्पन्नता) नहीं माने जाते।
यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
कर्तुं शक्यो भवेद्येन स विवेक इतीरितः ॥ ५ ॥
अन्वयःयेन केनापि यत् प्रोक्तं, तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः येन कर्तुं शक्यः भवेत्, सः ‘विवेकः’ इति ईरितः (कथितः)।
भावार्थःकिसी के भी द्वारा जो कुछ कहा गया हो, उसके वास्तविक अर्थ (तत्त्व) का निर्णय जिस गुण के द्वारा किया जा सके, वही ‘विवेक’ कहलाता है। अर्थात् सार-असार को पहचानने की बुद्धि ही विवेक है।
वाक्पटुर्धैर्यवान् मन्त्री सभायामप्यकातरः।
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते ॥ ६ ॥
अन्वयःवाक्पटुः धैर्यवान् सभायाम् अपि अकातरः (यः) मन्त्री (भवति), सः केनापि प्रकारेण परैः न परिभूयते।
भावार्थःजो मन्त्री वाणी में चतुर (वाक्पटु), धैर्यवान् तथा सभा में भी निर्भीक (निडर) होता है, वह किसी भी प्रकार से दूसरों के द्वारा अपमानित (तिरस्कृत) नहीं किया जाता।
य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च।
न कुर्यादहितं कर्म स परेभ्यः कदापि च ॥ ७ ॥
अन्वयःयः आत्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, सः परेभ्यः कदापि च अहितं कर्म न कुर्यात्।
भावार्थःजो मनुष्य अपना कल्याण तथा प्रचुर (बहुत-से) सुख चाहता है, उसे कभी भी दूसरों के लिए अहितकारी (अनिष्टकारी) कार्य नहीं करना चाहिए। अर्थात् अपना भला चाहने वाले को परोपकारी एवं अहिंसक होना चाहिए।
आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः।
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः ॥ ८ ॥ — तिरुक्कुरल् (तिरुवल्लुवरः)
अन्वयः‘आचारः प्रथमः धर्मः’ इति एतद् विदुषां वचः (अस्ति)। तस्माद् (मनुष्यः) सदाचारं प्राणेभ्यः अपि विशेषतः रक्षेत्।
भावार्थः‘आचार (सदाचरण) ही प्रथम (श्रेष्ठ) धर्म है’ – यह विद्वानों का कथन है। इसलिए मनुष्य को अपने सदाचार की रक्षा प्राणों से भी बढ़कर, विशेष रूप से करनी चाहिए।

सार (Hindi Summary)

‘सूक्तयः’ पाठ तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से संकलित आठ नीति-श्लोकों का सुन्दर संग्रह है। इस ग्रन्थ के रचयिता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं, जिनका काल प्रथम शताब्दी माना जाता है। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है तथा यह धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है। प्रस्तुत श्लोकों में मानव-जीवन को सँवारने वाले श्रेष्ठ मूल्यों का प्रतिपादन हुआ है।

प्रथम श्लोक में बताया गया है कि पिता बचपन में ही पुत्र को विद्या रूपी महान् धन देता है, यही उसके प्रति सच्ची कृतज्ञता है। द्वितीय श्लोक में मन एवं वाणी की समान सरलता को ही वास्तविक समता कहा गया है। तृतीय श्लोक में कठोर वचन बोलने वाले को उस मूर्ख के समान बताया गया है जो पके फल को छोड़कर कच्चा फल खाता है। चतुर्थ श्लोक के अनुसार विद्वान् ही सच्चे नेत्रवाले हैं; शेष लोगों के नेत्र केवल मुख की शोभा मात्र हैं।

पञ्चम श्लोक में कही गई बात के वास्तविक तत्त्व का निर्णय करने वाली बुद्धि को ‘विवेक’ कहा गया है। षष्ठ श्लोक में वाक्पटु, धैर्यवान् एवं सभा में निर्भीक मन्त्री को अपराजेय (कभी अपमानित न होने वाला) बताया गया है। सप्तम श्लोक में अपना कल्याण एवं सुख चाहने वाले को कभी किसी का अहित न करने का उपदेश दिया गया है। अष्टम श्लोक में सदाचार को प्रथम धर्म बताते हुए उसकी रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करने की प्रेरणा दी गई है। इस प्रकार ये सूक्तियाँ विद्या, सरलता, मधुर वाणी, ज्ञान, विवेक, धैर्य, परोपकार एवं सदाचार जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों की शिक्षा देती हैं।

शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
यच्छतिदेता हैGives
विद्याधनम्विद्या रूपी धनWealth of knowledge
तेपेतपस्या कीPerformed penance
कृतज्ञताउपकार को मानना, आभारGratitude
अवक्रतासरलता, ऋजुता (कुटिलता का अभाव)Simplicity / straightness
वाचिवाणी मेंIn the speech
तथ्यतःवास्तव में, यथार्थ रूप सेActually / truly
समत्वम्समता, समानताEquanimity / sameness
परुषाम्कठोर (वाणी)Harsh
अभ्युदीरयेत्बोले / उच्चारण करेMay utter / speak
विमूढधीःमूर्ख, बुद्धिहीनA fool
अपक्वम्कच्चा (फल)Unripe
चक्षुष्मन्तःनेत्रों वाले, दृष्टिसम्पन्नHaving eyes / sighted
वदनेमुख परOn the face
तत्त्वार्थनिर्णयःवास्तविक अर्थ का निर्णयDetermination of true meaning
ईरितःकहा गयाSaid / declared
वाक्पटुःवाणी में चतुर, सम्भाषण में निपुणEloquent
अकातरःनिर्भीक, वीर, साहसीFearless
परिभूयतेअपमानित किया जाता हैGets insulted
श्रेयःकल्याण, हितWelfare / good
प्रभूतानिअत्यधिक, बहुत-सेAbundant / many
विदुषाम्विद्वानों काOf scholars
सदाचारम्सद्आचरण, उत्तम व्यवहारGood conduct

अभ्यासः के उत्तर (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति ?

उत्तरम्विद्याधनम् (महत् विद्याधनम्)।

(ख) विमूढधीः कीदृशीं वाचं परित्यजति ?

उत्तरम्धर्मप्रदाम् (धर्मप्रदां वाचम्)।

(ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः ?

उत्तरम्विद्वांसः (विद्वांसः एव)।

(घ) प्राणेभ्योऽपि कः रक्षणीयः ?

उत्तरम्सदाचारः

(ङ) आत्मनः श्रेयः इच्छन् नरः कीदृशं कर्म न कुर्यात् ?

उत्तरम्अहितम् (अहितं कर्म, परेभ्यः अहितम्)।

(च) वाचि का भवेत् ?

उत्तरम्अवक्रता (सरलता)।

2. उदाहरणानुसारं स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

यथा – विमूढधीः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते। → कः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते ?

उत्तरम् (क) संसारे विद्वांसः ज्ञानचक्षुर्भिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते। → संसारे विद्वांसः ज्ञानचक्षुर्भिः कीदृशाः कथ्यन्ते ? (ख) जनकेन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते। → केन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते ? (ग) तत्त्वार्थस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः। → तत्त्वार्थस्य निर्णयः केन कर्तुं शक्यः ? (घ) धैर्यवान् लोके परिभवं न प्राप्नोति। → धैर्यवान् कुत्र परिभवं न प्राप्नोति ? (ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्। → आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः केषाम् अनिष्टं न कुर्यात् ?

3. पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचितपदक्रमेण पूरयत —

उत्तरम् (क) पिता पुत्राय बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति, अस्य पिता किं तपः तेपे इत्युक्तिः तत्कृतज्ञता (भवति)। (ख) येन केनापि यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः येन कर्तुं शक्यः भवेत्, सः विवेकः इति ईरितः (ग) य आत्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, परेभ्यः अहितं कर्म कदापि च न कुर्यात्

4. अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत —

क. श्लोकसंख्या – 3 (यथा– सत्या मधुरा च वाणी का ? → धर्मप्रदा)

उत्तराणि (क) धर्मप्रदां वाचं कः त्यजति ? → विमूढधीः (मूर्खः)। (ख) मूढः पुरुषः कां वाणीं वदति ? → परुषाम् (कठोराम्)। (ग) मन्दमतिः कीदृशं फलं खादति ? → अपक्वम् (अपक्वं फलम्)।

ख. श्लोकसंख्या – 7 (यथा– बुद्धिमान् नरः किम् इच्छति ? → आत्मनः श्रेयः)

उत्तराणि (क) कियन्ति सुखानि इच्छति ? → प्रभूतानि (प्रभूतानि सुखानि)। (ख) सः कदापि किं न कुर्यात् ? → अहितं कर्म (ग) सः केभ्यः अहितं न कुर्यात् ? → परेभ्यः

5. मञ्जूषायाः तद्भावात्मकसूक्तीः विचित्य अधोलिखितकथनानां समक्षं लिखत —

मञ्जूषा: विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् · आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः · मनसि एवं वचसि एवं कर्मणि एवं महात्मनाम् · विद्याधनं धनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्

उत्तरम् (क) विद्याधनं महत् → विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्। / विद्याधनं धनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्। (ख) आचारः प्रथमो धर्मः → आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः। (ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम् → मनसि एवं वचसि एवं कर्मणि एवं महात्मनाम्।

6. (अ) अधोलिखितानां शब्दानां पुरतः उचितं विलोमशब्दं कोष्ठकात् चित्वा लिखत —

शब्दःविलोमशब्दः (उत्तरम्)
(क) पक्वः  (परिपक्वः, अपक्वः, क्वथितः)अपक्वः
(ख) विमूढधीः  (सुधीः, निधिः, मन्दधीः)सुधीः
(ग) कातरः  (अकरुणः, अधीरः, अकातरः)अकातरः
(घ) कृतज्ञता  (कृपणता, कृतघ्नता, कातरता)कृतघ्नता
(ङ) आलस्यम्  (उद्विग्नता, विलासिता, उद्योगः)उद्योगः
(च) परुषा  (पौरुषी, कोमला, कठोरा)कोमला

(आ) अधोलिखितानां शब्दानां त्रयः समानार्थकाः शब्दाः मञ्जूषायाः चित्वा लिख्यन्ताम् —

मञ्जूषा: लोचनम्, नेत्रम्, भूरि, शुभम्, परिषद्, मानसम्, मनः, सभा, नयनम्, आननम्, चेतः, विपुलम्, सद्, बहु, वक्त्रम्, वदनम्, शिवम्, कल्याणम्

शब्दःसमानार्थकाः (उत्तरम्)
(क) प्रभूतम्भूरि, विपुलम्, बहु
(ख) श्रेयःशुभम्, शिवम्, कल्याणम्
(ग) चित्तम्मानसम्, मनः, चेतः
(घ) सभापरिषद्, सद् (संसद्), परिषत्
(ङ) चक्षुष्लोचनम्, नेत्रम्, नयनम्
(च) मुखम्आननम्, वक्त्रम्, वदनम्

7. अधस्तात् समासविग्रहाः दीयन्ते तेषां समस्तपदानि पाठाधारेण दीयन्ताम् —

विग्रहःसमस्तपदम् (उत्तरम्)समासनाम
(क) तत्त्वार्थस्य निर्णयःतत्त्वार्थनिर्णयःषष्ठी तत्पुरुषः
(ख) वाचि पटुःवाक्पटुःसप्तमी तत्पुरुषः
(ग) धर्मं प्रददाति इति (ताम्)धर्मप्रदाम्उपपदतत्पुरुषः
(घ) न कातरःअकातरःनञ् तत्पुरुषः
(ङ) न हितम्अहितम्नञ् तत्पुरुषः
(च) महान् आत्मा येषाम्महात्मानःबहुव्रीहिः
(छ) विमूढा धीः यस्य सःविमूढधीःबहुव्रीहिः

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. प्रस्तुत श्लोक किस ग्रन्थ से लिए गए हैं तथा उसके रचयिता कौन हैं?

उत्तरप्रस्तुत श्लोक मूलतः तमिल भाषा के ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं, जिसके रचयिता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है तथा इसका रचनाकाल प्रथम शताब्दी माना गया है।

2. कवि के अनुसार कठोर वचन बोलने वाला किसके समान है?

उत्तरकवि के अनुसार धर्म प्रदान करने वाली मधुर वाणी को छोड़कर कठोर वचन बोलने वाला व्यक्ति उस मूर्ख के समान है, जो पके (मीठे) फल को त्यागकर कच्चे (कड़वे) फल को खाता है।

3. इस पाठ में किन्हें सच्चे नेत्रवाले कहा गया है और क्यों?

उत्तरइस पाठ में विद्वानों को ही सच्चे नेत्रवाले (चक्षुष्मन्तः) कहा गया है, क्योंकि वे ज्ञान रूपी नेत्रों से युक्त होते हैं। अन्य लोगों के मुख पर स्थित नेत्र केवल शोभा मात्र हैं, वास्तविक दृष्टि (विवेक) नहीं।

4. ‘विवेक’ किसे कहा गया है?

उत्तरकिसी के भी द्वारा कही गई बात के वास्तविक अर्थ (तत्त्व) का निर्णय जिस गुण के द्वारा किया जा सके, उसे ‘विवेक’ कहा गया है। अर्थात् सार और असार को पहचानने की बुद्धि ही विवेक है।

5. कैसा मन्त्री दूसरों के द्वारा अपमानित नहीं होता?

उत्तरजो मन्त्री वाणी में चतुर (वाक्पटु), धैर्यवान् तथा सभा में भी निर्भीक (अकातर) होता है, वह किसी भी प्रकार से दूसरों के द्वारा अपमानित अथवा तिरस्कृत नहीं किया जाता।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘सूक्तयः’ पाठ के श्लोकों में दिए गए मुख्य जीवन-मूल्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर‘सूक्तयः’ पाठ के आठ श्लोकों में अनेक श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों का प्रतिपादन हुआ है। प्रथम श्लोक विद्या-दान को पिता की पुत्र के प्रति सबसे बड़ी देन बताता है। द्वितीय श्लोक मन एवं वाणी की समान सरलता को सच्ची समता कहता है। तृतीय श्लोक मधुर वाणी का महत्त्व बताते हुए कठोरभाषी को मूर्ख कहता है।चतुर्थ श्लोक विद्या को सच्ची दृष्टि मानता है, तो पञ्चम श्लोक विवेक (सार-असार के निर्णय की बुद्धि) की महिमा गाता है। षष्ठ श्लोक धैर्य एवं वाक्-चातुर्य को मन्त्री का बल बताता है। सप्तम श्लोक परोपकार एवं अहिंसा का तथा अष्टम श्लोक सदाचार का उपदेश देता है, जिसकी रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करनी चाहिए। इस प्रकार ये सूक्तियाँ सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए मार्गदर्शक हैं।

7. ‘तिरुक्कुरल्’ ग्रन्थ का परिचय अपने शब्दों में दीजिए।

उत्तर‘तिरुक्कुरल्’ तमिल भाषा में रचित तमिल साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति है, जिसे तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है। इसके प्रणेता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं तथा इसका रचनाकाल ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी माना जाता है। ‘तिरु’ शब्द श्रीवाचक है; अतः ‘तिरुक्कुरल्’ का अर्थ है – श्री (शोभा) से युक्त वाणी अथवा श्री से युक्त कुरल् छन्द।यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है तथा इसमें कुल 1330 पद्य हैं। इसमें समस्त मानव-जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन किया गया है। इसकी शिक्षाएँ सार्वभौमिक, सरल एवं प्रेरणाप्रद हैं, जो किसी जाति या देश तक सीमित न होकर सम्पूर्ण मानवता के लिए हितकारी हैं। इसी कारण यह विश्व-प्रसिद्ध नीति-ग्रन्थ माना जाता है।

8. ‘आचारः प्रथमो धर्मः’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर‘आचारः प्रथमो धर्मः’ का अर्थ है – सदाचार (उत्तम आचरण) ही प्रथम एवं श्रेष्ठ धर्म है। यह विद्वानों का कथन है। मनुष्य का बाह्य आचरण ही उसके चरित्र एवं संस्कारों का परिचायक होता है। अच्छे आचरण के बिना अन्य कोई गुण शोभा नहीं पाता।इसी कारण पाठ में उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को अपने सदाचार की रक्षा प्राणों से भी बढ़कर, विशेष रूप से करनी चाहिए। प्राण तो नश्वर हैं, किन्तु सदाचार मनुष्य को अमर यश एवं सम्मान प्रदान करता है। सदाचारी व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठित होता है तथा सभी का आदर पाता है। अतः जीवन में धन, बल अथवा विद्या से भी अधिक महत्त्व सदाचार का है – यही इस सूक्ति का मूल भाव है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. प्रस्तुत पाठ के श्लोक किस ग्रन्थ से लिए गए हैं?

(क) तिरुक्कुरल्

(ख) रघुवंशम्

(ग) पञ्चतन्त्रम्

(घ) हितोपदेशः

उत्तर(क) तिरुक्कुरल्।

2. ‘तिरुक्कुरल्’ ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं?

(क) तिरुवल्लुवरः

(ख) कालिदासः

(ग) भर्तृहरिः

(घ) विष्णुशर्मा

उत्तर(क) तिरुवल्लुवरः।

3. पिता बाल्ये पुत्राय किं यच्छति?

(क) सुवर्णम्

(ख) विद्याधनम्

(ग) भूमिम्

(घ) रत्नम्

उत्तर(ख) विद्याधनम्।

4. ‘तिरुक्कुरल्’ में कुल कितने पद्य हैं?

(क) 1000

(ख) 1330

(ग) 1500

(घ) 700

उत्तर(ख) 1330।

5. इस लोक में सच्चे ‘चक्षुष्मन्तः’ (नेत्रवाले) कौन कहे गए हैं?

(क) धनिकाः

(ख) विद्वांसः

(ग) राजानः

(घ) वीराः

उत्तर(ख) विद्वांसः।

6. ‘अकातरः’ शब्द का अर्थ है—

(क) भयभीत

(ख) निर्भीक

(ग) आलसी

(घ) मूर्ख

उत्तर(ख) निर्भीक (निडर)।

7. कही गई बात के वास्तविक अर्थ का निर्णय करने वाली बुद्धि क्या कहलाती है?

(क) श्रद्धा

(ख) विवेकः

(ग) भक्तिः

(घ) शक्तिः

उत्तर(ख) विवेकः।

8. कवि के अनुसार किसकी रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करनी चाहिए?

(क) धनस्य

(ख) सदाचारस्य

(ग) यशसः

(घ) बलस्य

उत्तर(ख) सदाचारस्य। (सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः रक्षेत्)

9. विमूढधीः पक्व फल को छोड़कर कैसा फल खाता है?

(क) मधुरम्

(ख) अपक्वम्

(ग) सुस्वादु

(घ) रसपूर्णम्

उत्तर(ख) अपक्वम् (कच्चा)।

10. अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को किसके लिए अहितकारी कार्य नहीं करना चाहिए?

(क) स्वयं कृते

(ख) परेभ्यः

(ग) बन्धुभ्यः

(घ) मित्रेभ्यः

उत्तर(ख) परेभ्यः (दूसरों के लिए)।
उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(क), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): प्रस्तुत पाठ ‘सूक्तयः’ के श्लोक तमिल ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं।

कारण (R): ‘तिरुक्कुरल्’ को तमिल भाषा का ‘वेद’ माना जाता है, जिसके रचयिता तिरुवल्लुवर हैं।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, किन्तु R, A की सीधी व्याख्या नहीं है (यह केवल ग्रन्थ का परिचय देता है)।

2. अभिकथन (A): इस संसार में विद्वान् ही सच्चे नेत्रवाले कहे गए हैं।

कारण (R): विद्वान् ज्ञान रूपी नेत्रों से युक्त होकर सत्य-असत्य का विवेक करने में समर्थ होते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): मनुष्य को सदाचार की रक्षा प्राणों से भी बढ़कर करनी चाहिए।

कारण (R): सदाचार ही प्रथम (श्रेष्ठ) धर्म है, ऐसा विद्वानों का कथन है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): कठोर वचन बोलने वाला व्यक्ति बुद्धिमान् माना जाता है।

कारण (R): धर्मप्रद मधुर वाणी छोड़कर कठोर बोलने वाला पके फल को छोड़कर कच्चा फल खाने वाले मूर्ख के समान है।

उत्तर(घ) A गलत है, किन्तु R सही है – कठोरभाषी को मूर्ख (विमूढधीः) कहा गया है, बुद्धिमान् नहीं।

5. अभिकथन (A): वाक्पटु, धैर्यवान् एवं निर्भीक मन्त्री दूसरों के द्वारा अपमानित नहीं होता।

कारण (R): धैर्य एवं वाक्-चातुर्य से युक्त व्यक्ति सभा में किसी भी परिस्थिति का सामना सहजता से कर लेता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)

  • आठों श्लोक उनके अन्वय एवं भावार्थ सहित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति एवं भावार्थ के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • ग्रन्थ-परिचय याद रखें – ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’, रचयिता तिरुवल्लुवर, काल प्रथम शताब्दी, कुल 1330 पद्य, तीन भाग (धर्म-अर्थ-काम)।
  • शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – अकातरः, परिभूयते, ईरितः, अवक्रता आदि।
  • समास-विग्रह में विभक्ति का सही प्रयोग करें (जैसे ‘तत्त्वार्थस्य निर्णयः’ = षष्ठी तत्पुरुष)।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही पद लिखें तथा ‘पूर्णवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।

सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

  • ग्रन्थ का नाम भूल जाना – श्लोक ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं, रचयिता तिरुवल्लुवर हैं।
  • संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘विमूढधीः’, ‘चक्षुष्मन्तः’, ‘कृतज्ञता’ शुद्ध लिखें।
  • ‘ऐहिक/आमुष्मिक’ की भाँति विरोधी अर्थों को बदल देना – पक्व/अपक्व, कातर/अकातर ध्यान से लिखें।
  • समास-विग्रह में गलत विभक्ति लगाना (जैसे ‘वाक्पटुः’ = वाचि पटुः, सप्तमी तत्पुरुष)।
  • अन्वय में पदक्रम बिगाड़ देना – कर्ता-कर्म-क्रिया का उचित क्रम बनाए रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शेमुषी कक्षा 10 का आठवाँ पाठ ‘सूक्तयः’ किस विधा का है और इसके श्लोक कहाँ से लिए गए हैं?

यह एक पद्य (नीति-श्लोक संग्रह) पाठ है। इसके आठ श्लोक मूलतः तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल्’ से लिए गए हैं, जिसके रचयिता महर्षि तिरुवल्लुवर हैं। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ कहा जाता है।

‘सूक्तयः’ पाठ में किन जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी गई है?

इस पाठ में विद्या-दान, मन एवं वाणी की सरलता (समता), मधुर वचन, विद्या की महत्ता, विवेक, धैर्य एवं वाक्-चातुर्य, परोपकार (अहिंसा) तथा सदाचार जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी गई है।

‘तिरुक्कुरल्’ ग्रन्थ की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

‘तिरुक्कुरल्’ तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृति है, जिसमें कुल 1330 पद्य हैं। यह धर्म, अर्थ एवं काम – इन तीन भागों में विभक्त है। इसका रचनाकाल प्रथम शताब्दी माना जाता है तथा इसमें समस्त मानव-जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन किया गया है।

श्लोक, अन्वय-शीर्षक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शेमुषी पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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