NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Kshitij 2) अध्याय 5: नागार्जुन – यह दंतुरित मुसकान एवं फसल (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड) के अध्याय 5 की दोनों कविताओं ‘यह दंतुरित मुसकान’ तथा ‘फसल’ (कवि – नागार्जुन) का पूरा समाधान देता है – प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, सार, भावार्थ, शब्दार्थ, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ एवं अभिकथन-कारण सहित।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड) अध्याय: 5 कवि: नागार्जुन विधा: कविता सत्र: 2026–27

कवि परिचय – नागार्जुन

नागार्जुन का जन्म सन् 1911 में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। आरंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में पाने के बाद वे अध्ययन हेतु बनारस और कोलकाता गए तथा 1936 में श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। घुमक्कड़ और अक्खड़ स्वभाव के नागार्जुन ने अनेक बार पूरे भारत की यात्रा की। हिंदी और मैथिली दोनों में समान रूप से लिखने वाले इस जनकवि ने बाँग्ला तथा संस्कृत में भी कविताएँ रचीं; मातृभाषा मैथिली में वे ‘यात्री’ नाम से प्रतिष्ठित हैं। लोकजीवन से गहरे जुड़े, व्यंग्य में माहिर नागार्जुन को ‘आधुनिक कबीर’ भी कहा जाता है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली का शिखर सम्मान आदि से सम्मानित किया गया। सन् 1998 में उनका देहांत हुआ। प्रमुख कृतियाँ – युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, हजार-हजार बाँहों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस आदि।

कविता का सार – यह दंतुरित मुसकान

‘यह दंतुरित मुसकान’ में कवि नागार्जुन ने एक छोटे शिशु की नवदंत निकली मनोहारी मुसकान को देखकर अपने मन में उमड़ने वाले कोमल भावों को अनेक बिंबों के माध्यम से प्रकट किया है। कवि कहते हैं कि बच्चे की यह दंतुरित मुसकान इतनी प्राणवान है कि वह मृत व्यक्ति में भी जान डाल सकती है। धूल-धूसरित शरीर वाला यह शिशु ऐसा प्रतीत होता है मानो तालाब छोड़कर कमल के फूल कवि की झोंपड़ी में ही खिल उठे हों। शिशु के स्पर्श से कठोर पत्थर भी पिघलकर जल बन जाता है। बच्चे का स्पर्श पाकर कवि को लगता है मानो उनके भीतर शेफालिका के फूल झर पड़े हों।

कवि इस शिशु से पहली बार मिल रहे हैं, अतः बच्चा पहले उन्हें अपरिचित मानकर एकटक (अनिमेष) देखता रहता है। कवि उससे कहते हैं कि यदि उसकी माँ माध्यम न बनती तो वे इस अनोखी मुसकान को न तो देख पाते और न जान पाते। इसलिए कवि शिशु को और उसकी माँ दोनों को धन्य मानते हैं। चिर-प्रवासी होने के कारण कवि स्वयं को इस घर में ‘इतर’ और ‘अन्य’ अनुभव करते हैं। जब माँ उँगली के स्पर्श से उस अतिथि-समान कवि से बच्चे का परिचय कराती है और दोनों की आँखें मिलती हैं, तब वह दंतुरित मुसकान कवि को अत्यंत छविमान (सुंदर) लगती है। इस प्रकार कविता शिशु-सौंदर्य और वात्सल्य की कोमल अनुभूति को बड़े मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।

कविता का सार – फसल

‘फसल’ कविता में नागार्जुन ने यह बताया है कि फसल कोई एक तत्व की देन नहीं, बल्कि अनेक तत्वों के सहयोग का परिणाम है। कवि प्रश्न उठाते हैं कि आखिर फसल है क्या और उसे पैदा करने में किन-किन तत्वों का योगदान होता है। वे बताते हैं कि फसल एक या दो नहीं, बल्कि ढेर सारी नदियों के पानी का जादू है; एक या दो नहीं, बल्कि लाख-लाख, कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा है; और हजार-हजार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म है।

कवि कहते हैं कि फसल और कुछ नहीं, वह नदियों के पानी का जादू, मानव-श्रम (हाथों के स्पर्श) की महिमा तथा भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण-धर्म है। साथ ही वह सूरज की किरणों का रूपांतर और हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच भी है। इस प्रकार कवि यह रेखांकित करते हैं कि फसल मनुष्य के सामूहिक श्रम तथा प्रकृति (जल, मिट्टी, सूर्य, वायु) के सहयोग से ही उपजती है। उपभोक्ता-संस्कृति के इस दौर में यह कविता हमें कृषि-संस्कृति के निकट ले जाती है और श्रम तथा प्रकृति की महत्ता का बोध कराती है। बोलचाल की सहज भाषा, गति और लय इस कविता को विशेष प्रभावशाली बनाती है।

मूलभाव / भावार्थ

यह दंतुरित मुसकान – शिशु की निश्छल, नवदंत मुसकान इतनी मोहक और प्राणवान है कि वह निर्जीव में भी जान फूँक देती है और कठोरतम हृदय को भी पिघला देती है। कवि वात्सल्य-भाव से अभिभूत होकर शिशु एवं उसकी माँ दोनों को धन्य मानते हैं। संदेश यह है कि इसी कोमल सुंदरता में जीवन का असली रस और संदेश छिपा है।

फसल – फसल किसी एक तत्व की उपज नहीं, बल्कि जल, मिट्टी, सूर्य, वायु जैसी प्रकृति-शक्तियों और करोड़ों किसानों के सामूहिक श्रम का सम्मिलित परिणाम है। कविता श्रम की गरिमा, प्रकृति-मनुष्य के सहयोग तथा कृषि-संस्कृति के महत्व को उजागर करती है।

कठिन शब्द-अर्थ

शब्दअर्थ
दंतुरितबच्चों के नए-नए दाँत निकलने की अवस्था; नवदंत
मुसकानहल्की हँसी, मंद हास्य
मृतकमरा हुआ व्यक्ति, निर्जीव
धूलि-धूसर गातधूल-मिट्टी से सने हुए अंग-प्रत्यंग
जलजातकमल का फूल (जो जल में उत्पन्न होता है)
परस / स्पर्शछूना, संपर्क
पाषाणपत्थर, चट्टान
शेफालिकाहरसिंगार का सफेद-केसरिया सुगंधित फूल
अनिमेषबिना पलक झपकाए लगातार देखना, एकटक
परिचितजाना-पहचाना
माध्यमजरिया, साधन
धन्यसराहनीय, कृतार्थ, भाग्यशाली
चिर प्रवासीलंबे समय से परदेश में रहने वाला
इतरदूसरा, भिन्न
अन्यदूसरा, पराया
अतिथिमेहमान
संपर्कमेल-जोल, संबंध
मधुपर्कदही, घी, शहद, जल और दूध का योग (पंचामृत) जो देवता-अतिथि के सम्मान में दिया जाता है; यहाँ माँ के स्नेहमय प्यार का प्रतीक
कनखीतिरछी निगाह से देखना, आँख का इशारा
छविमानसुंदर, मनोहर
गरिमा / महिमागौरव, बड़प्पन, श्रेष्ठता
गुण-धर्मस्वाभाविक विशेषता एवं गुण
संदलीचंदन के रंग की (हल्की पीली-भूरी)
रूपांतरएक रूप का दूसरे रूप में बदलना
थिरकनहल्की-सी गति, लहराहट, नृत्य जैसी हलचल
संकोचसिमटाव, झिझक

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

यह दंतुरित मुसकान

1. बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तरबच्चे की दंतुरित मुसकान कवि के कठोर एवं उदास मन को कोमल और प्रसन्न बना देती है।कवि को लगता है कि यह मुसकान इतनी प्राणवान है कि वह मृतक में भी जान डाल सकती है और कठोर पत्थर को भी पिघलाकर जल बना सकती है।चिर-प्रवासी होने के कारण नीरस हो चुका कवि का मन इस मुसकान से भर उठता है; उसे झोंपड़ी में कमल खिलते-से और भीतर शेफालिका के फूल झरते-से प्रतीत होते हैं। इस प्रकार यह मुसकान उसके मन में नवजीवन और वात्सल्य का संचार कर देती है।

2. बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है?

उत्तरबच्चे की मुसकान सहज, निश्छल और निष्कपट होती है – उसमें कोई बनावट, स्वार्थ या छल नहीं होता, इसलिए वह सीधे हृदय को छू जाती है और निर्जीव में भी जान डाल देती है।इसके विपरीत बड़े व्यक्ति की मुसकान प्रायः बनावटी, औपचारिक या स्वार्थ से युक्त होती है; उसमें वह सहजता और मनोहारी निर्मलता नहीं होती।यही कारण है कि शिशु की दंतुरित मुसकान अधिक मोहक और प्रभावशाली लगती है।

3. कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को किन-किन बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है?

उत्तरकवि ने अनेक सुंदर बिंबों के माध्यम से शिशु की मुसकान का सौंदर्य व्यक्त किया है –(क) झोंपड़ी में तालाब छोड़कर कमल के फूल (जलजात) खिल उठना।(ख) स्पर्श पाकर कठोर पत्थर का पिघलकर जल बन जाना।(ग) कवि के स्पर्श से शेफालिका के फूल झर पड़ना।(घ) मृतक में भी जान डाल देने वाली मुसकान।इन दृश्य-स्पर्श बिंबों से मुसकान की कोमलता, मोहकता और जीवनदायिनी शक्ति साकार हो उठती है।

4. भाव स्पष्ट कीजिए—(क) छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात।(ख) छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल / बाँस था कि बबूल?

उत्तर(क) कमल का फूल तालाब (जल) में खिलता है, पर कवि को लगता है मानो वह तालाब छोड़कर उनकी निर्धन झोंपड़ी में ही खिल उठा हो। यहाँ शिशु की कमल-सी कोमल, सुंदर मुसकान की तुलना झोंपड़ी में खिले कमल से की गई है – अर्थात् नन्हे शिशु की उपस्थिति से कवि का साधारण घर भी सौंदर्य और आनंद से भर उठा है।(ख) शिशु के स्पर्श से कवि को ऐसा अनुभव हुआ मानो उनके भीतर शेफालिका (हरसिंगार) के फूल झर-झरकर बरस पड़े हों, अर्थात् उनका रूखा-कठोर मन अचानक कोमल और सुगंधित-सा हो उठा। ‘बाँस था कि बबूल’ कहकर कवि अपने पूर्व कठोर, नीरस जीवन की ओर संकेत करते हैं – इतने कठोर हृदय में भी शिशु-स्पर्श ने फूल खिला दिए, यही इस मुसकान का चमत्कार है।

रचना और अभिव्यक्ति

5. मुसकान और क्रोध भिन्न-भिन्न भाव हैं। इनकी उपस्थिति से बने वातावरण की भिन्नता का चित्रण कीजिए।

उत्तरमुसकान का वातावरण – मुसकान से चारों ओर प्रेम, स्नेह, शांति और प्रसन्नता का वातावरण बनता है। मुसकुराते चेहरे को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठता है, तनाव दूर होता है और आपसी संबंध मधुर होते हैं; वातावरण सरस और आत्मीय बन जाता है।क्रोध का वातावरण – क्रोध से वातावरण में तनाव, भय, कटुता और अशांति फैल जाती है। क्रोधी व्यक्ति के निकट सब असहज हो उठते हैं, संबंध बिगड़ते हैं और मन में दूरी आ जाती है।इस प्रकार मुसकान जोड़ने और जीवनदायी बनाने वाला भाव है, जबकि क्रोध तोड़ने और विनाश की ओर ले जाने वाला भाव है।

6. दंतुरित मुसकान से बच्चे की उम्र का अनुमान लगाइए और तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर‘दंतुरित’ का अर्थ है – जिसके अभी नए-नए दाँत निकल रहे हों। शिशुओं के दाँत प्रायः छह से आठ महीने की आयु में निकलने आरंभ होते हैं।इस आधार पर कहा जा सकता है कि बच्चे की उम्र लगभग छह माह से एक वर्ष के बीच होगी।तर्क – इस उम्र में ही बच्चे के पहले दाँत झलकते हैं और वह पहचान न होने पर अपरिचित को अनिमेष (एकटक) देखता है; अतः शिशु लगभग छह माह से एक साल की आयु का जान पड़ता है।

7. बच्चे से कवि की मुलाकात का जो शब्द-चित्र उपस्थित हुआ है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरचिर-प्रवासी कवि लंबे समय बाद घर लौटते हैं और पहली बार अपने नन्हे शिशु से भेंट करते हैं। धूल-मिट्टी में सना शिशु अपनी दंतुरित मुसकान बिखेरता है।शिशु कवि को पहचानता नहीं, इसलिए पहले अपरिचित मानकर उन्हें एकटक देखता रहता है। तब माँ उँगली के स्पर्श से उसका परिचय कराती है।माँ के माध्यम से जब दोनों की आँखें मिलती हैं, तब बच्चा कनखी से कवि की ओर देखकर मुसकरा देता है। यह मुसकान कवि को अत्यंत छविमान (सुंदर) लगती है और उनका हृदय वात्सल्य से भर उठता है। इस प्रकार पिता-पुत्र की पहली मुलाकात का मार्मिक एवं कोमल शब्द-चित्र खिंच जाता है।

फसल

1. कवि के अनुसार फसल क्या है?

उत्तरकवि के अनुसार फसल किसी एक तत्व की देन नहीं, बल्कि अनेक तत्वों के सहयोग का परिणाम है। फसल –ढेर सारी नदियों के पानी का जादू है;लाख-लाख, कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श (मानव-श्रम) की गरिमा एवं महिमा है;हजार-हजार खेतों की भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण-धर्म है;तथा सूरज की किरणों का रूपांतर और हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच है। संक्षेप में, फसल जल, मिट्टी, सूर्य, वायु और मानव-श्रम के सम्मिलित योगदान का सुंदर रूप है।

2. कविता में फसल उपजाने के लिए आवश्यक तत्वों की बात कही गई है। वे आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं?

उत्तरकविता के अनुसार फसल उपजाने के लिए ये आवश्यक तत्व हैं –(क) नदियों का पानी (जल / सिंचाई)।(ख) लाखों-करोड़ों किसानों के हाथों का श्रम (मानव-परिश्रम)।(ग) खेतों की उपजाऊ मिट्टी का गुण-धर्म।(घ) सूरज की किरणें (धूप / ताप)।(ङ) हवा (वायु की थिरकन)।अर्थात् जल, श्रम, मिट्टी, सूर्य और वायु के मिले-जुले योगदान से ही फसल तैयार होती है।

3. फसल को ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ और ‘महिमा’ कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहता है?

उत्तरइन शब्दों के माध्यम से कवि मानव-श्रम की महत्ता एवं गौरव को व्यक्त करना चाहता है।फसल किसी एक-दो व्यक्ति की नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों किसानों के कठोर परिश्रम का परिणाम है; उनके हाथों के स्पर्श एवं मेहनत से ही बीज से फसल बनती है।‘गरिमा’ और ‘महिमा’ कहकर कवि श्रम को आदर एवं सम्मान देता है और यह बताता है कि सामूहिक मानव-श्रम ही सृजन की वास्तविक शक्ति है।

4. भाव स्पष्ट कीजिए—(क) रूपांतर है सूरज की किरणों का / सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

उत्तर(क) कवि कहते हैं कि फसल सूरज की किरणों का ही रूपांतरित (बदला हुआ) रूप है – अर्थात् सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा और ताप पौधों में संचित होकर फसल का रूप ले लेते हैं।‘सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का’ – खेतों में हवा के साथ लहराती, थिरकती (नृत्य करती) फसल मानो हवा की उसी हलचल को अपने भीतर समेटे हुए है।तात्पर्य यह है कि फसल में सूर्य की किरणें और वायु की गति दोनों रूपांतरित होकर समाई हुई हैं; इस प्रकार प्रकृति के विभिन्न तत्व मिलकर फसल को जन्म देते हैं।

रचना और अभिव्यक्ति

5. कवि ने फसल को हजार-हजार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म कहा है—(क) मिट्टी के गुण-धर्म को आप किस तरह परिभाषित करेंगे?(ख) वर्तमान जीवन शैली मिट्टी के गुण-धर्म को किस-किस तरह प्रभावित करती है?(ग) मिट्टी द्वारा अपना गुण-धर्म छोड़ने की स्थिति में क्या किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना की जा सकती है?(घ) मिट्टी के गुण-धर्म को पोषित करने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है?

उत्तर(क) मिट्टी का गुण-धर्म उसकी वह स्वाभाविक उर्वरता-शक्ति है जिसके कारण वह बीज को अंकुरित कर पौधों को जल, खनिज तत्व एवं पोषण देती है और फसल उगाने योग्य बनती है। नमी धारण करना, पोषक तत्व प्रदान करना और जीवन को आधार देना ही मिट्टी का गुण-धर्म है।(ख) वर्तमान जीवन शैली कई तरह से मिट्टी के गुण-धर्म को हानि पहुँचाती है – रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, औद्योगिक एवं प्लास्टिक कचरा, पॉलिथीन, वनों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण तथा अंधाधुंध शहरीकरण मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर देते हैं।(ग) नहीं। यदि मिट्टी अपना गुण-धर्म (उर्वरता) छोड़ दे, तो उस पर अन्न-वनस्पति नहीं उगेगी; भोजन के अभाव में मनुष्य, पशु-पक्षी सहित किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। उपजाऊ मिट्टी ही समस्त जीवन का आधार है।(घ) मिट्टी के गुण-धर्म को बनाए रखने में हमारी अहम भूमिका है – जैविक/गोबर खाद का प्रयोग, फसल-चक्र अपनाना, रासायनिक खाद कम करना, अधिकाधिक वृक्षारोपण, प्लास्टिक एवं प्रदूषण रोकना तथा जल का संरक्षण करके हम मिट्टी की उर्वरता को पोषित कर सकते हैं।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. नागार्जुन का मूल नाम क्या था और उनका जन्म कहाँ हुआ था?

उत्तरनागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनका जन्म सन् 1911 में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव में हुआ था।

2. कवि को अपने घर में ‘इतर’ और ‘अन्य’ क्यों लगता है?

उत्तरकवि घुमक्कड़ स्वभाव के कारण लंबे समय तक परदेश में रहे हैं; इसी ‘चिर-प्रवास’ के कारण वे अपने ही घर एवं शिशु के लिए अपरिचित-से हो गए हैं। बच्चा उन्हें पहचानता नहीं, इसलिए कवि स्वयं को अपने घर में भी मेहमान-सा, ‘इतर’ और ‘अन्य’ अनुभव करते हैं।

3. ‘फसल’ कविता का केंद्रीय भाव क्या है?

उत्तरफसल कविता का केंद्रीय भाव यह है कि फसल किसी एक तत्व की देन नहीं, बल्कि जल, मिट्टी, सूर्य, वायु जैसी प्रकृति-शक्तियों और लाखों-करोड़ों किसानों के सामूहिक श्रम का सम्मिलित परिणाम है। कविता श्रम एवं प्रकृति की महिमा का बोध कराती है।

4. ‘यह दंतुरित मुसकान’ में माँ की क्या भूमिका है?

उत्तरमाँ ही कवि और शिशु के बीच की कड़ी (माध्यम) है। यदि माँ उँगली के स्पर्श से परिचय न कराती, तो अपरिचित शिशु कवि को मुसकराकर न देखता और कवि उस अनुपम मुसकान को न देख-जान पाते। इसीलिए कवि शिशु के साथ-साथ माँ को भी धन्य मानते हैं।

5. नागार्जुन को ‘आधुनिक कबीर’ और ‘जनकवि’ क्यों कहा जाता है?

उत्तरनागार्जुन की कविता गाँव की चौपालों से लेकर साहित्यिक जगत तक समान रूप से लोकप्रिय रही और वे भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वार्थ तथा सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करते रहे; इसी निर्भीक, लोकधर्मी एवं व्यंग्यपूर्ण स्वभाव के कारण उन्हें ‘आधुनिक कबीर’ कहा जाता है। जनसाधारण के सुख-दुख से गहराई से जुड़े होने के कारण वे सच्चे अर्थों में ‘जनकवि’ कहलाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

6. ‘यह दंतुरित मुसकान’ कविता में निहित वात्सल्य-भाव का वर्णन कीजिए।

उत्तरयह कविता वात्सल्य-रस की सुंदर अभिव्यक्ति है। चिर-प्रवासी कवि पहली बार अपने नन्हे शिशु को देखते हैं और उसकी दंतुरित मुसकान देखकर भाव-विभोर हो उठते हैं।कवि को लगता है कि यह मुसकान निर्जीव में भी जान डाल दे और कठोर पत्थर को भी पिघला दे – इन बिंबों में पिता का असीम स्नेह झलकता है।शिशु की धूल-धूसरित देह उन्हें झोंपड़ी में खिले कमल-सी लगती है और स्पर्श से शेफालिका के फूल झरते-से अनुभव होते हैं।अंत में माँ के माध्यम से जब बच्चा मुसकराकर देखता है, तब कवि उसे और उसकी माँ दोनों को धन्य कह उठते हैं। इस प्रकार पूरी कविता शिशु-सौंदर्य और पितृ-वात्सल्य की कोमल अनुभूति से भरी है।

7. ‘फसल’ कविता के माध्यम से कवि श्रम और प्रकृति के संबंध को किस प्रकार उजागर करता है?

उत्तरकवि ‘फसल’ कविता में यह स्पष्ट करते हैं कि सृजन केवल प्रकृति या केवल मनुष्य से संभव नहीं, बल्कि दोनों के सहयोग से ही संभव है।प्रकृति की ओर से नदियों का पानी, उपजाऊ मिट्टी, सूरज की किरणें और हवा की थिरकन फसल को जन्म देती हैं।मनुष्य की ओर से लाखों-करोड़ों किसानों के हाथों का श्रम मिट्टी, जल और बीज को फसल में बदल देता है।कवि ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ एवं ‘महिमा’ कहकर मानव-श्रम को सम्मान देते हैं और यह संदेश देते हैं कि उपभोक्ता-संस्कृति के दौर में हमें कृषि-संस्कृति, श्रम एवं प्रकृति की महत्ता को नहीं भूलना चाहिए।

8. ‘यह दंतुरित मुसकान’ और ‘फसल’ – दोनों कविताओं के भाव-सौंदर्य एवं संदेश की तुलना कीजिए।

उत्तरदोनों कविताएँ नागार्जुन की रचनाएँ हैं, किंतु इनके विषय भिन्न हैं। ‘यह दंतुरित मुसकान’ एक कोमल, भावप्रधान कविता है जो शिशु-सौंदर्य और वात्सल्य की अनुभूति को अनेक बिंबों द्वारा व्यक्त करती है; इसका संदेश है कि इसी निश्छल सुंदरता में जीवन का असली रस है।‘फसल’ एक विचारप्रधान कविता है जो श्रम और प्रकृति के सहयोग से होने वाले सृजन को रेखांकित करती है; इसका संदेश है कि फसल सामूहिक मानव-श्रम और प्रकृति की देन है।दोनों में नागार्जुन की सहज, लोकजीवन से जुड़ी भाषा, बोलचाल की लय और जीवन के प्रति गहरा अनुराग समान रूप से दिखाई देता है।

अभ्यास MCQ & उत्तर-कुंजी

1. ‘यह दंतुरित मुसकान’ और ‘फसल’ कविताओं के रचयिता कौन हैं?

(क) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

(ख) नागार्जुन

(ग) जयशंकर प्रसाद

(घ) सुमित्रानंदन पंत

2. नागार्जुन का मूल नाम क्या था?

(क) वैद्यनाथ मिश्र

(ख) धनपत राय

(ग) रामधारी सिंह

(घ) हरिवंश राय

3. ‘दंतुरित’ शब्द का अर्थ है—

(क) बिना दाँत वाला

(ख) टूटे दाँत वाला

(ग) नए-नए दाँत निकलने वाला

(घ) पीले दाँत वाला

4. कवि के अनुसार बच्चे की मुसकान किसमें भी जान डाल सकती है?

(क) पशु में

(ख) मृतक में

(ग) वृक्ष में

(घ) नदी में

5. ‘जलजात’ का अर्थ है—

(क) बादल

(ख) कमल का फूल

(ग) मछली

(घ) झरना

6. शिशु के स्पर्श से कवि को किन फूलों के झरने का अनुभव होता है?

(क) गुलाब

(ख) चमेली

(ग) शेफालिका (हरसिंगार)

(घ) कमल

7. कवि और शिशु के बीच परिचय का माध्यम कौन बनती है?

(क) पिता

(ख) दादी

(ग) माँ

(घ) पड़ोसी

8. ‘फसल’ कविता के अनुसार फसल किसका जादू है?

(क) मशीनों का

(ख) ढेर सारी नदियों के पानी का

(ग) बादलों का

(घ) खाद का

9. कवि ने फसल को हजार-हजार खेतों की किसका गुण-धर्म कहा है?

(क) पानी का

(ख) हवा का

(ग) मिट्टी का

(घ) सूरज का

10. ‘फसल’ कविता में ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ किसकी ओर संकेत करती है?

(क) मशीनी उत्पादन की

(ख) मानव-श्रम की महत्ता की

(ग) व्यापार की

(घ) पूँजी की

उत्तर-कुंजी: 1→(ख), 2→(क), 3→(ग), 4→(ख), 5→(ख), 6→(ग), 7→(ग), 8→(ख), 9→(ग), 10→(ख)।

अभिकथन-कारण (Assertion–Reason)

निर्देश— नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): बच्चे की दंतुरित मुसकान मृतक में भी जान डाल सकती है।

कारण (R): शिशु की मुसकान सहज, निश्छल और अत्यंत प्राणवान होती है।

2. अभिकथन (A): कवि स्वयं को अपने घर में ‘इतर’ और ‘अन्य’ अनुभव करते हैं।

कारण (R): कवि चिर-प्रवासी हैं और शिशु उन्हें पहचानता नहीं।

3. अभिकथन (A): माँ कवि और शिशु के बीच परिचय का माध्यम बनती है।

कारण (R): बच्चा कवि से पूर्व-परिचित था और स्वयं ही मुसकरा उठा।

4. अभिकथन (A): फसल केवल मानव-श्रम का परिणाम है।

कारण (R): फसल जल, मिट्टी, सूर्य, वायु और मानव-श्रम के सम्मिलित योगदान से उपजती है।

5. अभिकथन (A): ‘फसल’ कविता मानव-श्रम की गरिमा को रेखांकित करती है।

कारण (R): कवि फसल को लाख-लाख, कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा एवं महिमा कहते हैं।

उत्तर-कुंजी: 1→(क); 2→(क); 3→(ग) – A सही है, पर R गलत है क्योंकि शिशु कवि से अपरिचित था और माँ के माध्यम से ही मुसकराया; 4→(घ) – A गलत है (फसल केवल श्रम की नहीं, प्रकृति की भी देन है), R सही है; 5→(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • दोनों कविताओं के कवि – नागार्जुन (मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र) – और जन्म-स्थान (सतलखा, दरभंगा, बिहार) याद रखें।
  • ‘यह दंतुरित मुसकान’ के बिंब (कमल/जलजात, पाषाण का पिघलना, शेफालिका के फूल) और ‘फसल’ के पाँच तत्व (पानी, श्रम, मिट्टी, सूरज, हवा) क्रमवार लिखें – इन पर सीधे प्रश्न आते हैं।
  • ‘भाव स्पष्ट कीजिए’ वाले प्रश्न में पहले पंक्ति का सरल अर्थ, फिर उसका भाव/संदेश लिखें।
  • उत्तर सटीक एवं बिंदुवार लिखें; कविता की प्रमुख पंक्तियों को उद्धरण के रूप में जोड़ें।

सामान्य गलतियाँ (इनसे बचें)

  • नागार्जुन को प्रेमचंद या किसी गद्यकार से न जोड़ें – ये दोनों कविताएँ हैं।
  • ‘दंतुरित’ का अर्थ ‘बिना दाँत’ लिखना गलत है – इसका अर्थ है ‘नए-नए दाँत निकलने वाला’।
  • ‘फसल’ को केवल मिट्टी या केवल श्रम की देन बताना अधूरा उत्तर है – सभी पाँच तत्वों का उल्लेख करें।
  • देवनागरी में मात्रा एवं वर्तनी (जैसे शेफालिका, मधुपर्क, संदली) सावधानी से लिखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्षितिज भाग 2 अध्याय 5 की कविताएँ कौन-सी हैं और इनके कवि कौन हैं?

इस अध्याय में नागार्जुन की दो कविताएँ – ‘यह दंतुरित मुसकान’ और ‘फसल’ – संकलित हैं। नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था।

‘यह दंतुरित मुसकान’ कविता का मुख्य भाव क्या है?

यह कविता शिशु की निश्छल, नवदंत मुसकान और उससे जागे वात्सल्य-भाव को अनेक बिंबों के माध्यम से व्यक्त करती है; इसी कोमल सुंदरता में जीवन का संदेश छिपा है।

‘फसल’ कविता के अनुसार फसल किन तत्वों से बनती है?

फसल नदियों के पानी, लाखों-करोड़ों किसानों के हाथों के श्रम, मिट्टी के गुण-धर्म, सूरज की किरणों और हवा की थिरकन – अर्थात् जल, श्रम, मिट्टी, सूर्य एवं वायु के सम्मिलित योगदान से बनती है।

प्रश्न NCERT क्षितिज पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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