NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 3: मनुष्यता – प्रश्न-उत्तर, सार एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 3 ‘मनुष्यता’ (कवि – मैथिलीशरण गुप्त) का पूर्ण समाधान देता है – पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, भाव-स्पष्टीकरण, कविता का सार, शब्दार्थ, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण सहित।
कवि परिचय – मैथिलीशरण गुप्त
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 में झाँसी के निकट चिरगाँव में हुआ था। अपने जीवनकाल में ही ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में विख्यात हुए इन कवि की शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः घर पर ही हुई। संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेज़ी भाषाओं पर इनका समान अधिकार था। गुप्त जी रामभक्त कवि थे और राम का कीर्तिगान करना इनकी चिरसंचित अभिलाषा रही। इन्होंने भारतीय जीवन को समग्रता में समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इनकी कविता की भाषा विशुद्ध खड़ी बोली है, जिस पर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। काव्य की कथावस्तु प्रायः भारतीय इतिहास के उन अंशों से ली गई है जो भारत के अतीत का स्वर्णिम चित्र पाठक के सामने प्रस्तुत करते हैं। ‘साकेत’, ‘यशोधरा’ और ‘जयद्रथ वध’ इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। इनके पिता सेठ रामचरण दास भी कवि थे और छोटे भाई सियारामशरण गुप्त भी प्रसिद्ध कवि हुए। सन् 1964 में इनका निधन हुआ।
कविता का सार
‘मनुष्यता’ कविता में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने सच्ची मनुष्यता का स्वरूप समझाया है। कवि कहते हैं कि मनुष्य को यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह मरणशील है, अतः मृत्यु से कभी नहीं डरना चाहिए। मृत्यु तो निश्चित है, किंतु मरना उस प्रकार चाहिए कि सब लोग उसे श्रद्धा से याद करें। जो केवल अपने लिए जीता-मरता है, उसका जीवन और मरण दोनों व्यर्थ हैं; यह तो पशु-प्रवृत्ति है। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जिए और दूसरों के हित में मर मिटे।
कवि उदार व्यक्ति की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि उदार और परोपकारी मनुष्य की कीर्ति सदा जीवित रहती है, उसे समस्त सृष्टि पूजती है तथा सरस्वती तक उसका यशोगान करती हैं। इसके बाद कवि भारतीय एवं पौराणिक परंपरा के दानवीर महापुरुषों के उदाहरण देते हैं – राजा रंतिदेव ने भूख से व्याकुल होकर भी अपने हाथ का थाल दान कर दिया, दधीचि ऋषि ने लोकहित के लिए अपनी अस्थियाँ दान दीं, राजा उशीनर (शिबि) ने अपने शरीर का मांस दान किया और वीर कर्ण ने सहर्ष अपना शरीर-चर्म दान कर दिया। महात्मा बुद्ध ने करुणावश तत्कालीन रूढ़ियों का विरोध किया, जिससे सारा लोकवर्ग उनके सामने नतमस्तक हो गया।
कवि चेतावनी देते हैं कि मनुष्य को धन-संपत्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए और न ही स्वयं को अनाथ या निःसहाय समझना चाहिए, क्योंकि दीनबंधु ईश्वर के विशाल हाथ सबके साथ हैं। अंत में कवि सबको परस्पर सहयोग एवं प्रेमपूर्वक एक मार्ग पर साथ-साथ चलने की प्रेरणा देते हैं। उनका संदेश है – ‘मनुष्य मात्र बंधु है’; सबका जन्मदाता परमपिता एक ही है, अतः किसी से भेदभाव किए बिना एक-दूसरे का दुख दूर करते हुए, विघ्न-बाधाओं को हटाते हुए सहर्ष आगे बढ़ना ही सच्ची मनुष्यता है। इस प्रकार कविता परोपकार, उदारता, बंधुत्व और मानव-कल्याण का अमर संदेश देती है।
कविता का मूलभाव
इस कविता का मूलभाव यह है कि सच्ची मनुष्यता परोपकार और त्याग में निहित है। केवल अपने लिए जीने वाला जीवन पशु-समान है, जबकि दूसरों के हित में जीना और मर मिटना ही ‘सुमृत्यु’ तथा सच्ची मानवता है। कवि घमंड त्यागकर, ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ की भावना अपनाते हुए परस्पर सहयोग एवं प्रेम के साथ एक मार्ग पर मिलकर चलने का संदेश देते हैं।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मर्त्य | मरणशील, मरने वाला |
| सुमृत्यु | अच्छी मृत्यु, जिसे सब याद रखें |
| वृथा | व्यर्थ, बेकार |
| पशु-प्रवृत्ति | पशु जैसा स्वभाव (केवल स्वयं के लिए जीना) |
| उदार | दानशील, सहृदय |
| कृतार्थ | आभारी, धन्य |
| कीर्ति | यश, ख्याति |
| कूजती | मधुर ध्वनि करती |
| क्षुधार्त | भूख से व्याकुल |
| रंतिदेव | एक परम दानी राजा |
| करस्थ | हाथ में पकड़ा हुआ / लिया हुआ |
| दधीचि | प्रसिद्ध ऋषि, जिनकी हड्डियों से इंद्र का वज्र बना |
| परार्थ | जो दूसरों के लिए हो |
| अस्थिजाल | हड्डियों का समूह |
| उशीनर | गंधार देश का राजा (शिबि) |
| क्षितीश | राजा |
| स्वमांस | अपने शरीर का मांस |
| कर्ण | दान देने के लिए प्रसिद्ध कुंती-पुत्र |
| महाविभूति | बड़ी भारी पूँजी |
| वशीकृता | वश में की हुई |
| मदांध | जो घमंड से अंधा हो |
| वित्त | धन-संपत्ति |
| परस्परावलंब | एक-दूसरे का सहारा |
| अमर्त्य-अंक | देवता की गोद |
| अपंक | कलंक-रहित, निर्मल |
| स्वयंभू | परमात्मा / स्वयं उत्पन्न होने वाला |
| अंतरैक्य | अंतःकरण/आत्मा की एकता |
| प्रमाणभूत | साक्षी, प्रमाण देने वाला |
| अभीष्ट | इच्छित, मनचाहा |
| अतर्क्य | तर्क से परे |
| सतर्क पंथ | सावधान यात्री |
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
1. कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?
2. उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?
3. कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?
4. कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?
5. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
6. कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?
7. व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।
8. ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?
(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए—
1. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?
2. रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
3. चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क्य एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
अतिरिक्त प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. कवि के अनुसार पशु-प्रवृत्ति और मनुष्यता में क्या अंतर है?
2. कवि ने धन-संपत्ति को ‘तुच्छ’ क्यों कहा है?
3. कविता में सरस्वती और धरती का क्या व्यवहार बताया गया है?
4. कवि ने मनुष्य को मृत्यु से न डरने की प्रेरणा क्यों दी है?
5. ‘अतर्क्य एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी’ पंक्ति का आशय लिखिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘मनुष्यता’ कविता में दिए गए दानवीरों के उदाहरणों का वर्णन कीजिए और उनसे मिलने वाली प्रेरणा बताइए।
7. ‘मनुष्यता’ कविता आज के समय में भी कितनी प्रासंगिक है? अपने विचार लिखिए।
8. कविता के आधार पर सच्ची मनुष्यता के प्रमुख गुणों का वर्णन कीजिए।
अभ्यास MCQ
1. ‘मनुष्यता’ कविता के कवि कौन हैं?
(क) सूरदास
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) सुमित्रानंदन पंत
2. कवि ने किसकी मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है?
(क) जो धन कमाकर मरे
(ख) जिसे मरने के बाद सब याद करें
(ग) जो वृद्धावस्था में मरे
(घ) जो युद्ध में मरे
3. भूख से व्याकुल होकर भी अपने हाथ का थाल किसने दान कर दिया?
(क) दधीचि
(ख) कर्ण
(ग) रंतिदेव
(घ) उशीनर
4. किसकी अस्थियों से इंद्र का वज्र बना था?
(क) दधीचि
(ख) रंतिदेव
(ग) कर्ण
(घ) शिबि
5. कवि के अनुसार सबसे बड़ी पूँजी (महाविभूति) क्या है?
(क) धन-संपत्ति
(ख) सहानुभूति
(ग) बल
(घ) विद्या
6. ‘मदांध’ शब्द का अर्थ है—
(क) मद्यपान करने वाला
(ख) जो घमंड से अंधा हो
(ग) अंधकार में रहने वाला
(घ) दानशील
7. किसने करुणावश तत्कालीन रूढ़ियों का विरोध किया?
(क) महावीर
(ख) महात्मा बुद्ध
(ग) कर्ण
(घ) रंतिदेव
8. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ – इसका मुख्य कारण कवि क्या बताते हैं?
(क) सब एक देश के हैं
(ख) सबका जन्मदाता परमपिता एक ही है
(ग) सबकी भाषा एक है
(घ) सब एक जाति के हैं
9. इस कविता का मूल भाव क्या है?
(क) धन-संग्रह का महत्त्व
(ख) परोपकार और मानव-एकता
(ग) प्रकृति-सौंदर्य
(घ) वीरता का गुणगान
10. कविता की भाषा कौन-सी है?
(क) अवधी
(ख) ब्रज
(ग) विशुद्ध खड़ी बोली
(घ) भोजपुरी
अभिकथन-कारण
निर्देश – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): कवि उस मनुष्य को महान मानते हैं जो दूसरों के लिए जीता-मरता है।
कारण (R): केवल अपने लिए जीना-खाना पशु-प्रवृत्ति है।
2. अभिकथन (A): कवि मनुष्य को धन-संपत्ति पर गर्व करने से रोकते हैं।
कारण (R): धन-संपत्ति स्थायी एवं सर्वोच्च पूँजी है।
3. अभिकथन (A): कवि सबको परस्पर सहयोग से एक मार्ग पर साथ-साथ चलने की प्रेरणा देते हैं।
कारण (R): परस्पर सहारे और एकता से ही सब उन्नति कर सकते हैं।
4. अभिकथन (A): कवि के अनुसार इस संसार में कोई भी अनाथ नहीं है।
कारण (R): दयालु दीनबंधु परमात्मा के विशाल हाथ सबके साथ हैं।
5. अभिकथन (A): महात्मा बुद्ध के सामने सारा लोकवर्ग नतमस्तक हो गया।
कारण (R): बुद्ध ने धन-बल के आधार पर लोगों को अपने वश में किया।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ
- दानवीरों के क्रम और उनके दान को याद रखें – रंतिदेव (थाल/भोजन), दधीचि (अस्थियाँ), उशीनर/शिबि (मांस), कर्ण (शरीर-चर्म)।
- भाव-स्पष्ट करने वाले प्रश्नों में पहले कठिन शब्दों के अर्थ बताएँ, फिर पूरी पंक्तियों का सरल भाव लिखें।
- ‘सुमृत्यु’, ‘पशु-प्रवृत्ति’ और ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ जैसे मुख्य बिंदु लगभग हर वर्ष पूछे जाते हैं – इन्हें उदाहरण सहित तैयार करें।
- उत्तर में कविता की संबंधित पंक्तियाँ उद्धृत करने से अंक बढ़ते हैं।
सामान्य गलतियाँ
- कवि का नाम ‘मैथिलीशरण गुप्त’ लिखें – इसे ‘मैथली शरण’ या किसी अन्य कवि से न उलझाएँ।
- दानवीरों के दान को आपस में मत बदलें (जैसे दधीचि का दान ‘मांस’ लिख देना गलत है)।
- कविता को केवल ‘मृत्यु’ की कविता न समझें – इसका मुख्य भाव परोपकार एवं मानव-एकता है।
- शब्दार्थ में अशुद्ध वर्तनी से बचें (जैसे ‘क्षुधार्त’, ‘कृतार्थ’, ‘अंतरैक्य’)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘मनुष्यता’ कविता के कवि कौन हैं?
‘मनुष्यता’ कविता के कवि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) हैं, जो खड़ी बोली के प्रमुख कवि माने जाते हैं।
कवि ने किस मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है?
कवि ने उस मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है, जिसके बाद सब लोग मरने वाले को श्रद्धा से याद करें, अर्थात् जो दूसरों के हित में जीवन अर्पित कर दे।
‘मनुष्यता’ कविता का मुख्य संदेश क्या है?
कविता का मुख्य संदेश है कि सच्ची मनुष्यता परोपकार, त्याग और उदारता में है; सबको बंधु मानकर भेदभाव त्यागते हुए परस्पर सहयोग से मिलकर आगे बढ़ना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।
प्रश्न NCERT स्पर्श पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।
