NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 3: मनुष्यता – प्रश्न-उत्तर, सार एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 3 ‘मनुष्यता’ (कवि – मैथिलीशरण गुप्त) का पूर्ण समाधान देता है – पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, भाव-स्पष्टीकरण, कविता का सार, शब्दार्थ, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण सहित।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: स्पर्श (भाग 2) अध्याय: 3 – मनुष्यता कवि: मैथिलीशरण गुप्त विधा: कविता सत्र: 2026–27

कवि परिचय – मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 में झाँसी के निकट चिरगाँव में हुआ था। अपने जीवनकाल में ही ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में विख्यात हुए इन कवि की शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः घर पर ही हुई। संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेज़ी भाषाओं पर इनका समान अधिकार था। गुप्त जी रामभक्त कवि थे और राम का कीर्तिगान करना इनकी चिरसंचित अभिलाषा रही। इन्होंने भारतीय जीवन को समग्रता में समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इनकी कविता की भाषा विशुद्ध खड़ी बोली है, जिस पर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। काव्य की कथावस्तु प्रायः भारतीय इतिहास के उन अंशों से ली गई है जो भारत के अतीत का स्वर्णिम चित्र पाठक के सामने प्रस्तुत करते हैं। ‘साकेत’, ‘यशोधरा’ और ‘जयद्रथ वध’ इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। इनके पिता सेठ रामचरण दास भी कवि थे और छोटे भाई सियारामशरण गुप्त भी प्रसिद्ध कवि हुए। सन् 1964 में इनका निधन हुआ।

कविता का सार

‘मनुष्यता’ कविता में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने सच्ची मनुष्यता का स्वरूप समझाया है। कवि कहते हैं कि मनुष्य को यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह मरणशील है, अतः मृत्यु से कभी नहीं डरना चाहिए। मृत्यु तो निश्चित है, किंतु मरना उस प्रकार चाहिए कि सब लोग उसे श्रद्धा से याद करें। जो केवल अपने लिए जीता-मरता है, उसका जीवन और मरण दोनों व्यर्थ हैं; यह तो पशु-प्रवृत्ति है। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जिए और दूसरों के हित में मर मिटे।

कवि उदार व्यक्ति की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि उदार और परोपकारी मनुष्य की कीर्ति सदा जीवित रहती है, उसे समस्त सृष्टि पूजती है तथा सरस्वती तक उसका यशोगान करती हैं। इसके बाद कवि भारतीय एवं पौराणिक परंपरा के दानवीर महापुरुषों के उदाहरण देते हैं – राजा रंतिदेव ने भूख से व्याकुल होकर भी अपने हाथ का थाल दान कर दिया, दधीचि ऋषि ने लोकहित के लिए अपनी अस्थियाँ दान दीं, राजा उशीनर (शिबि) ने अपने शरीर का मांस दान किया और वीर कर्ण ने सहर्ष अपना शरीर-चर्म दान कर दिया। महात्मा बुद्ध ने करुणावश तत्कालीन रूढ़ियों का विरोध किया, जिससे सारा लोकवर्ग उनके सामने नतमस्तक हो गया।

कवि चेतावनी देते हैं कि मनुष्य को धन-संपत्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए और न ही स्वयं को अनाथ या निःसहाय समझना चाहिए, क्योंकि दीनबंधु ईश्वर के विशाल हाथ सबके साथ हैं। अंत में कवि सबको परस्पर सहयोग एवं प्रेमपूर्वक एक मार्ग पर साथ-साथ चलने की प्रेरणा देते हैं। उनका संदेश है – ‘मनुष्य मात्र बंधु है’; सबका जन्मदाता परमपिता एक ही है, अतः किसी से भेदभाव किए बिना एक-दूसरे का दुख दूर करते हुए, विघ्न-बाधाओं को हटाते हुए सहर्ष आगे बढ़ना ही सच्ची मनुष्यता है। इस प्रकार कविता परोपकार, उदारता, बंधुत्व और मानव-कल्याण का अमर संदेश देती है।

कविता का मूलभाव

इस कविता का मूलभाव यह है कि सच्ची मनुष्यता परोपकार और त्याग में निहित है। केवल अपने लिए जीने वाला जीवन पशु-समान है, जबकि दूसरों के हित में जीना और मर मिटना ही ‘सुमृत्यु’ तथा सच्ची मानवता है। कवि घमंड त्यागकर, ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ की भावना अपनाते हुए परस्पर सहयोग एवं प्रेम के साथ एक मार्ग पर मिलकर चलने का संदेश देते हैं।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
मर्त्यमरणशील, मरने वाला
सुमृत्युअच्छी मृत्यु, जिसे सब याद रखें
वृथाव्यर्थ, बेकार
पशु-प्रवृत्तिपशु जैसा स्वभाव (केवल स्वयं के लिए जीना)
उदारदानशील, सहृदय
कृतार्थआभारी, धन्य
कीर्तियश, ख्याति
कूजतीमधुर ध्वनि करती
क्षुधार्तभूख से व्याकुल
रंतिदेवएक परम दानी राजा
करस्थहाथ में पकड़ा हुआ / लिया हुआ
दधीचिप्रसिद्ध ऋषि, जिनकी हड्डियों से इंद्र का वज्र बना
परार्थजो दूसरों के लिए हो
अस्थिजालहड्डियों का समूह
उशीनरगंधार देश का राजा (शिबि)
क्षितीशराजा
स्वमांसअपने शरीर का मांस
कर्णदान देने के लिए प्रसिद्ध कुंती-पुत्र
महाविभूतिबड़ी भारी पूँजी
वशीकृतावश में की हुई
मदांधजो घमंड से अंधा हो
वित्तधन-संपत्ति
परस्परावलंबएक-दूसरे का सहारा
अमर्त्य-अंकदेवता की गोद
अपंककलंक-रहित, निर्मल
स्वयंभूपरमात्मा / स्वयं उत्पन्न होने वाला
अंतरैक्यअंतःकरण/आत्मा की एकता
प्रमाणभूतसाक्षी, प्रमाण देने वाला
अभीष्टइच्छित, मनचाहा
अतर्क्यतर्क से परे
सतर्क पंथसावधान यात्री

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—

1. कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?

उत्तरकवि ने उस मृत्यु को सुमृत्यु कहा है, जिसके बाद संसार के सभी लोग मरने वाले को श्रद्धा और प्रेम से याद करें।अर्थात् जो व्यक्ति दूसरों के हित में, परोपकार करते हुए अपना जीवन लगा देता है और मरकर भी लोगों की स्मृति में सदा बना रहता है, उसी की मृत्यु सच्ची सुमृत्यु है।इसके विपरीत जो केवल अपने लिए जीता-मरता है, उसका जीना-मरना व्यर्थ है।

2. उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उत्तरउदार व्यक्ति की पहचान उसके परोपकारी और दानशील कार्यों से होती है।ऐसे व्यक्ति की कीर्ति सदा जीवित रहती है, सरस्वती (विद्या-देवी) उसका यशोगान करती हैं, धरती उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखती है और समस्त सृष्टि उसकी पूजा करती है।उदार व्यक्ति में अखंड आत्मीयता का भाव होता है, जो असीम विश्व में भरा रहता है – यही उसकी सच्ची पहचान है।

3. कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?

उत्तरकवि ने रंतिदेव, दधीचि, उशीनर (शिबि) और कर्ण जैसे महान दानवीरों का उदाहरण देकर यह संदेश दिया है कि सच्ची मनुष्यता त्याग और परोपकार में है।रंतिदेव ने भूख से व्याकुल होकर भी अपने हाथ का थाल दान कर दिया, दधीचि ने लोकहित के लिए अपनी अस्थियाँ दान दीं, उशीनर ने अपने शरीर का मांस और कर्ण ने अपना शरीर-चर्म तक सहर्ष दान कर दिया।इनके माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि शरीर तो नश्वर है, अतः उसके मोह में पड़कर डरने के बजाय मनुष्य को दूसरों के कल्याण के लिए सर्वस्व त्याग देने में पीछे नहीं हटना चाहिए – यही सच्ची मनुष्यता है।

4. कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

उत्तरकवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में गर्व-रहित जीवन जीने का संदेश दिया है—“रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।”इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि तुच्छ धन-संपत्ति पाकर कभी घमंड में अंधे मत बनो और स्वयं को सनाथ समझकर गर्व मत करो, क्योंकि दयालु ईश्वर के विशाल हाथ सबके साथ हैं।

5. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से कवि का अभिप्राय है कि संसार के सभी मनुष्य आपस में भाई-बंधु हैं, क्योंकि सबका जन्मदाता परमपिता परमात्मा एक ही है।कर्मों के फल के अनुसार लोगों में बाहरी भेद भले ही दिखाई दें, किंतु अंतःकरण की दृष्टि से सभी एक हैं – इसका प्रमाण वेद भी देते हैं।अतः किसी से ऊँच-नीच या भेदभाव न करके सबको परस्पर प्रेम और सहानुभूति रखनी चाहिए तथा एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहायक बनना चाहिए – यही सच्चा बंधुत्व है।

6. कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?

उत्तरकवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा इसलिए दी है, क्योंकि परस्पर सहयोग और एकता से ही मनुष्य उन्नति कर सकता है और कठिनाइयों पर विजय पा सकता है।एक-दूसरे के सहारे से ही सब आगे बढ़ सकते हैं; आपसी मेल-जोल कभी कम नहीं होना चाहिए और भिन्नता कभी नहीं बढ़नी चाहिए।कवि चाहते हैं कि सभी मनुष्य एक मार्ग पर सावधानी से चलते हुए, विघ्न-बाधाओं को हटाते हुए सहर्ष आगे बढ़ें, ताकि स्वयं तरते हुए दूसरों को भी तार सकें – यही समर्थ और सच्ची मनुष्यता है।

7. व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।

उत्तरइस कविता के आधार पर व्यक्ति को परोपकार और त्याग से भरा जीवन व्यतीत करना चाहिए।उसे मृत्यु से नहीं डरना चाहिए, बल्कि इस प्रकार जीना चाहिए कि उसके मरने पर सब उसे आदर से याद करें।उसे केवल अपने लिए न जीकर दूसरों के हित के लिए जीना चाहिए, धन-संपत्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए और किसी से भेदभाव नहीं रखना चाहिए।‘मनुष्य मात्र बंधु है’ की भावना अपनाकर परस्पर सहयोग, प्रेम एवं उदारता के साथ सबको साथ लेकर आगे बढ़ने वाला जीवन ही आदर्श जीवन है।

8. ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?

उत्तर‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि यह संदेश देना चाहते हैं कि सच्ची मनुष्यता परोपकार, त्याग और उदारता में निहित है।मनुष्य को निडर होकर दूसरों के कल्याण के लिए जीना और आवश्यकता पड़ने पर सर्वस्व त्याग देने को तत्पर रहना चाहिए।उसे धन का घमंड त्यागकर, सभी को बंधु मानते हुए, भेदभाव से ऊपर उठकर परस्पर सहयोग एवं प्रेम के साथ एक मार्ग पर मिलकर चलना चाहिए।इस प्रकार कविता का संदेश है – दूसरों के लिए जीना-मरना ही सच्ची मनुष्यता है और मानव-मात्र की एकता एवं भाईचारा ही जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए।

(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए—

1. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?

भाव-स्पष्टीकरणकवि कहते हैं कि मनुष्य के पास सहानुभूति का भाव होना चाहिए, क्योंकि यही सबसे बड़ी पूँजी (महाविभूति) है। जिस व्यक्ति के हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति होती है, यह धरती सदा उसके वश में रहती है – अर्थात् वह सबका प्रिय बन जाता है।इसके उदाहरण-स्वरूप कवि महात्मा बुद्ध का उल्लेख करते हैं। बुद्ध ने करुणा एवं दया से भरकर तत्कालीन रूढ़ियों और अनुचित परंपराओं का विरोध किया। उनकी इसी दया और सहानुभूति के कारण विनम्र होकर सारा लोकवर्ग उनके सामने नतमस्तक हो गया।भाव यह है कि करुणा और सहानुभूति में अपार शक्ति है, जिससे मनुष्य संसार का प्रेम और श्रद्धा अर्जित कर लेता है।

2. रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।

भाव-स्पष्टीकरणकवि मनुष्य को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि तुच्छ धन-संपत्ति पाकर कभी घमंड में अंधा नहीं होना चाहिए। स्वयं को सनाथ (सब प्रकार से संपन्न) समझकर मन में गर्व नहीं करना चाहिए।कवि प्रश्न करते हैं कि इस संसार में अनाथ कौन है? कोई भी अनाथ नहीं है, क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी ईश्वर सबके साथ हैं। दीनों पर दया करने वाले दीनबंधु परमात्मा के हाथ बहुत विशाल हैं, जो सबकी रक्षा करते हैं।भाव यह है कि मनुष्य को धन का अहंकार त्यागकर विनम्र बनना चाहिए और यह विश्वास रखना चाहिए कि ईश्वर सबका सहारा है।

3. चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क्य एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

भाव-स्पष्टीकरणकवि सबको प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि हमें अपने इच्छित (अभीष्ट) लक्ष्य की ओर हँसते-खेलते हुए, प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। मार्ग में जो भी विपत्तियाँ और विघ्न-बाधाएँ आएँ, उन्हें हटाते हुए निर्भय होकर आगे बढ़ते रहना चाहिए।कवि चाहते हैं कि चलते समय आपसी मेल-मिलाप कभी कम न हो और लोगों में भिन्नता या फूट कभी न बढ़े।भाव यह है कि सभी मनुष्य एक ही लक्ष्य-पथ के सावधान पथिक बनकर, एकता एवं सहयोग के साथ मिलकर चलें – यही सच्ची मनुष्यता और जीवन की सार्थकता है।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. कवि के अनुसार पशु-प्रवृत्ति और मनुष्यता में क्या अंतर है?

उत्तरकवि के अनुसार जो प्राणी केवल अपने लिए जीता और खाता-पीता है, वह पशु-प्रवृत्ति का है। इसके विपरीत जो मनुष्य दूसरों के हित के लिए जीता है और दूसरों के लिए मर मिटता है, वही सच्ची मनुष्यता रखता है। परोपकार ही मनुष्यता और पशुता के बीच की भेदरेखा है।

2. कवि ने धन-संपत्ति को ‘तुच्छ’ क्यों कहा है?

उत्तरकवि ने धन-संपत्ति को ‘तुच्छ’ इसलिए कहा है क्योंकि यह नश्वर एवं क्षणभंगुर है तथा इस पर घमंड करना व्यर्थ है। धन व्यक्ति को अहंकारी और मदांध बना देता है, जबकि सच्ची पूँजी तो सहानुभूति, उदारता और परोपकार है, जो मनुष्य को अमर कीर्ति प्रदान करती है।

3. कविता में सरस्वती और धरती का क्या व्यवहार बताया गया है?

उत्तरकविता में बताया गया है कि उदार एवं परोपकारी व्यक्ति की कथा सरस्वती (विद्या-देवी) बखानती हैं और उसकी सजीव कीर्ति सदा गूँजती रहती है। धरती भी उस उदार व्यक्ति के प्रति कृतार्थ अर्थात् आभार का भाव रखती है। इस प्रकार उदार मनुष्य को प्रकृति और समस्त सृष्टि पूजती है।

4. कवि ने मनुष्य को मृत्यु से न डरने की प्रेरणा क्यों दी है?

उत्तरकवि कहते हैं कि मनुष्य मरणशील है और मृत्यु अटल है, अतः उससे डरना व्यर्थ है। डरने के बजाय मनुष्य को इस प्रकार जीना और मरना चाहिए कि सब उसे श्रद्धा से याद करें। अनित्य शरीर के लिए अनादि आत्मा को भयभीत नहीं होना चाहिए; निडर होकर परहित में मर मिटना ही श्रेष्ठ है।

5. ‘अतर्क्य एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी’ पंक्ति का आशय लिखिए।

उत्तरइस पंक्ति का आशय है कि सभी मनुष्य एक ही (मानवता के) तर्कातीत श्रेष्ठ मार्ग के सावधान एवं जागरूक पथिक बनें। अर्थात् सब मिलकर, एक-दूसरे का ध्यान रखते हुए, एकता एवं सतर्कता के साथ मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ें ताकि कोई भटके नहीं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘मनुष्यता’ कविता में दिए गए दानवीरों के उदाहरणों का वर्णन कीजिए और उनसे मिलने वाली प्रेरणा बताइए।

उत्तरकवि ने मनुष्यता को परिभाषित करने के लिए भारतीय एवं पौराणिक परंपरा के अनेक महान दानवीरों के उदाहरण दिए हैं। राजा रंतिदेव ने स्वयं भूख से व्याकुल होते हुए भी अपने हाथ का भोजन-थाल दान कर दिया। दधीचि ऋषि ने लोककल्याण के लिए अपनी हड्डियाँ तक दान दे दीं, जिनसे इंद्र का वज्र बना। राजा उशीनर (शिबि) ने कबूतर की रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस दान किया और महाभारत के वीर कर्ण ने सहर्ष अपना कवच-कुंडल तथा शरीर-चर्म तक दान कर दिया।इन उदाहरणों से यह प्रेरणा मिलती है कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के हित के लिए अपना सर्वस्व त्याग देने को तैयार रहे। नश्वर शरीर के मोह में पड़ने के बजाय परोपकार और त्याग के द्वारा अमर कीर्ति अर्जित करना ही मनुष्य-जीवन का सच्चा उद्देश्य है।

7. ‘मनुष्यता’ कविता आज के समय में भी कितनी प्रासंगिक है? अपने विचार लिखिए।

उत्तर‘मनुष्यता’ कविता आज के युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है। आज जब संसार में स्वार्थ, भेदभाव, धन का अहंकार और परस्पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा है, तब यह कविता परोपकार, बंधुत्व और एकता का संदेश देकर समाज को सही दिशा दिखाती है।कविता हमें सिखाती है कि केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है; सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के दुख-दर्द में सहायक बने। ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ का संदेश जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर विश्व-बंधुत्व की भावना जगाता है।धन के घमंड से बचने, विनम्र रहने और परस्पर सहयोग से आगे बढ़ने की इसकी सीख आज के प्रतिस्पर्धी एवं असमानता-भरे समाज के लिए और भी आवश्यक है। अतः यह कविता हर युग के लिए सार्थक है।

8. कविता के आधार पर सच्ची मनुष्यता के प्रमुख गुणों का वर्णन कीजिए।

उत्तरकविता के आधार पर सच्ची मनुष्यता के अनेक गुण स्पष्ट होते हैं। सबसे पहला गुण है – परोपकार और त्याग; सच्चा मनुष्य दूसरों के हित के लिए जीता और मर मिटता है। दूसरा गुण है निर्भयता; वह मृत्यु से नहीं डरता और परहित में सर्वस्व अर्पण कर देता है।तीसरा गुण है उदारता और दानशीलता, जैसा रंतिदेव, दधीचि और कर्ण में दिखाई देता है। चौथा गुण है सहानुभूति एवं करुणा, जिसे कवि ‘महाविभूति’ कहते हैं। पाँचवाँ गुण है निरभिमानता – धन का घमंड न करना।अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण गुण है बंधुत्व एवं एकता – सबको भाई मानकर भेदभाव त्यागना और परस्पर सहयोग से मिलकर आगे बढ़ना। इन्हीं गुणों से युक्त जीवन ही सच्ची मनुष्यता है।

अभ्यास MCQ

1. ‘मनुष्यता’ कविता के कवि कौन हैं?

(क) सूरदास

(ख) मैथिलीशरण गुप्त

(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(घ) सुमित्रानंदन पंत

2. कवि ने किसकी मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है?

(क) जो धन कमाकर मरे

(ख) जिसे मरने के बाद सब याद करें

(ग) जो वृद्धावस्था में मरे

(घ) जो युद्ध में मरे

3. भूख से व्याकुल होकर भी अपने हाथ का थाल किसने दान कर दिया?

(क) दधीचि

(ख) कर्ण

(ग) रंतिदेव

(घ) उशीनर

4. किसकी अस्थियों से इंद्र का वज्र बना था?

(क) दधीचि

(ख) रंतिदेव

(ग) कर्ण

(घ) शिबि

5. कवि के अनुसार सबसे बड़ी पूँजी (महाविभूति) क्या है?

(क) धन-संपत्ति

(ख) सहानुभूति

(ग) बल

(घ) विद्या

6. ‘मदांध’ शब्द का अर्थ है—

(क) मद्यपान करने वाला

(ख) जो घमंड से अंधा हो

(ग) अंधकार में रहने वाला

(घ) दानशील

7. किसने करुणावश तत्कालीन रूढ़ियों का विरोध किया?

(क) महावीर

(ख) महात्मा बुद्ध

(ग) कर्ण

(घ) रंतिदेव

8. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ – इसका मुख्य कारण कवि क्या बताते हैं?

(क) सब एक देश के हैं

(ख) सबका जन्मदाता परमपिता एक ही है

(ग) सबकी भाषा एक है

(घ) सब एक जाति के हैं

9. इस कविता का मूल भाव क्या है?

(क) धन-संग्रह का महत्त्व

(ख) परोपकार और मानव-एकता

(ग) प्रकृति-सौंदर्य

(घ) वीरता का गुणगान

10. कविता की भाषा कौन-सी है?

(क) अवधी

(ख) ब्रज

(ग) विशुद्ध खड़ी बोली

(घ) भोजपुरी

उत्तर-कुंजी: 1–(ख), 2–(ख), 3–(ग), 4–(क), 5–(ख), 6–(ख), 7–(ख), 8–(ख), 9–(ख), 10–(ग)

अभिकथन-कारण

निर्देश – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कवि उस मनुष्य को महान मानते हैं जो दूसरों के लिए जीता-मरता है।

कारण (R): केवल अपने लिए जीना-खाना पशु-प्रवृत्ति है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): कवि मनुष्य को धन-संपत्ति पर गर्व करने से रोकते हैं।

कारण (R): धन-संपत्ति स्थायी एवं सर्वोच्च पूँजी है।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – कवि के अनुसार धन तुच्छ एवं नश्वर है, सच्ची पूँजी सहानुभूति है।

3. अभिकथन (A): कवि सबको परस्पर सहयोग से एक मार्ग पर साथ-साथ चलने की प्रेरणा देते हैं।

कारण (R): परस्पर सहारे और एकता से ही सब उन्नति कर सकते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): कवि के अनुसार इस संसार में कोई भी अनाथ नहीं है।

कारण (R): दयालु दीनबंधु परमात्मा के विशाल हाथ सबके साथ हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): महात्मा बुद्ध के सामने सारा लोकवर्ग नतमस्तक हो गया।

कारण (R): बुद्ध ने धन-बल के आधार पर लोगों को अपने वश में किया।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – लोग बुद्ध की करुणा एवं दया के कारण नतमस्तक हुए, धन-बल के कारण नहीं।
उत्तर-कुंजी: 1–(क), 2–(ग), 3–(क), 4–(क), 5–(ग)

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • दानवीरों के क्रम और उनके दान को याद रखें – रंतिदेव (थाल/भोजन), दधीचि (अस्थियाँ), उशीनर/शिबि (मांस), कर्ण (शरीर-चर्म)।
  • भाव-स्पष्ट करने वाले प्रश्नों में पहले कठिन शब्दों के अर्थ बताएँ, फिर पूरी पंक्तियों का सरल भाव लिखें।
  • ‘सुमृत्यु’, ‘पशु-प्रवृत्ति’ और ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ जैसे मुख्य बिंदु लगभग हर वर्ष पूछे जाते हैं – इन्हें उदाहरण सहित तैयार करें।
  • उत्तर में कविता की संबंधित पंक्तियाँ उद्धृत करने से अंक बढ़ते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  • कवि का नाम ‘मैथिलीशरण गुप्त’ लिखें – इसे ‘मैथली शरण’ या किसी अन्य कवि से न उलझाएँ।
  • दानवीरों के दान को आपस में मत बदलें (जैसे दधीचि का दान ‘मांस’ लिख देना गलत है)।
  • कविता को केवल ‘मृत्यु’ की कविता न समझें – इसका मुख्य भाव परोपकार एवं मानव-एकता है।
  • शब्दार्थ में अशुद्ध वर्तनी से बचें (जैसे ‘क्षुधार्त’, ‘कृतार्थ’, ‘अंतरैक्य’)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘मनुष्यता’ कविता के कवि कौन हैं?

‘मनुष्यता’ कविता के कवि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) हैं, जो खड़ी बोली के प्रमुख कवि माने जाते हैं।

कवि ने किस मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है?

कवि ने उस मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है, जिसके बाद सब लोग मरने वाले को श्रद्धा से याद करें, अर्थात् जो दूसरों के हित में जीवन अर्पित कर दे।

‘मनुष्यता’ कविता का मुख्य संदेश क्या है?

कविता का मुख्य संदेश है कि सच्ची मनुष्यता परोपकार, त्याग और उदारता में है; सबको बंधु मानकर भेदभाव त्यागते हुए परस्पर सहयोग से मिलकर आगे बढ़ना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

प्रश्न NCERT स्पर्श पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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