NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 4: पर्वत प्रदेश में पावस – प्रश्न-अभ्यास, सार एवं भावार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 4 ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ (कवि – सुमित्रानंदन पंत) का पूरा समाधान देता है – कविता का सार, भावार्थ, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: स्पर्श (भाग 2) अध्याय: 4 कवि: सुमित्रानंदन पंत विधा: कविता (छायावाद) सत्र: 2026–27

कवि परिचय – सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी (अल्मोड़ा) नामक रमणीय पर्वतीय गाँव में हुआ था। प्रकृति की गोद में पले-बढ़े पंत जी ने बचपन से ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था। वे छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनकी आरंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और रहस्यवाद की झलक मिलती है; बाद में वे मार्क्स, गांधी और अरविंद के दर्शन से प्रभावित हुए। आकाशवाणी से जुड़कर तथा ‘लोकायतन’ जैसी सांस्कृतिक संस्था की स्थापना कर उन्होंने साहित्य की सेवा की। उन्हें ‘कला और बूढ़ा चाँद’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (1960), ‘चिदंबरा’ पर ज्ञानपीठ पुरस्कार (1969) तथा पद्मभूषण सम्मान मिला; वे हिंदी के पहले ज्ञानपीठ विजेता थे। ‘वीणा’, ‘पल्लव’, ‘ग्राम्या’, ‘युगवाणी’, ‘स्वर्णकिरण’ और ‘लोकायतन’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। 28 दिसंबर 1977 को उनका निधन हुआ।

कविता का सार

‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने वर्षा ऋतु (पावस) में पर्वतीय प्रदेश के क्षण-क्षण बदलते मनोहारी सौंदर्य का सजीव चित्र खींचा है। कवि कहते हैं कि पावस ऋतु में प्रकृति का रूप पल-पल बदल रहा है। विशाल मेखलाकार पर्वत अपने हजारों पुष्प रूपी नेत्रों से अपने चरणों में फैले तालाब में अपना ही विशाल प्रतिबिंब बार-बार निहार रहा है। यह तालाब दर्पण के समान स्वच्छ और विशाल है।

पर्वत से झर-झर गिरते झरने मानो पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं; वे मोती की लड़ियों के समान सुंदर और फेन से भरे प्रतीत होते हैं। पर्वत के हृदय से उठते ऊँचे-ऊँचे वृक्ष अपनी ऊँची आकांक्षाओं के साथ शांत आकाश की ओर एकटक, अटल, किंतु कुछ चिंतित भाव से ताक रहे हैं – मानो वे भी कुछ पाने की आकांक्षा रखते हों।

तभी अचानक वर्षा और कोहरे के कारण दृश्य बदल जाता है। पर्वत मानो आँखों से ओझल हो जाता है और ऐसा लगता है जैसे वह पारे के समान उज्ज्वल पंख फड़फड़ाकर उड़ गया हो। अब केवल झरनों का शब्द शेष रह जाता है। घने बादल इस प्रकार छा जाते हैं मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। बादलों और कोहरे में डूबे ऊँचे शाल के वृक्ष ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे भयभीत होकर धरती में धँस गए हों। झरने का जल वाष्प बनकर उठता है तो लगता है मानो तालाब जल उठा हो और उससे धुआँ उठ रहा हो। अंत में कवि कल्पना करते हैं कि बादल रूपी विमानों में विचरण करता हुआ इंद्र मानो इंद्रजाल (जादू) का खेल खेल रहा है। इस प्रकार कविता मानवीकरण और चित्रात्मक भाषा के द्वारा पर्वतीय वर्षा का अद्भुत सौंदर्य प्रस्तुत करती है।

कविता का भावार्थ (पद्यांश-व्याख्या)

पद्यांश 1 – “पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश, / पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश। / मेखलाकार पर्वत अपार / अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़, / अवलोक रहा है बार-बार / नीचे जल में निज महाकार, / जिसके चरणों में पला ताल / दर्पण-सा फैला है विशाल!”

भावार्थ: वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश का रूप पल-पल बदल रहा है। करधनी के आकार वाला विशाल पर्वत अपने हजारों फूल रूपी नेत्रों को खोलकर अपने नीचे फैले तालाब में अपने ही विशाल प्रतिबिंब को बार-बार देख रहा है। पर्वत के चरणों में दर्पण के समान स्वच्छ एवं विशाल तालाब फैला हुआ है।

पद्यांश 2 – “गिरि का गौरव गाकर झर-झर / मद में नस-नस उत्तेजित कर / मोती की लड़ियों-से सुंदर / झरते हैं झाग भरे निर्झर! / गिरिवर के उर से उठ-उठ कर / उच्चाकांक्षाओं से तरुवर / हैं झाँक रहे नीरव नभ पर / अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।”

भावार्थ: झर-झर बहते झरने मानो मस्ती में पर्वत के गौरव का गान करते हुए, फेन से भरे और मोती की लड़ियों के समान सुंदर प्रतीत होते हैं। पर्वत के हृदय से उठते ऊँचे-ऊँचे वृक्ष ऊँची आकांक्षाओं को लिए शांत आकाश की ओर एकटक, अटल और कुछ चिंतित भाव से ताक रहे हैं।

पद्यांश 3 – “उड़ गया, अचानक लो, भूधर / फड़का अपार वारिद के पर! / रव-शेष रह गए हैं निर्झर! / है टूट पड़ा भू पर अंबर! / धँस गए धरा में सभय शाल! / उठ रहा धुआँ, जल गया ताल! / —यों जलद-यान में विचर-विचर / था इंद्र खेलता इंद्रजाल।”

भावार्थ: अचानक बादल और कोहरा छा जाने से पर्वत आँखों से ओझल हो जाता है, मानो बादलों के पंख फड़फड़ाकर वह उड़ गया हो। अब केवल झरनों का शब्द शेष रह जाता है। ऐसा लगता है मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। ऊँचे शाल के वृक्ष कोहरे में डूबकर मानो भयभीत होकर धरती में धँस गए हों। झरने का जल वाष्प बनकर उठता है तो लगता है तालाब जल उठा हो और धुआँ उठ रहा हो। ऐसा प्रतीत होता है मानो बादल रूपी विमान में घूमता हुआ इंद्र इंद्रजाल (जादू) का खेल खेल रहा हो।

शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ

शब्दअर्थ
पावसवर्षा ऋतु
प्रकृति-वेशप्रकृति का रूप/परिधान
मेखलाकारकरधनी (मेखला) के आकार की पहाड़ की ढाल
अपारविशाल, असीम
सहस्रहजार
दृग-सुमनपुष्प रूपी आँखें
अवलोकदेखना, निहारना
निजअपना
महाकारविशाल आकार
तालतालाब
दर्पणआईना
गिरि / गिरिवरपर्वत / श्रेष्ठ पर्वत
मदमस्ती
निर्झरझरना
झागफेन
उरहृदय
उच्चाकांक्षाऊँचा उठने की कामना
तरुवरश्रेष्ठ वृक्ष, पेड़
नीरव नभशांत आकाश
अनिमेषएकटक, बिना पलक झपकाए
अटलस्थिर, अडिग
चिंतापरचिंतित, चिंता में डूबा हुआ
भूधरपहाड़
वारिद के परबादल रूपी पंख
रव-शेषकेवल शब्द/आवाज़ का शेष रह जाना
अंबरआकाश
सभयभय के साथ, भयभीत
शालएक प्रकार का ऊँचा वृक्ष
जलद-यानबादल रूपी विमान
विचरघूमना, विचरण करना
इंद्रजालजादूगरी, माया

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—

1. पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपावस (वर्षा) ऋतु में प्रकृति का रूप पल-पल बदलता रहता है। कविता के आधार पर निम्नलिखित परिवर्तन दिखाई देते हैं—(क) पर्वत अपने हजारों फूल रूपी नेत्रों से अपने नीचे फैले तालाब में अपना प्रतिबिंब देखता प्रतीत होता है।(ख) झरने झर-झर बहते हुए मोती की लड़ियों के समान सुंदर लगते हैं।(ग) ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर एकटक ताकते दिखाई देते हैं।(घ) अचानक बादल और कोहरा छा जाने से पर्वत ओझल हो जाता है और लगता है मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो।(ङ) कोहरे में डूबे शाल के वृक्ष मानो धरती में धँस गए हों, और तालाब से वाष्प (धुआँ) उठता प्रतीत होता है। इस प्रकार प्रकृति का दृश्य निरंतर परिवर्तित होता रहता है।

2. ‘मेखलाकार’ शब्द का क्या अर्थ है? कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है?

उत्तर‘मेखलाकार’ का अर्थ है – करधनी (मेखला) के आकार वाला, अर्थात् कमर में पहनी जाने वाली करधनी की तरह घुमावदार ढाल।कवि ने इस शब्द का प्रयोग पर्वत की विशालता और उसकी घुमावदार, श्रृंखलाबद्ध ढलानों को दर्शाने के लिए किया है। पर्वत की चोटियाँ और ढलानें करधनी के समान वक्राकार फैली हुई प्रतीत होती हैं, इसीलिए कवि ने पर्वत को ‘मेखलाकार’ कहा है। इससे चित्रात्मकता और सौंदर्य बढ़ जाता है।

3. ‘सहस्र दृग-सुमन’ से क्या तात्पर्य है? कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा?

उत्तर‘सहस्र दृग-सुमन’ का अर्थ है – हजारों फूल रूपी आँखें (दृग = आँख, सुमन = फूल)।कवि ने इस पद का प्रयोग पर्वत पर खिले असंख्य रंग-बिरंगे फूलों के लिए किया है। कवि की कल्पना है कि पर्वत इन्हीं हजारों फूल रूपी नेत्रों से अपने चरणों में फैले तालाब में अपना प्रतिबिंब निहार रहा है। इस प्रकार पर्वत का मानवीकरण कर उसे सजीव बना दिया गया है।

4. कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों?

उत्तरकवि ने तालाब की समानता दर्पण (आईने) के साथ दिखाई है – “दर्पण-सा फैला है विशाल!”इसका कारण यह है कि तालाब का जल अत्यंत स्वच्छ, शांत और निर्मल है, जिसमें विशाल पर्वत का प्रतिबिंब उसी प्रकार स्पष्ट दिखाई देता है जैसे दर्पण में मुख दिखाई देता है। इसी विशेषता के कारण कवि ने तालाब को दर्पण के समान कहा है।

5. पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं?

उत्तरपर्वत के हृदय से उठते ऊँचे-ऊँचे वृक्ष शांत आकाश की ओर एकटक, अटल किंतु कुछ चिंतित भाव से इसलिए देख रहे थे क्योंकि वे और भी अधिक ऊँचा उठने की आकांक्षा रखते हैं।ये वृक्ष मनुष्य की उन ऊँची आकांक्षाओं (उच्चाकांक्षाओं) को प्रतिबिंबित करते हैं, जिनके अनुसार मनुष्य निरंतर आगे बढ़ने और ऊँचाइयों को छूने का प्रयास करता है। साथ ही उनकी मौन चिंता यह भी दर्शाती है कि ऊँचा लक्ष्य पाने की कामना के साथ कुछ चिंता और अनिश्चितता भी जुड़ी रहती है।

6. शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में क्यों धँस गए?

उत्तरवर्षा के समय जब घना कोहरा और बादल चारों ओर छा गए, तब ऊँचे शाल के वृक्ष कोहरे में पूरी तरह ढक गए और दिखाई देना बंद हो गए।कवि की कल्पना है कि वे वृक्ष इस भयानक एवं रहस्यमय वातावरण से भयभीत होकर मानो धरती में धँस गए हों। वास्तव में वृक्ष कोहरे में छिप गए थे, पर कवि ने मानवीकरण द्वारा उन्हें भयभीत होकर धरती में धँसता हुआ दिखाया है।

7. झरने किसके गौरव का गान कर रहे हैं? बहते हुए झरने की तुलना किससे की गई है?

उत्तरझरने पर्वत (गिरि) के गौरव का गान कर रहे हैं। वे झर-झर ध्वनि करते हुए मस्ती में पर्वत की महानता और सौंदर्य का गुणगान करते प्रतीत होते हैं।बहते हुए झरनों की तुलना मोती की लड़ियों से की गई है – “मोती की लड़ियों-से सुंदर / झरते हैं झाग भरे निर्झर!” अर्थात् ऊपर से गिरता फेनयुक्त स्वच्छ जल मोती की चमकती लड़ियों के समान सुंदर दिखाई देता है।

(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए—

1. “है टूट पड़ा भू पर अंबर!”

भाववर्षा के समय जब चारों ओर घने काले बादल छा जाते हैं और मूसलधार वर्षा होने लगती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण आकाश ही धरती पर टूटकर गिर पड़ा हो।यहाँ कवि ने बादलों के अत्यधिक घनेपन और तीव्र वर्षा के दृश्य को अत्यंत सजीव एवं अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है, जिससे वर्षा की भयानकता और विशालता का बोध होता है।

2. “—यों जलद-यान में विचर-विचर / था इंद्र खेलता इंद्रजाल।”

भावइन पंक्तियों में कवि कल्पना करते हैं कि वर्षा के देवता इंद्र बादल रूपी विमान (जलद-यान) में बैठकर इधर-उधर घूमते हुए मानो इंद्रजाल अर्थात् जादू का खेल खेल रहे हों।पर्वतीय प्रदेश में पल-पल बदलते वर्षा के दृश्य – कभी पर्वत का ओझल होना, कभी झरनों का शब्द, कभी कोहरा, कभी वाष्प – इतने विचित्र एवं चमत्कारी हैं कि वे किसी जादूगर के जादू जैसे प्रतीत होते हैं। इस प्रकार प्रकृति के परिवर्तनशील एवं मायावी रूप को इंद्र के इंद्रजाल के रूप में चित्रित किया गया है।

3. “गिरिवर के उर से उठ-उठ कर / उच्चाकांक्षाओं से तरुवर / हैं झाँक रहे नीरव नभ पर / अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।”

भावपर्वत के हृदय से उठते ऊँचे-ऊँचे वृक्ष मनुष्य की ऊँची आकांक्षाओं के प्रतीक हैं। वे शांत आकाश की ओर एकटक (अनिमेष), स्थिर (अटल) और कुछ चिंतित भाव से ताक रहे हैं।इसका भाव यह है कि जिस प्रकार वृक्ष आकाश रूपी ऊँचाई को छूने की कामना से अडिग खड़े हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी ऊँचे लक्ष्यों को पाने के लिए सदैव प्रयासरत रहता है; किंतु उन ऊँची आकांक्षाओं के साथ कुछ चिंता और अनिश्चितता भी जुड़ी रहती है। यहाँ मानवीकरण अलंकार के द्वारा वृक्षों को सजीव एवं भावनाशील दिखाया गया है।

कविता का सौंदर्य

1. इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किस प्रकार किया गया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरमानवीकरण अलंकार में प्रकृति के तत्त्वों पर मानवीय भावनाओं एवं क्रियाओं का आरोप किया जाता है। इस कविता में यह अलंकार अत्यंत सुंदर ढंग से प्रयुक्त हुआ है—(क) पर्वत अपने हजारों फूल रूपी नेत्रों से तालाब में अपना प्रतिबिंब निहारता है – मानो कोई मनुष्य दर्पण में स्वयं को देख रहा हो।(ख) झरने मस्ती में पर्वत के गौरव का गान करते हैं।(ग) ऊँचे वृक्ष उच्च आकांक्षाओं को लिए, एकटक, अटल और चिंतित होकर आकाश की ओर झाँक रहे हैं।(घ) शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में धँस जाते हैं। इन सभी स्थलों पर निर्जीव प्रकृति को सजीव मनुष्य की भाँति भावनाओं से युक्त दिखाया गया है, अतः यहाँ मानवीकरण अलंकार है।

2. आपकी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य इनमें से किस पर निर्भर करता है— (क) अनेक शब्दों की आवृत्ति पर। (ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा पर। (ग) कविता की संगीतात्मकता पर।

उत्तरवास्तव में इस कविता का सौंदर्य तीनों ही विशेषताओं पर निर्भर करता है, क्योंकि तीनों एक साथ मिलकर सौंदर्य उत्पन्न करती हैं—(क) शब्दों की आवृत्ति – ‘पल-पल’, ‘झर-झर’, ‘उठ-उठ’, ‘बार-बार’, ‘विचर-विचर’ जैसे पुनरुक्त शब्द लय और प्रभाव बढ़ाते हैं।(ख) चित्रमयी भाषा – ‘दर्पण-सा ताल’, ‘मोती की लड़ियों-से निर्झर’, ‘टूट पड़ा भू पर अंबर’ जैसे पद आँखों के सामने सजीव चित्र खींच देते हैं।(ग) संगीतात्मकता – अनुप्रास और तुकांत के कारण कविता में मधुर संगीत और प्रवाह उत्पन्न होता है। मेरी दृष्टि में कविता का सर्वाधिक सौंदर्य ‘चित्रमयी भाषा’ पर निर्भर करता है, क्योंकि उसी से पावस ऋतु का सजीव दृश्य साकार होता है।

3. कवि ने चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित किया है। ऐसे स्थलों को छाँटकर लिखिए।

उत्तरकविता में चित्रात्मक शैली के प्रमुख स्थल इस प्रकार हैं—(क) “मेखलाकार पर्वत अपार / अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़, / अवलोक रहा है बार-बार / नीचे जल में निज महाकार” – पर्वत का तालाब में प्रतिबिंब देखना।(ख) “मोती की लड़ियों-से सुंदर / झरते हैं झाग भरे निर्झर” – झरनों का सजीव चित्र।(ग) “दर्पण-सा फैला है विशाल” – स्वच्छ तालाब का चित्र।(घ) “है टूट पड़ा भू पर अंबर” और “धँस गए धरा में सभय शाल” – घने बादल एवं कोहरे का चित्र।(ङ) “उठ रहा धुआँ, जल गया ताल” – तालाब से उठती वाष्प का चित्र। इन सभी स्थलों पर पावस ऋतु का सजीव एवं चलचित्र जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय (30–40 शब्द)

1. कविता ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ का मूल भाव/उद्देश्य क्या है?

उत्तरइस कविता का मूल भाव पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु के पल-पल बदलते मनोहारी एवं रहस्यमय सौंदर्य का सजीव चित्रण करना है। कवि प्रकृति के परिवर्तनशील रूप को मानवीकरण और चित्रात्मक भाषा के द्वारा अत्यंत आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

2. कविता में किस ऋतु और किस स्थान का वर्णन है?

उत्तरइस कविता में वर्षा ऋतु (पावस) और पर्वतीय प्रदेश का वर्णन है। कवि ने पर्वत, तालाब, झरनों, वृक्षों, बादलों और कोहरे के माध्यम से पहाड़ी इलाके में होने वाली वर्षा के विविध दृश्यों को चित्रित किया है।

3. ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइसका आशय है कि वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश की प्रकृति का रूप क्षण-क्षण में बदलता रहता है। कभी धूप, कभी बादल, कभी कोहरा, कभी झरना – इस प्रकार प्रकृति निरंतर अपना वेश (रूप) बदलती रहती है, जिससे दृश्य बार-बार परिवर्तित होता प्रतीत होता है।

4. ‘उड़ गया, अचानक लो, भूधर’ से कवि का क्या अभिप्राय है?

उत्तरइसका अभिप्राय है कि अचानक घने बादल और कोहरा छा जाने से पर्वत आँखों से ओझल हो गया। कवि की कल्पना है कि पर्वत मानो बादल रूपी पंख फड़फड़ाकर आकाश में उड़ गया हो। वास्तव में पर्वत कोहरे में छिप गया, पर कवि ने उसे उड़ता हुआ दिखाया है।

5. यह कविता किस काव्य-धारा से संबंधित है और इसकी एक प्रमुख विशेषता क्या है?

उत्तरयह कविता छायावादी काव्य-धारा से संबंधित है। इसकी प्रमुख विशेषता प्रकृति का मानवीकरण है, अर्थात् प्रकृति के तत्त्वों (पर्वत, वृक्ष, झरने) को मनुष्य की भाँति भावनाशील एवं सजीव रूप में चित्रित करना। साथ ही चित्रात्मक एवं कोमल भाषा भी इसकी विशेषता है।

दीर्घ उत्तरीय (100–120 शब्द)

6. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में निहित प्रकृति-सौंदर्य का सविस्तार वर्णन कीजिए।

उत्तरइस कविता में कवि सुमित्रानंदन पंत ने पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु के बदलते सौंदर्य का अनुपम चित्र खींचा है। विशाल मेखलाकार पर्वत अपने हजारों फूल रूपी नेत्रों से अपने चरणों में फैले दर्पण-से स्वच्छ तालाब में अपना प्रतिबिंब निहारता प्रतीत होता है।झर-झर बहते झरने मोती की लड़ियों के समान सुंदर लगते हैं और मानो पर्वत के गौरव का गान करते हैं। ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर एकटक ताकते हैं। अचानक बादल और कोहरा छा जाने से पर्वत ओझल हो जाता है, शाल के वृक्ष धरती में धँसते-से प्रतीत होते हैं और तालाब से वाष्प उठती है।अंत में कवि कल्पना करते हैं कि बादल रूपी विमान में बैठा इंद्र इंद्रजाल का खेल खेल रहा है। इस प्रकार मानवीकरण एवं चित्रात्मक भाषा द्वारा प्रकृति का जीवंत सौंदर्य साकार हो उठता है।

7. इस कविता के माध्यम से कवि ने मनुष्य की आकांक्षाओं के विषय में क्या संदेश दिया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरयद्यपि यह मुख्यतः प्रकृति-वर्णन की कविता है, फिर भी कवि ने पर्वत के हृदय से उठते ऊँचे वृक्षों के माध्यम से मनुष्य की उच्च आकांक्षाओं की ओर सुंदर संकेत किया है।“उच्चाकांक्षाओं से तरुवर / हैं झाँक रहे नीरव नभ पर” – इन पंक्तियों में वृक्ष आकाश रूपी ऊँचाई को छूने की कामना से अटल खड़े हैं। इसका भाव यह है कि मनुष्य को भी जीवन में ऊँचे लक्ष्य रखने चाहिए और उन्हें पाने के लिए दृढ़ता एवं अडिगता से प्रयास करना चाहिए।साथ ही ‘कुछ चिंतापर’ शब्द यह भी संकेत करता है कि ऊँची आकांक्षाओं के साथ कुछ चिंता और अनिश्चितता भी स्वाभाविक रूप से जुड़ी रहती है; फिर भी मनुष्य को निराश हुए बिना निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता के कवि कौन हैं?

(क) जयशंकर प्रसाद

(ख) सुमित्रानंदन पंत

(ग) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

(घ) महादेवी वर्मा

उत्तर(ख) सुमित्रानंदन पंत।

2. ‘पावस’ शब्द का अर्थ है—

(क) ग्रीष्म ऋतु

(ख) शीत ऋतु

(ग) वर्षा ऋतु

(घ) वसंत ऋतु

उत्तर(ग) वर्षा ऋतु।

3. कवि ने तालाब की तुलना किससे की है?

(क) मोती से

(ख) दर्पण से

(ग) आकाश से

(घ) झरने से

उत्तर(ख) दर्पण से।

4. ‘मेखलाकार’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(क) तालाब

(ख) झरना

(ग) पर्वत

(घ) बादल

उत्तर(ग) पर्वत।

5. झरनों की तुलना किससे की गई है?

(क) दर्पण की लड़ियों से

(ख) मोती की लड़ियों से

(ग) फूलों की मालाओं से

(घ) तारों से

उत्तर(ख) मोती की लड़ियों से।

6. ‘सहस्र दृग-सुमन’ से तात्पर्य है—

(क) हजारों तारे

(ख) हजारों फूल रूपी आँखें

(ग) हजारों झरने

(घ) हजारों बूँदें

उत्तर(ख) हजारों फूल रूपी आँखें।

7. ‘नीरव नभ’ का अर्थ है—

(क) काला आकाश

(ख) शांत आकाश

(ग) ऊँचा पर्वत

(घ) गहरा तालाब

उत्तर(ख) शांत आकाश।

8. ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर किस भाव से ताक रहे हैं?

(क) प्रसन्न और निश्चिंत

(ख) एकटक, अटल और कुछ चिंतित

(ग) भयभीत और कंपित

(घ) क्रोधित और उग्र

उत्तर(ख) एकटक, अटल और कुछ चिंतित।

9. कविता के अंत में किस देवता की कल्पना की गई है?

(क) वरुण

(ख) इंद्र

(ग) अग्नि

(घ) वायु

उत्तर(ख) इंद्र। बादल रूपी विमान में घूमता इंद्र इंद्रजाल खेलता प्रतीत होता है।

10. इस कविता में प्रमुख रूप से कौन-सा अलंकार प्रयुक्त हुआ है?

(क) श्लेष

(ख) मानवीकरण

(ग) यमक

(घ) वक्रोक्ति

उत्तर(ख) मानवीकरण।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कवि ने तालाब को दर्पण के समान कहा है।

कारण (R): तालाब का जल स्वच्छ एवं शांत है, जिसमें पर्वत का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): कविता में पर्वत, वृक्ष और झरनों का मानवीकरण किया गया है।

कारण (R): कवि ने निर्जीव प्रकृति को मनुष्य की भाँति भावनाओं एवं क्रियाओं से युक्त दिखाया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): शाल के वृक्ष भयभीत होकर सचमुच धरती में धँस गए।

कारण (R): वर्षा के समय शाल के वृक्ष कोहरे में ढककर दिखाई देना बंद हो गए थे।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – वृक्ष वास्तव में धँसे नहीं, वे कोहरे में छिप गए थे; धँसना केवल कवि की कल्पना (मानवीकरण) है।

4. अभिकथन (A): ‘पावस’ शब्द वर्षा ऋतु के लिए प्रयुक्त हुआ है।

कारण (R): यह कविता वसंत ऋतु के सौंदर्य का वर्णन करती है।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – कविता वसंत नहीं, वर्षा (पावस) ऋतु का वर्णन करती है।

5. अभिकथन (A): कविता के अंत में इंद्र को इंद्रजाल खेलते हुए कल्पित किया गया है।

कारण (R): पर्वतीय वर्षा के पल-पल बदलते दृश्य जादू (माया) के समान विचित्र प्रतीत होते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
अभिकथन-कारण उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(क), 3-(घ), 4-(ग), 5-(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • ‘भाव स्पष्ट कीजिए’ वाले प्रश्नों में पहले पंक्ति का सरल अर्थ लिखें, फिर उसमें छिपे गूढ़ भाव और अलंकार का उल्लेख करें।
  • मानवीकरण के उदाहरण याद रखें – पर्वत का देखना, झरनों का गान, वृक्षों का झाँकना, शाल का धँसना। परीक्षा में अलंकार पर प्रश्न अवश्य पूछा जाता है।
  • कठिन शब्दों के अर्थ (मेखलाकार, दृग-सुमन, निर्झर, जलद-यान, अनिमेष) रटें नहीं, अर्थ समझकर याद करें।
  • उत्तर में जहाँ संभव हो, कविता की मूल पंक्ति उद्धृत करें – इससे अधिक अंक मिलते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  • ‘पावस’ को वसंत या ग्रीष्म ऋतु समझ लेना – यह वर्षा ऋतु है।
  • शाल के वृक्षों का सचमुच धरती में धँस जाना मान लेना – यह केवल कवि की कल्पना (मानवीकरण) है।
  • ‘दृग-सुमन’ का अर्थ केवल ‘फूल’ या केवल ‘आँखें’ लिखना – इसका सही अर्थ है ‘फूल रूपी आँखें’।
  • देवनागरी में मात्राओं की अशुद्धि – जैसे ‘निर्झर’, ‘गिरिवर’, ‘उच्चाकांक्षा’ की वर्तनी सावधानी से लिखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता के कवि कौन हैं?

इस कविता के कवि छायावाद के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत हैं, जो हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता थे।

इस कविता में किस ऋतु का वर्णन है?

इस कविता में वर्षा ऋतु (पावस) में पर्वतीय प्रदेश के पल-पल बदलते प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन है।

इस कविता में प्रमुख रूप से कौन-सा अलंकार प्रयुक्त हुआ है?

इस कविता में प्रमुख रूप से मानवीकरण अलंकार प्रयुक्त हुआ है, जिसमें पर्वत, वृक्ष और झरनों को मनुष्य की भाँति सजीव एवं भावनाशील दिखाया गया है।

प्रश्न NCERT स्पर्श पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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