कक्षा 6 हिंदी (मल्हार) पाठ 7 – जलाते चलो (कविता) प्रश्न-उत्तर एवं भावार्थ (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 6 हिंदी की नई पुस्तक मल्हार के पाठ 7 ‘जलाते चलो’ (कवि – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी) का पूरा समाधान देता है – कविता का मूल पाठ, भावार्थ, शब्दार्थ तथा पाठ की सभी गतिविधियों (मेरी समझ से, मिलकर करें मिलान, पंक्तियों पर चर्चा, सोच-विचार के लिए, कविता की रचना, अनुमान या कल्पना से आदि) के मौलिक एवं परीक्षा-उपयोगी उत्तर।
- कवि परिचय – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
- कविता (मूल पाठ)
- सार
- भावार्थ
- शब्दार्थ
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- कविता की रचना
- मिलान
- अनुमान या कल्पना से
- शब्दों के रूप
- अर्थ की बात
- प्रतीक
- पंक्ति से पंक्ति
- सा/सी/से का प्रयोग
- पाठ से आगे (अन्य गतिविधियाँ)
- अतिरिक्त प्रश्न
- अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कवि परिचय – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998) हिंदी के प्रसिद्ध कवि एवं बाल-साहित्यकार थे। बच्चों के लिए सरल, मधुर एवं प्रेरक रचनाएँ लिखने वाले चर्चित रचनाकारों में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने बच्चों के लिए बहुत-सी कविताएँ एवं गीत लिखे, जिनमें उत्साह, आशा एवं अच्छे संस्कारों का भाव भरा रहता है। उनका लिखा गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी बहुत लोकप्रिय है। ‘जलाते चलो’ भी उनकी ऐसी ही एक प्रेरणादायक रचना है, जो निराशा के अँधेरे में आशा एवं भलाई का दीप जलाते रहने का संदेश देती है।
कविता (मूल पाठ)
‘जलाते चलो’ एक आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है, जिसमें अँधेरे (तिमिर/निशा) को बुराई एवं निराशा का तथा दीप-ज्योति को भलाई एवं आशा का प्रतीक बनाकर निरंतर अच्छे कार्य करते रहने की प्रेरणा दी गई है।
कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।
भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह
कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी,
मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में
घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।
बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो
बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।।
जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की
चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी,
तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने
बना दीप की नाव तैयार की थी।
बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर
कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।।
युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर
दिये अनगिनत हैं निरंतर जलाए,
समय साक्षी है कि जलते हुए दीप
अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।
मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे
उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा।।
दिये और तूफ़ान की यह कहानी
चली आ रही और चलती रहेगी,
जली जो प्रथम बार लौ दीप की
स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।
रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि
कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।।
— द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
सार
‘जलाते चलो’ कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की एक आशा एवं उत्साह से भरी प्रेरणादायक कविता है। कवि इस कविता में बार-बार यह संदेश देते हैं कि हमें स्नेह (प्रेम) से भरे दीप अर्थात भलाई एवं सेवा के कार्य निरंतर जलाते रहना चाहिए, क्योंकि एक-न-एक दिन इन्हीं से धरती का अँधेरा अवश्य मिट जाएगा। यहाँ ‘अँधेरा’, ‘तिमिर’ एवं ‘निशा’ बुराई, अज्ञान, दुख एवं निराशा के प्रतीक हैं, जबकि ‘दीप’, ‘ज्योति’ एवं ‘सवेरा’ भलाई, ज्ञान, सेवा एवं आशा के प्रतीक हैं।
कवि कहते हैं कि भले ही विज्ञान में इतनी शक्ति हो कि वह अमावस की काली रात को पूर्णिमा जैसी उजली बना दे, फिर भी आज संसार में दिन के समय भी अमावस की रात जैसा अँधेरा छाता जा रहा है। इसका कारण है — प्रेम एवं संवेदना का अभाव। इसीलिए कवि कहते हैं कि जो बिजली के दीप (बल्ब) स्नेह के बिना केवल बाहरी प्रकाश दे रहे हैं, वे सच्चा मार्ग नहीं दिखा सकते।
कवि मनुष्य के साहस की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि अँधेरे की चुनौती को सबसे पहले मनुष्य ने ही स्वीकार किया और तिमिर रूपी नदी को पार करने के लिए दीप रूपी नाव बनाई। इस नाव को निरंतर चलाते रहने से कभी-न-कभी अँधेरे का किनारा (अंत) अवश्य मिलेगा। युगों-युगों से मनुष्य अँधेरे के विरुद्ध दीप जलाता आ रहा है; तूफ़ान (विपत्तियाँ) उन दीपों को बुझाते रहे, फिर भी जो लोग स्वयं बुझकर भी अपनी ज्योति दूसरों को दे गए, उन्हीं के त्याग से अँधेरे में उजाला फैलेगा। दीप और तूफ़ान का यह संघर्ष सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। कवि का दृढ़ विश्वास है कि जब तक धरती पर एक भी दीप जलता रहेगा, तब तक अँधेरी रात को सवेरा अवश्य मिलेगा। इस प्रकार कविता हमें निराश न होकर, चुनौतियों का सामना करते हुए, सबकी भलाई के लिए निरंतर अच्छे कार्य करते रहने की प्रेरणा देती है।
भावार्थ
पहला अंश – “जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर / कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।” कवि कहते हैं कि स्नेह (प्रेम) से भर-भरकर ये दीप अर्थात भलाई के कार्य निरंतर जलाते चलो। इस प्रकार लगातार सेवा एवं अच्छे कार्य करते रहने से एक-न-एक दिन धरती पर फैला बुराई, दुख एवं अज्ञान का अँधेरा अवश्य मिट जाएगा।
दूसरा अंश – “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह… बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।” भले ही विज्ञान में इतनी शक्ति है कि वह अमावस की काली रात को पूर्णिमा जैसी उजली बना सके, फिर भी आज संसार पर दिन में ही अमावस की रात जैसा अँधेरा घिरता आ रहा है। जो विद्युत-दीप (बल्ब) स्नेह के बिना केवल बाहरी रोशनी दे रहे हैं, उन्हें बुझा दो, क्योंकि प्रेम-रहित प्रकाश से सही मार्ग नहीं मिल सकता।
तीसरा अंश – “जला दीप पहला तुम्हीं ने… कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।” कवि मनुष्य से कहते हैं — अँधेरे की चुनौती को सबसे पहले तुम्हीं ने स्वीकार किया और पहला दीप जलाया। तिमिर रूपी नदी को पार करने के लिए तुमने दीप रूपी नाव तैयार की। उस नाव को निरंतर चलाते रहो, तभी कभी-न-कभी अँधेरे का किनारा (अंत) अवश्य मिलेगा।
चौथा अंश – “युगों से तुम्हीं ने… उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा।” युगों से मनुष्य अँधेरे रूपी शिला पर अनगिनत दीप जलाता आ रहा है। समय इसका साक्षी है कि तूफ़ानी हवाओं ने उन जलते दीपों को बार-बार बुझाया। फिर भी जो दीप (व्यक्ति) स्वयं बुझकर भी अपनी ज्योति दूसरों को दे गए, उन्हीं के त्याग एवं बलिदान से अँधेरे को उजाला मिलेगा।
पाँचवाँ अंश – “दिये और तूफ़ान की यह कहानी… कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।” दीप और तूफ़ान के संघर्ष की यह कहानी सदा से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। दीप की जो लौ पहली बार जली थी, वह सोने के समान चमकती हुई आगे भी जलती रहेगी। कवि का दृढ़ विश्वास है कि यदि धरती पर एक भी दीप जलता रहा, तो कभी-न-कभी अँधेरी रात को सवेरा अवश्य मिलेगा — अर्थात आशा एवं भलाई कभी समाप्त नहीं होगी।
शब्दार्थ
| कठिन शब्द | अर्थ |
|---|---|
| स्नेह | प्रेम; (दीपक में पड़ने वाला) तेल |
| धरा | पृथ्वी, धरती |
| तिमिर | अँधेरा, अंधकार |
| निशा | रात |
| अमावस | अमावस्या; जिस रात आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता |
| पूर्णिमा | पूर्णमासी; जिस रात पूरा चंद्रमा दिखाई देता है |
| निहित | छिपा हुआ, समाया हुआ |
| दिवस | दिन |
| विद्युत-दिये | बिजली से जलने वाले दीप, बल्ब आदि |
| पथ | रास्ता, मार्ग |
| दीप / दिया | दीपक |
| चुनौती | ललकार, मुश्किल कार्य का सामना |
| सरित | नदी |
| निरंतर | लगातार, बिना रुके |
| युग | समय, काल; बहुत लंबा समय |
| शिला | चट्टान, बड़ा पत्थर |
| अनगिनत / अनगिन | जिनकी गिनती न हो सके, बहुत अधिक |
| साक्षी | गवाह |
| पवन | हवा |
| ज्योति | प्रकाश, लौ |
| उजेला / उजाला | प्रकाश, रोशनी |
| तूफ़ान | आँधी; यहाँ विपत्ति/बाधा |
| लौ | दीपक की ज्वाला |
| स्वर्ण | सोना |
| सवेरा | सुबह, प्रभात |
मेरी समझ से
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (★) बनाइए—
(1) निम्नलिखित में से कौन-सी बात इस कविता में मुख्य रूप से कही गई है?
• भलाई के कार्य करते रहना
• दीपावली के दीपक जलाना
• बल्ब आदि जलाकर अंधकार दूर करना
• तिमिर मिलने तक नाव चलाते रहना
(2) “जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की, चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी” — यह वाक्य किससे कहा गया है?
• तूफ़ान से
• मनुष्यों से
• दीपकों से
• तिमिर से
(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
मिलकर करें मिलान
कविता में से चुनकर कुछ शब्द दिए गए हैं। इन्हें इनके सही अर्थों या संदर्भों से मिलाइए।
| शब्द | अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| 1. अमावस | (घ) अमावस्या, जिस रात आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता। |
| 2. पूर्णिमा | (क) पूर्णमासी, वह तिथि जिस रात चंद्रमा पूरा दिखाई देता है। |
| 3. विद्युत-दिये | (ख) विद्युत दिये अर्थात बिजली से जलने वाले दीपक, बल्ब आदि उपकरण। |
| 4. युग | (ग) समय, काल; युग संख्या में चार माने गए हैं — सत्ययुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग। |
पंक्तियों पर चर्चा
कविता से चुनी गई कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया?
“दिये और तूफ़ान की यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी, / जली जो प्रथम बार लौ दीप की / स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।। / रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि / कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।।”
सोच-विचार के लिए
कविता को एक बार फिर से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए—
(क) कविता में अँधेरे या तिमिर के लिए किन वस्तुओं के उदाहरण दिए गए हैं?
(ख) यह कविता आशा और उत्साह जगाने वाली कविता है। इसमें क्या आशा की गई है? यह आशा क्यों की गई है?
(ग) कविता में किसे जलाने और किसे बुझाने की बात कही गई है?
कविता की रचना
“जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर / कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।” इन पंक्तियों को लय सहित गाने या बोलने का प्रयास कीजिए। दोनों पंक्तियों को गाने या बोलने में समान समय लगा या अलग-अलग?
(क) इस कविता को एक बार फिर से पढ़िए और इस कविता की विशेषताओं की सूची बनाइए, जैसे इस कविता की पंक्तियों को 2–4, 2–4 के क्रम में बाँटा गया है आदि।
(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
मिलान
स्तंभ 1 और स्तंभ 2 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। मिलते-जुलते भाव वाली पंक्तियों को जोड़िए—
| स्तंभ 1 (पंक्ति) | स्तंभ 2 (मिलता-जुलता भाव) |
|---|---|
| 1. कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा। | (ग) विश्व की समस्याओं से एक-न-एक दिन छुटकारा अवश्य मिलेगा। |
| 2. जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर। | (घ) दूसरों के सुख-चैन के लिए प्रयास करते रहिए। |
| 3. मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में घिरी आ रही है अमावस निशा-सी। | (ख) विश्व में सुख-शांति क्यों कम होती जा रही है? |
| 4. बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा। | (क) विश्व की भलाई का ध्यान रखे बिना प्रगति करने से कोई लाभ नहीं होगा। |
अनुमान या कल्पना से
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए—
(क) “दिये और तूफ़ान की यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी” — दीपक और तूफ़ान की यह कौन-सी कहानी हो सकती है जो सदा से चली आ रही है?
(ख) “जली जो प्रथम बार लौ दीप की / स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी” — दीपक की यह सोने जैसी लौ क्या हो सकती है जो अनगिनत सालों से जल रही है?
शब्दों के रूप
“कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — ‘अमावस’ का अर्थ है ‘अमावस्या’। इन दोनों शब्दों का अर्थ समान है, पर लिखने-बोलने में थोड़ा अंतर है। ऐसे ही कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। इनसे मिलते-जुलते दूसरे शब्द कविता से खोजकर लिखिए।
| दिया गया शब्द | कविता में मिलता-जुलता रूप |
|---|---|
| 1. दिया | दीप / दिये |
| 2. उजेला | उजाला (ज्योति, प्रकाश) |
| 3. अनगिन | अनगिनत |
| 4. (कुछ अन्य शब्द) तिमिर | अँधेरा (अंधकार) |
| 5. निशा | रात / अमावस |
| 6. सरित | नदी |
अर्थ की बात
(क) “जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर” — इस पंक्ति में ‘चलो’ के स्थान पर ‘रहो’ शब्द रखकर पढ़िए। इस शब्द के बदलने से पंक्ति के अर्थ में क्या अंतर आ रहा है?
(ख) नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। पंक्तियों के सामने लगभग समान अर्थों वाले कुछ शब्द दिए गए हैं। उनमें से वह शब्द चुनिए, जो उस पंक्ति में सबसे उपयुक्त रहेगा—
| पंक्ति (रिक्त स्थान सहित) | विकल्प | सबसे उपयुक्त शब्द |
|---|---|---|
| 1. बहाते चलो ____ तुम वह निरंतर | नैया, नाव, नौका | नाव |
| कभी तो तिमिर का ____ मिलेगा।। | तट, तीर, किनारा | किनारा |
| 2. रहेगा ____ पर दिया एक भी यदि | धरा, धरती, भूमि | धरा |
| कभी तो निशा को ____ मिलेगा।। | प्रातः, सुबह, सवेरा | सवेरा |
| 3. जला दीप पहला तुम्हीं ने ____ की | अंधकार, तिमिर, अँधेरे | तिमिर |
| चुनौती ____ बार स्वीकार की थी। | प्रथम, अव्वल, पहली | प्रथम |
प्रतीक
(क) “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — ‘निशा’ का अर्थ है रात और ‘सवेरा’ का अर्थ है सुबह। पर कविता में इन दोनों शब्दों का प्रयोग केवल ‘रात’ और ‘सुबह’ के लिए नहीं हुआ है। पता लगाइए कि ‘निशा’ और ‘सवेरा’ का इस कविता में क्या-क्या अर्थ हो सकता है। (संकेत — निशा से जुड़ा है ‘अँधेरा’ और सवेरे से जुड़ा है ‘उजाला’)
(ख) कविता में से चुनकर कुछ शब्द दिए गए हैं — दिये, अँधेरा, अमावस, पूर्णिमा, दिवस, तिमिर, नाव, किनारा, शिला, ज्योति, उजेला, तूफ़ान, लौ, स्वर्ण, जलना, बुझना। इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें ‘सवेरा’ तथा ‘निशा’ के उपयुक्त स्थान पर लिखिए।
(ग) अपने समूह में मिलकर ‘निशा’ और ‘सवेरा’ के लिए कुछ और शब्द सोचिए और लिखिए।
पंक्ति से पंक्ति
“जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की / चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी” — इस पंक्ति को वाक्य के रूप में इस प्रकार लिख सकते हैं: “तुम्हीं ने पहला दीप जला तिमिर की चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी।” अब नीचे दी गई पंक्तियों को इसी प्रकार वाक्यों के रूप में लिखिए—
1. बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर।
2. जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर।
3. बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।
4. मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।
सा/सी/से का प्रयोग
“घिरी आ रही है अमावस निशा-सी”, “स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी” — इन पंक्तियों में ‘सी’ शब्द समानता दिखाने के लिए आया है। जब ‘सा/सी/से’ का प्रयोग समानता दिखाने के लिए हो, तो इनसे पहले योजक चिह्न (-) लगाया जाता है। अब आप भी ‘सा/सी/से’ का प्रयोग करते हुए कल्पना से पाँच वाक्य लिखिए।
पाठ से आगे (अन्य गतिविधियाँ)
आपकी बात
(क) “रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि / कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — यदि हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझ ले और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करे तो पूरी दुनिया सुंदर बन जाएगी। आप भी दूसरों के लिए प्रतिदिन बहुत-से अच्छे कार्य करते होंगे। अपने उन कार्यों के बारे में बताइए।
(ख) इस कविता में निराश न होने, चुनौतियों का सामना करने और सबके सुख के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी गई है। यदि आपको अपने किसी मित्र को निराश न होने के लिए प्रेरित करना हो तो आप क्या करेंगे? क्या कहेंगे?
(ग) क्या आपको कभी किसी ने कोई कार्य करने के लिए प्रेरित किया है? कब? कैसे? उस घटना के बारे में बताइए।
अमावस्या और पूर्णिमा
(क) “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह / कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — क्या आप जानते हैं कि अमावस्या और पूर्णिमा के होने का क्या कारण है?
(ख) नीचे दिए गए चित्र में अमावस्या, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को पहचानिए और ये नाम उपयुक्त स्थानों पर लिखिए।
तिथिपत्र
दिए गए तिथिपत्र (जनवरी 2023) को देखकर प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
(क) दिए गए महीने में कुल कितने दिन हैं?
(ख) पूर्णिमा और अमावस्या किस दिनांक और वार को पड़ रही है?
(ग) कृष्ण पक्ष की सप्तमी और शुक्ल पक्ष की सप्तमी में कितने दिनों का अंतर है?
(घ) इस महीने में कृष्ण पक्ष में कुल कितने दिन हैं?
(ङ) ‘वसंत पंचमी’ की तिथि बताइए।
आज की पहेली
“समय साक्षी है कि जलते हुए दीप / अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” — ‘पवन’ शब्द का अर्थ है हवा। दिए गए अक्षर-जाल में ‘पवन’ (हवा) के लिए प्रयोग होने वाले अलग-अलग शब्द छिपे हैं। उन्हें खोजिए।
खोजबीन के लिए
कविता से संबंधित कुछ रचनाएँ दी गई हैं, इन्हें पुस्तक में दिए गए क्यू.आर. कोड की सहायता से पढ़ें, देखें व समझें।
अतिरिक्त प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. ‘जलाते चलो’ कविता के कवि कौन हैं? वे किस प्रकार की रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं?
2. कविता में ‘दीप’ और ‘तिमिर’ किसके प्रतीक हैं?
3. कवि ‘विद्युत-दिये’ (बल्ब) को बुझाने के लिए क्यों कहते हैं?
4. कविता के अनुसार अँधेरे को उजाला कैसे मिलेगा?
5. कविता का मुख्य संदेश क्या है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘जलाते चलो’ कविता एक आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है। स्पष्ट कीजिए।
7. कविता में प्रयुक्त प्रतीकों (अँधेरा, दीप, तूफ़ान, सवेरा) की सहायता से कवि क्या समझाना चाहते हैं?
8. इस कविता से हमें क्या-क्या प्रेरणा मिलती है? अपने जीवन से उदाहरण देकर बताइए।
अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘जलाते चलो’ कविता के कवि कौन हैं?
(क) सूरदास
(ख) द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
(ग) रहीम
(घ) सुभद्रा कुमारी चौहान
2. कविता में हमें किसे ‘स्नेह भर-भर’ जलाने को कहा गया है?
(क) तूफ़ान को
(ख) दीयों को
(ग) शिला को
(घ) नाव को
3. कविता में ‘तिमिर’ का अर्थ है—
(क) उजाला
(ख) अँधेरा
(ग) सवेरा
(घ) दीपक
4. कवि के अनुसार तिमिर की चुनौती को सबसे पहले किसने स्वीकार किया?
(क) सूर्य ने
(ख) तूफ़ान ने
(ग) मनुष्य ने
(घ) चंद्रमा ने
5. ‘सरित’ शब्द का अर्थ है—
(क) पर्वत
(ख) नदी
(ग) समुद्र
(घ) तालाब
6. कविता में ‘पवन’ ने क्या किया?
(क) दीप जलाए
(ख) अनगिनत दीप बुझाए
(ग) नाव चलाई
(घ) सवेरा लाया
7. कविता में ‘निशा’ और ‘सवेरा’ किसके प्रतीक हैं?
(क) सर्दी और गर्मी के
(ख) बुराई/निराशा और भलाई/आशा के
(ग) धरती और आकाश के
(घ) नदी और किनारे के
8. कवि किस प्रकार के विद्युत-दीपों को बुझाने के लिए कहते हैं?
(क) जो बहुत तेज़ जलते हैं
(ख) जो स्नेह के बिना जल रहे हैं
(ग) जो पुराने हो गए हैं
(घ) जो रंगीन हैं
9. कविता के अनुसार धरती पर कब तक सवेरे की आशा बनी रहेगी?
(क) जब तक सूर्य रहेगा
(ख) जब तक एक भी दीप जलता रहेगा
(ग) जब तक तूफ़ान आता रहेगा
(घ) जब तक रात रहेगी
10. ‘जलाते चलो’ कविता का मुख्य भाव क्या है?
(क) प्रकृति का वर्णन
(ख) निराश हुए बिना निरंतर भलाई के कार्य करते रहना
(ग) त्योहार मनाना
(घ) विज्ञान की प्रशंसा
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): ‘जलाते चलो’ कविता आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है।
कारण (R): कवि विश्वास दिलाते हैं कि एक-न-एक दिन निशा को सवेरा अवश्य मिलेगा।
2. अभिकथन (A): कविता में ‘दीप’ भलाई एवं आशा का प्रतीक है।
कारण (R): दीप अँधेरे को मिटाकर प्रकाश फैलाता है, जैसे भलाई बुराई को मिटाती है।
3. अभिकथन (A): कवि सभी प्रकार के विद्युत-दीपों (बल्बों) को बुझाने के लिए कहते हैं।
कारण (R): कवि केवल उन्हीं विद्युत-दीपों को बुझाने को कहते हैं जो स्नेह के बिना जल रहे हैं।
4. अभिकथन (A): तूफ़ान ने अनगिनत जलते हुए दीप बुझा दिए।
कारण (R): ‘पवन’ अर्थात तेज़ हवा (तूफ़ान) दीपकों को बुझा देती है।
5. अभिकथन (A): कविता हमें कठिनाइयों के आगे हार मानकर निराश हो जाने की प्रेरणा देती है।
कारण (R): कवि कहते हैं कि निरंतर दीप जलाते रहने से कभी तो अँधेरा अवश्य मिटेगा।
परीक्षा-उपयोगी सुझाव एवं सामान्य भूलें
परीक्षा-उपयोगी सुझाव
- कविता के प्रतीकों को अवश्य याद रखें — अँधेरा/तिमिर/निशा = बुराई-निराशा; दीप/ज्योति/सवेरा = भलाई-आशा।
- “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा” एवं “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” जैसी टेक-पंक्तियाँ भावार्थ लिखते समय अवश्य उद्धृत करें।
- शब्दार्थ में ‘स्नेह’ के दोनों अर्थ (प्रेम तथा तेल) तथा ‘विद्युत-दिये’ का अर्थ ठीक से लिखें।
- कवि का नाम एवं उनकी प्रसिद्ध रचना ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ याद रखें।
सामान्य भूलें (इनसे बचें)
- ‘दीप जलाने’ का अर्थ केवल असली दीपक/बल्ब जलाना समझ लेना — इसका सही अर्थ है भलाई के कार्य करना।
- यह कह देना कि कवि सभी बल्ब बुझाने को कहते हैं — वे केवल स्नेह-रहित दीपों को बुझाने की बात करते हैं।
- ‘निशा’ एवं ‘सवेरा’ को केवल रात एवं सुबह मान लेना; ये बुराई-निराशा तथा भलाई-आशा के प्रतीक हैं।
- कवि का नाम गलत लिखना (सही: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘जलाते चलो’ कविता के कवि कौन हैं?
‘जलाते चलो’ कविता के कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998) हैं, जो बाल-साहित्य के चर्चित रचनाकार थे। उनका गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी लोकप्रिय है।
‘जलाते चलो’ कविता का मुख्य भाव क्या है?
कविता का मुख्य भाव है — निराश हुए बिना, चुनौतियों का सामना करते हुए, सबकी भलाई के लिए स्नेह एवं सेवा के दीप निरंतर जलाते रहना, क्योंकि एक-न-एक दिन धरती का अँधेरा अवश्य मिटेगा।
कविता में ‘दीप’ और ‘अँधेरा’ किसके प्रतीक हैं?
‘दीप’ (ज्योति, सवेरा) भलाई, आशा एवं ज्ञान का प्रतीक है, जबकि ‘अँधेरा’ (तिमिर, निशा) बुराई, निराशा एवं अज्ञान का प्रतीक है।
कवि किन विद्युत-दीपों को बुझाने के लिए कहते हैं?
कवि केवल उन्हीं विद्युत-दीपों (बल्बों) को बुझाने के लिए कहते हैं जो स्नेह (प्रेम) के बिना केवल बाहरी प्रकाश दे रहे हैं, क्योंकि प्रेम-रहित प्रकाश से सच्चा मार्ग नहीं मिल सकता।
कविता एवं प्रश्न/गतिविधि-शीर्षक NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
