Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 13 Solutions — पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि के आठ सुभाषित, अन्वय, सरल भावार्थ और दस अभ्यासों के क्रम में उत्तर पढ़ें। चित्र-प्रश्न पुस्तक के वास्तविक चित्रों से मिलाए गए हैं; चार परियोजनाओं के लिए मौलिक नमूने और स्रोत दिए गए हैं।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल सुभाषितानि (अन्वय + भावार्थ)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 6 का त्रयोदश (13वाँ) पाठ ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ आठ प्रसिद्ध सुभाषितों (सुन्दर एवं उपदेशप्रद वचनों) का संकलन है। पाठ का आरम्भ एक रोचक संवाद से होता है, जिसमें आचार्य छात्रों को स्फोरकपत्र (पोस्टर) दिखाते हैं, जिन पर सुन्दर चित्र एवं श्लोक अंकित हैं। आचार्य बताते हैं कि ‘सुन्दर वचन ही सुभाषित कहलाते हैं’ और ये हमें उत्तम कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। पाठ में दिए गए आठ सुभाषित जल-अन्न-सुभाषित रूपी तीन रत्नों, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार भावना, परिश्रम के महत्त्व, बड़ों के सम्मान, उद्यम-साहस-धैर्य जैसे गुणों, विद्या से प्राप्त सुख तथा मातृभूमि की महिमा का बोध कराते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव है – नीति, परिश्रम, उदारता एवं विद्या ही जीवन के सच्चे रत्न हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ किसी एक ग्रन्थ से नहीं, अपितु अनेक प्रसिद्ध नीति-ग्रन्थों से चुने गए सुभाषितों का संग्रह है। सुभाषित का अर्थ है – ‘सु + भाषित’ अर्थात् सुन्दर रूप से कहा गया वचन। पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ में बताया गया है कि ये सुभाषित चाणक्यनीतिः, मनुस्मृतिः, पञ्चतन्त्रम्, हितोपदेशः, रामायणम् तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारः जैसे ग्रन्थों से लिए गए हैं। ये वचन सूत्ररूप में जीवन के मूल्यों एवं आदर्शों की शिक्षा देते हैं और छात्रों को उत्तम कार्य के लिए प्रेरित करते हैं।
मूल सुभाषितानि (अन्वय + भावार्थ)
(पाठ के आठ सुभाषित ज्यों-के-त्यों, साथ में अन्वय एवं भावार्थ।)
सुभाषितम् 1 – तीन रत्न
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥
सुभाषितम् 2 – वसुधैव कुटुम्बकम्
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
सुभाषितम् 3 – उद्यम का महत्त्व
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥
सुभाषितम् 4 – बड़ों के सम्मान का फल
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥
सुभाषितम् 5 – छह गुण
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ॥
सुभाषितम् 6 – विद्या का फल
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥
सुभाषितम् 7 – मातृभूमि की महिमा
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
सुभाषितम् 8 – बुद्धिस्थ विद्या एवं स्वहस्त-धन
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥
सार (Hindi Summary)
‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के एक मनोरम संवाद से होता है। आचार्य छात्रों को स्फोरकपत्र (पोस्टर) दिखाते हैं, जिन पर सुन्दर चित्र एवं श्लोक हैं। आचार्य बताते हैं कि ये ‘सुभाषित’ हैं अर्थात् सुन्दर वचन, जो हमें उत्तम कार्य की प्रेरणा देते हैं। इसके बाद पाठ में आठ प्रसिद्ध सुभाषित दिए गए हैं।
पहला सुभाषित कहता है कि पृथ्वी पर सच्चे तीन रत्न जल, अन्न और सुभाषित हैं, मणि-पत्थर नहीं। दूसरा सुभाषित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उदार भाव सिखाता है – उदार लोगों के लिए सारी पृथ्वी ही परिवार है। तीसरा सुभाषित परिश्रम का महत्त्व बताता है – कार्य केवल इच्छा से नहीं, उद्यम से ही सिद्ध होते हैं, जैसे सोते सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आते। चौथा सुभाषित कहता है कि बड़ों का अभिवादन एवं सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।
पाँचवाँ सुभाषित बताता है कि जहाँ उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायता करते हैं। छठा सुभाषित विद्या की महिमा दर्शाता है – विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है। सातवाँ सुभाषित (रामायण से) मातृभूमि की महिमा बताता है – श्रीराम कहते हैं कि स्वर्णमयी लङ्का भी उन्हें प्रिय नहीं, क्योंकि माता एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान् हैं। अन्तिम सुभाषित सिखाता है कि केवल पुस्तक में रही विद्या और दूसरे के हाथ गया धन समय पर काम नहीं आते। संक्षेप में, यह पाठ नीति, परिश्रम, उदारता, बड़ों का सम्मान, मातृभूमि-प्रेम एवं विद्या के महत्त्व की प्रेरणा देता है।
ये नैतिक प्रेरणा देने वाले सुभाषित हैं। तीन रत्न जीवनोपयोगी वस्तुओं का रूपक है; यह खनिज-रत्नों की वैज्ञानिक सूची नहीं। आयु-वृद्धि, दैवी सहायता और विद्या से सुख की शृंखला पाठ का आदर्श भाव व्यक्त करते हैं, निश्चित स्वास्थ्य, धन या सफलता की गारंटी नहीं। स्रोत-ग्रन्थों का सामूहिक परिचय पृष्ठ 140 में है; बिना जाँचे हर श्लोक का अलग अध्याय-सन्दर्भ न जोड़ें।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मूढैः | मूर्ख जनों के द्वारा | By fools |
| पाषाणखण्डेषु | पत्थर के टुकड़ों में | In pieces of stone |
| रत्नसंज्ञा | रत्न का नाम/संज्ञा | The name ‘jewel’ |
| निजः | अपना (स्वकीयः) | Own |
| परः | अन्य/पराया जन | Other |
| लघुचेतसाम् | संकुचित/क्षुद्र हृदय वालों का | Of the narrow-minded |
| वसुधा | पृथ्वी (धरित्री) | The Earth |
| कुटुम्बकम् | परिवार/कुटुम्ब | Family |
| उद्यमेन | परिश्रम से | By effort |
| मनोरथैः | केवल इच्छाओं से | By mere wishes |
| सुप्तस्य | सोते हुए (का) | Of the sleeping (one) |
| अभिवादनशीलस्य | अभिवादन/प्रणाम करने वाले का | Of one who greets respectfully |
| वृद्धोपसेविनः | बड़ों की सेवा करने वाले का | Of one who serves elders |
| वर्धन्ते | बढ़ते हैं | Increase / grow |
| सहायकृत् | सहायता करने वाला | One who helps |
| पात्रताम् | योग्यता को | Worthiness / ability |
| आप्नोति | प्राप्त करता है | Obtains / receives |
| गरीयसी | श्रेष्ठ/महान | Greater / superior |
| स्वर्णमयी | सोने की बनी हुई | Made of gold |
| परहस्तगतम् | दूसरे के हाथ में गया हुआ | Gone into another’s hand |
अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
1. एतानि सर्वाणि सुभाषितानि उच्चैः पठन्तु स्मरन्तु लिखन्तु च ।
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —
(क) पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति ?
(ख) अयं निजः परो वा इति गणना केषां भवति ?
(ग) कार्याणि केन सिद्ध्यन्ति ?
(घ) विद्या किं ददाति ?
(ङ) जननी जन्मभूमिश्च कस्मात् गरीयसी ?
(च) लङ्का कीदृशी आसीत् ?
3. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु —
(क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि सन्ति ?
(ख) उदारचरितानां भावः कः भवति ?
(ग) मृगाः स्वयमेव कस्य मुखे न प्रविशन्ति ?
(घ) अभिवादनशीलस्य नित्यं कानि वर्धन्ते ?
(ङ) मनुष्यः धनात् किम् आप्नोति ?
(च) उत्पन्नेषु कार्येषु कीदृशं धनम् उपयोगाय न भवति ?
4. चित्रं दृष्ट्वा वाक्यानि रचयन्तु — चित्रानुसार नमूने
पृष्ठ 136 में वृक्ष, फल, फूल, पत्ते, लकड़ी, छाया और कागज़ हैं। दिया उदाहरण: वृक्षः फलानि यच्छति। त्वं फलानि स्वीकरोषि। अहं फलानि स्वीकरोमि।
| वस्तु | वृक्षः | त्वम् | अहम् |
|---|---|---|---|
| फूल | वृक्षः पुष्पाणि यच्छति। | त्वं पुष्पाणि स्वीकरोषि। | अहं पुष्पाणि स्वीकरोमि। |
| पत्ते | वृक्षः पत्राणि यच्छति। | त्वं पत्राणि स्वीकरोषि। | अहं पत्राणि स्वीकरोमि। |
| लकड़ी | वृक्षः काष्ठानि यच्छति। | त्वं काष्ठानि स्वीकरोषि। | अहं काष्ठानि स्वीकरोमि। |
| छाया | वृक्षः छायाम् यच्छति। | त्वं छायाम् स्वीकरोषि। | अहं छायाम् स्वीकरोमि। |
| कागज़ के पन्ने | वृक्षः कागदपत्राणि यच्छति। | त्वं कागदपत्राणि स्वीकरोषि। | अहं कागदपत्राणि स्वीकरोमि। |
कागज़ वृक्षों से प्राप्त रेशों को संसाधित करके बनता है; तैयार पन्ने सीधे पेड़ पर नहीं उगते। छाया लेने का अर्थ उसके नीचे आश्रय लेना है।
5. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति लिखन्तु —
यथा – किं पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि सन्ति ? → आम् ।
6. चित्रे दर्शितस्य नाम लिङ्गं च निर्दिशन्तु
पृष्ठ 137 के ऊपर से नीचे क्रम में उत्तर:
| चित्र | नाम | लिङ्ग |
|---|---|---|
| गुलाब — दिया उदाहरण | पुष्पम् | नपुंसकलिङ्गम् |
| सिंह | सिंहः | पुंलिङ्गम् |
| सेब / फल | फलम् | नपुंसकलिङ्गम् |
| स्त्री | स्त्री / महिला | स्त्रीलिङ्गम् |
| धूप में वृक्ष की छाया | छाया | स्त्रीलिङ्गम् |
| पुस्तकें | पुस्तकानि | नपुंसकलिङ्गम् |
पाँचवें चित्र में वृक्ष और उसकी छाया दोनों हैं। छाया — स्त्रीलिङ्गम्; यदि वृक्ष को नाम दें तो वृक्षः — पुंलिङ्गम् भी सही पहचान है। पुस्तकम् एक पुस्तक और पुस्तकानि अनेक पुस्तकें हैं।
7. वलये पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु —
(वृत्त (वलय) में दिए पदों को क्रम से लगाकर सुभाषित पूरा कीजिए।)
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥
8. पिट्टकातः पदानि चित्वा निर्देशानुसारं पदानि लिखन्तु —
पिट्टका (शब्द-मञ्जूषा): जननी, धैर्यम्, विद्या, विनयः, निजः, पत्रम्, बुद्धिः, मूलम्, पराक्रमः, शक्तिः, धनम्, उद्यमः
9. पाठगतानि सुभाषितानि स्मृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
10. चित्राणि दृष्ट्वा उचितान् श्लोकांशान् लिखन्तु
पृष्ठ 139 के पाँच वास्तविक चित्रों का मिलान:
| चित्र | उचित श्लोकांश |
|---|---|
| ऊपर बाएँ — पत्थर तोड़ता श्रमिक | उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। |
| ऊपर दाएँ — जल, भोजन, पुस्तक | पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। |
| बीच — भारत का मानचित्र | जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। |
| नीचे बाएँ — दूसरे को धन देना | पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्। |
| नीचे दाएँ — पृथ्वी | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (सुभाषितों के स्रोत-ग्रन्थ)
पाठ के ये सुभाषित विविध ग्रन्थों से लिए गए हैं। उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –
| ग्रन्थः | परिचयः (Introduction) |
|---|---|
| चाणक्यनीतिः | एक नीतिग्रन्थ; रचनाकार – चाणक्य। इसमें सूत्ररूप में धर्म, संस्कृति, न्यायव्यवस्था, शान्ति एवं सुशिक्षा का सुन्दर वर्णन है। |
| मनुस्मृतिः | प्रसिद्ध नीति एवं धर्मग्रन्थ; रचनाकार – महर्षि मनु। इसमें बारह अध्याय हैं तथा संसार की उत्पत्ति, धर्म, संस्कृति एवं मनुष्य के कर्तव्यों का वर्णन है। |
| पञ्चतन्त्रम् | कथाग्रन्थ; रचनाकार – पण्डित विष्णुशर्मा। इसमें पाँच तन्त्र हैं – मित्रभेदः, मित्रलाभः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः एवं अपरीक्षितकारकम्। |
| हितोपदेशः | रचनाकार – नारायण पण्डित। इसमें पशु-पक्षियों की कथाओं द्वारा बालकों को नीति का बोध कराया गया है। |
| रामायणम् | भारतीय संस्कृति का आदर्श-स्वरूप दर्शाने वाला ग्रन्थ; रचयिता – महर्षि वाल्मीकि। इसमें श्रीराम का चरित वर्णित है; यह ‘आदिकाव्य’ नाम से प्रसिद्ध है। |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारः | विविध संस्कृत-ग्रन्थों से चुने गए सुभाषितों का संग्रह-ग्रन्थ। |
परियोजनाकार्यम् — चार कार्यों के नमूने
1. सुभाषित-पोस्टर
ऊपर दिए आठों सुभाषितों के अलग बड़े पोस्टर बनाएँ। श्लोक, पदच्छेद, एक पंक्ति में भाव और सम्बन्धित मौलिक चित्र जोड़ें। तीन रत्नों के लिए जल, अन्न और सुन्दर वचन; उद्यम के लिए पढ़ाई / श्रम; वसुधैव कुटुम्बकम् के लिए सहयोग करते लोग दिखा सकते हैं। शिक्षक से शुद्ध वर्तनी जँचवाकर कक्षा में लगाएँ।
2. नौ क्रियापद और मौलिक वाक्य
| श्लोक में रूप | नमूना वाक्य | अर्थ |
|---|---|---|
| विधीयते | कर्तव्यं विधीयते। | कर्तव्य निर्धारित किया जाता है। |
| सिद्ध्यन्ति | कार्याणि उद्यमेन सिद्ध्यन्ति। | कार्य प्रयत्न से सिद्ध होते हैं। |
| प्रविशन्ति | छात्राः कक्षां प्रविशन्ति। | छात्र कक्षा में प्रवेश करते हैं। |
| वर्धन्ते | वृक्षाः वर्धन्ते। | पेड़ बढ़ते हैं। |
| वर्तन्ते | उत्तमाः गुणाः तस्मिन् वर्तन्ते। | उसमें अच्छे गुण हैं। |
| ददाति | शिक्षकः ज्ञानं ददाति। | शिक्षक ज्ञान देता है। |
| याति | बालकः विद्यालयं याति। | बालक विद्यालय जाता है। |
| आप्नोति | सा पुरस्कारम् आप्नोति। | वह पुरस्कार प्राप्त करती है। |
| रोचते | मह्यं संस्कृतं रोचते। | मुझे संस्कृत अच्छी लगती है। |
ये श्लोकों में आए नौ अलग तिङन्त रूप हैं। भावार्थ में जोड़े गए भवति / सन्ति को मूल श्लोक का शब्द न बताएँ। सुप्तस्य, पुस्तकस्था, समुत्पन्ने जैसे रूप इस सूची के तिङन्त क्रियापद नहीं हैं।
3. पाँच व्यक्तियों के लघु परिचय — स्रोत सहित नमूने
ये ClearStudy के चुने उदाहरण हैं, पुस्तक की अनिवार्य नाम-सूची नहीं। प्रत्येक स्रोत पढ़कर अपने शब्दों में विस्तार करें; गुणों की सीख हमारा शैक्षिक निष्कर्ष है।
स्वामी विवेकानन्द
वे भारतीय आध्यात्मिक विचारक थे। 1893 में शिकागो की धर्म-संसद में उन्होंने भाषण दिए। शिक्षा और सेवा उनके कार्य के प्रमुख विषय थे। उनके जीवन से अध्ययन, साहस और मानव-सेवा पर परियोजना लिख सकते हैं। स्रोत: बेलूर मठ।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
वे भारतीय वैज्ञानिक और भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति थे। उन्होंने भारत के अंतरिक्ष और प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों में काम किया। उनके विज्ञान-कार्य से सतत अध्ययन, सहयोग और परिश्रम का उदाहरण चुनें। स्रोत: राष्ट्रपति भवन।
महात्मा गांधी
मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबन्दर में हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के नेता थे और सत्य तथा अहिंसा पर बल देते थे। उनके जीवन से सत्यनिष्ठा और दूसरों के प्रति सम्मान का उदाहरण लें। स्रोत: संस्कृति मंत्रालय।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्
वे भारतीय दार्शनिक और भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे; उनका राष्ट्रपति-कार्यकाल 1962–1967 था। उनके दर्शन और सार्वजनिक जीवन पर पढ़कर ज्ञान एवं विचारशीलता का छोटा परिचय तैयार करें। स्रोत: राष्ट्रपति भवन।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
वे कवि और शिक्षाचिन्तक थे। शान्तिनिकेतन में उनके शिक्षा-प्रयोग से विश्वभारती विकसित हुई; विश्वभारती की स्थापना 1921 में हुई। उनके शिक्षा-कार्य से खुले मन से सीखने और विश्व-मैत्री का उदाहरण चुनें। स्रोत: विश्वभारती।
4. वसुधैव कुटुम्बकम् — भाषण का मौलिक नमूना
आदरणीय शिक्षक और मित्रो! वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ है कि सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। भाषाएँ, देश और परम्पराएँ अलग हो सकती हैं, पर सबको भोजन, जल, शिक्षा और सम्मान चाहिए। हम नए साथी को खेल में शामिल करके, दूसरों की बात सुनकर और साझा संसाधनों की रक्षा करके इस भाव को जीवन में ला सकते हैं। उदारता का अर्थ अपनी पहचान छोड़ना नहीं, बल्कि सबकी गरिमा का सम्मान करना है। आइए, अपने घर और कक्षा से सहयोग की शुरुआत करें। धन्यवाद!
प्रतियोगिता में एक मिनट का समय, सही उच्चारण, स्पष्ट विचार और उदाहरण के लिए समान मानदण्ड रखें। अपना भाषण तैयार करें; यही एकमात्र सही उत्तर नहीं है।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. सुभाषित किसे कहते हैं?
2. पृथ्वी पर तीन सच्चे रत्न कौन-से हैं और क्यों?
3. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का क्या अर्थ है?
4. श्रीराम को स्वर्णमयी लङ्का भी प्रिय क्यों नहीं लगी?
5. किन छह गुणों के होने पर ईश्वर भी सहायता करते हैं?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. ‘उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि’ सुभाषित का भाव विस्तार से समझाइए।
7. ‘विद्या ददाति विनयम्’ सुभाषित में विद्या से सुख तक की शृंखला को स्पष्ट कीजिए।
8. इस पाठ के सुभाषित किन-किन ग्रन्थों से लिए गए हैं? संक्षेप में बताइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. पृथ्वी पर कितने (सच्चे) रत्न बताए गए हैं?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
2. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ किनके लिए होता है?
(क) लघुचेतसां जनानाम्
(ख) मूढानाम्
(ग) उदारचरितानाम्
(घ) क्रोधिनाम्
3. कार्य किससे सिद्ध होते हैं?
(क) मनोरथैः
(ख) उद्यमेन
(ग) निद्रया
(घ) आलस्येन
4. अभिवादनशील एवं वृद्धों की सेवा करने वाले की कौन-सी चार वस्तुएँ बढ़ती हैं?
(क) धन, मित्र, सुख, यश
(ख) आयु, विद्या, यश, बल
(ग) रूप, बल, धन, विद्या
(घ) आयु, धन, सुख, बुद्धि
5. ‘उद्यमः साहसं धैर्यं…’ में कितने गुण बताए गए हैं?
(क) चार
(ख) पाँच
(ग) छह
(घ) सात
6. विद्या सबसे पहले क्या प्रदान करती है?
(क) धनम्
(ख) विनयम्
(ग) सुखम्
(घ) पात्रताम्
7. श्रीराम ने किससे कहा कि लङ्का उन्हें प्रिय नहीं लगती?
(क) सीतायै
(ख) हनुमते
(ग) लक्ष्मणाय
(घ) भरताय
8. जननी एवं जन्मभूमि किससे भी श्रेष्ठ (गरीयसी) हैं?
(क) धनात्
(ख) स्वर्गात्
(ग) राज्यात्
(घ) विद्यायाः
9. किस सुभाषित में ‘सिंह’ एवं ‘मृग’ का उदाहरण आया है?
(क) विद्या ददाति विनयम्
(ख) उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि
(ग) अयं निजः परो वेति
(घ) अपि स्वर्णमयी लङ्का
10. केवल पुस्तक में रही विद्या एवं दूसरे के हाथ गया धन कब काम नहीं आते?
(क) रात्रौ
(ख) कार्यकाले समुत्पन्ने (आवश्यकता के समय)
(ग) उत्सवे
(घ) यात्रायाम्
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): पृथ्वी पर जल, अन्न एवं सुभाषित को तीन रत्न कहा गया है।
कारण (R): ये तीनों जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं, इसीलिए इन्हें सच्चे रत्न कहा गया है।
2. अभिकथन (A): ‘अयं निजः परो वा’ ऐसी गणना उदार लोग करते हैं।
कारण (R): उदार स्वभाव वाले लोगों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।
3. अभिकथन (A): सोते हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।
कारण (R): कार्य केवल इच्छा (मनोरथ) से नहीं, अपितु परिश्रम (उद्यम) से ही सिद्ध होते हैं।
4. अभिकथन (A): श्रीराम को स्वर्णमयी लङ्का भी प्रिय नहीं लगती।
कारण (R): माता एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ हैं।
5. अभिकथन (A): विद्या मनुष्य को विनम्रता प्रदान करती है।
कारण (R): विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म एवं धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- आठों सुभाषित कण्ठस्थ करें – रिक्तस्थान-पूर्ति एवं श्लोक-लेखन के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- एकपदेन एवं एकवाक्येन उत्तर के अन्तर को समझें – प्रश्न-संख्या 2 में केवल एक शब्द, संख्या 3 में पूरा वाक्य लिखें।
- हर सुभाषित का भावार्थ (तीन रत्न, वसुधैव कुटुम्बकम्, उद्यम, बड़ों का सम्मान, छह गुण, विद्या, मातृभूमि) याद रखें।
- शब्दार्थ (मूढैः, लघुचेतसाम्, उद्यमेन, गरीयसी, पात्रताम्) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें।
- प्रत्येक सुभाषित किस ग्रन्थ से लिया गया है – योग्यताविस्तरः से जोड़कर याद रखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- ‘अयं निजः परो वा’ की गणना को उदार लोगों का बताना – यह ‘लघुचेतसां’ का भाव है।
- तीन रत्नों में ‘पाषाण/मणि’ जोड़ देना – सच्चे रत्न केवल जल, अन्न एवं सुभाषित हैं।
- सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘स्वर्गादपि’ = स्वर्गात् + अपि, ‘जलमन्नम्’ = जलम् + अन्नम्।
- मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – सिद्ध्यन्ति, गरीयसी, वृद्धोपसेविनः को शुद्ध लिखें।
- छह गुणों में से किसी को छोड़ देना – उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – सभी छह लिखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 6 पाठ 13 ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ में किन तीन रत्नों की बात है?
इस पाठ के पहले सुभाषित के अनुसार पृथ्वी पर तीन सच्चे रत्न हैं – जल, अन्न और सुभाषित (सुन्दर वचन)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों (मणि-हीरे) को रत्न मानते हैं।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है। उदार हृदय वाले लोग सबको अपना मानते हैं और ‘अपना-पराया’ जैसी संकुचित भावना नहीं रखते।
इस पाठ के सुभाषित किन ग्रन्थों से लिए गए हैं?
ये सुभाषित चाणक्यनीतिः, मनुस्मृतिः, पञ्चतन्त्रम्, हितोपदेशः, रामायणम् तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारः जैसे प्रसिद्ध नीति एवं संग्रह-ग्रन्थों से लिए गए हैं।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 6, पाठ 13, पृष्ठ 130–140; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। व्याख्याएँ और परियोजना के नमूने स्वतंत्र ClearStudy अध्ययन-सहायक हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
