कक्षा 7 हिंदी (मल्हार) पाठ 6 – गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ प्रश्न-उत्तर एवं भावार्थ (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 7 हिंदी की नई पुस्तक मल्हार के पाठ 6 ‘गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ’ (रचनाकार – गिरिधर कविराय) का पूरा समाधान देता है – दोनों कुंडलियों का मूल पाठ, भावार्थ, शब्दार्थ तथा पाठ की सभी गतिविधियों (मेरी समझ से, पंक्तियों पर चर्चा, मिलकर करें मिलान, सोच-विचार के लिए, अनुमान और कल्पना से, कविता की रचना, भाषा से जुड़ी गतिविधियाँ आदि) के मौलिक एवं परीक्षा-उपयोगी उत्तर।
कवि परिचय – गिरिधर कविराय
गिरिधर कविराय का जन्म अठारहवीं सदी में हुआ माना जाता है। वे अपनी लोकप्रचलित कुंडलियों के लिए हिंदी साहित्य में सदा याद किए जाते हैं। उनकी रचनाओं में बहुत-से ऐसे नीतिपरक पद मिलते हैं जो आज भी कहावत के रूप में जन-जन की जुबान पर रहते हैं – जैसे “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय” और “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” उन्होंने लाठी जैसी साधारण वस्तु के उपयोग से लेकर यह तक बताया कि धन अधिक हो जाए तो क्या करना चाहिए। लोकनीति एवं घर-गृहस्थी के सहज लोक-व्यवहार को सीधे, सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में कह देना उनकी कविता की प्रमुख विशेषता है।
कुंडलियाँ (मूल पाठ)
गिरिधर कविराय की ये दोनों कुंडलियाँ नीतिपरक हैं। पहली में बिना सोचे-समझे कार्य करने के दुष्परिणाम बताए गए हैं, और दूसरी में बीते हुए को भुलाकर भविष्य पर ध्यान देने की सीख दी गई है।
बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय।
काम बिगारे आपनो जग में होत हँसाय॥
जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै।
खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥
कह गिरिधर कविराय दुःख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥
(2)
बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ॥
ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥
कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती।
आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती॥
— गिरिधर कविराय
भावार्थ
पहली कुंडलिया: कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति बिना सोचे-विचारे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। ऐसा मनुष्य अपना काम बिगाड़ लेता है और संसार में हँसी का पात्र बन जाता है। दुनिया में उपहास का विषय बनने पर उसके मन में कभी चैन नहीं रहता; तब अच्छा खान-पान, सम्मान तथा राग-रंग (मनोरंजन) भी उसके मन को नहीं भाते। कवि गिरिधर कहते हैं कि बिना विचारे किए गए कार्य से उत्पन्न दुख टालने पर भी टलता नहीं और वह कार्य सदा हृदय में काँटे की तरह खटकता रहता है। तात्पर्य यह कि कोई भी काम सोच-समझकर ही करना चाहिए।
दूसरी कुंडलिया: कवि सीख देते हैं कि बीती हुई बातों (अतीत) को भूलकर आगे की सुधि (भविष्य की चिंता एवं तैयारी) करनी चाहिए। जो काम सहज रूप से बन पड़े, मनुष्य को अपना मन उसी में लगाना चाहिए। जो बात स्वाभाविक रूप से संभव हो, उसी में चित्त लगाने से न तो कोई दुष्ट (दुर्जन) हँसने का अवसर पाता है और न ही मन में किसी प्रकार का दोष या अपराधबोध (खता) रहता है। कवि गिरिधर कहते हैं – मन में यही विश्वास दृढ़ कर लो कि आगे का सुख इसी समझदारी में है; जो बीत गया, उसे ‘बीती सो बीती’ समझकर भुला देना ही श्रेयस्कर है।
शब्दार्थ
| कठिन शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बिना बिचारे | बिना सोचे-समझे, बिना विचार किए |
| पाछे | बाद में, पीछे |
| पछिताय | पछताना, पश्चात्ताप करना |
| बिगारे आपनो | अपना (काम) बिगाड़ लेना |
| होत हँसाय | हँसी का पात्र बनना, उपहास होना |
| चित्त / चित | मन, अंतःकरण |
| चैन | शांति, सुकून |
| सन्मान | सम्मान, आदर |
| राग रंग | मनोरंजन, हँसी-खुशी |
| मनहिं न भावै | मन को अच्छा न लगना |
| टरत न टारे | टालने पर भी न टलना |
| खटकत | चुभना, खलना |
| जिय / जिय माहिं | हृदय में, मन में |
| बीती | बीता हुआ समय, अतीत |
| बिसारि दे | भुला दे, विस्मृत कर दे |
| सुधि लेइ | सुध/ध्यान लेना, चिंता करना |
| बनि आवै | सहज रूप से बन पड़े, संभव हो |
| दुर्जन | दुष्ट व्यक्ति, बुरा व्यक्ति |
| खता | दोष, गलती, अपराधबोध |
| परतीती | प्रतीति, विश्वास, भरोसा |
| समुझि | समझकर |
मेरी समझ से
(क) पाठ के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों का सही उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
(1) “बिना बिचारे” काम करने के क्या परिणाम होते हैं?
• दूसरों से प्रशंसा मिलती है।
• मन में शांति बनी रहती है।
• अपना काम बिगड़ जाता है।
• खान-पान सम्मान मिलता है।
(2) “चित्त में चैन” न पा सकने का मुख्य कारण क्या है?
• प्रयास करने पर भी टाला न जा सकने वाला दुख
• बिना सोचे-समझे किए गए कार्य की असफलता
• खान-पान, सम्मान और राग-रंग का अभाव
• दुनिया द्वारा की जाने वाली निंदा और उपहास
(3) “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ” पंक्ति द्वारा कौन-सी सलाह दी गई है?
• भविष्य की सफलता के लिए अतीत की गलतियों से सीखने की
• अतीत की असफलताओं को भूलकर भविष्य पर ध्यान देने की
• अतीत और भविष्य दोनों घटनाओं को समान रूप से याद रखने की
• अतीत और भविष्य दोनों को भूलकर केवल वर्तमान में जीने की
(4) “जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ” पंक्ति का क्या अर्थ है?
• हमें कठिनाइयों और चुनौतियों से बचना चाहिए।
• हमें आराम की तलाश करने में मन लगाना चाहिए।
• हमें असंभव और कठिन कार्यों पर ध्यान देना चाहिए।
• हमें सहज जीवन पर ध्यान देना चाहिए।
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।
(क) “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय। काम बिगारे आपनो जग में होत हँसाय॥”
(ख) “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ। जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ॥”
मिलकर करें मिलान
नीचे स्तंभ 1 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं, उनसे संबंधित अर्थ वाली स्तंभ 2 की पंक्तियों से उनका मिलान कीजिए—
| स्तंभ 1 (पंक्ति) | स्तंभ 2 (सही अर्थ) |
|---|---|
| 1. जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै। खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥ | बिना विचार के किए गए कार्य के कारण मन अशांत रहता है। अच्छा खान-पान, सम्मान या जीवन की खुशियाँ भी उस व्यक्ति को सुख नहीं दे पातीं। |
| 2. कह गिरिधर कविराय दुःख कछु टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥ | जो कार्य बिना विचार किए किया जाता है, वह लंबे समय तक मन में खटकता रहता है और उसकी पीड़ा से छुटकारा पाना मुश्किल होता है। |
| 3. ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥ | ऐसे कार्य कीजिए कि किसी बुरे व्यक्ति को हँसने का मौका न मिले और मन में किसी प्रकार का दोष या अपराधबोध न हो। |
| 4. कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती। आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती॥ | अपने मन को इस बात पर विश्वास करना सिखाओ कि भविष्य की खुशी को समझते हुए अतीत के दुखों को भुलाकर आगे बढ़ना चाहिए। |
सोच-विचार के लिए
पाठ को एक बार पुनः पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।
(क) “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय।” कविता में बिना विचार किए कार्य करने के क्या नुकसान बताए गए हैं?
(ख) “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय।” कुंडलिया में जो बातें सैंकड़ों साल पहले कही गई थीं, क्या वे आपके लिए भी उपयोगी हैं? कैसे? उदाहरण देकर समझाइए।
(ग) “खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥” इस पंक्ति में रेखांकित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से देखकर लिखिए। प्रत्येक के लिए एक-एक उदाहरण भी दीजिए।
अनुमान और कल्पना से
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए—
(क) आपने पढ़ा है कि “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय…।” कल्पना कीजिए कि आपके एक मित्र ने बिना सोचे-समझे एक बड़ा निर्णय लिया है। वह निर्णय क्या था और उसका क्या प्रभाव पड़ा? इसके बारे में एक रोचक कहानी अपने साथियों के साथ मिलकर बनाइए और कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
(ख) कल्पना कीजिए कि “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ…।” कविता निम्नलिखित के लिए लिखी गई है – आप / आपका कोई सहपाठी / आपका कोई परिजन / आपके कोई शिक्षक / कोई पक्षी / कोई पशु। इनकी कौन-कौन सी समस्याएँ होंगी? यह कविता उन्हें कैसे प्रेरित करेगी?
(ग) कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे व्यक्ति से मिले हैं, जो हमेशा बीती बातों में खोया रहता है। आप उसे समझाने के लिए क्या-क्या कहेंगे?
शब्द से जुड़े शब्द
नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में ‘चित्त’ या ‘मन’ से जुड़े शब्द कुंडलियों में से चुनकर लिखिए (केंद्र में दिए शब्द – ‘चैन’, ‘मन (चित्त)’)।
कविता की रचना
इन पंक्तियों को लय के साथ बोलने में बराबर समय लगता है, जिससे कुंडलियों की सुंदरता बढ़ गई है। कुंडलिया में प्रायः प्रत्येक का पहला या दूसरा शब्द उसका अंतिम शब्द भी होता है, बातें दो-दो पंक्तियों में कही जाती हैं और पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो कोई हमसे बातचीत कर रहा हो।
(क) पाठ में दी गई दोनों कुंडलियों को ध्यान से देखिए और अपने समूह में मिलकर इनकी विशेषताओं की सूची बनाइए।
| जो विशेषताएँ दोनों कुंडलियों में हैं | जो विशेषताएँ किसी एक कुंडलिया में हैं |
|---|---|
| • दोनों कुंडलियाँ छह-छह पंक्तियों की हैं। • दोनों में बातें दो-दो पंक्तियों में कही गई हैं। • दोनों में कवि के नाम ‘गिरिधर कविराय’ का उल्लेख है। • दोनों के अंत में आरंभ का शब्द (बीती / —) फिर दोहराया गया है, जैसे ‘बीती…बीती’। • दोनों नीतिपरक एवं उपदेशात्मक हैं और संवाद-सी शैली में हैं। | • पहली कुंडलिया में ‘जग में होत हँसाय’ पंक्ति की पुनरावृत्ति है। • दूसरी कुंडलिया में ‘ताही में चित देइ’ पंक्ति की पुनरावृत्ति है। • पहली कुंडलिया बिना विचारे काम करने के दोष पर केंद्रित है। • दूसरी कुंडलिया बीती बातों को भुलाने की सीख पर केंद्रित है। |
(ख) नीचे एक स्तंभ में कविता की पंक्तियों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं और उनसे संबंधित पंक्तियाँ दूसरे स्तंभ में दी गई हैं। कविता की विशेषताओं का सही पंक्तियों से मिलान कीजिए—
| कविता की विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|
| 1. पंक्ति के अंतिम शब्द की ध्वनि आपस में मिलती-जुलती है। | क. कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती॥ |
| 2. कवि के नाम का उल्लेख किया गया है। | ख. ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥ |
| 3. एक-दूसरे के विपरीत विचार एक साथ आए हैं। | ग. बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय। |
| 4. एक ही वर्ण से शुरू होने वाले एक से अधिक शब्द एक ही पंक्ति में आए हैं। | घ. बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ। |
काल से जुड़े शब्द
“बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” इस वाक्य में ‘बीती’ शब्द भूतकाल का तथा ‘आगे’ शब्द भविष्य का बोध कराता है। एक ही शब्द कभी-कभी भूत, वर्तमान एवं भविष्य – तीनों प्रकार के वाक्यों में आ सकता है।
(क) नीचे कुछ शब्द दिए गए हैं। इनका प्रयोग करते हुए तीनों प्रकार के ‘काल’ व्यक्त करने वाले तीन-तीन वाक्य बनाइए (कल, परसों, पहले, पिछला आदि)।
| काल | शब्द | नमूना वाक्य |
|---|---|---|
| भूतकाल | कल / परसों / पहले / पिछला / बीते हुए | • कल मैंने पुस्तक पढ़ी थी। • परसों वर्षा हुई थी। • पिछला सप्ताह बहुत व्यस्त रहा। |
| वर्तमान काल | आज / अभी-अभी / अब / हमेशा / आजकल | • आज मैं विद्यालय जा रहा हूँ। • अभी-अभी घंटी बजी है। • आजकल मौसम सुहावना है। |
| भविष्य काल | कल / परसों / अगले दिन / आगामी / जल्दी ही | • कल हम पिकनिक पर जाएँगे। • परसों परीक्षा होगी। • जल्दी ही नया सत्र आरंभ होगा। |
(ध्यान दें – ‘कल’ तथा ‘परसों’ जैसे शब्द भूतकाल एवं भविष्य काल – दोनों में प्रयुक्त हो सकते हैं; अर्थ वाक्य के अन्य शब्दों से स्पष्ट होता है।)
(ख) आपने जो वाक्य बनाए हैं, उन्हें ध्यान से देखिए। पहचानिए कि इन वाक्यों में किन शब्दों से पता चल रहा है कि कार्य भूतकाल में हुआ, वर्तमान में हो रहा है या भविष्य में होगा? वाक्यों में उन शब्दों को रेखांकित कीजिए।
पाठ से आगे (आपकी बात आदि)
आपकी बात
(क) “खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥” का अर्थ है ‘बिना सोचे किए गए कार्य मन में चुभते रहते हैं।’ क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है? उस घटना को साझा कीजिए।
(ख) “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” का अर्थ है ‘अतीत को भूलना और भविष्य पर ध्यान देना चाहिए।’ क्या आप इस बात से सहमत हैं? क्यों? उदाहरण देकर समझाइए।
(ग) पाठ में दी गई दोनों कुंडलियों के आधार पर आप अपने जीवन में कौन-कौन से बदलाव लाना चाहेंगे?
(घ) “खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥” इस पंक्ति में खान-पान, सम्मान और राग-रंग अच्छा न लगने की बात की गई है। आप इसमें से किसे सबसे आवश्यक मानते हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।
अन्य गतिविधियाँ (हँसी / सोच-समझकर / आज की पहेली / खोजबीन के लिए)
अतिरिक्त प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. गिरिधर कविराय किस विधा की रचना के लिए प्रसिद्ध हैं और उनकी रचनाएँ किस रूप में सुनी जाती हैं?
2. पहली कुंडलिया में बिना विचारे काम करने वाले व्यक्ति की क्या दशा बताई गई है?
3. ‘खटकत है जिय माहिं’ पंक्ति का क्या आशय है?
4. दूसरी कुंडलिया में कवि ने जीवन में सुख पाने का क्या उपाय बताया है?
5. ‘दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै’ पंक्ति से क्या सीख मिलती है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. गिरिधर कविराय की दोनों कुंडलियों का मूल भाव (केंद्रीय संदेश) अपने शब्दों में लिखिए।
7. ‘कुंडलिया’ छंद की प्रमुख विशेषताएँ इन दोनों कुंडलियों के आधार पर समझाइए।
8. “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय” – यह सीख आज के समय में कैसे उपयोगी है? उदाहरण सहित समझाइए।
अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
1. इन कुंडलियों के रचनाकार कौन हैं?
(क) कबीरदास
(ख) गिरिधर कविराय
(ग) रहीम
(घ) तुलसीदास
2. ये दोनों रचनाएँ किस छंद/विधा में हैं?
(क) दोहा
(ख) चौपाई
(ग) कुंडलिया
(घ) सोरठा
3. “बिना बिचारे जो करै” काम करने वाले को क्या भुगतना पड़ता है?
(क) धन की प्राप्ति
(ख) पछतावा और उपहास
(ग) सबका सम्मान
(घ) मन की शांति
4. गिरिधर कविराय का जन्म किस सदी में हुआ माना जाता है?
(क) सोलहवीं सदी
(ख) सत्रहवीं सदी
(ग) अठारहवीं सदी
(घ) उन्नीसवीं सदी
5. ‘बिसारि दे’ शब्द का अर्थ है—
(क) याद कर ले
(ख) भुला दे
(ग) सँभाल ले
(घ) सुना दे
6. दूसरी कुंडलिया के अनुसार किस काम में मन लगाना चाहिए?
(क) जो असंभव हो
(ख) जो सहज रूप से बन पड़े
(ग) जो बहुत कठिन हो
(घ) जो दूसरों का हो
7. ‘खटकत है जिय माहिं’ में ‘जिय’ का अर्थ है—
(क) शरीर
(ख) हृदय/मन
(ग) आँख
(घ) हाथ
8. कुंडलिया की एक प्रमुख विशेषता यह है कि—
(क) इसमें केवल दो पंक्तियाँ होती हैं
(ख) जिस शब्द से आरंभ होती है, उसी पर समाप्त होती है
(ग) इसमें तुक नहीं मिलाई जाती
(घ) इसमें कवि का नाम नहीं आता
9. ‘दुर्जन’ शब्द का अर्थ है—
(क) सज्जन व्यक्ति
(ख) दुष्ट व्यक्ति
(ग) मित्र
(घ) गुरु
10. इन कुंडलियों का मुख्य भाव क्या है?
(क) प्रकृति-वर्णन
(ख) वीर-रस का चित्रण
(ग) नीति एवं जीवन-व्यवहार की सीख
(घ) हास्य-व्यंग्य
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): बिना विचारे काम करने वाले को बाद में पछताना पड़ता है।
कारण (R): बिना विचारे किया गया काम बिगड़ जाता है और व्यक्ति जग में हँसी का पात्र बनता है।
2. अभिकथन (A): कवि के अनुसार बीती बातों को सदा याद रखकर उन्हीं में डूबे रहना चाहिए।
कारण (R): कवि कहते हैं “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।”
3. अभिकथन (A): बिना विचारे किया गया काम मन में सदा खटकता रहता है।
कारण (R): कवि के अनुसार ऐसे काम का दुख टालने पर भी नहीं टलता।
4. अभिकथन (A): मनुष्य को सहज रूप से बन पड़ने वाले कार्य में मन लगाना चाहिए।
कारण (R): ऐसा करने से कोई दुष्ट हँस नहीं पाता और मन में कोई दोष नहीं रहता।
5. अभिकथन (A): ये दोनों रचनाएँ कुंडलिया छंद में हैं।
कारण (R): इनमें कवि के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है।
परीक्षा-टिप्स
• दोनों कुंडलियों की पहली पंक्ति (‘बिना बिचारे…’ तथा ‘बीती ताहि…’) कंठस्थ रखें – ये प्रायः सूक्ति/भावार्थ के प्रश्नों में पूछी जाती हैं।
• ‘कुंडलिया’ की पहचान याद रखें – जिस शब्द से आरंभ, उसी पर अंत; दोहा + रोला का मेल; छह पंक्तियाँ; कवि का नाम भीतर आना।
• भावार्थ लिखते समय सरल हिंदी का प्रयोग करें और हर कुंडलिया की सीख (नीति) एक वाक्य में अवश्य लिखें।
सामान्य गलतियाँ – इनसे बचें
• ब्रजभाषा के पुराने शब्दों (बिचारे, बिसारि, सुधि, परतीती, जिय) का अर्थ गलत न समझें – इन्हें शब्दार्थ तालिका से याद रखें।
• कुंडलिया को ‘दोहा’ लिख देना सामान्य भूल है – इसकी विधा सदा ‘कुंडलिया’ लिखें।
• दूसरी कुंडलिया का अर्थ ‘अतीत को बिल्कुल याद न रखो’ न लिखें; सही भाव है – अतीत के दुख में उलझे न रहकर भविष्य पर ध्यान देना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
इस पाठ की कुंडलियों के रचनाकार कौन हैं?
इन कुंडलियों के रचनाकार गिरिधर कविराय हैं, जो अठारहवीं सदी में हुए और अपनी लोकप्रचलित नीतिपरक कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
पहली कुंडलिया का मुख्य संदेश क्या है?
पहली कुंडलिया का मुख्य संदेश है कि कोई भी काम बिना सोचे-विचारे नहीं करना चाहिए, अन्यथा काम बिगड़ता है, उपहास होता है और बाद में पछताना पड़ता है।
“बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि बीती हुई बातों (अतीत के दुख) को भुलाकर भविष्य पर ध्यान देना चाहिए तथा जो काम सहज रूप से बन पड़े, उसी में मन लगाना चाहिए।
‘कुंडलिया’ छंद की मुख्य पहचान क्या है?
कुंडलिया छह पंक्तियों का छंद है, जिसमें दोहा और रोला का मेल होता है तथा जिस शब्द से यह आरंभ होती है, उसी शब्द पर समाप्त भी होती है।
कुंडलियाँ एवं प्रश्न/गतिविधि-शीर्षक NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
