कक्षा 7 हिंदी मल्हार पाठ 8 — बिरजू महाराज से साक्षात्कार प्रश्न उत्तर और सार

बिरजू महाराज से साक्षात्कार प्रश्न उत्तर: कक्षा 7 हिंदी मल्हार पाठ 8 का सार, शब्दार्थ, अभ्यास, उपसर्ग-प्रत्यय, लय, कथक, ताल-पहेली और साक्षात्कार की तैयारी पढ़ें। रचनात्मक और भूमिका-निर्वाह वाले उत्तर नमूने हैं।

कक्षा: 7 विषय: हिंदी पुस्तक: मल्हार पाठ: 8 साक्षात्कारदाता: पं. बिरजू महाराज विधा: साक्षात्कार (गद्य) स्रोत प्रति: पुनर्मुद्रण 2026–27

स्रोत: NCERT मल्हार पाठ 8 की PDF, मुद्रित पृष्ठ 96–115; पहेली-उत्तर पृष्ठ 152, पुनर्मुद्रण 2026–27। व्यक्तिगत, कल्पनात्मक और समूह-कार्य वाले उत्तर नमूने हैं; अपने अनुभव के अनुसार लिखें।

परिचय – पं. बिरजू महाराज

पं. बिरजू महाराज (1938–2022) कथक नृत्य के लखनऊ घराने के प्रमुख सम्मानित कलाकार थे। उन्हें कथक की कला विरासत में मिली – उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज एवं लच्छू महाराज उनके गुरु थे। बचपन में पारिवारिक आर्थिक संघर्ष के बावजूद उन्होंने कठोर साधना से कथक में महारत प्राप्त की और भारत ही नहीं, विदेशों में भी अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से ख्याति अर्जित की। नृत्य के साथ-साथ वे गायन, वादन, नृत्य-नाटिकाओं की रचना एवं चित्रकारी में भी निपुण थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बिरजू महाराज को भारत सरकार ने पद्मविभूषण से सम्मानित किया। प्रस्तुत पाठ उनके जीवन, साधना एवं विचारों पर आधारित एक व्यक्तिपरक साक्षात्कार है।

पाठ का सार

‘बिरजू महाराज से साक्षात्कार’ एक व्यक्तिपरक साक्षात्कार है जिसमें श्रेया, तनुश्री और माणिक नामक बच्चे प्रसिद्ध कथक-नर्तक पं. बिरजू महाराज से प्रश्न पूछते हैं और महाराज उत्तर देते हुए अपने जीवन, साधना एवं कला-दृष्टि से परिचय कराते हैं।

बिरजू महाराज बताते हैं कि एक समय उनका परिवार ‘छोटे नवाब’ कहलाता था, परंतु पिता के देहांत के बाद आर्थिक संकट गहरा गया। उस कठिन दौर में उनकी माँ (अम्मा) उनकी सबसे बड़ी सहयोगी रहीं, जो सदा कहती थीं – “खाने को भले चना मिले या कुछ भी न मिले, पर अभ्यास जरूर करो।” घर में कथक का माहौल होने से वे औपचारिक प्रशिक्षण से पहले ही देख-देखकर कथक सीख गए थे।

वे गुरु-शिष्य परंपरा के ‘गंडा’ (ताबीज़) बँधाने की रस्म का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि उन्होंने इस परंपरा को उलट दिया – वे शिष्य में सच्ची लगन देखकर ही गंडा बाँधते हैं। महाराज कथक की प्राचीन परंपरा, हरिया गाँव के कथिकों की कथा, लखनऊ-जयपुर-बनारस घरानों के विकास तथा संगीत में ‘लय’ के महत्व को समझाते हैं। वे कहते हैं कि लय जीवन के हर काम में संतुलन बनाए रखती है। उन्होंने कथक की पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए उसके प्रस्तुतीकरण में नवीनता लाई और टैगोर, त्यागराज जैसे कवियों की रचनाओं पर भी कथक तैयार किया, क्योंकि उनका मानना था कि भाषाएँ भले अलग हों, इंसान सब जगह एक-से हैं।

महाराज शास्त्रीय एवं लोक नृत्य का अंतर बताते हैं, भारत की विभिन्न नृत्य-शैलियों (कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी) की चर्चा करते हैं और स्त्री-शिक्षा एवं हुनर के पक्षधर दिखते हैं। वे बच्चों से आग्रह करते हैं कि वे संगीत अवश्य सीखें, क्योंकि लय अनुशासन एवं संतुलन सिखाती है और मन की शांति देती है। इस प्रकार यह साक्षात्कार बिरजू महाराज के संघर्ष, समर्पण, बहुमुखी प्रतिभा एवं जीवन-दर्शन को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।

बिरजू महाराज से साक्षात्कार: छोटे लकड़ी के दायाँ और बड़े धातु के बायाँ तबले के सामने पीतल के घुँघरू
कथक की लय और वादन समझने के लिए तबला-जोड़ी तथा घुँघरुओं का AI-सहायता से बनाया गया चित्र। ये किसी कलाकार के वास्तविक वाद्य या निजी संग्रह की तस्वीर नहीं हैं।

यह पुस्तक में दिया पुराना साक्षात्कार है; ‘आजकल’, ‘पिछले दो वर्ष’ और पद/नौकरी संबंधी बातें उसी बातचीत के समय की हैं, 2026 की वर्तमान स्थिति नहीं। जन्म-वर्ष 1938 का उल्लेख संगीत नाटक अकादेमी के परिचय में है; निधन 2022 का PIB अभिलेख देखें।

शब्दार्थ

कठिन शब्दअर्थ
साक्षात्कारभेंटवार्ता, इंटरव्यू
विरासतपूर्वजों से मिली संपत्ति/धरोहर
स्मरणयाद करना
साधनाकठोर अभ्यास, तपस्या
संघर्षकठिनाई से जूझना
देहांतमृत्यु, निधन
गंडागुरु द्वारा शिष्य को बाँधा जाने वाला ताबीज़/धागा
तालीमशिक्षा, प्रशिक्षण
औपचारिकविधिवत, नियमबद्ध
घरानाकलाकारों का समुदाय जो विशिष्ट शैली साझा करे
लयसंगीत/गति का नियमित प्रवाह एवं संतुलन
लहरानृत्य के साथ बजने वाली एक संगीत-धुन
भाव-भंगिमाहाव-भाव एवं अंग-संचालन
शास्त्रीयशास्त्रों/नियमों पर आधारित (परंपरागत)
सामूहिकसमूह में मिलकर किया जाने वाला
आत्मनिर्भरअपने पैरों पर खड़ा, स्वावलंबी
हुनरकौशल, कला
दयनीयदया योग्य, खराब स्थिति
लासानी / अनोखीबेजोड़, अद्वितीय
अनुशासननियमों का पालन, व्यवस्था

मेरी समझ से

(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे सही उत्तर कौन-सा है? उनके सामने तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

1. बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन क्यों किया होगा?

• वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे।

• वे नृत्य शिक्षण के लिए इस परंपरा को महत्वपूर्ण नहीं मानते थे।

• वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे।

• वे शिष्य की भेंट देने की सामर्थ्य को परखना चाहते थे।

उत्तर★ वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे तथा ★ वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे।बिरजू महाराज कई वर्ष नृत्य सिखाने के बाद, जब शिष्य में सच्ची लगन देखते हैं, तभी गंडा बाँधते हैं। इसका उद्देश्य शिष्य की निष्ठा, लगन एवं समर्पण को परखना है, न कि उसकी भेंट देने की सामर्थ्य।

2. “जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है।” बिरजू महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए?

• पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा।

• कोई भी संस्था नृत्य प्रस्तुतियों के लिए आमंत्रित नहीं करती थी।

• किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी।

• नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे।

उत्तर★ पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा तथा ★ किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी।पहले उनका परिवार ‘छोटे नवाब’ कहलाता था और घर में सुख-समृद्धि थी; पिता के देहांत के बाद आर्थिक परेशानियाँ बढ़ गईं – यही उनके जीवन के उतार-चढ़ाव हैं। शेष दोनों कथन पाठ में नहीं हैं।

3. बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए?

• संगीत, नृत्य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करती हैं।

• कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

• कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

• वर्तमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नहीं है।

उत्तर★ कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है तथा ★ कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।महाराज कहते हैं कि लय के साथ खेलने में संतुलन, समय का अंदाजा एवं उसका सदुपयोग बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है तथा यह एक ऐसा खेल है जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

उत्तर (मार्गदर्शन)यह समूह में मिलकर करने वाली गतिविधि है। उत्तर चुनते समय हमने सीधे पाठ के संदर्भ को आधार बनाया – जैसे गंडा वाली बात के लिए महाराज का यह कथन कि वे ‘सच्ची लगन’ देखकर ही गंडा बाँधते हैं।मित्रों से चर्चा करने पर पता चलता है कि कुछ प्रश्नों के एक से अधिक सही उत्तर हो सकते हैं; एक-दूसरे के तर्क सुनकर हम अपने उत्तर को और पक्के कर पाते हैं तथा सही निष्कर्ष तक पहुँचते हैं।

मिलकर करें मिलान

पृष्ठ 105 के दूसरे स्तंभ का मूल क्रम:

शब्द का मूल क्रमसंदर्भ का क्रमसरल पहचान
1. कर्नाटक संगीत शैली2मुख्यतः दक्षिण भारत की शास्त्रीय संगीत परंपरा
2. घराना4पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिखाई जाने वाली विशिष्ट शैली/कलाकारों की परंपरा
3. शास्त्रीय संगीत1नियमबद्ध भारतीय गायन-वादन परंपरा
4. हिंदुस्तानी संगीत शैली6मुख्यतः उत्तर भारत की शास्त्रीय संगीत परंपरा
5. कनछेदन3कान छेदने का संस्कार
6. लोक नृत्य5क्षेत्रीय लोकजीवन और अवसरों से जुड़ा पारंपरिक नृत्य

मिलान: 1→2, 2→4, 3→1, 4→6, 5→3, 6→5।

पुस्तक हिंदुस्तानी संगीत के परिचय में छह प्रमुख राग कहती है। इसे आज के पूरे संगीत में केवल छह राग होने का अर्थ न दें; रागों की अनेक परंपराएँ और रूप हैं।

शीर्षक

इस पाठ का शीर्षक ‘बिरजू महाराज से साक्षात्कार’ है। यदि आप इस साक्षात्कार को कोई अन्य नाम देना चाहते हैं तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? लिखिए।

उत्तर (नमूना)मैं इस साक्षात्कार को ‘लय के साधक’ अथवा ‘कथक के महाराज’ नाम देना चाहूँगा।‘लय के साधक’ इसलिए, क्योंकि पूरे साक्षात्कार में बिरजू महाराज बार-बार ‘लय’ के महत्व की बात करते हैं और स्वयं संघर्ष में भी निरंतर साधना करते रहे; और ‘कथक के महाराज’ इसलिए, क्योंकि कथक को उन्होंने जीवन-भर समर्पित होकर नई ऊँचाइयाँ दीं। दोनों नाम उनके व्यक्तित्व एवं कला-साधना को संक्षेप में व्यक्त करते हैं।

पंक्तियों पर चर्चा

साक्षात्कार में से चुने गए कुछ वाक्यों को ध्यान से पढ़िए और उन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया?

(क) “तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।”

अर्थ/विचारयह बात बिरजू महाराज से उनके चाचा ने कही थी। इसका अर्थ है कि यदि व्यक्ति का ध्यान एक साथ कई कामों में बँट जाए, तो वह किसी एक कला में पूरी तरह निखर नहीं पाता।किसी कला में सर्वोच्च स्थान पाने के लिए पूरा समय, मन एवं समर्पण उसी को देना पड़ता है – तभी प्रतिभा पूरी तरह विकसित होती है।

(ख) “नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।”

अर्थ/विचारनृत्य केवल शरीर का संचालन नहीं, बल्कि एकाग्रता (ध्यान) एवं कठोर साधना (तपस्या) की माँग करता है।सच्चा नर्तक तन, मन एवं अभ्यास तीनों को एक साथ साधता है; इसीलिए महाराज नृत्य को एक तरह से ‘अदृश्य शक्ति को निमंत्रण देना’ कहते हैं।

(ग) “कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।”

अर्थ/विचारइसका अर्थ है कि कथक में गर्दन का संचालन बहुत कोमल, धीमा एवं संतुलित होता है – ठीक वैसे ही जैसे दीपक की लौ हल्के-से लहराती है।यह कथक की नज़ाकत एवं सूक्ष्मता को दर्शाता है; जरा-सी अधिकता या जोर लय एवं सौंदर्य को बिगाड़ देता है, इसीलिए चाचा जी अधिक जोर पर तुरंत टोक देते थे।

सोच-विचार के लिए

1 (क) बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?

उत्तरउनके घर में कथक का माहौल था – पिता एवं चाचा सभी कथक के विख्यात कलाकार थे। इसलिए विधिवत तालीम शुरू होने से पहले ही वे देख-देखकर कथक सीख गए थे और नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे।

1 (ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?

उत्तरगाना, बजाना और नाचना – ये तीनों संगीत के ही अंग हैं और संगीत में लय होती है। नृत्य भी लय पर ही टिका है। यदि नर्तक को सुर-ताल एवं लय की समझ होगी, तभी वह पहचान सकेगा कि कौन-सा लहरा ठीक है और कैसे नृत्य अंगों में सहज रूप से उतरेगा। इसीलिए संगीत की समझ अनिवार्य है।

1 (ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्यों में रुचि थी?

उत्तरनृत्य के अतिरिक्त उन्हें गाने-बजाने, नृत्य-नाटिकाएँ एवं उनके लिए संगीत तैयार करने, मशीनों एवं यंत्रों को खोलकर देखने (वे ब्रीफकेस में पेचकस-औजार रखते थे और पंखा-फ्रिज ठीक कर लेते थे) तथा चित्रकारी (पेंटिंग) में गहरी रुचि थी।

1 (घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?

उत्तरउन्होंने अभिभावकों से विनती की कि यदि बच्चे की रुचि है तो उसे लय के साथ खेलने दें। जैसे अन्य खेल हैं, वैसे ही यह भी एक खेल है, जिसमें संतुलन, समय का अंदाजा एवं उसका सदुपयोग सीखने को मिलता है – जो बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

2. पाठ में से उन प्रसंगों की पहचान कर उन पर चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि —

उत्तर(क) बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे: वे नृत्य के साथ-साथ गाते-बजाते थे, नृत्य-नाटिकाओं के लिए संगीत रचते थे, मशीनें ठीक करते थे और रात-रात भर बैठकर पेंटिंग बनाते थे (दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र)।(ख) माँ का बड़ा योगदान: संघर्ष के दौर में अम्मा ने ज़री की साड़ियाँ जलाकर गुजारा किया, उनके दो कार्यक्रमों की कमाई पिता को गुरु-भेंट के रूप में दी और सदा कहती रहीं – “कुछ मिले या न मिले, अभ्यास जरूर करो।”(ग) महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर: उन्होंने अपनी बेटियों को खूब कथक सिखाया और कहा कि लड़कियों के पास शिक्षा या कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें – “हुनर ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता।”

शब्दों की बात

(क) पाठ में आए शब्दों में मूल शब्द के आगे जुड़ने वाले शब्दांश उपसर्ग तथा पीछे जुड़ने वाले शब्दांश प्रत्यय कहलाते हैं।

उपसर्ग वाले शब्दविभाजन
अदृश्यअ + दृश्य
आवरणआ + वरण
प्रशिक्षणप्र + शिक्षण
प्रत्यय वाले शब्दविभाजन
सीमितसीमा + इत
सुंदरतासुंदर + ता
भारतीयभारत + ईय
सामूहिकसमूह + इक

(ख) दिए गए शब्दांशों (उपसर्ग व प्रत्यय) तथा मूल शब्दों की सहायता से नए शब्द बनाइए।

उत्तरउपसर्ग से: आ + गमन = आगमन; सु + गमन = सुगमन; सु + कर्म = सुकर्म; अ + साधारण = असाधारण; सु + नाम = सुनाम।प्रत्यय से: राष्ट्र + ईय = राष्ट्रीय; संस्कृति + इक = सांस्कृतिक; श्रम + इक = श्रमिक; मर्म + इक = मार्मिक; खंड + इत = खंडित।

(ग) इस पाठ में से उपसर्ग व प्रत्यय की सहायता से बने कुछ और शब्द छाँटकर उनसे वाक्य बनाइए।

उत्तर (नमूना)आजीविका: हर व्यक्ति को अपनी आजीविका ईमानदारी से कमानी चाहिए।पारंपरिक: कथक एक पारंपरिक भारतीय नृत्य है।आधुनिक: महाराज ने विभिन्न कवियों की रचनाओं पर भी कथक तैयार किया।अनौपचारिक: पहले कथक कथा कहने का अनौपचारिक ढंग था।

शब्द-निर्माण में अक्षरों/स्वरों का बदलाव भी हो सकता है: राष्ट्र + ईय → राष्ट्रीय, संस्कृति + इक → सांस्कृतिक, मर्म + इक → मार्मिक। केवल दोनों टुकड़े जस के तस लिख देना हर शब्द का सही रूप नहीं बनाता। दिए ‘अ’ और ‘नाम’ से अनाम, ‘अ’ और ‘खंड’ से अखंड भी बना सकते हैं।

शब्दों का प्रभाव

1. “कुछ कथिक डर गए, किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।” इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘इतना’ हटाकर पढ़िए और पहचानिए कि क्या परिवर्तन आया है?

उत्तर‘इतना’ हटाने पर वाक्य बनेगा – “उन कथिकों की कला में दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर मग्न हो गए।” इससे वाक्य का अर्थ तो समझ आता है, पर कला की तीव्रता एवं मात्रा का भाव कमजोर पड़ जाता है।‘इतना’ शब्द कला के असाधारण प्रभाव पर बल देता है – अर्थात् कला में ‘इतना’ अधिक दम था कि डाकू तक मुग्ध हो गए। ऐसे शब्द वाक्य में विशेष प्रभाव एवं तीव्रता उत्पन्न करते हैं।

पाठ में आए ऐसे ही कुछ और शब्द ढूँढ़कर उन्हें रेखांकित कीजिए जिनके प्रयोग से वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है।

उत्तर (नमूना)‘बहुत’ (कथक की परंपरा बहुत पुरानी है), ‘खूब’ (मशीनों में मन खूब लगता है), ‘हरदम’ (मैं ब्रीफकेस में हरदम पेचकस रखता हूँ), ‘जरूर’ (अभ्यास जरूर करो), ‘कभी-कभी’ (नृत्य से कभी-कभी पैसा आ जाता था)।ये शब्द वाक्य में मात्रा, निरंतरता या बल का भाव जोड़कर उसे अधिक प्रभावशाली बना देते हैं।

कला का संसार (पाठ से आगे)

(क) “कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।” – बताइए कि कथक की प्रस्तुतियों में किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं?

उत्तरबिरजू महाराज ने अपने पिता एवं चाचा की सुंदर भाव-भंगिमाओं एवं खड़े होने के निराले अंदाज को कथक में शामिल किया तथा तीनों गुरुओं की शिक्षा मिलाकर एक नया रूप तैयार किया।उन्होंने टैगोर एवं त्यागराज जैसे विभिन्न कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ बनाईं। साथ ही पहले जहाँ नर्तक दृश्य का विस्तृत वर्णन करते थे, वहीं अब संकेत मात्र (‘पनघट की गत देखो’) देकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।

(ख) लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है? लिखिए।

आधारलोक नृत्यशास्त्रीय नृत्य
स्वरूपसामूहिक – लोग मिलकर नाचते हैं।एकल प्रस्तुति में एक नर्तक पर्याप्त हो सकता है; समूह प्रस्तुति भी होती है।
उद्देश्यथकान दूर करने एवं अपने मनोरंजन के लिए।मुख्यतः दर्शकों के लिए, कला-प्रदर्शन हेतु।
नियमअनौपचारिक, खुला रूप।शास्त्रों/नियमों पर आधारित, निश्चित शैली।
उदाहरणक्षेत्रीय फसल/उत्सव के नृत्य।कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी आदि।
संक्षेप मेंशुरू में कथावाचक भी लोक-नर्तक हुआ करता था; धीरे-धीरे जब उसकी शैली एवं रूप निश्चित हो गया, तो वह शास्त्रीय नृत्य बन गया।

(ग) “बैरगिया नाला जुलुम जोर, नौ कथिक नचावें तीन चोर…” पाठ में हरिया गाँव में गाए जाने वाले इस पद का उल्लेख है। आप अपने क्षेत्र के किसी लोकगीत को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर (गतिविधि)यह कक्षा में मिलकर करने वाली प्रस्तुति है। विद्यार्थी अपने क्षेत्र का कोई लोकगीत (जैसे फसल-कटाई, विवाह, त्योहार या ऋतु का गीत) चुनें, उसका अर्थ समझें और लय-ताल के साथ कक्षा में गाएँ। इससे क्षेत्र की लोक-संस्कृति की समझ बढ़ती है।

साक्षात्कार की रचना

प्रस्तुत पाठ की विधा ‘साक्षात्कार’ है। यह एक व्यक्तिपरक साक्षात्कार है, जिसका उद्देश्य साक्षात्कारदाता के जीवन, कामकाज, उपलब्धियों एवं विचारों को पाठकों के सामने लाना है।

(क) साक्षात्कार से पहले क्या-क्या तैयारियाँ की गई होंगी?

उत्तरसाक्षात्कार से पहले बिरजू महाराज के जीवन, कथक-परंपरा एवं उनकी उपलब्धियों के बारे में पर्याप्त शोध (पढ़ाई) किया गया होगा।सोच-समझकर क्रमबद्ध प्रश्न तैयार किए गए होंगे, समय एवं स्थान तय किया गया होगा तथा संवेदनशीलता एवं धैर्य के साथ बातचीत की योजना बनाई गई होगी – क्योंकि साक्षात्कार की सफलता इन्हीं तैयारियों पर निर्भर करती है।

(ख) आप इस साक्षात्कार में और क्या-क्या प्रश्न जोड़ना चाहेंगे?

उत्तर (नमूना)• अपनी सबसे यादगार प्रस्तुति कौन-सी रही? • विदेशी दर्शकों ने कथक को कैसे अपनाया? • नए विद्यार्थियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे? • अभ्यास के समय आप थकान एवं निराशा से कैसे जूझते थे? • आपके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा कौन रहा?

(ग) यह साक्षात्कार एक सुप्रसिद्ध कलाकार का है। यदि आपको किसी सब्जी विक्रेता, रिक्शा चालक, घरेलू सहायक/सहायिका का साक्षात्कार लेना हो तो आपके प्रश्न किस प्रकार के होंगे?

उत्तर (नमूना)प्रश्न उनके जीवन एवं रोज़मर्रा के काम से जुड़े सरल एवं संवेदनशील होंगे, जैसे – “आप यह काम कब से कर रहे हैं? दिनभर में कितनी मेहनत करनी पड़ती है? सबसे बड़ी कठिनाई क्या है? इस काम से क्या-क्या सीखा? आपके सुख-दुख क्या हैं और भविष्य के लिए आपके सपने क्या हैं?”

सृजन

आपके विद्यालय में कथक नृत्य का आयोजन होने जा रहा है।

(क) आप दर्शकों को कथक नृत्यकला के बारे में क्या-क्या बताएँगे? लिखिए।

उत्तरकथक उत्तर भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य परंपरा है; पुस्तक कथावाचन और ब्रज की रासलीला से उसके संबंध बताती है। ‘कथक’ शब्द ‘कथिक’ (कथावाचक) से बना है। इसमें पद, भाव-भंगिमा, तबला एवं घुँघरू का सुंदर मेल होता है तथा लखनऊ, जयपुर एवं बनारस इसके प्रमुख घराने हैं।इसकी विशेषता है – पैरों की तेज़ ‘तत्कार’, चक्करदार घुमाव, कोमल भाव-भंगिमाएँ तथा तबलावादक एवं नर्तक के बीच की जुगलबंदी।

(ख) इस कार्यक्रम की सूचना देने के लिए एक विज्ञापन तैयार कीजिए।

★ कथक संध्या ★
[अपने विद्यालय का नाम और नगर]
दिनांक: 25 जुलाई 2026  |  समय: सायं 5 बजे  |  स्थान: विद्यालय सभागार
आइए, कथक के मनमोहक बोल, तत्कार एवं भाव-भंगिमाओं का आनंद लें।
प्रवेश निःशुल्क — सभी सादर आमंत्रित हैं।

(ग) यदि इस नृत्य कार्यक्रम में कोई दृष्टिबाधित दर्शक है और वह नृत्य का आनंद लेना चाहे, तो विद्यालय की ओर से क्या व्यवस्था की जानी चाहिए?

उत्तरदृष्टिबाधित दर्शक के पास एक सहायक बैठाया जा सकता है, जो धीमे स्वर में नृत्य के दृश्य एवं भाव का वर्णन करता रहे (श्रव्य-वर्णन)।तबले एवं घुँघरू की ध्वनि, बोल एवं संगीत स्पष्ट और आरामदायक स्तर पर रखें; सुलभ रास्ता और दर्शक की पसंद का सुविधाजनक स्थान दें तथा कलाकार तथा दर्शक की सहमति से प्रस्तुति के बाद वेशभूषा/वाद्य का स्पर्श-परिचय कराया जा सकता है।

आज की पहेली

पृष्ठ 109 की डायरी में तालों के नाम दो तरह से छिपे हैं: रूपक और लक्ष्मी कलाकारों के नाम हैं; बाकी नाम पसंद पूछने में आते हैं। पृष्ठ 110 की ग्रिड और पृष्ठ 152 की कुंजी के सात उत्तर:

रूपक, लक्ष्मी, तिलवाड़ा, कहरवा, झूमरा, दीपचंदी, दादरा।

ताल मात्राओं का व्यवस्थित आवर्ती समूह/चक्र है; मात्रा संगीत का समय गिनने की इकाई है। एक मात्रा हर प्रस्तुति में तय एक सेकंड नहीं होती—गति बदल सकती है। डायरी काल्पनिक विद्यालय-घटना है, बिरजू महाराज की जीवनी का नया तथ्य नहीं।

साझी समझ & खोजबीन के लिए

झरोखे से — नृत्य की छटाएँ

पुस्तक सात रूपों का विवरण देती है: भरतनाट्यम, कथकली, कथक, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, ओडिसी और मोहिनीअट्टम। कथक में कथावाचन, लय, तत्कार और भाव; कथकली में नृत्य-नाट्य व सशक्त अभिनय; ओडिसी में त्रिभंग; कुचिपुड़ी में तरंगम; मणिपुरी में कोमल गति; मोहिनीअट्टम में लास्य और भरतनाट्यम में नियमबद्ध अंग-संचालन पर चर्चा करें। स्त्री/पुरुष संबंधी कथन पुस्तक की पारंपरिक प्रस्तुति का संदर्भ हैं, सीखने की आज की सर्वव्यापी रोक नहीं।

साझी समझ — मानचित्र बनाने का आधार

पाँच-पाँच विद्यार्थियों का समूह बनाएँ। राज्य पर नाम/नंबर रखें और अलग संकेत-सूची बनाएँ। संबंधित क्षेत्र ये हैं; कलाकार आज अन्य राज्यों में भी अभ्यास करते हैं:

शास्त्रीय नृत्यमुख्य संबद्ध क्षेत्र
भरतनाट्यमतमिलनाडु
कथकली; मोहिनीअट्टमकेरल
कथकउत्तर भारत—उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि
कुचिपुड़ीआंध्र प्रदेश
मणिपुरीमणिपुर
ओडिसीओडिशा
सत्रिय — अतिरिक्त जानकारीअसम

पुस्तक के सात विस्तृत परिचयों से आगे असम का सत्रिय भी शास्त्रीय नृत्य है। संगीत नाटक अकादेमी का सत्रिय केंद्र और CCRT की सांस्कृतिक सामग्री देखें।

लोक नृत्य के नमूने: गुजरात—गरबा; पंजाब—भांगड़ा; असम—बिहू; राजस्थान—घूमर; महाराष्ट्र—लावणी; झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के संबंधित क्षेत्रों—छऊ। इनके अवसर, संगीत, पोशाक और समूह-रूप जाँचकर सूची भरें। यह उदाहरण-सूची है, हर राज्य के सभी नृत्यों की पूरी सूची नहीं।

खोजबीन

पुस्तक के वीडियो और विद्यालय पुस्तकालय से प्रस्तुति देखें। नृत्य-रूप, लय, वाद्य, कलाकार और स्रोत दर्ज करें। केवल देखने के आधार पर किसी कलाकार की पूरी जीवनी न लिखें।

पढ़ने के लिए — नृत्यांगना सुधा चंद्रन

रामाज्ञा तिवारी का पूरक पाठ नियमित प्रशिक्षण, दुर्घटना के बाद सहायता, विशेष कृत्रिम पैर और अभ्यास से नृत्य में लौटने की उनकी यात्रा बताता है। पुस्तक में 2 मई 1981 की दुर्घटना और 28 जनवरी 1984 की पुनः सार्वजनिक प्रस्तुति का उल्लेख है। डॉक्टर और नृत्य-शिक्षक की संयुक्त सहायता उनके प्रयास के साथ महत्त्वपूर्ण है। इसे हर व्यक्ति के लिए एक जैसे परिणाम की गारंटी न समझें।

वैज्ञानिक सुधार: पुस्तक गैंग्रीन को ‘एक प्रकार का कैंसर’ कहती है। गैंग्रीन कैंसर नहीं है; रक्तापूर्ति रुकने या गंभीर संक्रमण से शरीर का ऊतक मर सकता है। NHS का चिकित्सकीय परिचय देखें। यह साहित्यिक पाठ के शब्द की स्पष्टता है।

ClearStudy के अतिरिक्त प्रश्न

यह अतिरिक्त अभ्यास NCERT के मुद्रित अभ्यास से अलग है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. बिरजू महाराज को कथक की कला किस प्रकार प्राप्त हुई?

उत्तरबिरजू महाराज को कथक विरासत में मिला। उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज एवं लच्छू महाराज उनके गुरु थे। घर में कथक का माहौल होने से वे औपचारिक तालीम से पहले ही देख-देखकर कथक सीख गए थे।

2. संघर्ष के दौर में बिरजू महाराज की सबसे बड़ी सहयोगी कौन थीं और उन्होंने क्या कहा?

उत्तरउनकी सबसे बड़ी सहयोगी उनकी माँ (अम्मा) थीं। वे साड़ियों के सोने-चाँदी के तार बेचकर गुजारा करती थीं और सदा कहती थीं – “खाने को भले चना मिले या कुछ भी न मिले, पर अभ्यास जरूर करो।”

3. ‘गंडा’ क्या है और बिरजू महाराज ने इस परंपरा में क्या बदलाव किया?

उत्तर‘गंडा’ गुरु द्वारा शिष्य को बाँधा जाने वाला पवित्र ताबीज़ है, जो तालीम के आरंभ में बाँधा जाता है। बिरजू महाराज ने इसे उलट दिया – वे कई वर्ष सिखाने के बाद, शिष्य में सच्ची लगन देखकर ही गंडा बाँधते हैं।

4. बिरजू महाराज के अनुसार ‘लय’ का जीवन में क्या महत्व है?

उत्तरलय केवल नृत्य में ही नहीं, हमारी हर गतिविधि में होती है (जैसे घसियारा घास काटते समय)। लय हर काम, नृत्य एवं जीवन में संतुलन बनाए रखती है तथा अनुशासन सिखाती है; वह नृत्य को सुंदरता प्रदान करने वाला आवरण है।

5. बिरजू महाराज ने स्त्री-शिक्षा एवं हुनर के बारे में क्या विचार व्यक्त किए?

उत्तरउन्होंने अपनी बेटियों को कथक सिखाया और कहा कि लड़कियों के पास शिक्षा या कोई हुनर अवश्य होना चाहिए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। उनके अनुसार हुनर ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता और जो वक्त पड़ने पर काम आता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. इस साक्षात्कार के आधार पर बिरजू महाराज की बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दीजिए।

उत्तरबिरजू महाराज केवल कथक के महान नर्तक ही नहीं, बल्कि अनेक कलाओं में निपुण बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे नृत्य के साथ-साथ गाते एवं बजाते भी थे तथा नृत्य-नाटिकाएँ एवं उनके लिए संगीत भी स्वयं तैयार करते थे।उन्हें मशीनों एवं यंत्रों में गहरी रुचि थी – वे ब्रीफकेस में सदा पेचकस एवं औजार रखते थे और पंखा-फ्रिज जैसी मशीनें ठीक कर लेते थे; वे कहते थे कि यदि नर्तक न होते तो शायद इंजीनियर होते। बेटी-दामाद को देखकर उन्हें चित्रकारी का भी शौक हो गया और उन्होंने दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र बनाए। इस प्रकार नृत्य, संगीत, यंत्र-ज्ञान एवं चित्रकला – हर क्षेत्र में उनकी प्रतिभा झलकती थी।

7. बिरजू महाराज ने कथक की पुरानी परंपरा को बनाए रखते हुए उसमें कौन-कौन से नए प्रयोग किए? समझाइए।

उत्तरबिरजू महाराज ने कथक की पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए उसके प्रस्तुतीकरण में अनेक नवीन प्रयोग किए। उन्होंने अपने पिता एवं चाचाओं की सुंदर भाव-भंगिमाओं एवं खड़े होने के निराले अंदाज को कथक में शामिल किया तथा तीनों गुरुओं की शिक्षा मिलाकर एक नया रूप गढ़ा।उन्होंने टैगोर एवं त्यागराज जैसे भिन्न भाषाओं के विभिन्न कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ बनाईं, क्योंकि उनका मानना था कि भाषाएँ भले अलग हों, इंसान सब जगह एक-से होते हैं। प्रस्तुति में भी बदलाव आया – पहले नर्तक दृश्य का विस्तृत वर्णन करते थे, अब संकेत मात्र देकर शेष दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार उन्होंने परंपरा एवं नवीनता का सुंदर संतुलन बनाया।

8. इस साक्षात्कार से हमें कौन-कौन से जीवन-मूल्यों की प्रेरणा मिलती है?

उत्तरइस साक्षात्कार से हमें अनेक जीवन-मूल्यों की प्रेरणा मिलती है। सबसे पहले, कठिनाई में भी निरंतर अभ्यास एवं साधना न छोड़ने का संदेश – जैसा महाराज की माँ कहती थीं कि “कुछ मिले या न मिले, अभ्यास जरूर करो।”दूसरे, किसी एक लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण एवं दृढ़ निश्चय का महत्व; तीसरे, परंपरा का सम्मान करते हुए नएपन को अपनाने की दृष्टि; चौथे, स्त्री-शिक्षा, समानता एवं आत्मनिर्भरता का भाव; और पाँचवें, लय, अनुशासन एवं संतुलन का जीवन में महत्व। यह साक्षात्कार हमें मेहनत, समर्पण एवं विनम्रता के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

ClearStudy अभ्यास MCQ और अभिकथन-कारण

1. यह साक्षात्कार किस प्रसिद्ध कलाकार का है?

(क) पं. रविशंकर

(ख) पं. बिरजू महाराज

(ग) उस्ताद ज़ाकिर हुसैन

(घ) पं. भीमसेन जोशी

उत्तर(ख) पं. बिरजू महाराज।

2. बिरजू महाराज किस शास्त्रीय नृत्य से संबंधित थे?

(क) भरतनाट्यम

(ख) ओडिसी

(ग) कथक

(घ) कथकली

उत्तर(ग) कथक।

3. संघर्ष के दौर में बिरजू महाराज की सबसे बड़ी सहयोगी कौन थीं?

(क) उनकी बहन

(ख) उनकी माँ (अम्मा)

(ग) उनकी बेटी

(घ) उनके चाचा

उत्तर(ख) उनकी माँ (अम्मा)।

4. ‘गंडा’ किसके बीच का पवित्र रिश्ता माना जाता है?

(क) मित्र और मित्र

(ख) माता और पुत्र

(ग) गुरु और शिष्य

(घ) राजा और प्रजा

उत्तर(ग) गुरु और शिष्य।

5. बिरजू महाराज के पिता का नाम क्या था?

(क) शंभू महाराज

(ख) लच्छू महाराज

(ग) अच्छन महाराज

(घ) चक्रधर महाराज

उत्तर(ग) अच्छन महाराज।

6. कथक के विकास से जुड़े घराने हैं —

(क) लखनऊ, जयपुर एवं बनारस

(ख) दिल्ली, आगरा एवं ग्वालियर

(ग) पटना, राँची एवं भोपाल

(घ) पुणे, नागपुर एवं इंदौर

उत्तर(क) लखनऊ, जयपुर एवं बनारस।

7. बिरजू महाराज के अनुसार जीवन एवं नृत्य में संतुलन बनाए रखती है —

(क) धन-संपत्ति

(ख) लय

(ग) प्रसिद्धि

(घ) पोशाक

उत्तर(ख) लय।

8. नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज की किस कार्य में विशेष रुचि थी?

(क) खेलकूद में

(ख) मशीनें ठीक करने एवं चित्रकारी में

(ग) व्यापार में

(घ) राजनीति में

उत्तर(ख) मशीनें ठीक करने एवं चित्रकारी में।

9. शास्त्रीय नृत्य मुख्यतः किसके लिए किया जाता है?

(क) केवल अपने मनोरंजन के लिए

(ख) दर्शकों के लिए

(ग) केवल पूजा के लिए

(घ) व्यायाम के लिए

उत्तर(ख) दर्शकों के लिए।

10. प्रस्तुत पाठ की विधा क्या है?

(क) कहानी

(ख) कविता

(ग) साक्षात्कार

(घ) निबंध

उत्तर(ग) साक्षात्कार।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ग), 6-(क), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): बिरजू महाराज औपचारिक प्रशिक्षण से पहले ही कथक सीख गए थे।

कारण (R): उनके घर में कथक का माहौल था और वे देख-देखकर सीख गए थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): बिरजू महाराज शिष्य को तालीम के पहले ही दिन गंडा बाँध देते थे।

कारण (R): वे कई वर्ष सिखाने के बाद, शिष्य में सच्ची लगन देखकर ही गंडा बाँधते थे।

उत्तर(घ) A गलत है (उन्होंने परंपरा उलट दी थी), जबकि R सही है।

3. अभिकथन (A): नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ आवश्यक है।

कारण (R): गाना, बजाना एवं नाचना तीनों संगीत के अंग हैं और संगीत में लय होती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): बिरजू महाराज महिलाओं की शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता के पक्षधर थे।

कारण (R): उन्होंने अपनी बेटियों को कथक सिखाया और हुनर को न छिनने वाला खज़ाना बताया।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): लोक नृत्य एवं शास्त्रीय नृत्य एक ही समान होते हैं।

कारण (R): साक्षात्कार में लोक नृत्य के सामूहिक मनोरंजन और शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति/नियमबद्धता पर बल है; दोनों की एकल और समूह प्रस्तुतियाँ भी संभव हैं।

उत्तर(घ) A गलत है (दोनों में अंतर है), जबकि R सही है।
उत्तर-कुंजी (अभिकथन-कारण): 1-(क), 2-(घ), 3-(क), 4-(क), 5-(घ)

परीक्षा-उपयोगी सुझाव एवं सामान्य भूलें

परीक्षा-उपयोगी सुझाव

  • साक्षात्कार के मुख्य बिंदु क्रम से याद रखें – संघर्ष, गुरु-परंपरा (गंडा), लय का महत्व, कथक के नए प्रयोग, बहुमुखी प्रतिभा एवं स्त्री-शिक्षा।
  • विधा-आधारित प्रश्न में ‘साक्षात्कार’ को ‘व्यक्तिपरक भेंटवार्ता’ के रूप में परिभाषित करें।
  • नृत्य-शैलियों (कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी) को उनके राज्य के साथ जोड़कर याद करें।
  • उपसर्ग-प्रत्यय के प्रश्न में मूल शब्द एवं जुड़ने वाले शब्दांश दोनों स्पष्ट लिखें।

सामान्य भूलें (इनसे बचें)

  • बिरजू महाराज के पिता (अच्छन महाराज) एवं चाचाओं (शंभू एवं लच्छू महाराज) के नाम आपस में गड्डमड्ड न करें।
  • ‘गंडा’ की रस्म को महाराज ने उलट दिया था – यह न लिखें कि वे शुरू में ही गंडा बाँधते थे।
  • कथक को दक्षिण भारत का नृत्य न लिखें; यह उत्तर भारत का शास्त्रीय नृत्य है।
  • ‘साक्षात्कार’ को निबंध या कहानी न लिख दें – इसकी विधा साक्षात्कार है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘बिरजू महाराज से साक्षात्कार’ पाठ किस विधा का है और किसका साक्षात्कार है?

यह पाठ ‘साक्षात्कार’ (व्यक्तिपरक भेंटवार्ता) विधा का है। इसमें श्रेया, तनुश्री एवं माणिक नामक बच्चे प्रसिद्ध कथक-नर्तक पं. बिरजू महाराज से उनके जीवन, साधना एवं कला के बारे में प्रश्न पूछते हैं।

बिरजू महाराज को कथक की कला कैसे मिली?

उन्हें कथक विरासत में मिला। उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज एवं लच्छू महाराज उनके गुरु थे, और घर के कथक-माहौल में वे औपचारिक तालीम से पहले ही देख-देखकर सीख गए थे।

बिरजू महाराज के अनुसार ‘लय’ का क्या महत्व है?

उनके अनुसार लय केवल नृत्य में ही नहीं, जीवन की हर गतिविधि में होती है। यह हर काम एवं जीवन में संतुलन बनाए रखती है, अनुशासन सिखाती है और नृत्य को सुंदरता प्रदान करती है।

साक्षात्कार एवं प्रश्न/गतिविधि-शीर्षक NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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