Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 7 Solutions (NCERT 2026–27) – मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

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Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 7 पाठ: मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का सप्तम पाठ ‘मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा’ एक मधुर गीत (पद्य-पाठ) है, जिसमें संस्कृतभाषा की महिमा का सुन्दर गान किया गया है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है, जिसमें ओमिता नामक छात्रा अपनी सखी को श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले संस्कृत-दिवस एवं विद्यालय में आयोजित विशिष्ट कार्यक्रमों (गीत-गायन-प्रतियोगिता आदि) के विषय में बताती है। इसके पश्चात् चार पद्यों में संस्कृत को सुन्दरसुरभाषा (देववाणी) कहकर उसकी विशेषताएँ बताई गई हैं – यह मुनियों एवं कवियों द्वारा विकसित मनोहर ज्ञान-मञ्जूषा (पेटिका) है, अनेक भाषाओं की जननी है, वेद-वेदान्त के विचारों से परिपूर्ण है तथा नवरसों एवं अलंकारों से सुशोभित है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – संस्कृतभाषा सर्वत्र (धरती पर) विजयिनी है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ एक आधुनिक संस्कृत-गीत है, जो संस्कृतभाषा के सौन्दर्य एवं गौरव का वर्णन करता है। प्रत्येक पद्य की प्रत्येक पंक्ति के अन्त में ‘सुन्दरसुरभाषा’ पद का प्रयोग एक मधुर लय एवं टेक (refrain) के रूप में हुआ है। ‘सुर’ का अर्थ है देवता; अतः ‘सुरभाषा’ का अर्थ है देवभाषा। पाठ में संस्कृत को वेदव्यास, वाल्मीकि जैसे मुनियों तथा कालिदास, बाणभट्ट जैसे कवियों की भाषा बताया गया है, जो ज्ञान-विज्ञान, वेद-वेदान्त, आयुर्वेद एवं खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों में विद्यमान है। प्रत्येक पद्य के साथ पुस्तक में पदच्छेदः, अन्वयः एवं भावार्थः दिए गए हैं, जो भाव समझने में सहायक हैं।

मूल पद्यम् (भावार्थ सहित)

(चारों पद्य ज्यों-के-त्यों; नीचे प्रत्येक का पुस्तकानुसार पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ।)

मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा ।
अयि मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥ १ ॥ — पद्यम् १

पदच्छेदः – मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा । अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा ।

अन्वयः – (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि) । अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति ।

भावार्थः – संस्कृतभाषा अत्यन्त सुन्दर भाषा एवं देवभाषा के रूप में प्रसिद्ध है। मुनियों ने इस संस्कृतभाषा का विकास किया। यह भाषा अनेक भारतीय भाषाओं तथा विश्व की बहुत-सी भाषाओं की जननी-भाषा (स्रोत-भाषा) एवं गुरु-भाषा (पूरक-भाषा) है। बहुत-से कवियों ने काव्य-रचना द्वारा इसके सौन्दर्य को बढ़ाया। यह कोमल पदावली से परिपूर्ण ज्ञान की मनोहर पेटिका (मञ्जूषा) है। संस्कृतभाषा अपने शब्द-भण्डार से अन्य भाषाओं को तथा ज्ञान-विज्ञान को पुष्ट करती है। संस्कृतभाषा का गौरव वर्णन से परे है।

वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां
कालिदास-बाणादिकवीनाम् ।
पौराणिक-सामान्य-जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥ — पद्यम् २

पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनाम् कालिदास-बाणादिकवीनाम् पौराणिक-सामान्य-जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा ।

अन्वयः – (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिकसामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि) । त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि) ।

भावार्थः – संस्कृतभाषा अत्यन्त रमणीय भाषा है। वाल्मीकि, वेदव्यास आदि मुनियों ने रामायण-महाभारत-पुराण आदि ग्रन्थों की रचना की। कालिदास, बाणभट्ट आदि विशिष्ट कवियों ने भी उपादेय (उत्तम) काव्यों की रचना की। प्राचीन काल से लेकर आज तक सामान्य जनों का जीवन संस्कृतभाषा में रचित काव्यों से प्रभावित है। संस्कृतभाषा बहुत-से लक्ष्यों को प्राप्त कराने वाली है। अतः संस्कृतभाषा सुन्दर भाषा है।

श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे ।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥ — पद्यम् ३

पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा ।

अन्वयः – हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति) । (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि) ।

भावार्थः – वस्तुतः रमणीय एवं देवत्व-विधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृति की जननी के समान है। संस्कृतभाषा की ध्वनि सुनने से सुख बढ़ता है तथा सभी लोग आनन्दित होते हैं। संस्कृतभाषा वरदान के रूप में संस्कारजन्य ज्ञान प्रदान करती है और सरस विनोद-भाव को प्रकाशित करती है। यह मानव-जीवन में उत्तम गति एवं बुद्धि प्रदान करती है। काव्यशास्त्र से परिपूर्ण संस्कृतभाषा हमारी संस्कृति की रक्षा एवं प्रसार करती है।

नवरस-रुचिरालङ्कृति-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा ।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥ — पद्यम् ४

पदच्छेदः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय-वेदान्त-विचारा । वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा ।

अन्वयः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते ।

भावार्थः – संस्कृत-काव्यशास्त्र में शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत एवं शान्त – ये नौ रुचिकर रस हैं। शब्द एवं अर्थ से परिपूर्ण विविध अलंकार सुशोभित होते हैं। वेद, उपनिषद्, वेदान्त एवं पुराण आदि के विचार लोगों को प्रेरित करते हैं। चिकित्सा-विज्ञान (आयुर्वेद) एवं खगोलशास्त्र आदि के साथ संस्कृतभाषा पृथ्वी पर विचरण करती है। इस प्रकार संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयी होती है।

सार (Hindi Summary)

‘मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा’ पाठ का आरम्भ एक रोचक संवाद से होता है। ओमिता नामक छात्रा अपनी सखी को बताती है कि आज श्रावणी पूर्णिमा है, और इसी दिन संस्कृत-दिवस मनाया जाता है, जिसे एक सप्ताह तक (संस्कृत-सप्ताह के रूप में) मनाया जाता है। उसके विद्यालय में अनेक विशिष्ट कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है, जिनमें गीत-गायन-प्रतियोगिता भी सम्मिलित है। ओमिता उसमें भाग लेगी और अपनी सखी को भी निमन्त्रण देती है। इसी प्रसंग के साथ संस्कृतभाषा की महिमा का गीत आरम्भ होता है।

गीत के चार पद्यों में संस्कृत को बार-बार ‘सुन्दरसुरभाषा’ अर्थात् सुन्दर देवभाषा कहकर सम्बोधित किया गया है। प्रथम पद्य में संस्कृत को मुनियों द्वारा विकसित एवं कवियों द्वारा सुशोभित मनोहर ज्ञान-मञ्जूषा (पेटिका) कहा गया है, जिसकी पोषण-क्षमता वर्णन से परे है। दूसरे पद्य में बताया गया है कि यह वेदव्यास, वाल्मीकि जैसे मुनियों तथा कालिदास, बाणभट्ट जैसे कवियों एवं पौराणिक तथा सामान्य जनों के जीवन की आशा है। तीसरे पद्य में संस्कृत को कर्णप्रिय ध्वनि देने वाली, सबको आनन्दित करने वाली, स्मृति के लिए हितकारी, सरस विनोद देने वाली तथा काव्य में पारंगत संस्कृति की स्रोत-भाषा बताया गया है।

चौथे पद्य में संस्कृत को नवरसों से रुचिकर, अलंकारों को धारण करने वाली, वेद-वेदान्त के विचारों से युक्त तथा आयुर्वेद एवं खगोलशास्त्र आदि शास्त्रों में विचरण करने वाली भाषा कहा गया है। इन सभी विशेषताओं के कारण संस्कृतभाषा सम्पूर्ण धरती पर सर्वत्र विजयी होती है। संक्षेप में, यह पाठ संस्कृतभाषा के सौन्दर्य, गौरव एवं उसकी ज्ञान-समृद्धि का गुणगान करता है तथा छात्रों के मन में संस्कृत के प्रति प्रेम एवं आदर का भाव जगाता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
विकसिताविकसित की गई, विस्तारितProgressively developed
विलसिताआनन्द देने वाली, रञ्जितThat which gives joy
मञ्जुलामन को हरने वाली, मनोहराLovely / Charming
मञ्जूषापेटी, पेटिकाBox / Encasement
पोषणक्षमतापोषण की क्षमता, पालन-शक्तिNurturing capacity
मे / मममेरेMine
अतीतापार हो, अतिक्रान्तBeyond
वृन्दानाम्समूहों कीOf groups
नवम्नई, नूतनNew
वचनातीतावाणी से परे (वर्णन से परे)Beyond words
भूयिष्ठानाम्अधिकांश, अधिकतर कीMostly / of most
श्रुतिसुखनिनदेकर्णप्रिय ध्वनि देने वाली(O one) whose sound is pleasant to listen
सकलप्रमोदेसभी को आनन्द देने वालीThat which gives pleasure to all
सरसविनोदेमधुर विनोद करने वालीThat which creates pleasant humour
काव्यविशारदेकाव्य में पारंगत(O one) proficient in literature
रुचिराआनन्द प्रदान करने वाली, रुचिकरThat which gives happiness
अलङ्कृतिधाराअलंकारों को धारण करने वालीWell ornamented / bearing figures of speech
व्योमशास्त्रम्अन्तरिक्ष-विज्ञानAstronomy
धरायाम्धरती पर, पृथ्वी परOn earth
विजयतेविजयी होती हैIs victorious

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) सुन्दरसुरभाषा कस्य वचनातीता ?

उत्तरमम (वचनातीता) ।

(ख) संस्कृतभाषा कुत्र विजयते ?

उत्तरधरायाम् (पृथिव्याम्) ।

(ग) संस्कृतभाषा कस्य आशा ?

उत्तरजीवनस्य (आशा) ।

(घ) संस्कृते कति रसाः सन्ति ?

उत्तरनव (रसाः) ।

(ङ) कस्याः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते ?

उत्तरसंस्कृतभाषायाः (ध्वनिश्रवणेन) ।

2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —

(क) संस्कृतभाषा केषां जीवनस्य आशा अस्ति ?

उत्तरसंस्कृतभाषा वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां, कालिदास-बाणादिकवीनां, पौराणिक-सामान्यजनानां च जीवनस्य आशा अस्ति

(ख) केषां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति ?

उत्तरवेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति

(ग) कैः रसैः समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते ?

उत्तरनवभिः रसैः (शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्तैः रसैः) समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते

(घ) संस्कृतभाषा केषु शास्त्रेषु विहरति ?

उत्तरसंस्कृतभाषा वैद्य-व्योम-शास्त्रादिषु (चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्र-आदिषु शास्त्रेषु) विहरति

(ङ) संस्कृतभाषायाः कानि कानि सम्बोधनपदानि अत्र प्रयुक्तानि ?

उत्तरअत्र संस्कृतभाषायाः सम्बोधनपदानि सन्ति – मातः, श्रुतिसुखनिनदे, सकलप्रमोदे, स्मृतिहितवरदे, सरसविनोदे, गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे च ।

3. रेखाङ्कितपदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

(मूल वाक्य में रेखांकित पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए। रेखांकित पद मोटे अक्षरों में हैं।)

वाक्यम्प्रश्ननिर्माणम् (उत्तर)
(क) मुनिगणाः संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः ।के संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः ?
(ख) सामान्यजनानां जीवनं काव्यैः प्रभावितम् अस्ति ।सामान्यजनानां जीवनं कैः प्रभावितम् अस्ति ?
(ग) कवयः अपि उपादेयानि काव्यानि रचितवन्तः ।कवयः अपि कानि रचितवन्तः ?
(घ) संस्कृतभाषा पृथिव्याम् विहरति ।संस्कृतभाषा कुत्र विहरति ?
(ङ) संस्कृतभाषा विविधभाषाः परिपोषयति ।संस्कृतभाषा काः परिपोषयति ?
(च) वेद-वेदाङ्गादीनि गभीराणि शास्त्राणि सन्ति ।वेद-वेदाङ्गादीनि कीदृशानि शास्त्राणि सन्ति ?

4. अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं विभक्तिं वचनं च लिखत —

यथा – मातः → सम्बोधनम्, एकवचनम् ।

पदम्विभक्तिःवचनम्
तवषष्ठीएकवचनम्
मञ्जूषाप्रथमाएकवचनम्
संस्कृतिःप्रथमाएकवचनम्
जनानाम्षष्ठीबहुवचनम्
जीवनस्यषष्ठीएकवचनम्
धरायाम्सप्तमीएकवचनम्
शास्त्रेषुसप्तमीबहुवचनम्

5. अधोलिखितानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत —

कवर्गःखवर्गः (दत्त-विकल्पाः)
(क) अयि मातस्तव पोषणक्षमतास्मृतिहितवरदे सरसविनोदे
(ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनांविजयते धरायाम्
(ग) पौराणिक-सामान्यजनानाम्मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा
(घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदेकालिदासबाणादिकवीनाम्
(ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रादिविहाराजीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा
सही मेलनम् (उत्तर) (क) अयि मातस्तव पोषणक्षमता → मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा (ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां → कालिदासबाणादिकवीनाम् (ग) पौराणिक-सामान्यजनानाम् → जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा (घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे → स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे (ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रादिविहारा → विजयते धरायाम्

6. उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानां पदानाम् एकपदेन अर्थं (समासपदं) लिखत —

यथा – देवस्य आलयः = देवालयः ।

विग्रहःएकपदम् (समासः) – उत्तर
(क) सुराणां भाषासुरभाषा
(ख) सुन्दरी सुरभाषासुन्दरसुरभाषा
(ग) नवरसैः रुचिरानवरसरुचिरा
(घ) पोषणस्य क्षमतापोषणक्षमता
(ङ) मञ्जुला भाषामञ्जुलभाषा

7. पेटिकातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —

पेटिका (शब्द-मञ्जूषा): कालिदासबाणादि, आशा, संस्कृतिः, विजयते, मम, वेदविषय, मञ्जुलमञ्जूषा, सकलप्रमोदे

उत्तर यथा – मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित- मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा । (क) अयि मातः तव पोषणक्षमता मम वचनातीता । (ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां कालिदासबाणादि कवीनाम् । (ग) पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा (घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे । (ङ) गति-मति-प्रेरक-काव्य-विशारदे, तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा । (च) नवरस-रुचिरालङ्कृतिधारा वेदविषय-वेदान्तविचारा । (छ) वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा ।

8. अधोलिखितविकल्पेषु प्रसङ्गानुसारम् अर्थं चिनुत —

(क) “मञ्जुलमञ्जूषा” इत्यस्य अर्थः कः?

(i) कठोरभाषा
(ii) शोचनीया भाषा
(iii) मनोहररूपेण सकलिता
(iv) सामान्यभाषा

उत्तर(iii) मनोहररूपेण सकलिता।

(ख) सुन्दरसुरभाषा केषां जीवनस्य आशा उच्यते?

(i) केवलं कवीनाम्
(ii) बालकानाम्
(iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम्
(iv) छात्राणाम्

उत्तर(iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम्।

(ग) सुन्दरसुरभाषा कुत्र विजयते ?

(i) आकाशे
(ii) जलधौ
(iii) धरायाम्
(iv) पवने

उत्तर(iii) धरायाम्।

(घ) सुन्दरसुरभाषायां किं नास्ति ?

(i) शास्त्रज्ञानम्
(ii) संस्कृतिः
(iii) वेदान्तचिन्तनम्
(iv) अशुद्धिः

उत्तर(iv) अशुद्धिः।

(ङ) कविः सुन्दरसुरभाषां केन पदेन सम्बोधयति?

(i) पितः
(ii) मातः
(iii) भ्रातः
(iv) दातः

उत्तर(ii) मातः।

अत्र इदम् अवधेयम् (समास-तालिका)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत समास (compound) का परिचय दिया गया है। परस्पर सम्बद्ध सार्थक पदों के एकपदीभाव (एक पद में संक्षेप) को समास कहते हैं। प्रायः दो या दो से अधिक पदों के संक्षिप्तीकरण का नाम समास है।

विग्रहःसमासः (एकपदम्)
नद्याः तीरम्नदीतीरम्
राज्ञः पुत्रःराजपुत्रः
सुराणां भाषासुरभाषा
पोषणस्य क्षमतापोषणक्षमता
वचनम् अतीतावचनातीता
नवसंख्याकाः रसाःनवरसाः
नवरसैः रुचिरानवरसरुचिरा

समासस्य प्रभेदाः (समास के भेद)

समास के विविध प्रभेद हैं – अव्ययीभावः, तत्पुरुषः, कर्मधारयः, द्विगुः, द्वन्द्वः, बहुव्रीहिः च ।

समासःलक्षणम् (विशेषता)उदाहरणम्
अव्ययीभावःप्रायः पूर्वम् अव्ययपदस्य प्रयोगः भवतिरूपस्य योग्यम् – अनुरूपम्
तत्पुरुषःपरपदस्य प्राधान्यं भवतिसुराणां भाषा – सुरभाषा
द्विगुःपूर्वं संख्यावाचकपदस्य व्यवहारः भवतिपञ्चानां वटानां समाहारः – पञ्चवटी
बहुव्रीहिःअन्यपदस्य प्राधान्यं भवतिपीतम् अम्बरं यस्य सः – पीताम्बरः (श्रीविष्णुः)

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः – संस्कृतप्रशस्तयः

पाठ के अन्त में संस्कृत की महिमा का वर्णन करने वाली पाँच प्रशस्तियाँ (श्लोक) दी गई हैं:

१. मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथैव च ।
   भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम् ॥

२. भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा ।
   विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता ॥

३. पुरुषाः संस्कृताः सन्तु महिलाः सन्तु संस्कृताः ।
   संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम् ॥

४. संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः ।
   वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम् ॥

५. यावद् भारतवर्षं स्याद् यावद् विन्ध्यहिमाचलौ ।
   यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम् ॥

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. संस्कृतेन जीवनं कथं समृद्धं भवेत् इति अधिकृत्य ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां विजयते’ इति संस्कृतनाटिकया छात्राः जागरूकाः करणीयाः ।

मार्गदर्शनम्यह समूह-गतिविधि है। ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां विजयते’ विषय पर एक छोटी संस्कृत-नाटिका तैयार कीजिए, जिसमें यह दर्शाया जाए कि संस्कृत के अध्ययन से ज्ञान, संस्कार एवं जीवन कैसे समृद्ध होते हैं। कक्षा में इसका मंचन करके सहपाठियों को संस्कृत के प्रति जागरूक कीजिए।

2. सरलसंस्कृतगीतानां सङ्ग्रहं कुरुत कक्षायां च गायत ।

मार्गदर्शनम्कुछ सरल संस्कृत-गीतों का संग्रह कीजिए और कक्षा में मधुर स्वर में गाइए। यथा – सुरससुबोधा विश्वमनोज्ञा, मनसा सततं स्मरणीयम्, मृदपि च चन्दनमस्मिन् देशे इत्यादि।

3. संस्कृतसाहित्ये प्रसिद्धानां कवीनां काव्यानां च सङ्ग्रहः करणीयः ।

मार्गदर्शनम्संस्कृत-साहित्य के प्रसिद्ध कवियों एवं उनके काव्यों की सूची बनाइए। यथा – कालिदास (अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम्), भवभूति (उत्तररामचरितम्), बाणभट्ट (कादम्बरी, हर्षचरितम्), भारवि (किरातार्जुनीयम्), माघ (शिशुपालवधम्) इत्यादि।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. इस पाठ में संस्कृतभाषा को बार-बार किस पद से सम्बोधित किया गया है और उसका क्या अर्थ है?

उत्तरइस पाठ में संस्कृतभाषा को बार-बार ‘सुन्दरसुरभाषा’ पद से सम्बोधित किया गया है। ‘सुर’ का अर्थ है देवता, अतः ‘सुन्दरसुरभाषा’ का अर्थ है – सुन्दर देवभाषा (देववाणी)। यह पद गीत की टेक (refrain) के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

2. श्रावणी पूर्णिमा का पाठ में क्या वैशिष्ट्य बताया गया है?

उत्तरपाठ के आरम्भिक संवाद में बताया गया है कि श्रावणी पूर्णिमा के दिन संस्कृत-दिवस मनाया जाता है। इसे एक सप्ताह तक संस्कृत-सप्ताह के रूप में मनाया जाता है, जिसमें गीत-गायन-प्रतियोगिता जैसे अनेक विशिष्ट कार्यक्रमों का आयोजन होता है।

3. प्रथम पद्य में संस्कृतभाषा को ‘मञ्जुलमञ्जूषा’ क्यों कहा गया है?

उत्तरप्रथम पद्य में संस्कृतभाषा को ‘मञ्जुलमञ्जूषा’ अर्थात् मनोहर पेटिका कहा गया है, क्योंकि वह कोमल पदावली एवं ज्ञान से परिपूर्ण है। मुनियों ने इसका विकास किया तथा कवियों ने अपने काव्य से इसे सुशोभित किया, इसलिए यह ज्ञान की सुन्दर मञ्जूषा है।

4. संस्कृत में कितने रस हैं? उनके नाम लिखिए।

उत्तरसंस्कृत-काव्यशास्त्र में नौ रस हैं – शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत एवं शान्त। इन्हीं नवरसों से संस्कृत-साहित्य समृद्ध एवं रुचिकर है।

5. समास किसे कहते हैं? इसके भेद लिखिए।

उत्तरपरस्पर सम्बद्ध सार्थक पदों के एकपदीभाव (संक्षेप) को समास कहते हैं; यथा – सुराणां भाषा = सुरभाषा। समास के छह प्रमुख भेद हैं – अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व एवं बहुव्रीहि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा’ पाठ में वर्णित संस्कृतभाषा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तरइस गीत में संस्कृतभाषा को ‘सुन्दरसुरभाषा’ अर्थात् सुन्दर देवभाषा कहकर उसकी अनेक विशेषताएँ बताई गई हैं। यह मुनियों द्वारा विकसित एवं कवियों द्वारा सुशोभित मनोहर ज्ञान-मञ्जूषा है, जिसकी पोषण-क्षमता वर्णन से परे है। यह अनेक भाषाओं की जननी-भाषा एवं गुरु-भाषा है।यह वेदव्यास, वाल्मीकि जैसे मुनियों तथा कालिदास, बाणभट्ट जैसे कवियों एवं पौराणिक तथा सामान्य जनों के जीवन की आशा है। इसकी ध्वनि कर्णप्रिय है, यह सबको आनन्द देती है, स्मृति के लिए हितकारी है तथा सरस विनोद प्रदान करती है। यह नवरसों एवं अलंकारों से सुशोभित है तथा वेद-वेदान्त, आयुर्वेद एवं खगोलशास्त्र आदि से युक्त है। इन्हीं गुणों के कारण संस्कृतभाषा सम्पूर्ण धरती पर सर्वत्र विजयी होती है।

7. संस्कृतभाषा को ‘अनेक भाषाओं की जननी’ क्यों कहा जाता है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपाठ के अनुसार संस्कृतभाषा भारत की अनेक भाषाओं तथा विश्व की बहुत-सी भाषाओं की जननी-भाषा (स्रोत-भाषा) एवं गुरु-भाषा (पूरक-भाषा) है। इसका अर्थ यह है कि अनेक भाषाओं के शब्द एवं व्याकरण-संरचना संस्कृत से ही विकसित हुई है।संस्कृतभाषा अपने समृद्ध शब्द-भण्डार (पदावली) से अन्य भाषाओं को तथा ज्ञान-विज्ञान को पुष्ट करती है। प्राचीन काल से वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण तथा कालिदास-बाणभट्ट आदि के काव्य संस्कृत में ही रचे गए, जिन्होंने सामान्य जनों के जीवन एवं चिन्तन को प्रभावित किया। इस प्रकार ज्ञान, संस्कृति एवं भाषा – तीनों की मूल स्रोत होने के कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहा जाता है।

8. समास से क्या तात्पर्य है? उसके भेदों का उदाहरण सहित संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तरपरस्पर सम्बद्ध सार्थक पदों के एकपदीभाव अर्थात् दो या अधिक पदों के संक्षिप्तीकरण को समास कहते हैं। यथा – नद्याः तीरम् = नदीतीरम्, राज्ञः पुत्रः = राजपुत्रः। समास के छह प्रमुख भेद होते हैं।(1) अव्ययीभाव – इसमें प्रायः पूर्वपद अव्यय होता है (रूपस्य योग्यम् = अनुरूपम्)। (2) तत्पुरुष – इसमें परपद की प्रधानता होती है (सुराणां भाषा = सुरभाषा)। (3) कर्मधारय – विशेषण-विशेष्य का समास। (4) द्विगु – पूर्वपद संख्यावाचक होता है (पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी)। (5) द्वन्द्व – दोनों पद प्रधान होते हैं। (6) बहुव्रीहि – अन्यपद की प्रधानता होती है (पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः)।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस विषय पर आधारित गीत है?

(क) मातृभूमि

(ख) संस्कृतभाषा की महिमा

(ग) प्रकृति

(घ) मित्रता

उत्तर(ख) संस्कृतभाषा की महिमा।

2. ‘सुरभाषा’ का अर्थ है—

(क) मीठी भाषा

(ख) देवभाषा

(ग) मातृभाषा

(घ) कठिन भाषा

उत्तर(ख) देवभाषा। (सुर = देवता)

3. श्रावणी पूर्णिमा के दिन कौन-सा दिवस मनाया जाता है?

(क) हिन्दी-दिवसः

(ख) शिक्षक-दिवसः

(ग) संस्कृत-दिवसः

(घ) गणतन्त्र-दिवसः

उत्तर(ग) संस्कृत-दिवसः।

4. इस गीत में कुल कितने पद्य हैं?

(क) तीन

(ख) चार

(ग) पाँच

(घ) छह

उत्तर(ख) चार।

5. ‘मञ्जूषा’ शब्द का अर्थ है—

(क) पुष्प

(ख) पेटिका (पेटी)

(ग) नदी

(घ) वृक्ष

उत्तर(ख) पेटिका (पेटी)।

6. संस्कृत-साहित्य में कितने रस माने गए हैं?

(क) सात

(ख) आठ

(ग) नौ

(घ) दस

उत्तर(ग) नौ (नवरसाः)।

7. ‘व्योमशास्त्रम्’ का अर्थ है—

(क) चिकित्सा-विज्ञान

(ख) अन्तरिक्ष-विज्ञान (खगोलशास्त्र)

(ग) रसायन-विज्ञान

(घ) गणित

उत्तर(ख) अन्तरिक्ष-विज्ञान (खगोलशास्त्र)।

8. संस्कृतभाषा कहाँ विजयी होती है?

(क) आकाशे

(ख) जलधौ

(ग) धरायाम् (पृथ्वी पर)

(घ) पवने

उत्तर(ग) धरायाम् (पृथ्वी पर)।

9. ‘सुराणां भाषा’ का समासपद क्या है?

(क) सुरभाषा

(ख) भाषासुरा

(ग) सुरगण

(घ) देवभाषा

उत्तर(क) सुरभाषा। (तत्पुरुष समास)

10. किस कवि को इस पाठ में संस्कृत-कवि के रूप में स्मरण किया गया है?

(क) तुलसीदास

(ख) कालिदास

(ग) सूरदास

(घ) कबीर

उत्तर(ख) कालिदास। (कालिदास-बाणादिकवीनाम्)
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ग), 9-(क), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): संस्कृत को ‘सुन्दरसुरभाषा’ कहा गया है।

कारण (R): ‘सुर’ का अर्थ देवता है, अतः संस्कृत देवभाषा मानी जाती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): संस्कृतभाषा अनेक भाषाओं की जननी-भाषा है।

कारण (R): संस्कृतभाषा अपने शब्द-भण्डार से अन्य भाषाओं एवं ज्ञान-विज्ञान को पुष्ट करती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): ‘सुराणां भाषा = सुरभाषा’ तत्पुरुष समास का उदाहरण है।

कारण (R): तत्पुरुष समास में पूर्वपद की प्रधानता होती है।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – तत्पुरुष समास में परपद की प्रधानता होती है, पूर्वपद की नहीं।

4. अभिकथन (A): संस्कृत-साहित्य नवरसों से समृद्ध है।

कारण (R): संस्कृत-काव्यशास्त्र में शृङ्गार, हास्य, करुण आदि नौ रस माने गए हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): संस्कृतभाषा सम्पूर्ण धरती पर विजयी होती है।

कारण (R): संस्कृत आयुर्वेद एवं खगोलशास्त्र आदि अनेक शास्त्रों में विद्यमान एवं उपयोगी है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • चारों पद्य कण्ठस्थ करें – मेलन, रिक्तस्थान-पूर्ति एवं भावार्थ के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • शब्दार्थ (मञ्जूषा, वचनातीता, आकूति-रहित सम्बोधनपद, धरायाम्, व्योमशास्त्रम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • समास एवं उसके छह भेद उदाहरण सहित याद करें – विशेषतः तत्पुरुष (परपद-प्रधान) एवं बहुव्रीहि (अन्यपद-प्रधान)।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में केवल एक शब्द तथा ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ में पूरा वाक्य लिखें।
  • सभी सम्बोधनपद (मातः, श्रुतिसुखनिनदे, सकलप्रमोदे, स्मृतिहितवरदे, सरसविनोदे, काव्यविशारदे) सूची-रूप में याद रखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • तत्पुरुष समास में ‘पूर्वपद-प्रधान’ लिख देना – इसमें परपद की प्रधानता होती है।
  • संस्कृत में रसों की संख्या आठ या दस बता देना – ये नौ (नवरस) हैं।
  • मात्रा एवं संयुक्ताक्षर की अशुद्धि – मञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा, अलङ्कृतिधारा को शुद्ध लिखें।
  • ‘धरायाम्’ को आकाश/जल मान लेना – इसका अर्थ ‘पृथ्वी पर’ है।
  • सम्बोधनपद को कर्ता मान लेना – मातः, श्रुतिसुखनिनदे आदि सम्बोधन (आठवीं विभक्ति-तुल्य) पद हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का पाठ 7 ‘मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा’ किस विषय पर है?

यह एक संस्कृत-गीत है जो संस्कृतभाषा की महिमा का गुणगान करता है। इसमें संस्कृत को बार-बार ‘सुन्दरसुरभाषा’ (सुन्दर देवभाषा) कहकर उसकी विशेषताएँ बताई गई हैं और कहा गया है कि संस्कृत सम्पूर्ण धरती पर विजयी होती है।

‘सुन्दरसुरभाषा’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – ‘सुन्दर देवभाषा’। ‘सुर’ का अर्थ देवता है, अतः ‘सुरभाषा’ का अर्थ देवभाषा (देववाणी) है। यह पद गीत में टेक के रूप में बार-बार आता है।

इस पाठ में समास के कितने भेद बताए गए हैं?

पाठ के ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ भाग में समास के छह भेद बताए गए हैं – अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व एवं बहुव्रीहि। उदाहरण के लिए ‘सुराणां भाषा = सुरभाषा’ तत्पुरुष समास है।

पद्य, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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